गांधीजी का ट्रस्टीशिप संबंधी सिद्धांत

गाँधीवाद के चार प्रमुख आयाम हैं — सत्य, अहिंसा, स्वावलंबन और न्यासिता। गाँधीजी का न्यासिता (ट्रस्टीशिप) संबंधी सिद्धांत मुझे आज के दौर में काफी प्रासंगिक और सबसे क्रांतिकारी आर्थिक सिद्धांत लगता है। यह पूँजीवाद और मार्क्सवाद के बीच का गाँधीवादी रास्ता है। यही वह सिद्धांत है, जिसके आधार पर विश्व शांति, न्याय और आर्थिक समानता के लक्ष्य को हासिल कर पाना किसी हद तक संभव है। लेकिन इस सिद्धांत को अमल में लाने की हिम्मत विरले ही किसी ने दिखाई है। इस सिद्धांत के व्यवहारिक पक्ष को लेकर मेरी देश के दिग्गज गाँधीवादी विद्वानों से चर्चा होती रही है।
 
इस चर्चा और चिंतन के आधार पर गाँधीजी के न्यासिता संबंधी सिद्धांत का एक नया व्यावहारिक मॉडल भी मैंने तैयार किया है, जो किशोरलाल मश्रुवाला और नरहरि पारीख द्वारा तैयार किए गए और कुछ संशोधनों के साथ स्वयं महात्मा गाँधी द्वारा अनुमोदित सूत्रों पर आधारित है। इससे पहले कि मैं आपके समक्ष न्यासिता का वह मॉडल पेश करूँ, बेहतर होगा कि हम न्यासिता के सिद्धांत और उसके अर्थशास्त्र को गाँधीजी के शब्दों में ही ठीक से समझ लें। गाँधीजी अपनी बात को सरलतम शब्दों में व्यक्त करते थे, इसलिए उसकी अलग से व्याख्या करना मेरे ख्याल से आवश्यक नहीं है।

महात्मा गांधी

ऊँच-नीच का समतलीकरण

आर्थिक समानता अहिंसक स्वाधीनता की सर्वकुंजी (Master Key) है। आर्थिक समानता के लिए कार्य करने का मतलब है पूंजी और श्रम के अंतहीन संघर्ष का उन्मूलन। इसका अर्थ है, एक ओर तो उन मुट्ठी भर धनवानों के स्तर को नीचे लाना जिनके हाथ में राष्ट्र की अधिकांश संपदा केन्द्रित है और दूसरी ओर, आधा पेट भोजन पर जीवन-निर्वाह करने वाले लाखों-करोड़ों लोगों के स्तर को ऊपर उठाना।

जब तक धनवानों और लाखों-करोड़ों भूखे लोगों के बीच की खाई नहीं पटती तब तक अहिंसक किस्म की सरकार की स्थापना करना नितांत असंभव है। नई दिल्ली के आलीशान भवनों और उनके पास ही मजदूरों की टूटी-फूटी झोपड़ियों का अंतर स्वतंत्र भारत में एक दिन भी नहीं चल सकता, जिसमें देश के गरीब लोगों के हाथों में उतनी ही शक्ति होगी जितनी कि सर्वाधिक धनी लोगों के हाथों में।

अगर धनवानों ने अपनी धन-दौलत और उससे प्राप्त शक्ति का स्वेच्छा से त्याग न किया और आम जनता को उसके हित के लिए उसमें साझीदार न बनाया तो निश्चित रूप से एक दिन हिंसक और रक्तरंजित क्रांति हो जाएगी।

मैं अपने न्यासिता के सिद्धांत पर दृढ़ हूँ, भले ही लोगों ने इसकी जमकर खिल्ली उड़ाई हो। यह सही है कि इसे प्राप्त करना कठिन है।

अहिंसक तरीका

अहिंसक पद्धति में हम पूँजीपति को नष्ट करने का प्रयास नहीं करते, बल्कि पूँजीवाद को समाप्त करने का प्रयास करते हैं। हम पूँजीपति से आग्रह करते हैं कि वह स्वयं को उन लोगों का न्यासी समझें जिनके ऊपर वह अपनी पूँजी के निर्माण, उसकी रक्षा और उसके संवर्धन के लिए निर्भर है। श्रमिक को भी उसके हृदय-परिवर्तन के लिए प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है। यदि पूँजी में शक्ति है तो श्रम में भी है। शक्ति का प्रयोग विनाश के लिए भी किया जा सकता है और सृजन के लिए भी। दोनों एक-दूसरे पर निर्भर हैं। अपनी शक्ति का अहसास होते ही श्रमिक पूँजीपति का गुलाम होने के स्थान पर उसका सह-भागीदार होने की स्थिति में आ जाता है। अगर वह एकमात्र स्वामी बनने की कोशिश करेगा तो अधिक संभावना इसी बात की है कि वह सुनहरा अंडा देने वाली मुर्गी को ही मार देगा।

