होली की छुट्टियाँ मनाने के लिए आज ही दिल्ली से प्रस्थान करने से पहले मुझे मैथिली जी के पाँच सवालों के जवाब देने हैं। टैगिंग के खेल में अब तक अधिकांश चिट्ठाकार पहले ही लपेटे जा चुके हैं और ज्यादातर ने अपने जवाब भी दे दिए हैं। इसलिए इस खेल को आगे बढ़ाने के लिए मुझे शायद ही पाँच चिट्ठाकार मिल सकें। फिर भी, आप चिट्ठाकार भाइयों एवं बहनों में से कुछ अब भी बचे रह गए हों तो मैं आप सभी को लपेट रहा हूँ। कोई बाध्यता नहीं है, इस खेल में अब तक पूछे गए प्रश्नों में से आप अपनी पसंद के कोई भी पाँच सवाल चुन सकते हैं, शर्त केवल इतनी है कि जवाब अंतरंगता और तसल्ली से दिए जाएँ, निपटाने के ख्याल से नहीं। इस खेल की खासियत यही रही है कि पहली बार इसी बहाने साथी चिट्ठाकारों के बारे में हमें कुछ अंतरंग किस्म का परिचय जानने को मिल सका, जो शायद अन्यथा नहीं मिल पाता।
मैथिली जी का मैं शुक्रगुजार हूँ कि उन्होंने वस्तुनिष्ठ प्रकृति के ऐसे सवाल ही पूछे हैं, जिनके उत्तर चाहें तो एक-एक पंक्ति में भी दिए जा सकते हैं। मगर ऐसा करना तो सरासर बेईमानी होगी। इस खेल ने अनौपचारिक होने और अतीत में झाँकने का अवसर प्रदान किया है तो मुझे अपने उत्तरों में अंतरंगता का पुट डालते हुए व्यक्तिनिष्ठ होने और उसके दायरे को यथासंभव विस्तार देने का प्रयास करना चाहिए।
1. आपका सबसे पसंदीदा लेखक कौन है?
इस सवाल का उत्तर देते हुए एक दिलचस्प तथ्य की तरफ आपका ध्यान दिलाना चाहूंगा। बीसवीं शताब्दी में जिन दो भारतीयों ने संभवत: सर्वाधिक विपुल मात्रा में लेखन किया है और जिनको मैंने सर्वाधिक पढ़ा भी है, उन्हें मूल रूप से लेखक के तौर पर जाना नहीं जाता। उनमें से एक ‘लेखक’ के समग्र लेखन को लगभग 500-500 पृष्ठों के 100 खंडों में संकलित किया गया है तो दूसरे ‘लेखक’ के समग्र लेखन (लघु आकार की 2700 से अधिक पुस्तकों) को लगभग 500-500 पृष्ठों के 70 खंडों में अब तक प्रकाशित किया जा चुका है। जी हाँ, आपने सही पहचाना। ये दो लेखक हैं — महात्मा गांधी और पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य। गाँधी वाङमय अंग्रेजी में इंटरनेट पर पीडीएफ फार्मेट में उपलब्ध है। हमारे चिट्ठाकार साथी अफ़लातून जी इसे हिन्दी में भी इंटरनेट पर उपलब्ध कराने की दिशा में प्रयासरत हैं। इसी तरह ओशो भी, जिन्हें मैंने खूब पढ़ा और सुना है, जिनकी 240 से अधिक पुस्तकें अंग्रेजी में और 75 से अधिक पुस्तकें हिन्दी में इंटरनेट पर ई-बुक के रूप में भी उपलब्ध हैं, लेखकों में शुमार नहीं किए जाते, क्योंकि उनकी सभी किताबें उनके प्रवचनों एवं संभाषणों के लिप्यंतरण और अनुवाद हैं। सरलतम शब्दों में पाठकों तक अपनी बात को प्रभावी रूप में पहुँचा देने की कला में गाँधीजी से अधिक सिद्धहस्त शायद ही कोई होगा। मनसा-वाचा-कर्मणा पूर्णतया एक होने के कारण महात्मा गांधी के लेखन में पाठकों के मन पर अचूक प्रभाव पैदा करने की जादुई क्षमता है, जो मुन्नाभाई जैसे व्यक्तियों के दिमाग में ‘केमिकल लोचा’ कर देता है। पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य और ओशो – दोनों अलग-अलग ध्रुवों पर स्थित समकालीन विचारक एवं युगद्रष्टा हैं। उन दोनों को समानांतर रूप से पढ़ना और एक साथ आत्मसात करना मानसिक बवंडर जैसा प्रभाव पैदा करता है। इसी कड़ी में मैं आठ खंडों में संकलित विवेकानन्द साहित्य संचयन, जिसका हिन्दी अनुवाद प्रसिद्ध कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने किया था, का उल्लेख अवश्य करना चाहूँगा, जिसे दिन-रात रोजाना सत्रह-अठारह घंटे पढ़कर तीन हफ्ते में जब तक मैंने पूरा नहीं कर लिया तब तक चैन नहीं मिला। स्वामी विवेकानन्द भी लेखक के तौर पर शुमार नहीं किए जाते!
