स्कूल के दिनों में समूह प्रार्थना करते समय हमारे कुछ मुसलमान सहपाठी पंक्ति में शामिल तो होते थे, पर मौन रहते थे और उनके हाथों की मुद्रा भी विश्राम में रहती थी। यहां तक कि धर्मनिरपेक्ष शब्दावली वाली प्रार्थनाओं या राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत के समय भी उनका अंदाज वही रहता था। एक बार टोका तो उनमें [...]
इस वर्ष अप्रैल में जंतर-मंतर पर हुए अन्ना के असरकारी अनशन के बाद मैंने आशंका जाहिर की थी कि आंदोलन की सफलता का श्रेय और लाइमलाइट लूटने की पुरानी होड़ और व्यक्तित्वों की आपसी टकराहट उसे राह से भटका न दे। वह आशंका सच साबित होने लगी है। और अब तो हालत यह हो चली [...]
Posted in चुनाव सुधार, दर्शन, पत्रकारिता, प्रशासनिक सुधार, प्रेरक विचार, भ्रष्टाचार, राजनीति, समसामयिक, संविधान और विधि, जन सरोकार, विश्लेषण, अन्ना हजारे on August 28th, 2011 No Comments »
मीडिया, मध्य वर्ग और आम जनता से वह शिकायत अब दूर होने लगी है, जो मुझे लंबे अरसे से रही है और जिसे समय-समय पर मैं अभिव्यक्त करता भी रहा हूं। शायद हम सभी को उस एक निमित्त का इंतजार था, जिसके माध्यम से हमारे भीतर की प्रखर चेतना संघनित होकर अभिव्यक्त हो सके। शायद [...]
करीबन दस साल पहले एक कविता लिखी थी, जिसे पहली बार इस ब्लॉग पर 17 मार्च, 2006 को और फिर 13 नवम्बर, 2007 को दोबारा पोस्ट किया था। उस कविता में जिस ‘चिर-प्रतीक्षित’ की संकल्पना थी, उसका कोई चेहरा सामने नहीं था और हमारे कुछ मित्रों, मसलन ज्ञानदत्त जी, घुघूतीबासूति जी ने उसके बारे में [...]