सामुदायिक कल्याण

मैं उन व्यक्तियों को जो आज अपने आप को मालिक समझ रहे हैं, न्यासी (ट्रस्टी) के रूप में काम करने के लिए आमंत्रित कर रहा हूँ अर्थात् यह आग्रह कर रहा हूँ कि वे स्वयं को अपने अधिकार की बदौलत मालिक न समझें, बल्कि उनके अधिकार की बदौलत मालिक समझें जिनका उन्होंने शोषण किया है।

मान लीजिए कि मेरे पास विरासत में या उद्योग-व्यापार करके काफी धन इकट्ठा हो गया है तो मुझे यह समझना चाहिए कि यह सारा धन मेरा नहीं है, मेरा अधिकार तो बस सम्मानीय ढंग से रह सकने का है और इसका स्तर भी उससे ऊपर नहीं होना चाहिए जो लाखों लोगों को प्राप्त है। मेरा शेष धन समुदाय का है और वह उसी के कल्याण में खर्च किया जाना चाहिए।

व्यवहार में

इस प्रश्न का कोई महत्व नहीं है कि इस परिभाषा के अनुसार कितने लोग सच्चे न्यासी के रूप में आचरण कर सकते हैं। अगर यह सिद्धांत सही है तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि इस पर अनेक लोग चल रहे हैं या केवल एक ही आदमी चल रहा है। प्रश्न केवल दृढ़ आस्था का है। इस सिद्धांत में ऐसी कोई बात नहीं है जो बुद्धि की पकड़ के बाहर हो, हालाँकि आप यह कह सकते हैं कि इसे व्यवहार में लाना कठिन है।

मुझे यह स्वीकार करने में कोई लज्जा नहीं है कि अनेक पूँजीपतियों का मेरे प्रति मैत्रीभाव है और वे मुझसे भय नहीं खाते। वे जानते हैं कि मैं पूँजीवाद को समाप्त करने का लगभग उतना ही इच्छुक हूँ जितने कि सर्वाधिक उन्नत समाजवादी अथवा साम्यवादी हैं। लेकिन हमारे तरीके अलग-अलग हैं, हमारी भाषाएँ अलग-अलग हैं।

कामचलाऊ नहीं

न्यासिता का मेरा सिद्धांत कोई कामचलाऊ सिद्धांत नहीं है– निश्चित रूप से यह कोई छद्मावरण नहीं है। मुझे पक्का विश्वास है कि अन्य सभी सिद्धांतों का लोप हो जाने के बाद भी यह सिद्धांत जीवित रहेगा। यह दर्शन और धर्म द्वारा अनुमोदित है। धनवान लोगों ने इस सिद्धांत के अनुसार आचरण नहीं किया है, इससे सिद्धांत झूठा नहीं हो जाता, इससे सिर्फ धनवानों की दुर्बलता सिद्ध होती है। अन्य किसी सिद्धांत का अहिंसा के साथ मेल नहीं है।

धन-संपत्ति का अर्जन

आज जिनके पास दौलत है, उनसे कहना है कि वे इस तरह आचरण करें मानो उनके पास यह दौलत गरीबों की ओर से एक न्यास के रूप में रखी गई हो। आप कह सकते हैं कि न्यासिता कानून की दृष्टि से एक कल्पना मात्र है। लेकिन अगर लोग इस पर बराबर विचार करें और इसके अनुसार आचरण करने का प्रयास करें तो दुनिया आज जितने प्रेम से चलाई जा रही है, उससे कहीं अधिक प्रेम का संचार हो सकता है। यूक्लिड द्वारा की गई बिन्दु की परिभाषा की तरह पूर्ण न्यासिता भी एक अमूर्त विचार है और इसे प्राप्त करना भी उतना ही असंभव है। लेकिन अगर हम उसके लिए प्रयास करते रहें तो हम धरती पर समानता स्थापित करने की दिशा में अन्य किसी उपाय की अपेक्षा (न्यासिता के सिद्धांत पर आचरण करके) अधिक प्रगति कर सकते हैं।

मुझे पक्का विश्वास है कि जान-बूझकर गलत काम किए बिना भी दौलत कमाई जा सकती है। लेकिन मैं इस प्रस्थापना को स्वीकार करता हूँ कि संपत्ति को अर्जित करने और उसका न्यासी बनने की अपेक्षा संपत्ति की कामना न करना बेहतर है। मैं अपनी संपत्ति बहुत पहले ही त्याग चुका हूँ, जो इस बात का पर्याप्त प्रमाण होना चाहिए कि मैं औरों से क्या करने की अपेक्षा रखता हूँ। लेकिन मैं उन लोगों को क्या सलाह दूँ जो पहले से ही धनवान हैं या जो धन की कामना को छोड़ना नहीं चाहतेl ऐसे लोगों को मेरा परामर्श यही हो सकता है कि वे अपने धन का इस्तेमाल सेवा के लिए करें।

