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	<title>सृजन शिल्पी</title>
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	<description>बेहतर दुनिया के लिए बेहतर इंसान चाहिए</description>
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		<title>बात सच्ची हो तो चाहे जिस ज़बां में बोलिये</title>
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		<pubDate>Thu, 17 Nov 2011 18:44:52 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Srijan Shilpi</dc:creator>
				<category><![CDATA[चिट्ठाकारिता]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
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		<category><![CDATA[जन सरोकार]]></category>
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		<description><![CDATA[स्कूल के दिनों में समूह प्रार्थना करते समय हमारे कुछ मुसलमान सहपाठी पंक्ति में शामिल तो होते थे, पर मौन रहते थे और उनके हाथों की मुद्रा भी विश्राम में रहती थी। यहां तक कि धर्मनिरपेक्ष शब्दावली वाली प्रार्थनाओं या राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत के समय भी उनका अंदाज वही रहता था। एक बार टोका तो उनमें [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">स्कूल के दिनों में समूह प्रार्थना करते समय हमारे कुछ मुसलमान सहपाठी पंक्ति में शामिल तो होते थे, पर मौन रहते थे और उनके हाथों की मुद्रा भी विश्राम में रहती थी। यहां तक कि धर्मनिरपेक्ष शब्दावली वाली प्रार्थनाओं या <a href="http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%9C%E0%A4%A8_%E0%A4%97%E0%A4%A3_%E0%A4%AE%E0%A4%A8" target="_blank">राष्ट्रगान</a> और<a href="http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%87_%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A5%8D" target="_blank"> राष्ट्रगीत</a> के समय भी उनका अंदाज वही रहता था। एक बार टोका तो उनमें से एक ने बताया कि वे ऐसा अपनी धार्मिक मान्यतायों के कारण करते हैं। लेकिन इस बात को लेकर हमारे यहां कोई मुद्दा बना हो, ऐसा याद नहीं आता।</p>
<p style="text-align: justify;">जब कॉलेज में थे तो एक बार पढ़ने में आया कि केरल के एक स्कूल से एक खास समुदाय के कुछ बच्चों को इसलिए निकाल दिया गया था वे राष्ट्रगान के समय सबके साथ खड़े तो रहते थे, मगर उसे गाते नहीं थे। वह मामला उच्चतम न्यायालय तक पहुंचा था और अदालत ने अपने <a href="http://www.angelfire.com/linux/prasun/cipe/009.txt" target="_blank">फैसले में</a> स्पष्ट किया कि</p>
<blockquote>
<p style="text-align: justify;">यदि कोई व्यक्ति राष्ट्र-गान का सम्मान तो करता है पर उसे गाता नहीं है तो इसका मतलब यह नहीं कि वह इसका अपमान कर रहा है।</p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">लेकिन, उसके बाद भी जब कभी स्कूलों में वन्दे मातरम् के गायन को अनिवार्य किए जाने के प्रयास हुए तो उस पर उठे <a href="http://www.hindu.com/fline/fl1601/16010940.htm" target="_blank">हंगामे</a> को शांत करने के लिए समाधान यही सुझाया गया कि इसे थोपा नहीं जाना चाहिए कि हर कोई इसे गाये ही, लेकिन उसका सम्मान वह जरूर करे।</p>
<p style="text-align: justify;">हाल ही में मध्य प्रदेश के स्कूलों में बच्चों के लिए <a href="http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/11446475.cms" target="_blank">सूर्य नमस्कार</a>, प्राणायाम और अब, <a href="http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/10717288.cms" target="_blank">गीता</a> की शिक्षा को अनिवार्य किए जाने पर भी ऐसा ही विवाद देखने को मिला।</p>
<p style="text-align: justify;">जंतर-मंतर पर अन्ना के अनशन के दौरान बनाए गए मंच की पृष्ठभूमि में भारत माता की मौजूदगी को लेकर भी इतने सवाल उठाए गए कि रामलीला मैदान में अनशन के दौरान आयोजकों को यह जरूरी लगा कि मंच की पृष्ठभूमि में महात्मा गांधी का चित्र लगाकर धर्मनिरपेक्षता का परिचय दिया जाए।</p>
<p style="text-align: justify;"><div class="wpcol-one-half">
<div class="mceTemp" style="text-align: center;">
<dl id="attachment_855" class="wp-caption alignnone" style="width: 235px;">
<dt class="wp-caption-dt"><img class="size-full wp-image-855" title="Anna_Hazare_bharat mata" src="http://srijanshilpi.com/wp-content/uploads/Anna_Hazare_bharat-mata.jpg" alt="" width="225" height="200" /></dt>
<dd class="wp-caption-dd">जंतर-मंतर पर अण्णा हजारे</dd>
</dl>
</div>
</div></p>
<div class="wpcol-one-half wpcol-last">
<div id="attachment_864" class="wp-caption alignnone" style="width: 310px"><img class="size-medium wp-image-864 " title="anna-hazare-ramlila" src="http://srijanshilpi.com/wp-content/uploads/anna-hazare-ramlila-300x229.jpg" alt="" width="300" height="200" /><p class="wp-caption-text">रामलीला मैदान में अण्णा हजारे</p></div>
</div><div class="wpcol-divider"></div>
<p style="text-align: justify;">धर्मनिरपेक्षता बरतने की इतनी कोशिश के बाद भी अण्णा द्वारा &#8216;भारत माता की जय&#8217; और &#8216;वन्दे मातरम्&#8217; के नारे लगवाए जाने पर जामा मस्जिद के इमाम के<a href="http://visfot.com/home/index.php/permalink/4850.html" target="_blank"> नाराज होने</a> और टीम अन्ना द्वारा इमाम को <a href="http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/9699095.cms" target="_blank">मनाए जाने</a> की कोशिश के वाकये पर लखनऊ के एक शायर<strong><a href="http://www.blogger.com/profile/05881620690512870733" target="_blank"> काज़िम जरवली</a></strong> ने कुछ यूँ अर्ज़ किया:</p>
<blockquote>
<p style="text-align: justify; padding-left: 90px;">बात सच्ची हो तो चाहे जिस ज़बा मे बोलिये,<br />
फर्क मतलब पर नहीं पड़ता है ख़ालिक़ कि क़सम ।<br />
&#8220;माँ के पैरो मे है जन्नत&#8221; क़ौल है मासूम का,<br />
मै मुसल्ले पर भी कह सकता हुं “वन्दे मातरम” ।।</p>
</blockquote>
<p>अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए उन्होंने एक खत भी लिखा:</p>
<blockquote>
<p style="text-align: justify;">पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद ने फ़रमाया है कि &#8220;जन्नत माँ के पैरों के नीचे है&#8221; अर्थात् माँ वन्दनीय है। यह एक साफ़ मुस्लिम दृष्टिकोण है। किसी आन्दोलन में भाग लेना या विरोध करना एक निजी फैसला हो सकता है, लेकिन धर्म के नाम पर इसका विरोध निन्दनीय है; और वन्दे मातरम कहने में इस्लामिक दृष्टिकोण से कोई बुराई नहीं है।</p>
<p style="text-align: justify;">वन्दे मातरम का मतलब है कि हे माँ, आप पूज्य हैं और वास्तव में माँ पूज्य है। माँ को पूजनीय कहने में किसी को भी कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। यह केवल शब्दों का हेरफेर भर है, वरना किस मुसलमान के लिए माँ पूजनीय नहीं है, अर्थात् सब पूजनीय मानते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">केवल इस वजह से माँ को पूज्य मानने से इनकार करना कि ये शब्द (वन्दे मातरम) हिंदी में कहे गए हैं, इसे केवल एक संकीर्ण मानसिकता ही कहा जा सकता है। वे इसे मुसल्ले (नमाज़ पढ़ने का पवित्र कपड़ा) पर भी कह सकते हैं, क्योंकि माँ को पूज्य होने का दर्जा उसी पैग़म्बर ने दिया है जिसने नमाज़ पढने को कहा है। यह कहाँ का तर्क है कि एक कहा माने और एक कहा न माने।</p>
<p style="text-align: justify;">माँ को पूज्य मानने या कहने का मतलब यह कदापि नहीं कि उसको भगवान मान लिया है; और वो हमारे कहते ही अब ईश्वर हो गयी; और ये दो ईश्वरवाद का सिद्धांत हो गया। हे संकीर्ण मानसिकता वालों, माँ को भगवान् हिन्दू भी नहीं मानते, बल्कि कोई धर्म माँ को ईश्वर नहीं मानता। हिन्दू धर्म में मातृभूमि को माँ का दर्जा दिया जाता है। इसमें कुछ भी गलत नहीं है। देश से प्यार करना एक गर्व की बात है। कोई नास्तिक भी इसका विरोध नहीं कर सकता। भगवान के मानने वालों की तो बात ही अलग है। यहाँ पर यह विदित रहे, इसलिए मुस्लिम इतिहास का हवाला दिया जा रहा कि पैग़म्बर मुहम्मद ने अपने जीवन में सिर्फ एक बार आक्रमण किया। यह आक्रमण मक्का, जो उनकी मातृभूमि थी, उसमें रहने का हक़ पाने के लिए किया गया था। इस्लाम में भी देशप्रेम की भावना को उचित और ज़रूरी बताया गया है।</p>
<p style="text-align: justify;">यहाँ पर प्रकट विचारों का अभिप्राय किसी धर्म-विशेष को अच्छा-बुरा बताना या किसी आन्दोलन को सही या गलत क़रार देना नहीं है। बल्कि धर्म के नाम पर नफरत व द्वेष का वातावरण न पैदा होने देना है। यदि कोई इन निजी विचारों से सहमत नहीं है तो वह इसके लिए बाध्य भी नहीं है। हमारा विनम्र निवेदन यही होगा कि न बुखारी को माने, न तोगड़िया के उग्र भाषणों से प्रेरित हों, बल्कि अपने अन्दर बैठे विकेक का प्रयोग करे, तब सही या गलत का निर्णय ले ।</p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;"><em><img class="alignleft size-thumbnail wp-image-880" title="Kazim Jarwali" src="http://srijanshilpi.com/wp-content/uploads/Kazim-Jarwali-100x96.jpg" alt="" width="100" height="96" /></em><span style="color: #ff6600;">लखनऊ के निकट जरवल में 1955 में जन्मे क़ाजिम जरवली फिलहाल लखनऊ के शिया कॉलेज में कार्यरत हैं और देश-विदेश में आयोजित होने वाले मुशायरों में भाग लेते रहते हैं और कई पुरस्कारों से भी वह नवाजे जा चुके हैं। उनकी रचनाओं के कुछ संकलन भी प्रकाशित हुए हैं। हाल ही में उन्होंने अपनी रचनाओं को <a href="http://kazimjarwali.blogspot.com" target="_blank"><span style="color: #ff6600;">अपने ब्लॉग </span></a>पर भी डालना शुरू किया है और <a href="http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%BC%E0%A4%BF%E0%A4%AE_%E0%A4%9C%E0%A4%B0%E0%A4%B5%E0%A4%B2%E0%A5%80" target="_blank"><span style="color: #ff6600;">कविता कोश</span></a> पर भी वे रचनाएं उपलब्ध हैं।  </span></p>
