Monthly Archives: October 2011

टीम अन्ना को हुए मर्ज़ की आख़िर दवा क्या है?

इस वर्ष अप्रैल में जंतर-मंतर पर हुए अन्ना के असरकारी अनशन के बाद मैंने आशंका जाहिर की थी कि आंदोलन की सफलता का श्रेय और लाइमलाइट लूटने की पुरानी होड़ और व्यक्तित्वों की आपसी टकराहट उसे राह से भटका न … Continue reading

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गांधीजी के ट्रस्टीशिप संबंधी सिद्धांत के कमजोर पक्ष

ऊपर से आकर्षक दिखने के बावजूद ट्रस्टीशिप के सिद्धांत में अनेक कमजोरियां हैं. यह सम्राटों-सामंतों की दान-परंपरा का आधुनिक संस्करण है. चूंकि धर्म स्वयं सामंती परिवेश की देन है, इसलिए प्रायः सभी धर्मग्रंथों में किसी न किसी रूप में दान … Continue reading

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केवल गैर-जिम्मेदार और भ्रष्ट नौकरशाह ही घबराते हैं आरटीआई से

अब तक हम सब सुनते और मानते आए थे कि ‘साँच को आँच नहीं’। यानी, जो ईमानदार है उसे डरने की जरूरत नहीं। मगर प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के लिए ऐसा नहीं है। हो सकता है कि इसके पीछे उनका अपना … Continue reading

Posted in प्रशासनिक सुधार, भ्रष्टाचार, समसामयिक, संविधान और विधि, सूचना का अधिकार, जन सरोकार, विश्लेषण | 2 Comments

आरटीआई आवेदक की पहचान तीसरे पक्ष को उजागर न हो

पिछली पोस्ट में हमने यह संकेत करने की कोशिश की कि आरटीआई आवेदकों के खिलाफ हिंसा और हत्या की वारदातों के पीछे भ्रष्टाचार में लिप्त सरकार से बाहर के व्यक्तियों के साथ-साथ खुद सरकारी विभागों की भी भूमिका होती है। हमने … Continue reading

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बेमानी है यह ‘सुरक्षा’ सूचना हेतु शहीद होने वालों के लिए

सूचना हासिल करने की ‘हिमाकत’ करना दिनों-दिन अधिक खतरनाक बनता जा रहा है। ऐसे माहौल में कम-से-कम दर्जन भर आरटीआई कार्यकर्ताओं की शहादत के बाद संवेदनशील बने केन्द्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) ने यह तय किया है कि अब से किसी … Continue reading

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