यह सही है कि आम तौर से धनी लोग अपने ऊपर जरूरत से ज्यादा खर्च करते हैं। लेकिन इससे बचा जा सकता है। व्यक्तिगत रूप से, मैं विरासत में मिली धन-दौलत में विश्वास नहीं करता। धनवान लोगों को अपने बच्चों को ऐसी शिक्षा देनी चाहिए और उनका पालन-पोषण इस प्रकार करना चाहिए कि वे अपने पैरों पर खड़ा होना सीखें। दुख का विषय है कि वे ऐसा नहीं करते।
न्यासी का कोई वारिस नहीं होता, जनता ही उसकी वारिस होती है। अहिंसा के आधार पर संगठित राज्य में न्यासिता का नियमन किया जाएगा।

विकल्प

जहाँ तक धन-संपत्ति के वर्तमान स्वामियों का प्रश्न है, उन्हें वर्ग-भेद और अपनी धन-संपत्ति के न्यासी के रूप में स्वेच्छा से अपने आपको परिवर्तित कर देने के बीच किसी एक का चुनाव करना होगा। उन्हें अपनी धन-दौलत के स्वामित्व को बनाए रखने, अपनी प्रतिभा का इस्तेमाल करने और अपनी दौलत में वृद्धि करने की अनुमति होगी, लेकिन अपनी खातिर नहीं बल्कि राष्ट्र की खातिर। इसलिए इसमें शोषण के लिए भी कोई स्थान नहीं होगा। इन्हें अपनी सेवा और समाज के लिए उसके मूल्य को देखते हुए कमीशन मिलेगा जिसकी दर का नियमन राज्य द्वारा किया जाएगा। उनके बच्चों को उनके स्थान पर न्यासी बनने की आज्ञा तभी मिलेगी जबकि वे स्वयं को इसके लिए सिद्ध कर सकेंगे।

जब लोग न्यासिता के अर्थ को समझने लगेंगे और वातावरण उसके अनुकूल हो जाएगा तो लोग स्वयं ही ऐसे कानून बनाना शुरू कर देंगे और यह शुरुआत ग्राम पंचायतों से होगी। ऐसी चीज नीचे से शुरू हो तो उसे लोग आसानी से स्वीकार कर लेते हैं। ऊपर से शुरू होने पर वह एक बोझ महसूस होती है।

1. न्यासिता (ट्रस्टीशिप) समाज की वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था को समतावादी व्यवस्था में रूपांतरित करने का एक साधन है। न्यासिता पूंजीवाद को बख़्शती नहीं है, पर वह वर्तमान मालिक वर्ग को सुधार का एक अवसर प्रदान करती है। यह इस विश्वास पर आधारित है कि मानव प्रकृति कभी सुधार से परे नहीं होती।

2. यह निजी स्वामित्व के किसी अधिकार को नहीं मानती, सिवा उसके जिसकी अनुमति समाज अपने कल्याण के लिए दे।

3. यह धन-संपत्ति के स्वामित्व और उपयोग के कानूनी विनियमन की वर्जना नहीं करती।

4. तदनुसार राज्य द्वारा विनियमित न्यासिता के तहत, कोई व्यक्ति अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए अथवा समाज के हितों की अनदेखी करते हुए अपनी संपत्ति को धारण करने अथवा उसका इस्तेमाल करने के लिए स्वतंत्र नहीं होगा।

5. जिस प्रकार एक समुचित न्यूनतम निर्वाह मजदूरी नियत करने का प्रस्ताव है, उसी तरह समाज में व्यक्ति की अधिकतम आय भी नियत कर देनी चाहिए। न्यूनतम और अधिकतम आयों के बीच जो अंतर हो वह युक्तिसंगत और न्यायोचित हो और उसमें समय-समय पर इस दृष्टि से परिवर्तन किया जाए कि अंतत: वह अंतर मिट जाए।

6. गांधीवादी अर्थव्यवस्था में, उत्पादन का स्वरूप सामाजिक आवश्यकता द्वारा निर्धारित होगा, व्यक्तिगत सनक या लोभ द्वारा नहीं।

(क्रमश:)

(साभार: महात्मा गांधी के विचार, संकलन एवं संपादन- आर.के. प्रभु तथा यू.आर. राव, नेशनल बुक ट्रस्ट, नई दिल्ली, भारत)

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3 Responses to गांधीजी का ट्रस्टीशिप संबंधी सिद्धांत