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		<title>गहन मौन के बहुआयामी चित्र</title>
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		<pubDate>Mon, 14 Nov 2011 19:13:58 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Srijan Shilpi</dc:creator>
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		<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
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		<description><![CDATA[&#8216;मौन, शून्य और शांति&#8217; सत्य के प्राय: सभी साधकों के लिए अभिव्यक्ति के न सिर्फ प्रस्थान-बिंदु, बल्कि चरम गंतव्य भी रहे हैं। यह और बात है कि अभिव्यक्ति के लिए वे भले ही अलग-अलग माध्यम चुनते हों। अक्षय अमेरिया  हमारे दौर के एक ऐसे ही युवा चित्रकार हैं, जिनके चित्रों में मौन के महाशून्य से [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div style="border-bottom: #5c8a64 3px solid; text-align: center; padding-bottom: 2px; line-height: 125%; margin: 12px; width: 660px; float: right; font-size: 13pt; border-top: #5c8a64 3px solid; font-weight: normal; padding-top: 2px;">
<p style="text-align: justify;">&#8216;मौन, शून्य और शांति&#8217; सत्य के प्राय: सभी साधकों के लिए अभिव्यक्ति के न सिर्फ प्रस्थान-बिंदु, बल्कि चरम गंतव्य भी रहे हैं। यह और बात है कि अभिव्यक्ति के लिए वे भले ही अलग-अलग माध्यम चुनते हों।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><img class="alignleft size-full wp-image-804" title="Akshay ameria" src="http://srijanshilpi.com/wp-content/uploads/Akshay-ameria.jpg" alt="" width="176" height="176" /></strong><strong><a href="http://axaykafalak.blogspot.com/p/about-axy-ka-falak.html" target="_blank">अक्षय अमेरिया</a> </strong> हमारे दौर के एक ऐसे ही युवा चित्रकार हैं, जिनके चित्रों में मौन के महाशून्य से निकले शांति के स्वर गूंजते हैं। जैसा कि हर सच्चा कलाकार होता है, अक्षय के चित्र उनके भीतर के स्वप्न-द्रष्टा की झलक दिखाते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">1963 में इंदौर में जन्मे और उज्जैन में रहने वाले अक्षय अमेरिया ने एम. एस. विश्वविद्यालय, बड़ौदा से चित्रकला में स्नातक की उपाधि प्राप्त की है और वह अचल एलायस अवार्ड, अभ्युदय सम्मान, मीरा कला सम्मान, विष्णु चिंचालकर कला सृजन सम्मान आदि जैसे कई सम्मानों से अलंकृत हो चुके हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">मैंने पहले गौर नहीं किया था, पर अब ध्यान में आया है कि इस ब्लॉग पर भी उनका यदा-कदा आना-जाना रहा है। यहां तक कि उनके भेजे कई चित्र मेरे ई-मेल के इनबॉक्स में भी पाए गए हैं, जो असावधानी के चलते मेरी निगाहों से अब तक ओझल ही थे।</p>
<p style="text-align: justify;">कहते हैं कि एक चित्र हजार शब्दों के बराबर अभिव्यक्ति करने में सक्षम होता है। मगर जब वह चित्र मौन को अभिव्यक्त करे तो &#8230;? उसके बराबर अभिव्यक्ति की क्षमता कितने शब्दों में होगी? अपनी कुछ पोस्टों में मैंने<a href="http://srijanshilpi.com/archives/37" target="_blank"> मौन को समझने</a> और अभिव्यक्त करने के प्रयास किए हैं। लेकिन यदि आप अक्षय के इन चित्रों को देखें तो पता चलेगा कि शब्दों के बनिस्पत चित्र उसे कितने बेहतर अभिव्यक्त कर सकते हैं:</p>
</div>
<p>&nbsp;</p>
<div class="wpcol-one-half">
<p><img class="size-full wp-image-808 alignnone" title="Thought of the day" src="http://srijanshilpi.com/wp-content/uploads/Thought-of-the-day-02.jpg" alt="" width="184" height="250" /></p>
<p style="text-align: justify;"><img class="size-medium wp-image-814 alignnone" title="Head 4589" src="http://srijanshilpi.com/wp-content/uploads/Head-4589-218x300.jpg" alt="" width="184" height="250" /></p>
<p style="text-align: justify;"><img class="size-medium wp-image-816 alignnone" title="Head 4544" src="http://srijanshilpi.com/wp-content/uploads/Head-4544-218x300.jpg" alt="" width="184" height="250" /></p>
<p style="text-align: justify;"><div class="wpcol-one-half wpcol-last"></div><div class="wpcol-divider"></div></p>
<p style="text-align: justify;"> </div>
<p style="text-align: justify;"><div class="wpcol-one-half wpcol-last">
<p style="text-align: justify;"><img class="alignnone size-medium wp-image-824" title="Head 4587" src="http://srijanshilpi.com/wp-content/uploads/Head-4587-218x300.jpg" alt="" width="184" height="250" /></p>
<p style="text-align: justify;"><img class="alignnone size-medium wp-image-825" title="Head 4560" src="http://srijanshilpi.com/wp-content/uploads/Head-4560-218x300.jpg" alt="" width="184" height="250" /></p>
<p style="text-align: justify;"><img class="alignnone size-medium wp-image-826" title="Head 4555" src="http://srijanshilpi.com/wp-content/uploads/Head-4555-218x300.jpg" alt="" width="184" height="250" /></div><div class="wpcol-divider"></div></p>
<p style="text-align: justify;">
<div id="crp_related"><h3>कुछ अन्य लेख:</h3><ul><li><a href="http://srijanshilpi.com/archives/853" rel="bookmark" class="crp_title">बात सच्ची हो तो चाहे जिस ज़बां में बोलिये</a></li><li><a href="http://srijanshilpi.com/archives/90" rel="bookmark" class="crp_title">गांधीजी का ट्रस्टीशिप संबंधी सिद्धांत</a></li><li><a href="http://srijanshilpi.com/archives/184" rel="bookmark" class="crp_title">कुछ तो अलग जरूर था जंतर-मंतर पर</a></li><li><a href="http://srijanshilpi.com/archives/483" rel="bookmark" class="crp_title">केवल गैर-जिम्मेदार और भ्रष्ट नौकरशाह ही घबराते हैं आरटीआई से</a></li><li><a href="http://srijanshilpi.com/archives/361" rel="bookmark" class="crp_title">बेमानी है यह &#8216;सुरक्षा&#8217; सूचना हेतु शहीद होने वालों के लिए</a></li><li><a href="http://srijanshilpi.com/archives/521" rel="bookmark" class="crp_title">गांधीजी के ट्रस्टीशिप संबंधी सिद्धांत के कमजोर पक्ष</a></li><li><a href="http://srijanshilpi.com/archives/8" rel="bookmark" class="crp_title">भारत में ग्रामीण पत्रकारिता का वर्तमान स्वरूप</a></li><li><a href="http://srijanshilpi.com/archives/417" rel="bookmark" class="crp_title">आरटीआई आवेदक की पहचान तीसरे पक्ष को उजागर न हो</a></li><li><a href="http://srijanshilpi.com/archives/744" rel="bookmark" class="crp_title">जो नैतिक है वही न्यासी हो सकता है</a></li><li><a href="http://srijanshilpi.com/archives/159" rel="bookmark" class="crp_title">धर्म, राजनीति और हम</a></li></ul></div>]]></content:encoded>
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		<title>जो नैतिक है वही न्यासी हो सकता है</title>
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		<pubDate>Sun, 06 Nov 2011 18:05:16 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Srijan Shilpi</dc:creator>
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		<category><![CDATA[प्रेरक विचार]]></category>
		<category><![CDATA[समसामयिक]]></category>
		<category><![CDATA[संविधान और विधि]]></category>
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		<category><![CDATA[विश्लेषण]]></category>

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		<description><![CDATA[आशा है कि न्यासिता (ट्रस्टीशिप) के बारे में गांधीजी के सिद्धांतों और ओमप्रकाश कश्यप द्वारा उन सिद्धांतों में इंगित की गई &#8216;कमजोरियों&#8217; से अब तक आप अवगत हो चुके हैं। दरअसल, कश्यप जी द्वारा की गई आलोचना को गांधीजी के ट्रस्टीशिप संबंधी सिद्धांतों की एक प्रतिनिधि आलोचना माना जा सकता है और अपने लेख में उन्होंने [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">आशा है कि न्यासिता (ट्रस्टीशिप) के बारे में <a href="http://srijanshilpi.com/archives/90" target="_blank">गांधीजी के सिद्धांतों</a> और ओमप्रकाश कश्यप द्वारा उन सिद्धांतों में <a href="http://srijanshilpi.com/archives/521" target="_blank">इंगित की गई &#8216;कमजोरियों&#8217;</a> से अब तक आप अवगत हो चुके हैं। दरअसल, कश्यप जी द्वारा की गई आलोचना को गांधीजी के <a href="http://www.livehindustan.com/news/deshlocal/rubaru/article1-story-0-61-193742.html" target="_blank">ट्रस्टीशिप संबंधी सिद्धांतों</a> की एक प्रतिनिधि आलोचना माना जा सकता है और अपने लेख में उन्होंने प्राय: वे सारी आपत्तियां व्यक्त कर दी हैं जो कि आम तौर पर इस सिद्धांत के संदर्भ में की जाती रही हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">कश्यप जी ने मोटे तौर पर गांधीजी के सिद्धांतों में पांच प्रमुख कमजोरियों को रेखांकित किया है:</p>
<blockquote>
<p style="text-align: justify;">1. इस सिद्धांत का दुरुपयोग पूंजीपति ट्रस्ट की आड़ में अनैतिक तरीकों से अर्जित किए गए धन को वैध बनाने में कर सकते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">2. यह उसी दान-परंपरा का आधुनिक रूप है जिसे सामंती व्यवस्था के तहत धर्म का एक अंग माना जाता रहा है।</p>
