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	<title>Comments on: गाँधी की महानता पर उठते प्रश्न</title>
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	<description>बेहतर दुनिया के लिए बेहतर इंसान चाहिए</description>
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		<title>By: pravinsinh</title>
		<link>http://srijanshilpi.com/archives/77#comment-7889</link>
		<dc:creator>pravinsinh</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 16 May 2009 12:16:50 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[nature cant make twice every person or living beling is unique in the world , so dont make compare who is the great , all r the great  , but the main thing what u learn from them , in my point of view mainly(also many other r) three ways to know truth , one is dissolve your self in nature means yog(by bhakri ,samrpan etc , ram ,krishna , shiv), second is madhya marg  like mediatation , pranayam ( osho,buddha ,patjali etc) and third is viyog ( mahavir ) ( u r not body) so i think gandhiji mostly follow the mahavir(ahinsha) so comment between the wayers is common so all r the great i like really all.i like my mother and u like your mother its basic thing in common so all like his own thinking how ever all great person impact on simploe men so the common men quarreal due to his own thinking , time doing and time finished , so just enjoy by peace]]></description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>nature cant make twice every person or living beling is unique in the world , so dont make compare who is the great , all r the great  , but the main thing what u learn from them , in my point of view mainly(also many other r) three ways to know truth , one is dissolve your self in nature means yog(by bhakri ,samrpan etc , ram ,krishna , shiv), second is madhya marg  like mediatation , pranayam ( osho,buddha ,patjali etc) and third is viyog ( mahavir ) ( u r not body) so i think gandhiji mostly follow the mahavir(ahinsha) so comment between the wayers is common so all r the great i like really all.i like my mother and u like your mother its basic thing in common so all like his own thinking how ever all great person impact on simploe men so the common men quarreal due to his own thinking , time doing and time finished , so just enjoy by peace</p>
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		<title>By: Pradeep</title>
		<link>http://srijanshilpi.com/archives/77#comment-7670</link>
		<dc:creator>Pradeep</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 28 Mar 2009 16:20:46 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[सभी सिर्फ बाते ही करते है. गांधी जी स्‍वयं अपने अहिंसा रूपी खुंटे से बन्‍ध गये थे. जैसे भीष्‍म पितामह बन्‍धे थे. सिर्फ अहिंसा से ही समस्‍याऐं हल नहीं होती है. देश की स्‍वतन्‍त्रता तो बहुत बड़ी समस्‍या थी. मेरा यह मानना है कि चुकिं गांधी जी को जनता के सामने जनप्रिय बनना आ गया था. साथ ही एक बडी पार्टी से जुडे थे. अत जनप्रिय बनना तो स्‍वा‍भविक है. साथ अहिंसा रूपी नये विचार को (लीक से हटकर) को सार्वजनिक तौर पर उठाने वाले उस समय अकेले ही व्‍यक्ति थे. इसलिऐ भी उनको काफी प्रसि‍‍द्ध‍ि मिली. लेकिन देश की स्‍वतन्‍त्रता में अहिंसा ही प्रमुख नहीं थी.
साथ अंग्रेजों जो काफी धूर्त, चालाक, मक्‍कार थे. उन्‍होने भी काफी जाल बिछाया इनको जनप्रिय बनाने में. ताकि अहिंसा की आड्र में उनकी गलतियां माफ होती रहे. आशीष जी ने 10 करोड़ का आंकडा कहां से लिया है? यदि यह मान भी ले कि इतने लोगो ने गांधी जी को अपना आदर्श माना तो आज तक अपना देश अंहिसा वादी हो जाना चाहिऐ था. जहां कोई खून खराबा, लड़ाई झगड़ा न हो, हर बात अंहिसक तरीके से मनायी जायें. किन्‍तु हमारे देश के चुने हुये प्रतिनिधि ही आपस में टांग खिचाई में समय जाया करते है. जनता में जातिवाद बढ़ाने हेतु आरक्षण आदि करवाते है. कभी धर्म के नाम तो कभी जाति के नाम, तो कभी जगह के नाम लड्राते है असली मुद्रदे की बात तो कोई नहीं कहता है? कि पर्यावरण इतना दूषित क्‍यों हो रहा है? क्‍यों हमारी भूमि बंजर हो रही है? क्‍यों किसान गरीब से गरीब हो जा रहा है? क्‍यों नेता, आई.ए.एस. या अन्‍य उच्‍च अधिकारी गण लोग एसी कारों में ही सफर करते है? शहरी करण क्‍यों बढता जा रहा है? गांवों में इतनी असुविधाएं क्‍यों है? नैतिक पतन उच्‍च अमीर लोगों में ज्‍यादा क्‍यों है? क्‍यों अमीर लोग अपराध करके छूट जाते है? क्‍यों एक कम्‍पनी मालिक करोड़ों रूपयों से खेलता है? क्‍यों पहले की तरह व्‍यक्ति एक दूसरे का भला नहीं करते है? यह प्रव़ति शहरों में ज्‍यादा है. 