  1. OMPRAKASH KASHYAP says:

    ऊपर से आकर्षक दिखने के बावजूद ट्रस्टीशिप के सिद्धांत में अनेक कमजोरियां हैं. यह सम्राटों-सामंतों की दान-परंपरा का आधुनिक संस्करण है. चूंकि धर्म स्वयं सामंती परिवेश की देन है, इसलिए प्रायः सभी धर्मग्रंथों में किसी न किसी रूप में दान का महत्तम गाया गया है. राजा-महाराजाओं के दरबारी-चाटुकार उनकी दानशीलता का तो बखान करते थे, उसके लिए चारण-वृंदों को वृत्तिका पर रखा जाता था. उन सबका दायित्व अपने आश्रयदाता की प्रशंसा उसमें सदगुणों की स्थापना करना था. दानशीलता को राजा का सद्गुण माना गया था. मगर राजा के धनागम के स्रोत क्या हैं? उनका नैतिक स्वरूप क्या है? इस बारे में प्रायः कोई चर्चा नहीं होती थी. राजा का खजाना उसके जागीरदारों, जमींदारों, सेठों, व्यापारी संगठनों के प्राप्त कराधान, भेंट और सौगातों पर निर्भर रहता था. हालांकि राजा-सामंतों की कमाई के लिए धार्मिक ग्रंथों में आचारसहिंताएं थीं, मगर व्यवहार में उनका पालन कम ही होता था. बल्कि युद्ध के दौरान निरीह प्रजा से लूटे गए धन को भी राजा का पराक्रम बताते हुए राजदरबार में उसका प्रदर्शन अपनी उपलब्धि के बखान के लिए किया जाता था. भारतीय ग्रंथों में दान की महानता का वर्णन किया गया है. मगर दान की परंपरा ने ही भारतीय समाज में एक पराश्रित तथा दूसरे के श्रम पर पलने वाले वर्ग को जन्म दिया था, जिसका दुष्परिणाम देश आज तक भुगतता आ रहा है.

    ट्रस्टीशिप के साथ खतरा यह है कि जैसे धर्म के आवरण में राजा की कमाई के सारे स्रोत छिपा दिए जाते थे, उनकी नैतिकता पर कभी कोई चर्चा नहीं होती थी, वैसे ही यह विचार पूंजीवाद की समस्त अतियों और अनाचारों पर पर्दा डालने का काम करेगा. यह अनुचित और असंवैधानिक माध्यम से कमाए गए धन का वैधानिकीकरण करता है. अपनी पूंजी और तज्जनित संसाधनों के दम पर ट्रस्ट अथवा उसके सदस्य यह समझाने में कामयाब हो जाते हैं कि उनका लाभार्जन का तरीका व्यापक जनहित में है. कि लाभ द्वारा अर्जित धन का उपयोग लोकहित में किया जाना है. ट्रस्ट में धन के ‘धनार्जन’ के रास्ते पर भी सवाल नहीं उठाए जा सकते, न ही अपेक्षित होता है कि इस प्रकार के प्रश्नों को बीच में लाया जाए. स्वयं पूंजीपतियों को भी मालूम था कि ट्रस्टीशिप का विचार समाजवाद के विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया गया तो समाज की उनसे अपेक्षाएं बढ़ेंगी. उसपर हुई बहस पूंजीपतियों को कठघरे में खड़ा करेगी. इसलिए उन्होंने स्वयं ही उसको किसी भी प्रकार की बहस के दायरे से बाहर रखा. इसका एक परिणाम यह हुआ कि ट्रस्टीशिप का विचार कभी पुस्तकों से बाहर न आ सका.

    ट्रस्टीशिप के सिद्धांत को समझाने के लिए गांधीजी धर्म का सहारा लेते हैं. संभवत: वे उम्मीद करते हैं कि धर्म का आकर्षण अथवा डर पूंजीपतियों को लोककल्याण के पथ पर चलने का विवश कर देगा. यहां वे भूल जाते हैं कि पूंजीपति और राजनेता ही हैं जो परस्पर मिलकर धर्म को ताकतवर बनाते हैं. बदले में धर्म भी उनकी अनैतिक सत्ता को वैधता प्रदान करता है. ट्रस्टीशिप में पूंजीपतियों से अपेक्षा की जाती है कि वे जनसमस्याओं को एक जिम्मेदार अभिभावक की भांति देखें. अपने विवेक से उनके निदान के लिए आवश्यक उपाय भी करें. इससे निर्णय प्रक्रिया में आम आदमी की महत्ता घट जाती है. अप्रत्यक्ष रूप में समाज के बहुसंख्यक वर्ग को अविवेकी मानकर उसकी उपेक्षा करने का ट्रस्टीशिप का विचार पूंजीपतियों को अतिरिक्तरूप से अधिकार संपन्न करता है. उसकी अगली पीढ़ी जब चाहे उस निर्णय को वापस ले सकती है अथवा ट्रस्ट के नियमों में फेरबदल कर सकती है. पूंजीपति अपनी परिसंपत्तियां श्रमिक के श्रम के बल पर अर्जित करता है. अपने मुनाफे के मामूली हिस्से को ही वह ट्रस्ट के संचालन में लगाता है. ट्रस्ट में लगी पूंजी श्रमिक के खून-पसीने की कमाई होती है. इसके बावजूद श्रमिक को यह अधिकार नहीं होता कि वह ट्रस्ट के काम में हस्तक्षेप कर सके अथवा पूंजीपति को कोई सलाह दे सके. ट्रस्टी के रूप में जिन व्यक्तियों को यह जिम्मेदारी सौंपी जाती है, उनका चयन पूंजीपति द्वारा किया जाता है. अतः वे उसी का हितसाधन करते हैं. इस तरह देखा जाए तो ट्रस्टीशिप से आर्थिक-सामाजिक विभाजन के निदान का स्थायी उपाय कभी संभव नहीं है. शायद यही कारण है जो यह विचार पुस्तकों से बाहर कभी नहीं आ सका.