<p style="text-align: justify;">3. इस सिद्धांत में बहुसंख्यक आम जनता को विवेकहीन मानते हुए उनके हित के बारे में फैसला लेने का अनुचित अधिकार थोड़े-से पूंजीपतियों को दे दिया गया है।</p>
<p style="text-align: justify;">4. इस सिद्धांत से हमारी व्यवस्था में मौजूद आर्थिक-सामाजिक विषमता का कोई स्थायी समाधान नहीं मिलता है।</p>
<p style="text-align: justify;">5. यह उस श्रमिकसंघवाद का विरोधी विचार है जो श्रमिकों के संगठित संघर्ष द्वारा उत्पादन तंत्र पर अधिकार हासिल करके बेरोजगारी और आर्थिक विषमता को दूर करने का एक अधिक प्रगतिशील वैकल्पिक मार्ग प्रस्तुत करता है।</p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">अब मैं न्यासिता संबंधी अपने उस व्यावहारिक मॉडल की अवधारणा आपके समक्ष रखने जा रहा हूँ, जिसका प्रस्ताव मैंने इससे संबंधित पिछली पोस्टों में किया था।</p>
<p style="text-align: justify;">इसे समझकर आप ही बताएं कि क्या यह गांधीजी के आदर्शों के अनुरूप है और क्या इससे उन उपर्युक्त आलोचनाओं का निराकरण हो जाता है, जिसके कारण ट्रस्टीशिप संबंधी उनके सिद्धांतों को कभी अमल में लाने लायक नहीं समझा गया?</p>
<p style="text-align: justify;">अपने स्तर पर मैंने संबंधित क़ानूनी प्रावधानों को भी देख लिया है और मेरे हिसाब से यह उनके दायरे में है।</p>
<div style="border-top: #5c8a64 3px solid; text-align: center; padding-bottom: 1px; line-height: 125%; margin: 12px; width: 660px; float: left; font-size: 13pt; border-bottom: #5c8a64 3px solid; font-weight: bold; padding-top: 1px;">
<ul>
<li style="text-align: justify;">न्यासी कोई भी बन सकता है, जरूरी नहीं कि वह कोई पूंजीपति हो।</li>
<li style="text-align: justify;">इसका संबंध व्यक्ति की उस नैतिकता से है, जो सबके भले में अपना भला भी देखता है, न कि किसी तथाकथित धर्म से। (हाँ, यदि आप धर्म को उस नज़रिये से देख सकें, जिससे <a href="http://srijanshilpi.com/archives/159" target="_blank">मैं देखता हूं</a> तो आप न्यासिता को धर्म से जोड़ सकते हैं।)</li>
<li style="text-align: justify;">ऐसा कोई भी व्यक्ति जिसके पास नैतिक उपायों से धन अर्जित करने, उस पर नियमानुसार कर आदि चुकाने, और जीवनोपयोग में होने वाले औसत स्तर के आवश्यक खर्च के बाद भी कुछ बचत हो जाती है तो यदि वह चाहे तो न्यासिता को अपना सकता है।</li>
<li style="text-align: justify;">ऐसा व्यक्ति अपनी अधिकतम क्षमता के अनुरूप धनार्जन करे, मगर खर्च केवल औसत आवश्यकता के अनुरूप ही करे। जो बचत हो उसका एक अंश नियमित रूप से समाज के हित के लिए अपने ही पास अलग से रखे।</li>
<li style="text-align: justify;">उसे करना क्या है? उसे केवल संकल्पपूर्वक यह सार्वजनिक घोषणा करनी है कि उसने अपनी बचत में से इतनी राशि समाज के हित के लिए अपने पास रखी है।</li>
<li style="text-align: justify;">इस तरह हर एक व्यक्ति के पास अलग से संकल्पपूर्वक रखे गए धन के अंशों को मिलाकर जो वर्चुअल निधि बनेगी वह किसी एक खाते में जमा नहीं रहेगी और न ही किसी एक खाते से हस्तांतरित होगी।</li>
<li style="text-align: justify;">आप पूछेंगे कि इसमें भला न्यासिता कहां से आ गई? इस तरह से सृजित हुई वर्चुअल निधि की न्यासिता इस बात से निर्धारित होगी कि उसका सदुपयोग व्यक्तियों की अपनी मर्जी से न होकर सामूहिक विवेक से तय होगा। इस तरह के सामूहिक विवेक को मैं &#8216;प्रज्ञा&#8217; नाम देता हूं।</li>
<li style="text-align: justify;">जरूरी नहीं कि इस तरह की वर्चुअल निधि केवल धन की हो। इस तरह की virtual pooling के तहत बनाया गया न्यास समय, श्रम और बुद्धि जैसे ऐसे संसाधनों का भी हो सकता है, जिनकी बचत संभव नहीं।</li>
</ul>
</div>
<p style="text-align: justify;">जाहिर है कि अभी यह एक अवधारणा मात्र है और इस विषय पर मैं ऐसे सभी व्यक्तियों से संवाद करने को तत्पर हूं जो इसके महत्व को किसी हद तक समझ सकते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">लेकिन मेरा इरादा इसे व्यवहार में आजमाने का भी है और इस ब्लॉग पर इस उद्देश्य से मैं एक स्थायी पृष्ठ अलग से बनाने जा रहा हूं, जो इस तरह के न्यास का एक व्यावहारिक मूर्त्त मॉडल सामने रखेगी। यदि आप इस अवधारणा के मूलभूत तत्वों से सहमत हो पाते हैं तो <a href="http://srijanshilpi.com/pragya_nidhi_nyas" target="_blank">इस न्यास में</a> आपका स्वागत है। यदि आपके मन में इससे जुड़ा कोई भी सवाल उठता है तो आप बेहिचक यहां टिप्पणी के तौर पर उसे दर्ज कर सकते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">जैसा कि गांधीजी ने स्वयं कहा था कि</p>
<blockquote>
<p style="text-align: justify;">इस प्रश्न का कोई महत्व नहीं है कि इस अवधारणा के अनुसार कितने लोग सच्चे न्यासी के रूप में आचरण कर सकते हैं। अगर यह  सिद्धांत सही है तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि इस पर अनेक लोग चल रहे हैं या केवल एक ही आदमी चल रहा है। प्रश्न केवल दृढ़ आस्था का है।</p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">न्यासिता दरअसल नि:स्वार्थता का ही एक व्यापक रूप है। जब अर्जित &#8216;अर्थ&#8217; के प्रति &#8216;स्व&#8217; के भाव का लोप हो जाता है और व्यक्ति नि:स्वार्थ भाव से उस अर्थ को परमार्थ के प्रति समर्पित कर देता है तो यह प्रक्रिया न्यासिता बन जाती है।</p>
<p style="text-align: justify;">नि:स्वार्थता के अलावा यह विवेकशील व्यक्तियों का कर्तव्य भी है, जैसा कि कबीर कह गए हैं:</p>
<blockquote>
<p style="text-align: center;">जो जल बाढ़ै नाव में, घर में बाढ़ै दाम।<br />
दोनों हाथ उलीचिये, यही सयानो काम।।</p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">सनातन परंपरा में इसे सृष्टि का पहला नियम माना जाता है कि <strong>देने से घटता नहीं है</strong>। ऐसा माना जाता है कि परमार्थ की दृष्टि से सुपात्र को किया गया अंशदान उपयुक्त समय पर उसी तरह वापस लौट आता है, जैसे सतत प्रवाहित नदी में जल की आपूर्ति अनवरत कायम रहती है।</p>
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		<title>टीम अन्ना को हुए मर्ज़ की आख़िर दवा क्या है?</title>
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		<pubDate>Fri, 28 Oct 2011 13:35:58 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Srijan Shilpi</dc:creator>
				<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[समसामयिक]]></category>
		<category><![CDATA[जन सरोकार]]></category>
		<category><![CDATA[विश्लेषण]]></category>
		<category><![CDATA[अन्ना हजारे]]></category>

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		<description><![CDATA[इस वर्ष अप्रैल में जंतर-मंतर पर हुए अन्ना के असरकारी अनशन के बाद मैंने आशंका जाहिर की थी कि आंदोलन की सफलता का श्रेय और लाइमलाइट लूटने की पुरानी होड़ और व्यक्तित्वों की आपसी टकराहट उसे राह से भटका न दे। वह आशंका सच साबित होने लगी है। और अब तो हालत यह हो चली [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">इस वर्ष अप्रैल में जंतर-मंतर पर हुए अन्ना के असरकारी अनशन के बाद मैंने <a href="http://srijanshilpi.com/archives/262" target="_blank">आशंका जाहिर की थी</a> कि आंदोलन की सफलता का श्रेय और लाइमलाइट लूटने की पुरानी होड़ और व्यक्तित्वों की आपसी टकराहट उसे राह से भटका न दे। वह आशंका सच साबित होने लगी है। और अब तो हालत यह हो चली है कि टीम अन्ना के भीतर से ही <a href="http://www.khaskhabar.com/kumar-vishwas-1020112810501112588.html" target="_blank">कोर कमेटी को भंग कर दिए जाने की मांग</a> प्रबल होने लगी है और अण्णा हैं कि मौन के अपने <a href="http://annahazaresays.wordpress.com/2011/10/27/todays-decision-about-maun-vrat" target="_blank">विस्तारित व्रत</a> में यह<a href="http://www.livehindustan.com/news/desh/national/article1-story-39-39-198108.html" target="_blank"> समाधान तलाश लाए हैं</a> कि कोर टीम का विस्तार कर देना ही बेहतर उपाय है।</p>
<p style="text-align: justify;">यह तो शुरू से ही स्पष्ट था कि सत्ता हर संभव कोशिश करेगी कि इस आंदोलन को या तो कुचल दिया जाए या उसके नेतृत्वकर्ताओं को बदनाम कर दिया जाए और उनके बीच आपस में फूट डाल दी जाए। लेकिन यदि टीम अन्ना ने अपने भीतर की कमजोरियों को दूर करने का ठीक से प्रयास किया होता और आपस में समन्वय एवं संतुलन का कोई तरीका निकाला होता तो सत्ता अपने हथकंडों में कभी कामयाब नहीं हो सकती थी।<span id="more-603"></span></p>
<div style="border-left: #5c8a64 7px solid; text-align: center; padding-bottom: 7px; line-height: 120%; margin: 12px; width: 200px; float: right; font-size: 13pt; border-right: #5c8a64 7px solid; font-weight: bold; padding-top: 7px;">महत्वाकांक्षा, कमीनापन और कुटिल राजनीति किसी भी बड़े मकसद को भटका देने के लिए पर्याप्त होते हैं। फिर, जब आप दूसरों पर अंगुली उठाने निकलते हैं तो पहले अपने गिरेबां में भी झांक लेना जरूरी होता है।</div>
<p style="text-align: justify;">महत्वाकांक्षा, कमीनापन और कुटिल राजनीति किसी भी बड़े मकसद को भटका देने के लिए पर्याप्त होते हैं। फिर, जब आप दूसरों पर अंगुली उठाने निकलते हैं तो पहले अपने गिरेबां में भी झांक लेना जरूरी होता है। खासकर, तब जब आप पूरे सिस्टम में व्याप्त भ्रष्टाचार के विरूद्ध एक निर्णायक संघर्ष करने निकल पड़े हों तो यह देख लेना जरूरी है कि कहीं अपने दामन पर भी तो कोई दाग लगा नहीं रह गया है।</p>
<p>जैसा कि फ्रेडरिक नीत्शे कहते हैं:</p>
