घोषणा पत्र
Sunday, 30 October, 2011 by Srijan Shilpi
- उपलब्ध समस्त प्राकृतिक संसाधनों पर प्रत्येक नागरिक का एक समान अधिकार है। इस अधिकार का प्रयोग वह इन संसाधनों के संरक्षण और प्रबंधन में अपना योगदान देकर कर सकता है।
- समय आ गया है कि प्रत्येक व्यक्ति को न्याय सुनिश्चित और सुलभ कराने के लिए एक निर्णायक और अनवरत कार्रवाई शुरू की जाए।
- मानवता ही एकमात्र धर्म है। सत्य, प्रेम और न्याय उसके मूल सिद्धांत हैं जिनका लक्ष्य है शांति, आनंद और करुणा को उपलब्ध हो जाना। उपासना के लिए जिनका काम स्थूल प्रतीकों के बिना नहीं चल पाता, उनके लिए सर्वमान्य साक्षात देव प्रतिमाएं हैं – चंद्रमा, पृथ्वी और सूर्य।
- स्वतंत्रता, समानता और मित्रतापूर्ण सहकार पर आधारित लोकतंत्र ही सही राजनीतिक व्यवस्था है, जो सर्वोदय पर आधारित हो और जिसमें हाशिये के वर्गों के उत्थान के लिए विशेष प्रावधान हों।
- हमें ऐसी सामाजिक संरचना के लिए काम करना है जिसमें सबको समान अवसर और समान प्रतिष्ठा मिले, और जिसमें कोई पदानुक्रम न हो।
- संसाधनों का वितरण नागरिकों की आवश्यकताओं के अनुरूप हो और दायित्वों का निर्धारण उनकी क्षमताओं के अनुरूप हो।
- बुनियादी शिक्षा, समुचित स्वास्थ्य सुविधा और योग्यता के अनुरूप रोजगार प्रत्येक व्यक्ति को उपलब्ध हो।
- देश के सभी भागों में विकास के लिए आवश्यक बुनियादी अवसंरचना उपलब्ध हो।
- देश भ्रष्टाचार से मुक्त हो और उसकी राजनीतिक, प्रशासनिक एवं न्यायिक व्यवस्था में केवल ऐसे व्यक्तियों को प्रवेश करने दिया जाए, जो नैतिक मानदंडों पर खरा उतरते हों।
- व्यक्ति अपनी अधिकतम क्षमता के अनुरूप धनार्जन करे और औसत आवश्यकता के अनुरूप खर्च करे। बचत में से एक अंश नियमित रूप से समाज के हित के लिए अपने पास न्यासी के तौर पर रखे।
- जब प्रकृति प्रदत्त जीवन ऊर्जा किसी कुशल व्यक्ति में अनुकूल दिशा का संधान कर लेती है तो वह सृजनकारी बन जाती है। यदि उस सृजन में सत्य की शक्ति और सबके प्रति प्रेम का आकर्षण मौजूद हो और वह निष्काम भाव से मानव धर्म की सदभावना के साथ सबको न्याय सुनिश्चित कराने की दिशा में प्रेरित हो तो जीवन ऊर्जा का चक्र पूरा हो जाता है और वह आत्मा को मुक्त कर देती है। जीवन ऊर्जा को ऐसी अनुकूल सृजनशील दिशा देना ही मुक्ति का सर्वोत्तम मार्ग है।
[वे मूल विचार-सूत्र जिनकी अभिव्यक्ति भिन्न-भिन्न संदर्भों में इस ब्लॉग की पोस्टों में अक्सर होते हैं।]