    ट्रस्टीशिप को ‘श्रमिकसंघवाद’(Syndicalism) का विरोधी विचार भी कहा जा सकता है, जो श्रमिकों को संगठित होने, संघर्ष करने और अपनी एकजुटता के दम पर समस्त उत्पादनतंत्र पर अधिकार कर लेने का आवाह्न करता है. अभिसंघवाद श्रमिक सहकारिता का विस्तार था, एक ऐसा सुधारवादी आंदोलन जिसमें अभिकल्पना की गई थी कि श्रम-संघ उत्पादक कारखानों को हड़ताल, विरोध-प्रदर्शन के माध्यम से अपने हाथों में ले लेंगे. श्रमिकसंघवाद का उद्देश्य समस्त श्रमिकों को एक झंडे, एक संगठन के रूप में संगठित करना है, जिसपर उसके साधारण से साधारण सदस्य का नियंत्रण हो. इसके व्याख्याता बेकुनिन का मानना था कि इससे पूंजीवाद की समस्त बुराइयों का हल खोजा जा सकता है. श्रमिक-संघवाद के लागू होने से बेरोजगारी और आर्थिक विषमता अपने आप समाप्त हो जाएंगी. चूंकि उस समय उत्पादक एवं उपभोक्ता का कोई अंतर ही नहीं रहेगा, इसलिए वस्तुओं का उत्पादन व्यक्ति की आवश्यकताओं के अनुरूप होगा, न कि लाभार्जन की वांछा से. गांधीजी का ट्रस्टीशिप का विचार एक परिकल्पना से आगे नहीं बढ़ पाता. दूसरी ओर पूंजीवाद के विरोधस्वरूप उपजे दर्शनों में उसके विकल्पों पर गंभीरतापूर्वक विचार किया गया है.

    स्मरणीय है कि जिस समय महात्मा गांधी ‘हिंद स्वराज’ में आधुनिक सभ्यता और मशीनीकरण की आलोचना कर रहे थे, उसको ‘शैतानी सभ्यता’ कहकर उसका तिरष्कार कर रहे थे, शेष दुनिया विशेषकर पश्चिम में पूंजीवाद के विरोध नए-नए विचारों का जन्म हो रहा था. पूंजीवाद के आलोचकों में एक अराजकतावादी पियरे जोसेफ प्रूधों भी था, जो व्यक्तिगत संपत्ति की अवधारणा का ही विरोधी था—‘व्यक्ति संपत्ति चोरी है. व्यक्तिगत संपत्तिधारक चोर है.’ उसका यह कथन बुद्धिजीवी हलकों में खलबली मचाए हुए था. प्रूधों के अलावा मार्क्स, ऐंगल्स, फ्यूरियर, राबर्ट ओवेन, बेकुनिन आदि विचारक पूंजीवाद के निरंकुश विस्तार से नाखुश थे. इन सबके विचारों में भिन्नता थी, किंतु वे सभी इस तथ्य पर एकमत थे कि समाज में व्याप्त आर्थिक असमानता अन्यान्य बुराइयों के लिए पूंजीवाद जिम्मेदार है. इसलिए समाज के वास्तविक कल्याण के लिए, विकास का लाभ जनसाधारण तक पहुंचाने के लिए पूंजीवाद पर अंकुश लगाना अत्यावश्यक है. उन सबसे अलग गांधीजी ‘हिंद स्वराज’ में तीखेपन के साथ मशीनों और आधुनिक सभ्यता की आलोचना तो करते हैं, मगर पूंजीपतियों की आलोचना नहीं कर पाते. वे संपत्ति पर समाज का अधिकार तो स्वीकारते हैं, किंतु उसके समान विभाजन के लिए कोई नई व्यवस्था का सुझाव देने के बजाय पूंजीपतियों से ही अपेक्षा करते हैं कि वे स्वयं को समाज की संपत्ति का रखवाला मानें. यह पूंजीवाद के प्रति समझौतावादी रवैया अपनाने जैसा है.