<blockquote><p>&#8220;<strong>राक्षसों से लड़ने वालों को सावधान रहना चाहिये कि वे स्वयं एक राक्षस में न बदल जायं क्योंकि जब आप रसातल में देर तक घूरते हैं तो रसातल भी पलट कर आप को घूरता है।</strong>&#8221;</p>
<p>(He who fights with monsters should look to it that he himself does not become a monster. And when you gaze long into an abyss the abyss also gazes into you.)</p></blockquote>
<div style="border-left: #5c8a64 7px solid; text-align: center; padding-bottom: 7px; line-height: 120%; margin: 12px; width: 200px; float: left; font-size: 13pt; border-right: #5c8a64 7px solid; font-weight: bold; padding-top: 7px;">बड़े मकसद को लेकर चलने वालों के लिए जरूरी है कि पहले तो आप अपने व्यक्तिगत जीवन और चरित्र में इतने निष्कलंक हों कि कोई आरोप आप पर टिक न पाए। दूसरा, आपके अपने साथियों के बीच ऐसा समन्वय हो और कार्यशैली में ऐसी पारदर्शिता हो कि आपस में कोई दरार पैदा न हो पाए। और सबसे अधिक जरूरी यह कि आप हमेशा मुद्दे को फोकस में रखें, न कि व्यक्ति को।</div>
<p style="text-align: justify;">जब आप किसी सिस्टम के यथास्थितिवाद और उसमें व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाते हैं तो जाहिर है कि सिस्टम भी आप पर पलटवार करेगा ही और आपकी जिन छोटी-मोटी चूकों को वह अपने स्वाभाविक अंदाज में अब तक नजरंदाज करता आ रहा था, अब लेंस लेकर उसकी पड़ताल करने लग जाएगा और आपकी कोई कमजोर नब्ज हाथ में आते ही इतनी निर्मम कुटिलता से आप पर प्रहार करेगा कि आप तिलमिलाते रह जाएंगे और उसके खिलाफ आवाज उठाने की बात ही भूल जाएंगे।</p>
<p style="text-align: justify;">इसलिए इस तरह के बड़े मकसद को लेकर चलने वालों के लिए जरूरी है कि पहले तो आप अपने व्यक्तिगत जीवन और चरित्र में इतने निष्कलंक हों कि कोई आरोप आप पर टिक न पाए। दूसरा, आपके अपने साथियों के बीच ऐसा समन्वय हो और कार्यशैली में ऐसी पारदर्शिता हो कि आपस में कोई दरार पैदा न हो पाए। और सबसे अधिक जरूरी यह कि आप हमेशा मुद्दे को फोकस में रखें, न कि व्यक्ति को।</p>
<blockquote><dl class="wp-caption aligncenter" style="width: 665px;">
<dt class="wp-caption-dt"><img title="Facebook status on ramdeo" src="http://srijanshilpi.com/wp-content/uploads/Facebook-status-on-ramdeo2.jpg" alt="" width="660" height="210" /></dt>
<dd class="wp-caption-dd">4 जून, 2011 की सुबह (रात की घटना के बाद नहीं) फेसबुक पर व्यक्त हुआ मेरा मनोभाव</dd>
</dl>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">टीम अन्ना को चाहिए कि वह बाबा रामदेव के हश्र से कुछ सबक सीखे और मुद्दे को व्यक्तिपरक बनाने की बजाय पूरी तरह जनलोकपाल के प्रावधानों पर अपना फोकस रखे। इस संबंध में क़ानून बनाए जाने की जो प्रक्रिया चल रही है उसको लेकर जनता में इतनी जागरूकता पैदा कर दे कि संसद लोकपाल के लिए एक कारगर क़ानून बनाने हेतु बाध्य हो जाए।</p>
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		<title>गांधीजी के ट्रस्टीशिप संबंधी सिद्धांत के कमजोर पक्ष</title>
		<link>http://srijanshilpi.com/archives/521</link>
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		<pubDate>Sat, 22 Oct 2011 14:07:05 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Srijan Shilpi</dc:creator>
				<category><![CDATA[प्रेरक विचार]]></category>
		<category><![CDATA[समसामयिक]]></category>
		<category><![CDATA[जन सरोकार]]></category>
		<category><![CDATA[विश्लेषण]]></category>
		<category><![CDATA[अन्यत्र]]></category>

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		<description><![CDATA[ऊपर से आकर्षक दिखने के बावजूद ट्रस्टीशिप के सिद्धांत में अनेक कमजोरियां हैं. यह सम्राटों-सामंतों की दान-परंपरा का आधुनिक संस्करण है. चूंकि धर्म स्वयं सामंती परिवेश की देन है, इसलिए प्रायः सभी धर्मग्रंथों में किसी न किसी रूप में दान की महत्ता गायी गयी है. राजा-महाराजाओं के दरबारी-चाटुकार उनकी दानशीलता का तो बखान करते थे, [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div style="border-bottom: #5c8a64 3px solid; text-align: left; padding-bottom: 1px; line-height: 125%; margin: 10px; width: 680px; float: left; font-size: 12pt; border-top: #5c8a64 3px solid; font-weight: normal; padding-top: 1px;">
<p><em><div class="wpcol-one-half"></em><em>चार साल पहले शहीद दिवस के अवसर पर ट्रस्टीशिप संबंधी गांधीजी के सिद्धांतों को <a href="http://srijanshilpi.com/archives/90" target="_blank">मैंने एक लेख में प्रस्तुत </a>किया था। उसमें यह भी संकेत किया था कि उन सिद्धांतों के आधार पर आज के दौर के लिए एक व्यावहारिक मॉडल भी तैयार किया जा सकता है। मेरी अपेक्षा थी कि इससे पहले कि वह मॉडल पेश किया जाए, गांधीजी के अपने दृष्टिकोण को ठीक से समझ लिया जाए।</em><br />
<em>मगर, जैसा कि गंभीर विषयों के मामले में अक्सर होता है, हमारे पाठकों ने उसमें कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई। दिव्याभ और कविराज की जो दो प्रतिक्रियाएं मिलीं, उनमें भी ऐसा सूत्र कोई नहीं दिखा जिसको लेकर बात आगे बढ़ाई जाती। मुझे याद आता है कि हिन्दी ब्लॉगरों में घुघूती बासूती जी और अफ़लातून जी से भी शायद इस विषय पर अलग से कुछ चर्चा हुई थी, पर कोई संवाद सार्थक दिशा में आगे नहीं बढ़ सका था।</em></div> <div class="wpcol-one-half wpcol-last"><em>कुछ दिन पहले गांधी जयंती के अवसर पर उस लेख पर एक महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया आई, ओमप्रकाश कश्यप जी की ओर से। उन्होंने गांधीजी के सिद्धांतों की सम्यक् आलोचना प्रस्तुत करते हुए कुछ वाजिब सवाल उठाए हैं। उनकी इस प्रतिक्रिया से बात को आगे बढ़ाने का एक सूत्र मिला है।</em><br />
<em>आज, जबकि भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन चलाने वाले लोग भी अपने-अपने ट्रस्ट और एनजीओ में फंड के हेर-फेर के मामले में कई तरह के सवालों के घेरे में आ रहे हैं, यह और भी जरूरी हो जाता है कि हम ट्रस्टीशिप के एक ऐसे मॉडल पर विमर्श करें, जो गांधीजी के आदर्शों के अनुरूप हो और वर्तमान दौर के लिए व्यावहारिक भी हो।</em><br />
<em>मगर, ऐसा किए जाने से पहले, यह भी जरूरी है कि हम उन स्वरों को भी ठीक से सुनें जो गांधीजी के ट्रस्टीशिप संबंधी सिद्धांतों की सम्यक् आलोचना करते हैं। इसलिए, प्रस्तुत है <a href="http://omprakashkashyap.wordpress.com/about" target="_blank"><strong>ओमप्रकाश कश्यप</strong> </a>का यह लेख:</em></div><div class="wpcol-divider"></div><em><br />
</em></p>
</div>
<p style="text-align: justify;"><strong>ऊपर</strong> से आकर्षक दिखने के बावजूद ट्रस्टीशिप के सिद्धांत में अनेक कमजोरियां हैं. यह सम्राटों-सामंतों की दान-परंपरा का आधुनिक संस्करण है. चूंकि धर्म स्वयं सामंती परिवेश की देन है, इसलिए प्रायः सभी धर्मग्रंथों में किसी न किसी रूप में दान की महत्ता गायी गयी है. राजा-महाराजाओं के दरबारी-चाटुकार उनकी दानशीलता का तो बखान करते थे, उसके लिए चारण-वृंदों को वृत्तिका पर रखा जाता था. उन सबका दायित्व अपने आश्रयदाता की प्रशंसा उसमें सदगुणों की स्थापना करना था. दानशीलता को राजा का सद्गुण माना गया था. मगर राजा के धनागम के स्रोत क्या हैं? उनका नैतिक स्वरूप क्या है? इस बारे में प्रायः कोई चर्चा नहीं होती थी. राजा का खजाना उसके जागीरदारों, जमींदारों, सेठों, व्यापारी संगठनों के प्राप्त कराधान, भेंट और सौगातों पर निर्भर रहता था. हालांकि राजा-सामंतों की कमाई के लिए धार्मिक ग्रंथों में आचार-संहिताएं थीं, मगर व्यवहार में उनका पालन कम ही होता था. बल्कि युद्ध के दौरान निरीह प्रजा से लूटे गए धन को भी राजा का पराक्रम बताते हुए राजदरबार में उसका प्रदर्शन अपनी उपलब्धि के बखान के लिए किया जाता था. भारतीय ग्रंथों में दान की महानता का वर्णन किया गया है. मगर दान की परंपरा ने ही भारतीय समाज में एक पराश्रित तथा दूसरे के श्रम पर पलने वाले वर्ग को जन्म दिया था, जिसका दुष्परिणाम देश आज तक भुगतता आ रहा है.</p>
<p style="text-align: justify;"><span id="more-521"></span></p>
<div style="border-left: #5c8a64 7px solid; text-align: center; padding-bottom: 7px; line-height: 115%; margin: 12px; width: 200px; float: left; font-size: 12pt; border-right: #5c8a64 7px solid; font-weight: bold; padding-top: 7px;">ट्रस्टीशिप के साथ खतरा यह है कि जैसे धर्म के आवरण में राजा की कमाई के सारे स्रोत छिपा दिए जाते थे, उनकी नैतिकता पर कभी कोई चर्चा नहीं होती थी, वैसे ही यह विचार पूंजीवाद की समस्त अतियों और अनाचारों पर पर्दा डालने का काम करेगा. यह अनुचित और असंवैधानिक माध्यम से कमाए गए धन का वैधानिकीकरण करता है.</div>
<p style="text-align: justify;">ट्रस्टीशिप के साथ खतरा यह है कि जैसे धर्म के आवरण में राजा की कमाई के सारे स्रोत छिपा दिए जाते थे, उनकी नैतिकता पर कभी कोई चर्चा नहीं होती थी, वैसे ही यह विचार पूंजीवाद की समस्त अतियों और अनाचारों पर पर्दा डालने का काम करेगा. यह अनुचित और असंवैधानिक माध्यम से कमाए गए धन का वैधानिकीकरण करता है. अपनी पूंजी और तज्जनित संसाधनों के दम पर ट्रस्ट अथवा उसके सदस्य यह समझाने में कामयाब हो जाते हैं कि उनका लाभार्जन का तरीका व्यापक जनहित में है. कि लाभ द्वारा अर्जित धन का उपयोग लोकहित में किया जाना है.</p>
<p style="text-align: justify;">ट्रस्ट में धन के ‘धनार्जन’ के रास्ते पर भी सवाल नहीं उठाए जा सकते, न ही अपेक्षित होता है कि इस प्रकार के प्रश्नों को बीच में लाया जाए. स्वयं पूंजीपतियों को भी मालूम था कि ट्रस्टीशिप का विचार समाजवाद के विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया गया तो समाज की उनसे अपेक्षाएं बढ़ेंगी. उसपर हुई बहस पूंजीपतियों को कठघरे में खड़ा करेगी. इसलिए उन्होंने स्वयं ही उसको किसी भी प्रकार की बहस के दायरे से बाहर रखा. इसका एक परिणाम यह हुआ कि ट्रस्टीशिप का विचार कभी पुस्तकों से बाहर न आ सका.</p>