आत्मा को झकझोर देने वाले विचारों के प्रणेता इन सभी महान भारतीयों को ‘लेखक’ इसलिए नहीं माना जाता, क्योंकि इनकी किताबें ‘साहित्य’ की श्रेणी में नहीं आतीं। उनमें साहित्य का वह सबसे महत्वपूर्ण गुण नहीं पाया जाता, जिसे आचार्यों ने ‘कांता सम्मति उपदेश’ की संज्ञा दी है। कांता अर्थात् पत्नी जिस भाव से पति को जीवन की उलझनों और चुनौतियों का सामने करने के लिए सलाह देती है, जिसमें वह प्रत्यक्ष रूप से अपनी बात थोपती भी नहीं है और पति को उसे मान लेने के लिए रजामंद भी कर लेती है, साहित्य में भी कुछ उसी तरह के गुण की अपेक्षा की जाती है। पता नहीं, आज के जमाने में ऐसी पत्नियाँ कितने पतियों को नसीब हैं! साहित्य वह है जो उपदेश न दे, लोगों को बदलने के लिए सीधे तौर पर न कहे। जबकि गाँधीजी, पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य, ओशो और स्वामी विवेकानन्द लोगों को, दुनिया को, युग को बदलने के संकल्प के साथ ही प्रयत्नशील रहे। यही कारण था कि आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखते समय कबीर को महान कवियों में शामिल नहीं किया।
विद्यार्थी जीवन में विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रमों में शामिल हिन्दी और अंग्रेजी साहित्य के ‘क्लासिक्स’ माने जाने वाली ज्यादातर पुस्तकों का अध्ययन करने का अवसर मुझे मिला है। हिन्दी साहित्य के गद्य लेखकों में प्रेमचन्द, हरिशंकर परसाई, रामचन्द्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, फणीश्वर नाथ रेणु एवं अज्ञेय पसंदीदा लेखक रहे हैं। कवियों में बाबा नागार्जुन, निराला, शमशेर, मुक्तिबोध और कबीर विशेष प्रिय रहे हैं। अंग्रेजी साहित्य में टी.एस. इलियट और जॉर्ज बर्नाड शॉ पसंदीदा लेखक रहे हैं। रूसी साहित्यकारों में लियो टालस्टॉय, निकोलाई चेर्नीशेव्स्की और गोर्की को पढ़ा है। समकालीन चर्चित भारतीय अंग्रेजी लेखकों की किताबें भी मौका मिलने पर पढ़ने की कोशिश करता हूँ। अपने व्यक्तिगत परिचय के दायरे में समकालीन हिन्दी साहित्य में केदारनाथ सिंह, उदय प्रकाश, अनामिका, मैत्रेयी पुष्पा, विष्णु नागर, भगवान सिंह और मैनेजर पांडेय को पढ़ना और सुनना अच्छा लगता है। इसी तरह, हिन्दी के समकालीन पत्रकारों में प्रभाष जोशी, राजकिशोर, भारत डोगरा, आलोक पुराणिक और आनंद प्रधान का लिखा नियमित रूप से पढ़ता हूँ। लंबे अरसे तक जनसत्ता के ब्यूरो प्रमुख रहे राम बहादुर राय जी का पत्रकारीय लेखन भी मेरे लिए स्पृहणीय रहा है। इतने छोटे-छोटे और सरल वाक्य लिखने की कला आज तक किसी अन्य पत्रकार में नहीं दिखी।
जिन दो ग्रंथों को मैं जीवन में सर्वाधिक महत्वपूर्ण मानता हूँ और प्राय: रोज पढ़ता हूँ, वे हैं अष्टावक्र गीता और भारत का संविधान ।
2. आपने सर्व प्रथम किस हिन्दी चिट्ठे की किस प्रविष्टि को अपने कम्प्यूटर पर कापी कर के रखा?