इसलिए गांधी जी या रामदेव जी चर्चा से पहले यह देखना चाहिऐ कि हम क्‍या कर सकते है और क्‍या नहीं कर सकते है तथा देश, समाज या किसी व्‍यक्ति के लिये कितना भला किया है? 
जहां तक मेरा मानना है कि गांधी जी की अहिंसा से मेरा भला तो अब तक नहीं हुआ है (जीव हिंसा के अर्थ में नहीं) दुष्‍ट व्‍यक्ति को अहिंसा समझ में नहीं आती है? उसे तो दण्‍ड ही समझा सकता है.
और रामदेव जी के प्राणायाम व योग (चुकिं योग व प्राणायाम वेदकाल से चला आ रहा है लेकिन लोकप्रिय रामदेव जी ने किया इसलिए) मुझे काफी लाभ हुआ है. जिसको यह बात नहीं समझ में आती हो वह स्‍वयं आधा घण्‍टा प्राणायाम करके देख लेवें. और ज्‍यादा जानना हो तो रामदेव जी के शिविर में श्री राजीव जी दीक्षित के विचार सुने. काफी बातें समझ में आ जाएगी. धन्‍यवाद]]></description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>सभी सिर्फ बाते ही करते है. गांधी जी स्‍वयं अपने अहिंसा रूपी खुंटे से बन्‍ध गये थे. जैसे भीष्‍म पितामह बन्‍धे थे. सिर्फ अहिंसा से ही समस्‍याऐं हल नहीं होती है. देश की स्‍वतन्‍त्रता तो बहुत बड़ी समस्‍या थी. मेरा यह मानना है कि चुकिं गांधी जी को जनता के सामने जनप्रिय बनना आ गया था. साथ ही एक बडी पार्टी से जुडे थे. अत जनप्रिय बनना तो स्‍वा‍भविक है. साथ अहिंसा रूपी नये विचार को (लीक से हटकर) को सार्वजनिक तौर पर उठाने वाले उस समय अकेले ही व्‍यक्ति थे. इसलिऐ भी उनको काफी प्रसि‍‍द्ध‍ि मिली. लेकिन देश की स्‍वतन्‍त्रता में अहिंसा ही प्रमुख नहीं थी.<br />
साथ अंग्रेजों जो काफी धूर्त, चालाक, मक्‍कार थे. उन्‍होने भी काफी जाल बिछाया इनको जनप्रिय बनाने में. ताकि अहिंसा की आड्र में उनकी गलतियां माफ होती रहे. आशीष जी ने 10 करोड़ का आंकडा कहां से लिया है? यदि यह मान भी ले कि इतने लोगो ने गांधी जी को अपना आदर्श माना तो आज तक अपना देश अंहिसा वादी हो जाना चाहिऐ था. जहां कोई खून खराबा, लड़ाई झगड़ा न हो, हर बात अंहिसक तरीके से मनायी जायें. किन्‍तु हमारे देश के चुने हुये प्रतिनिधि ही आपस में टांग खिचाई में समय जाया करते है. जनता में जातिवाद बढ़ाने हेतु आरक्षण आदि करवाते है. कभी धर्म के नाम तो कभी जाति के नाम, तो कभी जगह के नाम लड्राते है असली मुद्रदे की बात तो कोई नहीं कहता है? कि पर्यावरण इतना दूषित क्‍यों हो रहा है? क्‍यों हमारी भूमि बंजर हो रही है? क्‍यों किसान गरीब से गरीब हो जा रहा है? क्‍यों नेता, आई.ए.एस. या अन्‍य उच्‍च अधिकारी गण लोग एसी कारों में ही सफर करते है? शहरी करण क्‍यों बढता जा रहा है? गांवों में इतनी असुविधाएं क्‍यों है? नैतिक पतन उच्‍च अमीर लोगों में ज्‍यादा क्‍यों है? क्‍यों अमीर लोग अपराध करके छूट जाते है? क्‍यों एक कम्‍पनी मालिक करोड़ों रूपयों से खेलता है? क्‍यों पहले की तरह व्‍यक्ति एक दूसरे का भला नहीं करते है? यह प्रव़ति शहरों में ज्‍यादा है.<br />