<p style="text-align: justify;">ट्रस्टीशिप के सिद्धांत को समझाने के लिए गांधीजी धर्म का सहारा लेते हैं. संभवत: वे उम्मीद करते हैं कि धर्म का आकर्षण अथवा डर पूंजीपतियों को लोककल्याण के पथ पर चलने का विवश कर देगा. यहां वे भूल जाते हैं कि पूंजीपति और राजनेता ही हैं जो परस्पर मिलकर धर्म को ताकतवर बनाते हैं. बदले में धर्म भी उनकी अनैतिक सत्ता को वैधता प्रदान करता है. ट्रस्टीशिप में पूंजीपतियों से अपेक्षा की जाती है कि वे जनसमस्याओं को एक जिम्मेदार अभिभावक की भांति देखें. अपने विवेक से उनके निदान के लिए आवश्यक उपाय भी करें. इससे निर्णय प्रक्रिया में आम आदमी की महत्ता घट जाती है. अप्रत्यक्ष रूप में समाज के बहुसंख्यक वर्ग को अविवेकी मानकर उसकी उपेक्षा करने का ट्रस्टीशिप का विचार पूंजीपतियों को अतिरिक्तरूप से अधिकार संपन्न करता है. उसकी अगली पीढ़ी जब चाहे उस निर्णय को वापस ले सकती है अथवा ट्रस्ट के नियमों में फेरबदल कर सकती है. पूंजीपति अपनी परिसंपत्तियां श्रमिक के श्रम के बल पर अर्जित करता है. अपने मुनाफे के मामूली हिस्से को ही वह ट्रस्ट के संचालन में लगाता है. ट्रस्ट में लगी पूंजी श्रमिक के खून-पसीने की कमाई होती है. इसके बावजूद श्रमिक को यह अधिकार नहीं होता कि वह ट्रस्ट के काम में हस्तक्षेप कर सके अथवा पूंजीपति को कोई सलाह दे सके. ट्रस्टी के रूप में जिन व्यक्तियों को यह जिम्मेदारी सौंपी जाती है, उनका चयन पूंजीपति द्वारा किया जाता है. अतः वे उसी का हितसाधन करते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">इस तरह देखा जाए तो ट्रस्टीशिप से आर्थिक-सामाजिक विभाजन के निदान का स्थायी उपाय कभी संभव नहीं है. शायद यही कारण है जो यह विचार पुस्तकों से बाहर कभी नहीं आ सका.</p>
<p style="text-align: justify;">ट्रस्टीशिप को ‘श्रमिकसंघवाद’ (Syndicalism) का विरोधी विचार भी कहा जा सकता है, जो श्रमिकों को संगठित होने, संघर्ष करने और अपनी एकजुटता के दम पर समस्त उत्पादनतंत्र पर अधिकार कर लेने का आवाह्न करता है. अभिसंघवाद श्रमिक सहकारिता का विस्तार था, एक ऐसा सुधारवादी आंदोलन जिसमें अभिकल्पना की गई थी कि श्रम-संघ उत्पादक कारखानों को हड़ताल, विरोध-प्रदर्शन के माध्यम से अपने हाथों में ले लेंगे. श्रमिकसंघवाद का उद्देश्य समस्त श्रमिकों को एक झंडे, एक संगठन के रूप में संगठित करना है, जिसपर उसके साधारण से साधारण सदस्य का नियंत्रण हो. इसके व्याख्याता बेकुनिन का मानना था कि इससे पूंजीवाद की समस्त बुराइयों का हल खोजा जा सकता है. श्रमिक-संघवाद के लागू होने से बेरोजगारी और आर्थिक विषमता अपने आप समाप्त हो जाएंगी. चूंकि उस समय उत्पादक एवं उपभोक्ता का कोई अंतर ही नहीं रहेगा, इसलिए वस्तुओं का उत्पादन व्यक्ति की आवश्यकताओं के अनुरूप होगा, न कि लाभार्जन की वांछा से. गांधीजी का ट्रस्टीशिप का विचार एक परिकल्पना से आगे नहीं बढ़ पाता. दूसरी ओर पूंजीवाद के विरोधस्वरूप उपजे दर्शनों में उसके विकल्पों पर गंभीरतापूर्वक विचार किया गया है.</p>
<div style="border-left: #5c8a64 5px solid; text-align: center; padding-bottom: 7px; line-height: 115%; margin: 12px; width: 200px; float: right; font-size: 13pt; border-right: #5c8a64 5px solid; font-weight: bold; padding-top: 7px;">समाज के बहुसंख्यक वर्ग को अविवेकी मानकर उसकी उपेक्षा करने का ट्रस्टीशिप का विचार पूरी तरह पूंजीपतियों की अनुकंपा पर निर्भर रहता है. इससे समाज के आर्थिक-सामाजिक विभाजन का स्थायी समाधान संभव नहीं.</div>
<p style="text-align: justify;">स्मरणीय है कि जिस समय महात्मा गांधी ‘हिंद स्वराज’ में आधुनिक सभ्यता और मशीनीकरण की आलोचना कर रहे थे, उसको ‘शैतानी सभ्यता’ कहकर उसका तिरष्कार कर रहे थे, शेष दुनिया विशेषकर पश्चिम में पूंजीवाद के विरोध नए-नए विचारों का जन्म हो रहा था. पूंजीवाद के आलोचकों में एक अराजकतावादी पियरे जोसेफ प्रूधों भी था, जो व्यक्तिगत संपत्ति की अवधारणा का ही विरोधी था—‘व्यक्ति संपत्ति चोरी है. व्यक्तिगत संपत्तिधारक चोर है.’ उसका यह कथन बुद्धिजीवी हलकों में खलबली मचाए हुए था. प्रूधों के अलावा मार्क्स, ऐंगल्स, फ्यूरियर, राबर्ट ओवेन, बेकुनिन आदि विचारक पूंजीवाद के निरंकुश विस्तार से नाखुश थे. इन सबके विचारों में भिन्नता थी, किंतु वे सभी इस तथ्य पर एकमत थे कि समाज में व्याप्त आर्थिक असमानता अन्यान्य बुराइयों के लिए पूंजीवाद जिम्मेदार है. इसलिए समाज के वास्तविक कल्याण के लिए, विकास का लाभ जनसाधारण तक पहुंचाने के लिए पूंजीवाद पर अंकुश लगाना अत्यावश्यक है.</p>
<p style="text-align: justify;">उन सबसे अलग गांधीजी ‘हिंद स्वराज’ में तीखेपन के साथ मशीनों और आधुनिक सभ्यता की आलोचना तो करते हैं, मगर पूंजीपतियों की आलोचना नहीं कर पाते. वे संपत्ति पर समाज का अधिकार तो स्वीकारते हैं, किंतु उसके समान विभाजन के लिए कोई नई व्यवस्था का सुझाव देने के बजाय पूंजीपतियों से ही अपेक्षा करते हैं कि वे स्वयं को समाज की संपत्ति का रखवाला मानें. यह पूंजीवाद के प्रति समझौतावादी रवैया अपनाने जैसा है.</p>
<p style="text-align: justify;">ट्रस्टीशिप में पूंजीपतियों से अपेक्षा की जाती है कि वे जनसमस्याओं को एक जिम्मेदार अभिभावक की भांति देखें. अपने विवेक से उनके निदान के लिए आवश्यक उपाय भी करें. परंतु इस निर्णय प्रक्रिया में आम आदमी की महत्ता घट जाती है. समाज के बहुसंख्यक वर्ग को अविवेकी मानकर उसकी उपेक्षा करने का ट्रस्टीशिप का विचार पूरी तरह पूंजीपतियों की अनुकंपा पर निर्भर रहता है. इससे समाज के आर्थिक-सामाजिक विभाजन का स्थायी समाधान संभव नहीं.</p>
<p style="text-align: right;">(क्रमश:)</p>
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		<title>केवल गैर-जिम्मेदार और भ्रष्ट नौकरशाह ही घबराते हैं आरटीआई से</title>
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		<pubDate>Sat, 15 Oct 2011 14:16:49 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Srijan Shilpi</dc:creator>
				<category><![CDATA[प्रशासनिक सुधार]]></category>
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		<description><![CDATA[अब तक हम सब सुनते और मानते आए थे कि &#8216;साँच को आँच नहीं&#8217;। यानी, जो ईमानदार है उसे डरने की जरूरत नहीं। मगर प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के लिए ऐसा नहीं है। हो सकता है कि इसके पीछे उनका अपना व्यक्तिगत अनुभव रहा हो। वह एक सच्चे और ईमानदार व्यक्ति के रूप में जाने जाते [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><img class="size-full wp-image-498 aligncenter" title="PM" src="http://srijanshilpi.com/wp-content/uploads/PM.jpg" alt="" width="600" height="350" /></p>
<p style="text-align: justify;">अब तक हम सब सुनते और मानते आए थे कि &#8216;साँच को आँच नहीं&#8217;। यानी, जो ईमानदार है उसे डरने की जरूरत नहीं। मगर प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के लिए ऐसा नहीं है। हो सकता है कि इसके पीछे उनका अपना व्यक्तिगत अनुभव रहा हो। वह एक सच्चे और ईमानदार व्यक्ति के रूप में जाने जाते रहे हैं, मगर उन्हें बार-बार जताना और बताना पड़ा है कि वह अक्सर खुद को मजबूर पाते हैं और चाहकर भी सही फैसले नहीं ले पाते।</p>
<p style="text-align: justify;">उनका <a href="http://in.jagran.yahoo.com/news/national/politics/review-the-RTI-Act-needs-to-undertaken-PM_5_2_8352112.html" target="_blank">मानना है कि</a> आरटीआई कानून के तहत अधिकारियों की नोटिंग को सार्वजनिक किए जाने से ईमानदार अधिकारी काम करने से कतराने लगे हैं। सही कहा गया है कि जो जैसा होता है उसको सारी दुनिया वैसी ही दिखती है।</p>
<p style="text-align: justify;">ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री एक बार फिर से नौकरशाही के जबरदस्त दबाव में हैं। इस बार शायद 2जी घोटाले में आरटीआई के कारण कुछ दस्तावेजों के सार्वजनिक हो जाने के बाद सरकार की जो फजीहत हुई, वह भी एक अहम उत्प्रेरक है।</p>
<p style="text-align: justify;">आरटीआई कानून की समीक्षा के नाम पर प्रधानमंत्री ने इस विषय पर सार्वजनिक रूप से बहस चलाए जाने की जरूरत पर बल दिया है। एक तरह से यह अच्छा ही है। गुपचुप तरीके से संशोधन हो, इससे बेहतर है कि पहले विषय पर हर पहलू से चर्चा हो जाए।</p>
<p style="text-align: justify;">नौकरशाही लंबे अरसे से आरटीआई कानून में मुख्य रूप से तीन संशोधन चाहती रही है: 1. फाइल नोटिंग और फैसला लिए जाने की प्रक्रिया से जुड़े ऐसे ही कुछ अन्य दस्तावेजों को आरटीआई कानून के दायरे से बाहर रखा जाना, 2. आवेदक के लिए सूचना मांगे जाने की वजह भी बताना अनिवार्य किया जाना और बताई गई वजह से असंतुष्ट होने पर लोक सूचना अधिकारी को आवेदन ख़ारिज कर सकने का अधिकार होना, और 3. आवेदन में पूछे जाने वाले प्रश्नों की संख्या या विषय के दायरे को सीमित किया जाना।</p>
<p style="text-align: justify;">इससे पहले<a href="http://srijanshilpi.com/archives/31" target="_blank"> वर्ष 2006 में भी सरकार के भीतर ऐसी मुहिम चली थी</a>, मगर तब व्यापक जन दबाव में सोनिया गांधी के निर्देश पर उसे स्थगित करना पड़ा था।</p>
<p style="text-align: justify;">प्रधानमंत्री ऐसा क्यों नहीं करते कि वह सरकार के उन तथाकथित ईमानदार अधिकारियों को कहें कि वे आरटीआई कानून के अनुपालन से जुड़े ऐसे दृष्टांत जनता के सामने रखें, जिनसे यह पता चले कि इस कानून के कारण उन्हें ईमानदारी से काम करने में कैसे दिक्कत आ रही है और उन्हें काम से क्यों कतराना पड़ रहा है?</p>