ब्लॉग के बारे में रवि रतलामी जी के अभिव्यक्ति पर प्रकाशित इस लेख को शायद मैंने सबसे पहले कंप्यूटर पर सुरक्षित किया था। अपने लेख हिन्दी चिट्ठाकारिता के नवीन आयाम में रवि जी के उक्त लेख के अलावा जीतू भाई के लेख हिन्दी ब्लॉगिंग का व्यावसायिक भविष्य को पहली बार हाइपरलिंक्स से जोड़ा था। किसी अन्य उद्देश्य से किसी चिट्ठे की किसी प्रविष्टि को कंप्यूटर पर कापी करने की जरूरत उससे पहले महसूस नहीं हुई।
3. बचपन की कौन सी घटना आपको अब तक याद है?
अच्छी यादों से अधिक तो बुरी यादें हैं। अच्छी यादों में से एक – हिन्दी फिल्मों के मशहूर पार्श्व गायक उदित नारायण, जब मेरे गाँव के स्कूल में पढ़ते थे और गाँव में आयोजित होने वाले नाटकों के स्टेज पर ग्रामवासियों की फरमाइश पर रफी के गाने गाकर सुनाया करते थे तो एक महान भावी गायक को उभरते हुए नजदीक से देखना याद आता है। वर्ष 1983 में जब घुंघरू फिल्म के लिए उनका गाया गाना “जो सफर प्यार से कट जाए वो प्यारा है सफर” सुपरहिट होने के बाद जब वह गाँव आए तो हाई स्कूल में हमलोगों की फरमाइश पर मेज पर उन्होंने हाथ से संगीत की धुन बजाते हुए यह गाना सुनाया था।
बुरी यादें बाढ़, आग और भूकम्प के प्रकोप से जुड़ी हैं। कई बार उजड़े और कई बार बसे हैं हमलोग। हमारे इलाके के प्रख्यात लेखक फणीश्वर नाथ रेणु ने बाढ़ और भूकम्प का अपनी रचनाओं में काफी वर्णन किया है।
4. आपने अपने कम्यूटर में हिन्दी में सबसे पहले किस साफ़्टवेयर में टाइप किया और कब?
पहली बार हिन्दी में आकृति सॉफ्टवेयर पर काम किया था, 1997 में अमर उजाला में नौकरी के दौरान। वहाँ ज्वाइन करने के पहले ही दिन हिन्दी में इंस्क्रिप्ट कीबोर्ड पर टाइप करना सीखा। उसके बाद लीप ऑफिस, 2000 पर कई वर्षों तक कार्य किया। अक्षर, एपीएस कारपोरेट तथा आईएसएम 2000 नामक सॉफ्टवेयर भी कुछ अरसे तक उपयोग में लाया। अंतत: अब माइक्रोसॉफ्ट के इंडीक आईएमई पर काम करता हूँ।
5. कौन सा ऐसा काम है जिसे आप करना चाहते थे पर आपने नहीं किया, पहले किसी दूसरे ने कर लिया और आपको इसका अफ़सोस हुआ.
…हम्म। बचपन में सोचता था कि स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में क्यों नहीं पैदा हुए। भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद या नेताजी के साथ देश की आजादी के लिए लड़ते और कुर्बान हो जाते। सच में, बहुत अफसोस होता था और ईश्वर से मन ही मन फरियाद करता था कि तुमने बहुत नाइंसाफी की है मेरे साथ। अब लगता है कि ईश्वर ने बिल्कुल सही समय पर ही जन्म दिया है। आज की चुनौतियाँ उस जमाने की चुनौतियों से अधिक बड़ी हैं। पहले गोरे अंग्रेजों को भगाकर आजादी हासिल करनी थी, लेकिन अब देशी अंग्रेजों से निपटना है और आजादी को सही मायनों में हासिल करना है और उसे बरकरार रखना है।
इंटरनेट और हिन्दी से जुड़े होने के बावजूद चिट्ठाकारी से काफी देर से जुड़ा, इसका भी कुछ अफसोस है। तकनीकी रूप से जागरूक नहीं होने के कारण ही यह देरी हुई। हालाँकि अपना डोमेन 2004 में ही रजिस्टर करा लिया था, लेकिन शुरुआत अंग्रेजी की साइट से की। बाद में हिन्दी का डायनेमिक फोण्ट भी बनवाया, लेकिन यूनिकोड का पता बाद में चला। आज ही मिर्ची सेठ की काफी अरसे बाद टैगिंग के इसी खेल के क्रम में पोस्ट देखी तो वहाँ मैंने यह टिप्पणी की:
