Monthly Archives: August 2006

हिन्दी के दुश्मन

(आलोचक नामवर सिंह द्वारा चार वर्ष पूर्व हिन्दी दिवस के अवसर पर लिखित लेख के संपादित अंश)   आज हिन्दी की स्थिति त्रिशंकु की है। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान उसे राष्ट्रभाषा बनाने की मांग हुई और स्वाधीन भारत की वह … Continue reading

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एक थी फूलन

नियति जिंदगी में कैसे-कैसे रंग बिखर सकती है, इसे कोई नहीं जानता। फूलन भी नहीं जानती थी। पर नियति ने फूलन की जिंदगी के लिए बहुत से बहुत से रंग सजाए थे। जन्म से लेकर मरण तक फूलन का पूरा … Continue reading

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भारत में आसन्न वर्ग-संघर्ष की पृष्ठभूमि

(रवि रतलामी जी की आरक्षण संबंधी एक पोस्ट पर टिप्पणी करते हुए 23 मई, 2006 को मैंने भारतीय समाज में वर्ग-संघर्ष की परिस्थितियों पर एक आलेख लिखने का वादा किया था। अब जबकि आरक्षण पर गर्मागर्म बहस का गुबार कुछ थमने … Continue reading

Posted in विश्लेषण | 7 Comments

सूचना को छिपाने के नौकरशाही के हथकंडे

संसद के मानसून सत्र के दौरान सरकार ने नौकरशाही के दबाव के सामने झुकते हुए सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 में संशोधन करके फाइल नोटिंग्स को सूचना के दायरे से बाहर निकालने की विफल चेष्टा की। यदि सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 2 … Continue reading

Posted in प्रशासनिक सुधार, भ्रष्टाचार, समसामयिक, संविधान और विधि, सूचना का अधिकार, जन सरोकार, विश्लेषण | 1 Comment

ऑनलाइन हिन्दी और चिट्ठाकारिता

ऑनलाइन जगत में हिन्दी  हिन्दी दुनिया की तीसरी सर्वाधिक बोली-समझी जाने वाली भाषा है। विश्व में लगभग 80 करोड़ लोग हिन्दी समझते हैं, 50 करोड़ लोग हिन्दी बोलते हैं और लगभग 35 करोड़ लोग हिन्दी लिख सकते हैं। लेकिन इंटरनेट … Continue reading

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