<p style="text-align: justify;">दरअसल, प्रधानमंत्री जिन नौकरशाहों को &#8216;ईमानदार&#8217; कहना चाह रहे हैं, असल में वे ऐसे नौकरशाह हैं जो अपने बॉस को तो खुश रखना चाहते हैं, मगर आरटीआई क़ानून की वजह से नियमों को नज़रंदाज करने का जोखिम नहीं लेना चाहते। खुद मनमोहन सिंह अपने पूरे कैरियर में ऐसे ही &#8216;ईमानदार&#8217; नौकरशाह रहे हैं जो कभी अपने बॉस को नाराज करने का जोखिम नहीं उठाते। तो उनकी जो ईमानदारी की परिभाषा है, उसी में दिक्क़त है।</p>
<p style="text-align: justify;">जबकि हमारी और आपकी नज़र में ईमानदार अधिकारी वह है जो भ्रष्ट नहीं है, जो नियमों-क़ानूनों के हिसाब से अपना काम करता है और किसी लालच या भय से प्रेरित होकर या किसी दबाव में फैसले नहीं करता। ऐसे ईमानदार अधिकारियों को आरटीआई क़ानून से तो क्या, मौत का भी कोई ख़ौफ नहीं होता।</p>
<div style="border-bottom: #5c8a64 7px solid; text-align: center; padding-bottom: 7px; line-height: 130%; margin: 12px; width: 200px; float: right; font-size: 13pt; border-top: #5c8a64 7px solid; font-weight: bold; padding-top: 7px;">यह सही है कि आरटीआई क़ानून मौजूदा रूप में परफेक्ट नहीं है। इसकी समीक्षा जरूर होनी चाहिए। मगर इसमें ऐसे बदलाव हों जो वाकई लोकहित में हों। मसलन् 1. लोक सूचना अधिकारियों की तैनाती प्रतिनियुक्ति के आधार पर हो और नौकरशाहों को सूचना आयुक्त न बनाया जाए। 2. फाइल गायब कर देने वाले अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई हो। 3. सूचना मांगने वालों को बदले की किसी कार्रवाई से पूरा संरक्षण दिया जाए।</div>
<p style="text-align: justify;">मौजूदा आरटीआई क़ानून में यह प्रावधान है कि आवेदक को यह बताना नहीं होगा कि उसे कोई सूचना क्यों चाहिए। यह प्रावधान आरटीआई कानून की जान है और इस प्रावधान को बड़ी जद्दोजहद से क़ानून में शामिल कराया जा सका था। लेकिन सरकार अब चाहती है कि इस क़ानून में आरटीआई आवेदनों को &#8216;फिल्टर&#8217; किए जाने की गुंजाइश हो और लोक सूचना अधिकारी केवल ऐसे आवेदन ही स्वीकार करे जो उसकी राय में &#8216;लोकहित&#8217; में हों। दरअसल सरकार आरटीआई क़ानून की बुनियाद को ही बदल देना चाहती है। मौजूदा क़ानून के  तहत सरकार केवल ऐसी सूचना को देने से इनकार कर सकती है जिसे प्रकट किया जाना लोकहित में नहीं हो।</p>
<p style="text-align: justify;">सरकार कह रही है कि समय और संसाधनों की सीमितता के कारण आरटीआई क़ानून के अनुपालन में दिक्कत हो रही है। इसलिए वह पूछे जाने वाले प्रश्नों की संख्या या उसके विषय के दायरे को भी सीमित कर देना चाह रही है। इस दिशा में कोई कदम उठाने की बजाय सरकार को करना यह चाहिए कि ऐसे सभी दस्तावेज और अभिलेख वह खुद सार्वजनिक कर देने की पहल करे जो आरटीआई क़ानून के मुताबिक गोपनीय श्रेणी में नहीं आते।</p>
<p style="text-align: justify;">इसका मतलब यह नहीं है कि आरटीआई क़ानून मौजूदा रूप में परफेक्ट है और इसकी कोई समीक्षा नहीं होनी चाहिए। मेरी राय में, पिछले सात साल के अनुभव में आरटीआई क़ानून की जो कमजोरियां सामने आई हैं, उनके मद्देनज़र इस क़ानून में तीन खास बदलाव किए जाने बहुत जरूरी हैं:</p>
<blockquote><p>1. सरकारी विभागों में नियुक्त किए जाने वाले लोक सूचना अधिकारी और अपीलीय प्राधिकारी संबंधित विभाग के ही अधिकारी न हों, बल्कि वे दूसरे विभागों से हों और उन्हें प्रतिनियुक्ति के आधार पर तैनात किया जाए। संभव हो तो उनका अलग से एक काडर हो, जिसका नियंत्रण केन्द्रीय / राज्य सूचना आयोग के पास हो। सूचना आयोगों में भी नौकरशाहों को नियुक्त किए जाने की परंपरा खत्म हो और उनमें ऐसे आयुक्त नियुक्त किए जाएं, जिनकी विश्वसनीयता जनता के बीच हो।</p>
<p>2. आरटीआई क़ानून के तहत सूचना मांगे जाने पर यदि लोक सूचना अधिकारी यह उत्तर दे कि मांगी गई सूचना जिस फाइल या दस्तावेज में थी, वह अब गायब हो गई है तो ऐसे मामलों में संबंधित अधिकारियों की जिम्मेवारी निश्चित की जाए और उनके खिलाफ कठोरतम कार्रवाई की जाए।</p>
<p>3. आरटीआई के तहत सूचना मांगने वालों को परेशान किए जाने, उन्हें धमकी दिए जाने या अन्य किसी भी तरह से उन्हें हतोत्साहित किए जाने के मामलों में संबंधित विभागीय अधिकारियों की भूमिका की भी जांच हो और उनके खिलाफ क़ानूनन उचित कार्रवाई की जाए।</p></blockquote>
<p style="text-align: justify;">पहले ही विश्वसनीयता का गंभीर संकट झेल रही सरकार के मुखिया ने आरटीआई क़ानून में जिस तरह के नापाक संशोधनों की दिशा में अपने सुझाव दिए हैं, उससे ऐसा लगता है कि उनके भीतर लोक सेवक की भावना आज तक नहीं आ पाई है। शायद वह लोकहित की दृष्टि से कभी सोच ही नहीं पाते, क्योंकि वह जनता के आदमी नहीं है, वह आम जनता का प्रतिनिधित्व नहीं करते। दरअसल, वह लोकप्रिय बनने का खतरा उठाना चाहते भी नहीं, बस स्वामी-भक्ति करके सत्ता में बने रहना चाहते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">जो सरकार एक तरफ बिना मांगे ही प्रस्तावित लोकपाल को संवैधानिक दर्जा दिए जाने की बात कर रही हो, वह आरटीआई क़ानून को बेजान बनाने पर क्यों तुली हुई है? आख़िर, जब सूचना ही उपलब्ध नहीं होगी तो कोई लोकपाल में शिकायत किस आधार पर करेगा? खासकर ऐसे हालात में, जब सरकार ने प्रस्तावित लोकपाल विधेयक में यह प्रावधान कर रखा हो कि यदि शिकायतकर्ता बिना पर्याप्त आधार के लोकपाल में शिकायत करेगा तो उसको मिलने वाला दंड दोषी भ्रष्ट अधिकारी को मिलने वाले दंड से भी अधिक होगा।</p>
<p style="text-align: right;">(क्रमश:)</p>
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		<title>आरटीआई आवेदक की पहचान तीसरे पक्ष को उजागर न हो</title>
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		<pubDate>Sun, 09 Oct 2011 15:37:29 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Srijan Shilpi</dc:creator>
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		<description><![CDATA[पिछली पोस्ट में हमने यह संकेत करने की कोशिश की कि आरटीआई आवेदकों के खिलाफ हिंसा और हत्या की वारदातों के पीछे भ्रष्टाचार में लिप्त सरकार से बाहर के व्यक्तियों के साथ-साथ खुद सरकारी विभागों की भी भूमिका होती है। हमने यह सवाल भी उठाया कि बाहरी व्यक्तियों को कैसे पता चल जाता है कि किस [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a href="http://srijanshilpi.com/archives/361" target="_blank">पिछली पोस्ट में</a> हमने यह संकेत करने की कोशिश की कि आरटीआई आवेदकों के खिलाफ हिंसा और हत्या की वारदातों के पीछे भ्रष्टाचार में लिप्त सरकार से बाहर के व्यक्तियों के साथ-साथ खुद सरकारी विभागों की भी भूमिका होती है। हमने यह सवाल भी उठाया कि बाहरी व्यक्तियों को कैसे पता चल जाता है कि किस आवेदक ने उनसे संबंधित सूचना मांगी है और उसे कब तक दिया जाना है।</p>
<blockquote>
<div class="mceTemp mceIEcenter">
<dl class="wp-caption aligncenter" style="width: 645px;">
<dt class="wp-caption-dt"><img class="size-full wp-image-506" title="kejriwal" src="http://srijanshilpi.com/wp-content/uploads/kejriwal.jpg" alt="" width="630" height="340" /></dt>
</dl>
<p>अन्ना के अनशन के दौरान रेलवे प्लेटफॉर्म पर रात बिताते अरविंद केजरीवाल</p>
</div>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;">दरअसल, आरटीआई के कानून में ही ऐसे प्रावधान हैं जो बाहरी व्यक्तियों के सामने आवेदकों की पहचान जाहिर कर देने का आधार बन जाते हैं। सूचना का अधिकार अधिनियम की शब्दावली में उन बाहरी व्यक्तियों को &#8216;पर पक्ष (Third Party)&#8217; कहा जाता है। अभी हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय ने अरविन्द केजरीवाल की याचिका पर यह <a href="http://www.lawetalnews.com/NewsDetail.asp?newsid=4814" target="_blank">स्पष्ट कर दिया है</a> कि सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 11 के अधीन केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी के लिए यह आवश्यक है कि वह ऐसे सभी मामलों में उस थर्ड पार्टी से संपर्क करके, जिनसे संबंधित सूचना का खुलासा किए जाने का अनुरोध किसी आरटीआई आवेदन में किया गया हो, यह पूछे कि मांगी गई सूचना को प्रकट किया जाए या नहीं और उसकी इस राय को ध्यान में रखते हुए ही वह सूचना को प्रकट करने के बारे में विनिश्चय करे। चूंकि ऐसे मामलों में  थर्ड पार्टी प्राय: सूचना को गोपनीय रखे जाने की राय देती है, लोक सूचना अधिकारी को अपने स्तर पर यह फैसला करना होता है कि मांगी गई सूचना से थर्ड पार्टी की संभावित हानि की तुलना में लोकहित अधिक सधता है या नहीं।</p>
<p style="text-align: justify;">आरटीआई अधिनियम की उक्त धारा और उच्च न्यायालय का यह स्पष्टीकरण इस संदर्भ में खास तौर पर महत्वपूर्ण है कि इससे उस थर्ड पार्टी को आरटीआई आवेदक के बारे में भी जानकारी मिल जाती है और यदि वह थर्ड पार्टी ऐसी सूचना मांगे जाने पर नाराज होकर आवेदक को सबक सिखाने के लिए उद्यत हो जाए तो उस आवेदक को सुरक्षा देने के लिए आरटीआई अधिनियम में कोई प्रावधान नहीं है।</p>
<p style="text-align: justify;">अत: आरटीआई आवेदकों के खिलाफ हिंसक हमलों और उन्हें परेशान किए जाने एवं धमकी दिए जाने की दर्जनों वारदातों के मद्देनज़र उक्त धारा 11 के अंतर्गत यह भी स्पष्ट किए जाने की जरूरत है कि लोक सूचना अधिकारी थर्ड पार्टी को मांगी गई सूचना के बारे में तो बताएगा, किन्तु किसी भी हाल में उसके समक्ष आवेदक की पहचान जाहिर नहीं करेगा।</p>
<p style="text-align: right;">(क्रमश:)</p>
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		<title>बेमानी है यह &#8216;सुरक्षा&#8217; सूचना हेतु शहीद होने वालों के लिए</title>
