आज मैं ‘प्राण’ की बात करने जा रहा हूँ। उस प्राण की नहीं, जो हिन्दी सिनेमा जगत के बेहतरीन कलाकारों में से एक रहे हैं और आज भी 92 साल की उम्र में हमारे बीच मौजूद हैं। हाँ, एक बात तो है कि सिने कलाकार प्राण ने अपने नाम को वाकई सार्थक किया है।
पिछली पोस्ट में मैंने शरीर का जिक्र किया था। शरीर, जो रासायनिक तत्वों से मिलकर बना पदार्थ है, जिसे हमारी पौराणिक शब्दावली में पंच तत्वों से मिलकर बना माना जाता है। यह शरीर एक यंत्र है। प्रकृति का बनाया हुआ एक यंत्र, जो जैव प्रक्रियाओं से बनता है। इस शरीर की बनावट अद्भुत है। यह इतना जटिल है कि आज तक के वैज्ञानिक अध्ययनों-परीक्षणों से भी इसे पूरी तरह समझा नहीं जा सका है। खासकर मस्तिष्क वाला हिस्सा तो एक अबूझ पहेली की तरह हमारे विज्ञान के सामने लंबे अरसे से चुनौती के रूप में रहा है। खैर…
हम अब तक अपनी वैज्ञानिक तरक्की के बल पर इतना कर पाए हैं कि शरीर जिन जैव प्रक्रियाओं से बनता है, उसे जान गए हैं और उन प्रक्रियाओं को दूसरे तरीके से दोहरा कर नए शरीर बना पाने में सक्षम हो रहे हैं। परखनली शिशु, कृत्रिम गर्भाधान, क्लोनिंग आदि आधुनिक विधियों का विकास वाकई एक बड़ी वैज्ञानिक प्रगति है। हो सकता है कि आने वाले वक्त में हम मनुष्य की क्लोनिंग करने में भी सक्षम हो जाएं और आने वाले दौर में शरीर बनाने की फैक्ट्रियाँ भी बन जाएं।
हर यंत्र की तरह शरीर रूपी यंत्र को चलाने के लिए भी ऊर्जा की जरूरत पड़ती है, अन्यथा वह बेजान, निष्प्राण, बेकाम हो जाती है। हमारे शरीर को चलाने के लिए जिस ऊर्जा की जरूरत पड़ती है उसे प्राण कहा जाता है। प्राण ही वह ऊर्जा है जो हर सचेतन को, चाहे वह जीव-जंतु हो या वनस्पति, संचालित करती है। मनुष्य के बनाए जड़ यंत्रों को चलाने के लिए जिस तरह ऊर्जा यानी बिजली की जरूरत पड़ती है, उसी तरह प्रकृति के बनाए सचेतन यंत्रों को चलाने के लिए प्राण की जरूरत पड़ती है। केवल नाम का फर्क है, वह भी केवल यह दर्शाने मात्र के लिए कि पहला जड़ यंत्र को संचालित करता है तो दूसरा चेतन यंत्र को।
हम अपने आधुनिक वैज्ञानिक अध्ययनों के द्वारा ऊर्जा के बारे में काफी कुछ जानते हैं। यह भी जानते हैं कि ऊर्जा दरअसल पदार्थ से भी रूपांतरित होकर बनती है और एक रूप में पहले से मौजूद ऊर्जा को भी किसी दूसरे रूप में बदला जा सकता है। इस जानकारी का उपयोग करके हम ऊर्जा का रूपांतरण करते हैं और अपने समस्त यंत्रों को चलाते हैं।
इस संसार के बारे में हम जो कुछ जानते हैं, वह जड़ हो या चेतन, असल में केवल पदार्थ और ऊर्जा ही हैं। यदि हम अपनी बात चेतन जगत तक सीमित रखें तो कहेंगे कि शरीर है और प्राण है, इनके अलावा और कुछ नहीं। हमारा विज्ञान यही मानता है। विज्ञान-सम्मत सत्य यही है। हालांकि वास्तविक सत्य इससे अधिक हो सकता है, पर उसकी चर्चा फिर कभी।
आज हमें प्राण के बारे में बात करनी है। प्राण के बारे में हम-आप क्या जानते हैं? हम इतना जानते हैं कि प्राण हम चेतन जीवों को भोजन, पानी और हवा को ग्रहण करने से मिलता रहता है। यदि हम इन्हें ग्रहण करना छोड़ दें तो प्राण की अविरल धारा टूट जाएगी और हम निष्प्राण हो जाएंगे। हम प्राण को धारण करते हैं, इसीलिए तो हम प्राणी कहलाते हैं।
मगर, क्या हम जानते हैं कि शरीर में प्राण का पहली बार प्रवेश और शरीर से प्राण का अंतिम बार निकास किन प्रक्रियाओं से होता है? शरीर में प्राण के पहली बार प्रवेश को जन्म कहते हैं और शरीर से अंतिम बार प्राण के निकास को मृत्यु कहते हैं। हम जन्म और मृत्यु के बारे में क्या जानते हैं, कितना जानते हैं? यदि जान सकते तो हमारा जन्म और मृत्यु पर नियंत्रण होता!
यह हमारे जीवन के सबसे बड़े रहस्यों में से एक है। हमारा अब तक का वैज्ञानिक विकास और अध्ययन, इस विषय पर प्राथमिक अवस्था में है। यदि आपमें से कोई पाठक इस विषय पर ऐसा कुछ जानता है जिससे जीवन और मृत्यु के रहस्य को समझने में किसी हद तक मदद मिल सके तो आप जरूर साझा कीजिए।