इसलिए गांधी जी या रामदेव जी चर्चा से पहले यह देखना चाहिऐ कि हम क्‍या कर सकते है और क्‍या नहीं कर सकते है तथा देश, समाज या किसी व्‍यक्ति के लिये कितना भला किया है?<br />
जहां तक मेरा मानना है कि गांधी जी की अहिंसा से मेरा भला तो अब तक नहीं हुआ है (जीव हिंसा के अर्थ में नहीं) दुष्‍ट व्‍यक्ति को अहिंसा समझ में नहीं आती है? उसे तो दण्‍ड ही समझा सकता है.<br />
और रामदेव जी के प्राणायाम व योग (चुकिं योग व प्राणायाम वेदकाल से चला आ रहा है लेकिन लोकप्रिय रामदेव जी ने किया इसलिए) मुझे काफी लाभ हुआ है. जिसको यह बात नहीं समझ में आती हो वह स्‍वयं आधा घण्‍टा प्राणायाम करके देख लेवें. और ज्‍यादा जानना हो तो रामदेव जी के शिविर में श्री राजीव जी दीक्षित के विचार सुने. काफी बातें समझ में आ जाएगी. धन्‍यवाद</p>
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		<title>By: रामेन्द्र सिंह भदौरिया</title>
		<link>http://srijanshilpi.com/archives/77#comment-4837</link>
		<dc:creator>रामेन्द्र सिंह भदौरिया</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 01 Apr 2008 11:24:16 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[महात्मा गांधी और बाबा रामदेव की तुलना करना भी एक महानता ही माना जायेगा,आज की पीढी को यह भी पता नही है,कि अन्ग्रेजी शासन क्या होता था,मै खुद इस बात का गवाह हूँ,कि अन्ग्रेजों के अत्याचार के कारण मेरे पिताजी मुझे दसों दिन जंगलों में रखते थे,और शीत गर्मी और बरसात का दुख जितना झेलना होता था,वह झेला करते थे,उन्नीस सौ छियालीस की गर्मियों की बात है,मेरे गांव की नहर की पटरी पर एक अन्ग्रेजों के ठहरने की कोठी बनी थी,अन्ग्रेज सैनिक जब निकलते थे,तो चारो तरफ़ हल्ला मचता था,&quot;भागो फ़िरंगी&quot;,और जो जहां पर जैसा होता था भाग लेता था,रोटी अगर चूल्हे के अन्दर होती थी तो वहीं रह जाती थी,आफ़त कमजोर और अबलाऒं की आती थी,कोई गांव की लडकी अगर किसी फ़िरंगी की नजर में चढ जाती थी,तो उसे अन्ग्रेजों के हाथों मरने के अलावा,परिवार में आते ही मार दिया जाता था,क्योंकि उसके उदर में कितने ही फ़िरंगियों का वीर्य भरा होता था,आज जैसे लोग अगर होते तो शायद गुलामी काट रहे होते,आज अपने ही लोग फ़िरंगियों की भाषा को पढ कर अपने ही देश में अबलाओं की कोख में अपना वीर्य भरने के लिये घूमते रहते है,नौकरी के बहाने घर पर रखते है,और फ़िर रोटी देने के नाम पर और अपनी ऊंची पहुँच रखने के कारण जिन्दगी को फ़िरंगियों से अधिक बरबाद करते है,इस लिये गांधी और रामदेव की तुलना करना बेकार है,उसे सीखो जो भूल कर आये हो,उसे याद करो जो तुम्हारे हमारे पुरखों ने झेला है,वे दिन याद करो जब तुम्हारे हमारे पूर्वज किसी प्रकार से हिन्दुत्व और मुसलमानी संस्कृति को बचा कर रख पाये थे,उन दिनो को याद करो जब जाते जाते हम दो भाइयों के अन्दर घरेलू कूटनीति को फ़ैलाकर लाखों परिवारों को उजाड दिया था,और वही कूटनीति का सहारा लेकर हम आपस में दूर और दूर होते जा रहे है,एक