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		<pubDate>Fri, 07 Oct 2011 15:25:55 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Srijan Shilpi</dc:creator>
				<category><![CDATA[प्रशासनिक सुधार]]></category>
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		<category><![CDATA[संविधान और विधि]]></category>
		<category><![CDATA[सूचना का अधिकार]]></category>
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		<description><![CDATA[सूचना हासिल करने की &#8216;हिमाकत&#8217; करना दिनों-दिन अधिक खतरनाक बनता जा रहा है। ऐसे माहौल में कम-से-कम दर्जन भर आरटीआई कार्यकर्ताओं की शहादत के बाद संवेदनशील बने केन्द्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) ने यह तय किया है कि अब से किसी आरटीआई आवेदक की &#8216;हत्या&#8216; हो जाने के बाद यदि उसके परिवार का कोई सदस्य आयोग [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">सूचना हासिल करने की &#8216;हिमाकत&#8217; करना दिनों-दिन अधिक खतरनाक बनता जा रहा है। ऐसे माहौल में कम-से-कम दर्जन भर आरटीआई कार्यकर्ताओं की शहादत के बाद संवेदनशील बने केन्द्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) ने यह <a href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2011/10/111005_cic_resolution_pa.shtml" target="_blank">तय किया है</a> कि <strong>अब से किसी आरटीआई आवेदक की &#8216;हत्या</strong><strong>&#8216;</strong><strong> हो जाने के बाद यदि उसके परिवार का कोई सदस्य आयोग से शिकायत करे तो वह संबंधित विभाग या कार्यालय को अपनी वेबसाइट पर उस </strong><strong>&#8216;</strong><strong>शहीद&#8217; आरटीआई कार्यकर्ता द्वारा मांगी गई सूचना को प्रकाशित करने का निर्देश देगा</strong>। क्रांतिधर्मी सोच वाले सूचना आयुक्त शैलेष गांधी की पहल पर केन्द्रीय सूचना आयोग के इस संकल्प को इस उम्मीद में काफी सराहा जा रहा है कि इससे आरटीआई कार्यकर्ताओं पर होने वाले जानलेवा हमलों में कमी आएगी।</p>
<div style="border-bottom: #5c8a64 7px solid; padding-bottom: 7px; margin: 12px; width: 200px; float: left; border-top: #5c8a64 7px solid; font-weight: normal; padding-top: 7px;">
<div id="attachment_392" class="wp-caption aligncenter" style="width: 170px"><img class="size-full wp-image-392 " title="Shailesh Gandhi" src="http://srijanshilpi.com/wp-content/uploads/2011/10/images10.jpg" alt="" width="160" height="179" /><p class="wp-caption-text">सूचना आयुक्त शैलेष गांधी</p></div>
</div>
<p style="text-align: justify;">मगर इस उम्मीद को बेमानी साबित होते देर नहीं लगेगी। ऐसा लगता है कि इस समस्या को अत्यंत सरलीकृत ढंग से लिया गया है और इसके सभी पहलुओं पर पर्याप्त विचार नहीं किया गया है।</p>
<p style="text-align: justify;">पहली बात तो यह है कि आरटीआई के तहत जो सूचना मांगी जाती है वह सरकारी अभिलेखों में पहले से मौजूद होती है और उसे संबंधित विभाग के लोक सूचना अधिकारी द्वारा आवेदक को तीस दिन के भीतर देनी होती है। ऐसे में, यदि किसी आरटीआई कार्यकर्ता पर सूचना के लिए आवेदन करने के बाद और सूचना मिलने से पहले कोई जानलेवा हमला होता है या <a href="http://rtihindi.blogspot.com/2011/03/blog-post.html" target="_blank">कोई धमकी मिलती है</a> तो शक की सूई सबसे पहले उस विभाग के अधिकारियों और विशेषकर उसके प्रमुख की तरफ क्यों नहीं घूमनी चाहिए?</p>
<p style="text-align: justify;">इसे समझिए जरा। किसी गैर-सरकारी व्यक्ति को पता कैसे चल जाता है कि किस आरटीआई कार्यकर्ता ने सरकार से ऐसी सूचना मांगी है जिससे उसके गलत कारनामे सामने आ सकते हैं ?</p>
<p style="text-align: justify;">और, सरकार को कैसे पता चल जाता है कि फलां पते पर रहने वाले फलां आवेदक ने अमुक विभाग से जो अमुक-अमुक जानकारियां मांगी थी उसे अब उजागर करने की जरूरत नहीं, क्योंकि अब उसकी हत्या हो चुकी है!</p>
<p style="text-align: justify;">सूचना लोक सूचना अधिकारी के स्तर से ही मिल जानी चाहिए और आवेदक के पते पर डाक से ही आ जाना चाहिए। सूचना आयोग में अपील की जरूरत सामान्य तौर पर नहीं पड़नी चाहिए।</p>
<div style="border-bottom: #5c8a64 7px solid; text-align: center; padding-bottom: 7px; line-height: 115%; margin: 12px; width: 200px; float: right; font-size: 13pt; border-top: #5c8a64 7px solid; font-weight: bold; padding-top: 7px;">केन्द्रीय सूचना आयोग को यह सुनिश्चित करने का प्रयास करना चाहिए कि आरटीआई कार्यकर्ताओं की हर अस्वाभाविक मौत के मामले में दर्ज होने वाले एफआईआर में संबंधित विभाग के उन अधिकारियों के साथ-साथ विभाग-प्रमुख का नाम भी संदिग्ध अभियुक्त के तौर पर शामिल हो, जिनके नियंत्रण में सूचना थी।</div>
<p style="text-align: justify;">आखिर, सीआईसी को इतना कष्ट करने और आरटीआई आवेदक की शहादत के बाद उसके परिजनों को भी इतना दु:खी करने की जरूरत क्यों पड़नी चाहिए। जो सूचना जिस विभाग से मांगी गई है वह नियत तिथि तक आवेदक के पते पर नियमानुसार डाक से पहुंचा दी जाए और यदि आवेदक स्वयं मौजूद नहीं है तो उस पते पर रहने वाला कोई अन्य स्वजन उसे ग्रहण कर लेगा। संबंधित विभाग की ओर से तो वह सूचना आरटीआई कानून के विहित प्रावधानों के तहत ही उजागर हो जानी चाहिए। यदि आवेदक के पते पर उस सूचना को ग्रहण करने वाला कोई व्यक्ति न मिले और डाक संबंधित विभाग के पास वापस लौट आए तो वह विभाग उस सूचना को अपनी वेबसाइट पर स्वयं डाल दे। इसके लिए आरटीआई आवेदक की हत्या होने की शर्त और फिर उसके किसी परिजन द्वारा सूचना आयोग के पास शिकायत लेकर जाने की शर्त क्यों?</p>
<p style="text-align: justify;">माननीय सूचना आयुक्त शैलेष गांधी इतना तो समझते ही होंगे कि आज का कोई परिवार अपने घर में भगत सिंह नहीं चाहता। जो कोई व्यक्ति आज भगत सिंह बनने की जुर्रत करता है वह अपने परिवार वालों को सूचित करके क्रांतिकारी हरकतें नहीं करता। इसलिए प्लीज, परिवारवालों को बख्श दीजिए और उनसे यह सब जहमत उठाने को मत कहिए कि आप सूचना आयोग में यह फरियाद दर्ज करायें कि हमारे परिवार में शहीद हुए &#8216;भगत सिंह&#8217; ने जिस-जिस विभाग से जो-जो सूचना मांगी थी वह अब जनहित में सार्वजनिक कर दी जाए।</p>
<p>केन्द्रीय सूचना आयोग यदि वाकई आरटीआई कार्यकर्ताओं पर होने वाले जानलेवा हमलों को रोकना चाहता है और यदि वह वाकई सक्षम है तो उसे यह सुनिश्चित करने का प्रयास करना चाहिए कि ऐसी हर अस्वाभाविक मौत के मामले में दर्ज होने वाले एफआईआर में संबंधित विभाग के उन अधिकारियों के साथ-साथ विभाग-प्रमुख का नाम भी संदिग्ध अभियुक्त के तौर पर दर्ज हो, जिनके नियंत्रण में सूचना थी।</p>
<p style="text-align: justify;">क्योंकि जब भी किसी आरटीआई कार्यकर्ता पर कोई हमला होता है या उसे डराने-धमकाने या परेशान करने की कोई कोशिश सूचना के लिए आवेदन करने के बाद और सूचना मिलने से पहले होती है तो इसका स्वाभाविक अर्थ निकलता है कि सूचना जिस संबंध में मांगी गई है उस मामले में कोई भ्रष्टाचार हुआ है और उसमें संबंधित विभाग के शीर्ष अधिकारियों या मंत्री की संलिप्तता है और उन्होंने ही सूचना को प्रकट करने से बचने के लिए आवेदक को रास्ते से हटाने की कोशिश की है, भले ही उन्होंने इसके लिए उस बाहरी व्यक्ति का सहारा लिया हो जो भ्रष्टाचार से लाभान्वित हुआ हो।</p>
<p style="text-align: justify;">क्या सीआईसी ने इस पहलू पर भी गौर किया है कि कल यदि किसी आरटीआई कार्यकर्ता की हत्या के बाद सीआईसी संबंधित विभाग को मांगी गई सूचना अपनी वेबसाइट पर डालने के लिए कहे और वह विभाग इस दलील के साथ सीआईसी में आ धमके कि संबंधित आरटीआई आवेदक की मौत की वजह हत्या नहीं, बल्कि दुर्घटना या आत्महत्या या स्वाभाविक मौत है, और इसलिए उसे सूचना को तब तक प्रकाशित करने से छूट मिलनी चाहिए, जब तक कि किसी सक्षम अदालत में आवेदक की मौत की वजह हत्या सिद्ध न हो जाए और जब अदालत में वह मौत हत्या सिद्ध हो जाए तो विभाग यह कहे कि पहले यह भी सिद्ध हो कि हत्या की वजह उसी विभाग से मांगी गई सूचना थी।</p>
<p style="text-align: justify;">जिस बात की ओर मैं संकेत करना चाह रहा हूं और जिसे केन्द्रीय सूचना आयोग ने भी एक तरह से मान लिया है कि आरटीआई कार्यकर्ताओं पर हो रहे जानलेवा हमलों के पीछे खुद सरकारी विभागों की भी प्रमुख भूमिका है। यदि ऐसा है तो क्या केन्द्रीय सूचना आयोग का दायित्व केवल इतना है कि वह उस विभाग को संबंधित सूचना को उजागर करने का निर्देश भर दे?</p>
<p style="text-align: justify;">(क्रमश:)</p>
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		<title>कई और अन्ना चाहिए अभी&#8230;</title>
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		<pubDate>Sun, 28 Aug 2011 09:44:48 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Srijan Shilpi</dc:creator>
				<category><![CDATA[चुनाव सुधार]]></category>
