Monthly Archives: March 2007

मुझे विदुर चाहिए

हे भीष्म! आप महान हैं, धर्मात्मा हैं, ज्ञानी हैं, वीर हैं पितृभक्त हैं, बुजुर्ग हैं, संत हैं, अखंड ब्रह्मचारी हैं अष्ट वसुओं में श्रेष्ठ हैं, उनके अवतार हैं देवी गंगा मैया के आप पुत्र हैं आपको कोई हरा नहीं सकता … Continue reading

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कैसे हो एकत्व की भावना का विकास?

पिछले कुछ दिनों से हिन्दी चिट्ठाकारी में सांप्रदायिकता पर बहस के बहाने कुछ साथियों के बीच अवांछित और अप्रिय भाषा में तकरार हुई है, जिससे चिट्ठाकारी से जुड़े सभी लोगों को दु:ख हुआ है। हम मुद्दों पर बहस करने के बजाय व्यक्तियों पर प्रहार करने लग … Continue reading

Posted in प्रेरक विचार | 9 Comments

आख़िर क्यों बदला सरकार ने अपना दृष्टिकोण?

नेताजी पर लेख-शृंखला के मेरे पिछले लेख पर नीरज दीवान जी ने टिप्पणी करते हुए एक जिज्ञासा व्यक्त की थी: मैं यह भी सोच रहा हूं कि सत्तारूढ़ सरकार की कौन-सी मजबूरियां है जो मुखर्जी आयोग की मांग पर इच्छित दस्तावेज मुहैया नहीं … Continue reading

Posted in नेताजी का रहस्य, जन सरोकार, विश्लेषण | 10 Comments

मेरे जवाब भी हाजिर हैं

होली की छुट्टियाँ मनाने के लिए आज ही दिल्ली से प्रस्थान करने से पहले मुझे मैथिली जी के पाँच सवालों के जवाब देने हैं। टैगिंग के खेल में अब तक अधिकांश चिट्ठाकार पहले ही लपेटे जा चुके हैं और ज्यादातर … Continue reading

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