    ट्रस्टीशिप का औचित्य सिद्ध करने के लिए गांधीजी धर्म को माध्यम बनाते हैं. उम्मीद करते हैं कि धर्म का आकर्षण अथवा डर पूंजीपतियों को लोककल्याण के पथ पर चलने का विवश कर देगा. जबकि पूंजीपति और राजनेता ही हैं जो परस्पर मिलकर धर्म को ताकतवर बनाते हैं. धर्म उन्हें मजबूत करता है. निहित स्वार्थ के लिए वे धर्म की बेड़ियों को लगातार कसते जाते हैं. ट्रस्टीशिप में पूंजीपतियों से अपेक्षा की जाती है कि वे जनसमस्याओं को एक जिम्मेदार अभिभावक की भांति देखें. अपने विवेक से उनके निदान के लिए आवश्यक उपाय भी करें. परंतु इस निर्णय प्रक्रिया में आम आदमी की महत्ता घट जाती है. समाज के बहुसंख्यक वर्ग को अविवेकी मानकर उसकी उपेक्षा करने का ट्रस्टीशिप का विचार पूरी तरह पूंजीपतियों की अनुकंपा पर निर्भर रहता है. इससे समाज के आर्थिक-सामाजिक विभाजन का स्थायी समाधान संभव नहीं. शायद इसीलिए यह विचार पुस्तकों से बाहर कभी नहीं आ सका.

    ‘ट्रस्टीशिप’ की अवधारणा के पीछे हम गांधीजी के निजी जीवन के अनुभवों की छाया भी देख सकते हैं. दक्षिण अफ्रीका में प्रारंभिक सफलता के पश्चात वे प्रवासी भारतीयों के सर्वमान्य नेता बन चुके थे. यह प्रसिद्धि उन्हें सत्याग्रह आंदोलनों द्वारा प्राप्त हुई थी, जिनकी प्रेरणा उन्हें थोरो से मिली थी. इसमें उनके मित्रों और सहयोगियों का भी पूरा समर्थन उनके साथ रहा था. दक्षिण अफ्रीका में अपना पहला आश्रम खरीदने के लिए 100 एकड़ भूमि गांधीजी ने स्वयं खरीदी थी. उस स्थान पर उन्होंने फीनिक्स आश्रम की स्थापना की थी. वही दक्षिण अफ्रीका में उनकी प्रारंभिक गतिविधियों का केंद्र बिंदू बना. उसके बाद जैसे-जैसे उनका प्रभामंडल बढ़ता गया, मददगार आगे आते गए. आंदोलनों और कार्यक्रमों के लिए संसाधन अपने आप जुटते चले गए. जोहन्सबर्ग में टाल्सटाय फार्म की स्थापना का विचार बना तो हरमन केलिनवर्थ मैत्री-धर्म निभाने आगे आ गया. पेशे से वास्तुकार, धनी यहूदी केलिनवर्थ ने 1910 में आश्रम के लिए 1100 एकड़ भूमि की व्यवस्था अपने संसाधनों के बल पर की थी. वहां बनाया गया टाल्सटाय आश्रम गांधींजी के ‘सत्य के प्रयोगों’ की कर्मस्थली बना. मार्क्सवाद की आंधी भारतीय उद्योगपतियों को भी ’गांधी शरणम गच्छामि’ के लिए विवश कर दिया था. वे एक ओर ब्रिटिश सरकार से संपर्क बनाए हुए थे, तो दूसरी ओर गांधीजी से भी उनका निकट संबंध था. गांधी समर्थन का एक तरीका था कि उनके आंदोलन के लिए संसाधन उपलब्ध कराए जाएं. यह उनके लिए आसान कार्य था. अत: 1915 में भारत आगमन के उपरांत राजनीतिक-सामाजिक आंदोलनों के कार्यान्वन के लिए स्थान की आवश्यकता पड़ी तो गांधीजी के बैरिस्टर मित्र जीवनलाल देसाई ने जिम्मेदारी संभाली. उनके ‘कोचरब बंगले’ में 25 मई, 1915 को ‘सत्याग्रह आश्रम’ की नींव रखी गई. 1917 में अहमदाबाद नगर को प्लेग की महामारी ने जकड़ लिया. घनी आबादी के बीच प्लेग ज्यादा फैलती थी, इसलिए आश्रम को अन्यत्र ले जाने की जरूरत अनुभव की गई. उसके लिए शहर से दूर, खाली पड़ी बंजर जमीन को चुना गया. उसके पास ही ब्रिटिश जेल थी, जहां लौह-शृंखलाओं में बंधे ब्रिटिश साम्राज्य के कैदी काम करते रहते थे. वह भूमि गांधीजी को बिना कोई मूल्य चुकाए मिल गई. सत्याग्रह आंदोलन के विस्तार के लिए गांधीजी के आदेश पर विनोबा ने जब वर्धा जाकर पवनार आश्रम की नींव डाली तो उसके लिए भूमि-भवन जमनालाल बजाज ने भेंट किया था. गांधीजी की व्यक्तिगत नैतिकता और ईमानदारी का पूरा-पूरा सम्मान करते हुए हमें याद रखना चाहिए कि उस समय बिरला घराना कपड़ा उद्योग में अग्रणी था. जिसके मालिक घनश्यामदास बिरला गांधीजी के बेहद करीबी लोगों में थे. क्या यह केवल संयोग है एक लंगोटी में ब्रिटेन की यात्रा कर आने वाला वह ‘अधनंगा फकीर’ पूंजीपतियों अथवा जमींदारों के बंगलों में ठहरता था. यहां तक कि उन्होंने आखिरी सांस भी बिरला के ही भवन में ली थी.