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		<description><![CDATA[ मीडिया, मध्य वर्ग और आम जनता से वह शिकायत अब दूर होने लगी है, जो मुझे लंबे अरसे से रही है और जिसे समय-समय पर मैं अभिव्यक्त करता भी रहा हूं। शायद हम सभी को उस एक निमित्त का इंतजार था, जिसके माध्यम से हमारे भीतर की प्रखर चेतना संघनित होकर अभिव्यक्त हो सके। शायद [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img class="aligncenter size-full wp-image-355" title="mashal" src="http://srijanshilpi.com/wp-content/uploads/2011/08/mashal2.gif" alt="" width="400" height="520" /></p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://srijanshilpi.com/archives/262" target="_blank"> मीडिया</a>, <a href="http://srijanshilpi.com/archives/72" target="_blank">मध्य वर्ग</a> और <a href="http://rejectmaal.blogspot.com/2007/11/blog-post_30.html" target="_blank">आम जनता</a> से वह शिकायत अब दूर होने लगी है, जो मुझे<a href="http://rejectmaal.blogspot.com/2007/11/blog-post_30.html?showComment=1196440320000#c8965925114857436239" target="_blank"> लंबे अरसे से रही है</a> और जिसे समय-समय पर मैं अभिव्यक्त करता भी रहा हूं। शायद हम सभी को उस एक निमित्त का इंतजार था, जिसके माध्यम से हमारे भीतर की प्रखर चेतना संघनित होकर अभिव्यक्त हो सके। शायद वह समय अब ही आना था, जब भारत की बेजुबान जनता को कोई नैतिक प्रेरणा झकझोर कर यथास्थितिवाद को चुनौती देने के लिए एकजुट करने वाली थी।</p>
<p style="text-align: justify;">पिछले वर्षों में मुझे कुछ ऐसे दूरदर्शी मनीषियों के सानिध्य में आने का अवसर मिला, जो शायद आने वाले समय की आहट को पहचानते थे। जिज्ञासा करने पर उन्होंने बताया था कि कुछ वर्ष इंतजार करो, परिस्थितियां बदलेंगी और वह सब होगा और ठीक उसी तरह से होगा, जैसा नियति ने निश्चित कर रखा है। जो उस महापरिवर्तन के दौर में युग-चेतना के सहभागी बनना चाहते हैं, उन्हें इस समय बस अपनी पात्रता का विकास करना चाहिए और जब सही समय आए तो सक्रिय होकर अपनी क्षमता के अनुसार योगदान करने के लिए तैयार रहना चाहिए।</p>
<p style="text-align: justify;">मित्रो, वह समय आ चुका है, वह युग-चेतना भी अब सक्रिय हो चुकी है। हमें बस अपने भीतर के तार को उस युग-चेतना से जोड़ लेने भर की जरूरत है। हमें अपना पक्ष चुनने की जरूरत है। क्या हम अब भी उन कुटिल शक्तियों के हाथों की कठपुतलियां बने रहना चाहते हैं जो यथास्थिति बनाए रखकर सारी सत्ता और सारे संसाधन अपने अधिकार में बनाए रखना चाहते हैं? या फिर परिवर्तन-चक्र के सहगामी बनकर सारी व्यवस्था को पारदर्शी और जवाबदेह बनने के लिए बाध्य करके उसे सत्य और न्याय के अनुरूप ढालना चाहते हैं? यह हमें ही तय करना है।</p>
<p style="text-align: justify;">अन्ना हजारे नामक परिघटना को समझिए। एक व्यक्ति अपनी पात्रता का जीवन भर विकास करता है। अपने कर्मों से, अपने विचारों से और अपने आचरण से एक आदर्श सामने रखता है। अहंकार और स्वार्थ से दूर रहता है। सादगी, सेवा और समर्पण के मार्ग पर चलता है। अपने चरित्र से वह एक ऐसी विश्वसनीयता अर्जित करता है कि उसके आह्वान पर, उसके नाम पर इस देश की बहुसंख्यक जनता उठ खड़ी होती है। पहले वह अपने गांव में क्रांति को संभव बनाता है, फिर अपने इलाके में, फिर अपने राज्य में और उसके बाद वह पूरे देश के मन-मस्तिष्क पर छा जाता है। पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य सदसंकल्प करवाते थे, &#8220;हम बदलेंगे, युग बदलेगा। हम सुधरेंगे, युग सुधरेगा।&#8221; अन्ना हजारे ने इसे चरितार्थ करके दिखाया।</p>
<p style="text-align: justify;">सुधारों का, परिवर्तनों का दौर शुरू हो चुका है। इसके लिए सबसे पहले हमें अपने उन कानूनों को बदलना होगा, जो अप्रासंगिक हो चुके हैं और कुछ नए कानून बनाने होंगे। उसके बाद उन कानूनों के पालन को सुनिश्चित कराने के लिए सजगता दिखानी होगी। पहले हमने व्यवस्था में पारदर्शिता लाने के लिए सूचना का अधिकार हासिल किया। इस समय हम भ्रष्टाचार पर नकेल कसने के लिए लोकपाल का कानून बनवाने की प्रक्रिया में हैं। इसके बाद चुनाव सुधार, न्यायपालिका की जवाबदेही, समान शिक्षा, इलाज की सुलभता, न्याय की सुगमता, रोजगार की गारंटी, आवास की उपलब्धता, ऊर्जा की प्रचुरता, पर्यावरण संरक्षण, संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण, आदि कई विषयों पर लगातार और एक साथ तेजी से सक्रिय होने की जरूरत है।</p>
<p style="text-align: justify;">अन्ना ने अपने-आप को बिल्कुल सही समझा कि वह एक निमित्त मात्र हैं और उनके माध्यम से कोई महान शक्ति कार्य कर रही है। उस महान शक्ति को अभी कई और अन्नाओं की तलाश है जिनके माध्यम से वह भारत में और भारत के माध्यम से पूरे विश्व में महापरिवर्तन की अपनी रूपरेखा को मूर्त रूप दे सके।</p>
<p style="padding-left: 30px;"><span style="color: #0000ff;"><strong><span style="text-decoration: underline;">संबंधित आलेख</span> :</strong></span></p>
<ul>
<li><a href="http://srijanshilpi.com/archives/158" target="_blank">बाजार-सरकार बनाम जन-सहकार</a></li>
<li><a href="http://srijanshilpi.com/archives/150" target="_blank">समय की डायरी में दर्ज हैं तटस्थों के अपराध</a></li>
<li><a href="http://srijanshilpi.com/archives/134" target="_blank">लोकतंत्र नहीं हैं अभी भारत में</a></li>
<li><a href="http://srijanshilpi.com/archives/81" target="_blank">उच्चतम न्यायालय का पाशुपत अस्त्र</a></li>
<li><a href="http://srijanshilpi.com/archives/44" target="_blank">भारत में आसन्न वर्ग-संघर्ष की पृष्ठभूमि</a></li>
<li><a href="http://srijanshilpi.com/archives/31" target="_blank">नहीं लगने देंगे सूचना के अधिकार में सेंध</a></li>
<li><a href="http://srijanshilpi.com/archives/7" target="_blank">गांधी: एक पुनर्विचार</a></li>
</ul>
<p>&nbsp;</p>
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		</item>
		<item>
		<title>क्या अण्णा ही हैं वह चिर-प्रतीक्षित?</title>
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		<pubDate>Sun, 21 Aug 2011 11:16:43 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Srijan Shilpi</dc:creator>
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		<category><![CDATA[जन सरोकार]]></category>
		<category><![CDATA[कविता]]></category>
		<category><![CDATA[अन्ना हजारे]]></category>
		<category><![CDATA[Anna Hazare]]></category>
		<category><![CDATA[अण्णा हज़ारे]]></category>

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		<description><![CDATA[करीबन दस साल पहले एक कविता लिखी थी, जिसे पहली बार इस ब्लॉग पर 17 मार्च, 2006 को और फिर 13 नवम्बर, 2007 को दोबारा पोस्ट किया था। उस कविता में जिस &#8216;चिर-प्रतीक्षित&#8217; की संकल्पना थी, उसका कोई चेहरा सामने नहीं था और हमारे कुछ मित्रों,  मसलन ज्ञानदत्त जी, घुघूतीबासूति जी ने उसके बारे में [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><img class="size-full wp-image-337 aligncenter" title="anna" src="http://srijanshilpi.com/wp-content/uploads/2011/08/anna1.jpg" alt="" width="321" height="225" /></p>
<blockquote>
<p style="text-align: justify;">करीबन दस साल पहले एक कविता लिखी थी, जिसे पहली बार इस ब्लॉग पर <a href="http://srijanshilpi.com/archives/14" target="_blank">17 मार्च, 2006</a> को और फिर <a href="http://srijanshilpi.com/archives/142" target="_blank">13 नवम्बर, 2007</a> को दोबारा पोस्ट किया था। उस कविता में जिस &#8216;चिर-प्रतीक्षित&#8217; की संकल्पना थी, उसका कोई चेहरा सामने नहीं था और हमारे कुछ मित्रों,  मसलन <a href="http://halchal.gyandutt.com" target="_blank">ज्ञानदत्त जी</a>, <a href="http://ghughutibasuti.blogspot.com" target="_blank">घुघूतीबासूति जी</a> ने उसके बारे में जिज्ञासा प्रकट की थी।</p>
<p style="text-align: justify;">आज अण्णा हज़ारे में कई लोग उस &#8216;चिर-प्रतीक्षित&#8217; का अक्स देख सकते हैं। आपकी क्या राय है, बताइएगा। बहरहाल, वह कविता एक बार फिर से प्रस्तुत है:</p>
</blockquote>
<p align="center">कब से सुन रहा हूँ सुदूर से आती हुई<br />
तुम्हारे पदचापों की मधुर ध्वनि<br />
आ रहे हो तुम<br />
धीरे-धीरे हमारे बीच<br />
तुम्हारे आने की ख़बर<br />
हमें सदियों से है<br />
हम हर घड़ी तुम्हारे ही इंतजार में रहे हैं।</p>
<p align="center">पहुँच चुके हैं धरा पर<br />
तुम्हारे पगों के स्पंदन<br />
आ तो चुके हो मगर छुपे हो<br />
आम लोगों की ओट में<br />
न हो तुम कोई राजकुमार<br />
और न ही किसी पंडित की संतान<br />
न तो तुम किसी नेता के बेटे हो<br />
और न ही किसी अफसर के पुत्र<br />
इतने सीधे-सादे हो तुम<br />
कि लगते नहीं कि तुम ही हो।</p>
<p align="center">पुराणों ने कह दी थीं तुम्हारे आने की कथाएँ<br />
भविष्यवेत्ताओं ने भी कर दी भविष्यवाणियाँ<br />
हमें तुम्हारा नाम-पता मालूम था हमेशा से<br />
और तुम्हारे रूप व कर्म के विवरण भी<br />
लेकिन तुम तो वैसे लगते ही नहीं !</p>
<p align="center">सूर्योदय की सुनहरी किरणों में<br />
झलकता था तुम्हारा तेजोमय रूप<br />
वर्षा की इंद्रधनुषी फुहारों में<br />
निखरता था तुम्हारी प्रभा का वलय<br />
हवा की बहारों में<br />
नादित होते थे तुम्हारे मधुर अस्फुट स्वर<br />
हर साँस के साथ उमड़ती थी प्यास<br />
तुम्हारी चिन्मयी शक्ति की लहरियों से जुड़ने की<br />
लेकिन अब तुम जब इतने सम्मुख हो तो<br />
तुम्हारी सहजता और सरलता ही असाधारण लगती है।</p>
<p align="center"><span id="more-321"></span>क्षमा करना<br />
अवतारों-पैगम्बरों की कथाओं और दावों ने<br />
बुद्धि भ्रष्ट कर दी है हमारी<br />
शब्दों के भ्रमजाल से<br />
विकृत हो चुकी है संप्रेषण की हमारी शक्ति<br />
नेताओं, अभिनेताओं और साधुओं ने<br />
दिग्भ्रमित कर दिया है हमें<br />
निष्प्राण हो चुकी है हमारी संवेदना<br />
हम तुमको ठीक से पहचान नहीं पा रहे हैं।</p>
<p align="center">लेकिन फिर भी दिल में पक्का विश्वास है<br />
तुम वही हो जिसका हमें जन्मों-जन्मों से इंतजार है<br />
जिसके मन में न अहंकार है<br />
और न ही कोई स्वार्थ है<br />
जिसकी शक्ति प्रतिबद्ध है<br />
न्याय और धर्म के लिए<br />
हमारी सेवाएँ समर्पित हैं तुम्हारे ही लिए।</p>
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