नींव का पत्थर बनना बड़े नसीब की बात है, महल के कंगूरे पर तो कौए भी कांव-कांव कर लेते हैं। आप हिन्दी चिट्ठाकारी की नींव में जड़े उन नायाब पत्थरों में से हैं जिनके बल पर चिट्ठाकारी का यह भव्य महल खड़ा हुआ है। इसका साज-श्रृंगार करने वाले, झाड़-फानूस लगाने वाले आते रहेंगे। लेकिन जो काम आलोक जी, देबू दा, आप और जीतू भाई ने किया है, उसके बिना चिट्ठाकारी का यह अंजाम देख पाना मुमकिन न हो पाता।
उक्त सूची में रवि रतलामी जी, अनूप शुक्ला जी, ई-स्वामी जी, अतुल अरोरा जी आदि जैसे कई दिग्गज चिट्ठाकारों का नाम जोड़ना छूट गया था। यदि पहले से जागरूक रहा होता तो मैं भी चिट्ठाकारी की नींव का हिस्सा हो सकता था।
[नेताजी पर लेख-श्रृंखला की कड़ी को आगे बढ़ाने का काम मंद गति से चल रहा है। इसके लिए आवश्यक दस्तावेजी सबूतों को एकत्र करने, उनका विश्लेषण करने और फिर उन्हें प्रकाशित करने की अनुमति हासिल करने में वक्त लग रहा है और शायद अब होली के बाद ही अगले लेख को अंतिम रूप दे सकूंगा।]

बकवास है गुङिया भीतर गुङिया आत्मकथा, नकली और गढी हुई। मैत्रेयी का मुखौटा नोचना होगा। यह सखि भाव की बात करती है यादव जैसे वुमेनाइजर के साथ? मंच पर से प्रेमी की बात करती यह बदसूरत मगर रंगीली बुढिया। इसे प्रेम सेक्स में स्त्री मुक्ती नजर आती है। गांव की मेहनतकश औरतों को गलत तरह से पेश करती है।
चालाक लोमडी की नकली और गढी हुई आत्मकथा, यह पढने लायक नहीं है।
चिठ्ठा संसार का एक ग्रह परिभ्रमण करते हुए दूसरे ग्रह के नज़दीक पहुंचेगा और युति होगी. नई भौगोलिक घटनाऒं और परिघटनाओं से भरी पोस्ट का इन्तज़ार रहेगा .
आपकी और अनूप जी की मुलाकात वाली चिट्ठी का इन्तजार रहेगा।
“आज की चुनौतियाँ उस जमाने की चुनौतियों से अधिक बड़ी हैं। पहले गोरे अंग्रेजों को भगाकर आजादी हासिल करनी थी, लेकिन अब देशी अंग्रेजों से निपटना है और आजादी को सही मायनों में हासिल करना है और उसे बरकरार रखना है।”
आपकी भावना दिल को छू गयी।
खूब तसल्ली से जवाब दिए आपने। यह देखकर बहुत खुशी होती है कि आजकल के छदम धर्मनिरपेक्षता वादी पत्रकारों की बजाय आप निष्पक्ष पत्रकारिता में यकीन रखते हैं।
आप ने तो मेरे दिल की बात कह दी। उपरोक्त प्रश्न का बिल्कुल यही जवाब मेरा भी था। सच में बहुत अफसोस होता है कि इंटरनेट तो तीन साल से प्रयोग कर रहा हूँ। काश हिन्दी चिट्ठाकारी से पहले जुड़ गया होता।
पर फिर लगता है कि हिन्दी चिट्ठाकारी इस समय शैशवावस्था से निकलकर किशोरावस्था में है। हम लोग अब भी इसमें बहुत योगदान दे सकते है। अतः निराश न हों।
पीछे रह जाने का अफसोस कैसा सृजन जी?
देश हजार साल के विदेशी शासन से जरूर मुक्त हुआ है परतुं अभी महासत्ता बनना बाकि है. फिर सीमाविहीन संसार की रचना बाकि है. यानी काम बहुत है. इसमें योगदान दें.
आपके पसंदिदा लेखक मेरे भी पसंदिदा लेखक है।
बढ़िया है! आऒ ठाकुर आओ कानपुर में स्वागत है!
आपके उत्तर मे सच्चाई है। बधाई
आपके और अनूप जी के बीच वार्ता का इन्तजार रहेगा, अपसोश की मै कानपुर मे नही था।