    बेन ब्रैडले द्वारा अपने एक लेख में व्यक्त की गई यह घटना हालांकि बहुत बाद की है, किंतु गांधीजी के ट्रस्टीशिप के सिद्धांत की पृष्ठभूमि को समझने में सहायक हो सकती है. 1933 में मंदी के चलते मुंबई समेत देश के अन्य शहरों में कपड़ा मिलों में काम करने वाले श्रमिकों की मजदूरी में अचानक कटौती कर दी गई. एक तरफ महंगाई की मार, दूसरी ओर वेतन की कटौती, मजदूरों को एक साथ दोहरे संकट का शिकार बनना पड़ा. इससे उनमें आक्रोश फैलना स्वाभाविक था. श्रमिकों ने मिल-मालिकों पर दबाव बनाने की कोशिश की तो उन्होंने पुलिस की मदद से श्रमिकों को कुचलना आरंभ कर दिया. मजदूरों को कम वेतन पर काम करने के लिए बाध्य किया जाने लगा. इस बीच मिल मालिक कारखानों के विस्तार पर पूरा-पूरा ध्यान दे रहे थे. मजदूरी के नाम पर पूंजी की कमी और बढ़ते व्यापारिक घाटे का दावा करने वाले मिल-मालिकों की विस्तार योजनाओं में कोई कमी नहीं थी. कपड़ा मिलें जोर-शोर से आधुनिकीकरण में जुटी थीं. नई प्रौद्योगिकीयुक्त मशीनें लगाई जाने लगी थीं, जिससे एक साथ छह करघे जुड़े थे. एक श्रमिक छह करघों का संचालन एक साथ कर सकता था. इससे मिल मालिकों की आय में आशातीत वृद्धि हुई. मगर नई तकनीक श्रमिकों के लिए बेरोजगारी का संकट लेकर आई थी. वे घटी दरों पर रात और दिन की पारियों में काम करने को विवश थे. ऊपर से महंगाई बढ़ती ही जा रही थी. इससे उनके आक्रोश का बढ़ना निश्चित था. उग्र श्रमिकों ने काम पर जाना बंद कर दिया. मद्रास, धुलिया, नागपुर, शोलापुर, आमलनेर, अहमदाबाद, कुरिया यानी जहां-जहां कपड़ा मिलें थीं, सब जगह ऐसे ही हालात थे. दबाव से उकताकर अहमदाबाद में शेरा॓क मिल के मजदूरों ने अंततः हड़ताल घोषित कर दी. हड़ताल की घोषणा के साथ ही मिल मालिक दमन पर उतारू हो गए.

    उस समय ‘मिल मजदूर यूनियन’ नामक श्रम-संगठन पर गांधीजी का नियंत्रण था. ‘मिल मजदूर यूनियन’ ने यह तर्क देते हुए कि श्रमिकों ने हड़ताल पर जाने से पहले संगठन की अनुमति नहीं ली, उन्हें अपने संगठन से बहिष्कृत करना आरंभ कर दिया. उसी समय बेजबाड़ा मिल के मालिकों ने मजदूरी में 25 प्रतिशत कटौती का ऐलान कर दिया. इस नाजायज कटौती के विरुद्ध मामला मध्यस्थता के लिए ‘आर्बीट्रेशन बोर्ड’ के सम्मुख पहुंचा. गांधीजी वहां श्रमिकों की ओर से उपस्थित हुए. उस समय के हालात पर टिप्पणी करते हुए बेन ब्रैडले ने अपने आलेख में लिखा है—
    ‘‘मिल मालिक संगठन’ के सदस्यों में अधिकांश राष्ट्रीय कांग्रेस के समर्थक थे. संगठन का अध्यक्ष तो पूरी तरह से कांग्रेसी था और वह स्वदेशी माल वस्तुओं के उपयोग का पूर्ण पक्षधर था, जो उसकी अपनी मिलों में बनती थीं. महात्मा गांधी तो स्वदेशी का पक्ष लेते ही थे, इसलिए कि उन्हें मिल मालिकों की ओर से चंदा प्राप्त होता था. सेठ चमनलाल पारिख जो मिल मालिकों की ओर से ‘आबीर्टेशन बोर्ड’ के समक्ष उपस्थित हुए थे, समर्पित कांग्रेसी नेता थे. महात्मा गांधी कांग्रेस के सर्वेसर्वा थे. ऐसे में यह सोचना व्यर्थ ही है कि मजदूरी में 25 प्रतिशत की कटौती को लेकर ‘आर्बीट्रेशन बोर्ड’ का क्या निर्णय रहा होगा. गांधीजी द्वारा वेतन कटौती हेतु सहमत होने के लिए मजदूरों पर जोर डालने की यह कोई पहली घटना नहीं थी.’

