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Archive for the 'कविता' Category

स्कूल के दिनों में समूह प्रार्थना करते समय हमारे कुछ मुसलमान सहपाठी पंक्ति में शामिल तो होते थे, पर मौन रहते थे और उनके हाथों की मुद्रा भी विश्राम में रहती थी। यहां तक कि धर्मनिरपेक्ष शब्दावली वाली प्रार्थनाओं या राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत के समय भी उनका अंदाज वही रहता था। एक बार टोका तो उनमें [...]

करीबन दस साल पहले एक कविता लिखी थी, जिसे पहली बार इस ब्लॉग पर 17 मार्च, 2006 को और फिर 13 नवम्बर, 2007 को दोबारा पोस्ट किया था। उस कविता में जिस ‘चिर-प्रतीक्षित’ की संकल्पना थी, उसका कोई चेहरा सामने नहीं था और हमारे कुछ मित्रों,  मसलन ज्ञानदत्त जी, घुघूतीबासूति जी ने उसके बारे में [...]

हर रोज टीवी, इंटरनेट और अख़बार ठेल देते हैं मेरे भीतर संसार के खारे समंदर की ढेर सारी बेतहाशा हलचल। एक दरिया मेरे अंदर से भी उमड़ता है रोज संसार की तरफ लबरेज बेबसी और बेचैनी की बुदबुदाहटों भरा गंदला बेस्वाद जल लिए। हर रोज कुछ थपेड़े संसार के समंदर के करते हैं आघात मेरे [...]

कब से सुन रहा हूँ सुदूर से आती हुई तुम्हारे पदचापों की मधुर ध्वनि आ रहे हो तुम धीरे-धीरे हमारे बीच तुम्हारे आने की ख़बर हमें सदियों से है हम हर घड़ी तुम्हारे ही इंतजार में रहे हैं। पहुँच चुके हैं धरा पर तुम्हारे पगों के स्पंदन आ तो चुके हो मगर छुपे हो आम [...]

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