    भारतीय वांङमय में कहा गया है—‘सबै भूमि गोपाल की.’ ट्रस्टीशिप के सिद्धांत की व्याख्या के समय कुछ ऐसा ही विचार गांधीजी के मन में रहा होगा. हो सकता है, उस समय गांधी जी के मन-मस्तिष्क पर राबर्ट ओवेन जैसे उदार पूंजीपतियों की छवि रही हो. लियो टाल्सटाय, थोरो और रस्किन की प्रेरणाओं को तो स्वयं गांधीजी ने ही स्वीकारा है. चीन और रूस में हुई सामाजिक क्रांति से मन ही मन घबराए हुए उस समय के प्रायः सभी धनकुबेर महात्मा गांधी के संपर्क में थे. गांधीजी की प्रेरणा पर उनमें से कुछ पूंजीपतियों ने ट्रस्ट बनाए भी, लेकिन वे उनके वाणिज्यिक और पारिवारिक हित-साधन से आगे न बढ़ सके. अधिकांश ने उसका उपयोग पुरस्कार-प्रोत्साहन द्वारा बुद्धिजीवियों को अपने पाले में बनाए रखने के लिए किया. कहा जा सकता है कि गांधीजी का ‘सत्याग्रह’ यानी राजनीति का अहिंसात्मक अनुप्रयोग तो कामयाब हुआ, किंतु आर्थिक क्षेत्र में उनका अहिंसावादी दृष्टिकोण सिवाय कुछ नारों और राजनीतिक अभिव्यक्तियों से आगे न बढ़ सका. जैसाकि ऊपर कहा गया है, कुछ नामी-गिरामी उद्योगपति टोपी-खद्दर पहनकर उनके पीछे जरूर चले, मगर इसके पीछे उनकी गांधीवाद में आस्था कम स्वयं को वर्ग-संगर्ष के उन नतीजों से बचाए रखने की छटपटाहट अधिक थी, जिसकी धमक भारतीय जनसमाज को नई चेतना से सराबोर कर रही थी. लेनिन और ट्राटस्की जैसे जननेता रूस की क्रांति को भारत में दोहराना चाहते थे, ताकि एशिया महाद्वीप में पूंजीवाद के पर कतरे जा सकें. गांधीजी का ‘ट्रस्टीशिप’ का विचार भले ही अव्यावहारिक मान लिया गया हो, मगर उसको उछाला खूब गया. सही मायने में तो उसने भारतीय किसानों-मजदूरों को सर्वहारा क्रांति से विमुख रखने, हालात से समझौता करने तथा दूसरों से दया की उम्मीद बनाए रखने के लिए प्रेरित किया.
    जैसा कि पीछे कहा गया है, गांधीजी समाजवादी नहीं थे. किंतु उनकी विचारधारा जिसे प्रायः गांधीवाद कह दिया जाता है, समाजवाद के विकल्प के रूप में प्रस्तुत की जाती है. पिछले दिनों यह मांग की गई थी गांधीजी को जिन धनी सेठों ने भूमि-भवन दान दिए, उनके आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए आर्थिक मदद पहुंचाई उनके बारे में शोध किया जाना चाहिए. यह काम अवश्य होना चाहिए कि गांधीजी को सार्वजनिक कार्य के लिए कब किस पूंजीपति ने कौन-सी संपत्ति भेंट की थी, उसका उन दिनों मूल्य क्या था? आखिर हिंद स्वराज के हिंदी संस्करण में भारतीय उद्योगपतियों के कारखानों में बने कपड़े का उपयोग करने की अनुमति के पीछे कुछ तो वजह रही होगी.
    © ओमप्रकाश कश्यप

  2. सर्वप्रथम तो एक बहुत उम्दा लेख के लिए आपको हार्दिक बधाई!!!

    आपके आलेख को ध्यानपूर्वक पढ़ने के पश्चात कम से कम मुझे तो ऐसा लग रहा है कि न्यासिता आवश्यक तो है परंतु जो तरिके सुझाएँ गये है वर्तमान परिप्रेक्ष्य में लगभग असंभव ही दिख रहे है। गरीब और अमीर के बीच की खाई बहुत गहरी हो चुकी है इसे पाटना अब संभव नहीं दिख रहा।

  3. divyabh says:

    बहुत उम्दा लेख लगा…,,पर यह उतना प्रासंगिक नहीं है जितना दिखता है…गांधी जी पर चर्चा होनी चाहिए पर चर्चाओं पर चर्चा ही इन सिद्धांतों को और जटील बना रहा है…वो तो साधारण मानव थे फिर भी हमसे दूजे थे…क्योंकि उन्होंने मात्र ईसा के वाक्यों का अनुकरण नहीं किया एक स्वयं के व्यक्तित्व का निर्माण भी किया…बापु का ही कहना था कि जबतक कार्य को Action नहीं बनाया जाता तबतक वह अधूरा रहता है…मात्र महान लोगों के विचार का अनुकरण करने से कुछ नहीं बदलेगा…हमॅ अपने भीतर से नया महात्मा को जन्म देना होगा…जो और नई पद्धतियों को वर्तमान समय के अनुसार कार्यान्वित कर सके…!!! Thnx…

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