विशेष पार्टी एक तरफ़ अन्दरूनी कूटनीति आज भी फ़ैला रही है,और दूसरी बाहर से रहकर अपना नाम चमकाने के चक्कर में कूटनीति का सहारा ले रही है,एक पार्टी हिन्दू को भी आपस में बांटने के लिये राजनीतिक माहौल पैदा कर रही है,और हरिजन और नीच बताकर सवर्णों का भेद पैदा कर रही है,जनता को अब भी मानस बना लेना चाहिये कि हमने बहुत ही जिल्लत झेली है,लाखों कुर्बानिया दी है,हजारों सुहागिनो का सुहाग दाव पर लगा दिया था,हम भी यतीम थे,लेकिन एक दिन के लिये जेल जाकर स्वतंत्रता-संग्रामी होने की वाह वाही नही लूटी,किसी कारण से थाने में नाम आगया तो अपने को आगे कर नही चले,फ़िर कह रहा हूँ कि मत भूलो,हमारी संस्कृति बहुत मूल्यवान है.]]></description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>महात्मा गांधी और बाबा रामदेव की तुलना करना भी एक महानता ही माना जायेगा,आज की पीढी को यह भी पता नही है,कि अन्ग्रेजी शासन क्या होता था,मै खुद इस बात का गवाह हूँ,कि अन्ग्रेजों के अत्याचार के कारण मेरे पिताजी मुझे दसों दिन जंगलों में रखते थे,और शीत गर्मी और बरसात का दुख जितना झेलना होता था,वह झेला करते थे,उन्नीस सौ छियालीस की गर्मियों की बात है,मेरे गांव की नहर की पटरी पर एक अन्ग्रेजों के ठहरने की कोठी बनी थी,अन्ग्रेज सैनिक जब निकलते थे,तो चारो तरफ़ हल्ला मचता था,&#8221;भागो फ़िरंगी&#8221;,और जो जहां पर जैसा होता था भाग लेता था,रोटी अगर चूल्हे के अन्दर होती थी तो वहीं रह जाती थी,आफ़त कमजोर और अबलाऒं की आती थी,कोई गांव की लडकी अगर किसी फ़िरंगी की नजर में चढ जाती थी,तो उसे अन्ग्रेजों के हाथों मरने के अलावा,परिवार में आते ही मार दिया जाता था,क्योंकि उसके उदर में कितने ही फ़िरंगियों का वीर्य भरा होता था,आज जैसे लोग अगर होते तो शायद गुलामी काट रहे होते,आज अपने ही लोग फ़िरंगियों की भाषा को पढ कर अपने ही देश में अबलाओं की कोख में अपना वीर्य भरने के लिये घूमते रहते है,नौकरी के बहाने घर पर रखते है,और फ़िर रोटी देने के नाम पर और अपनी ऊंची पहुँच रखने के कारण जिन्दगी को फ़िरंगियों से अधिक बरबाद करते है,इस लिये गांधी और रामदेव की तुलना करना बेकार है,उसे सीखो जो भूल कर आये हो,उसे याद करो जो तुम्हारे हमारे पुरखों ने झेला है,वे दिन याद करो जब तुम्हारे हमारे पूर्वज किसी प्रकार से हिन्दुत्व और मुसलमानी संस्कृति को बचा कर रख पाये थे,उन दिनो को याद करो जब जाते जाते हम दो भाइयों के अन्दर घरेलू कूटनीति को फ़ैलाकर लाखों परिवारों को उजाड दिया था,और वही कूटनीति का सहारा लेकर हम आपस में दूर और दूर होते जा रहे है,एक विशेष पार्टी एक तरफ़ अन्दरूनी कूटनीति आज भी फ़ैला रही है,और दूसरी बाहर से रहकर अपना नाम चमकाने के चक्कर में कूटनीति का सहारा ले रही है,एक पार्टी हिन्दू को भी आपस में बांटने के लिये राजनीतिक माहौल पैदा कर रही है,और हरिजन और नीच बताकर सवर्णों का भेद पैदा कर रही है,जनता को अब भी मानस बना लेना चाहिये कि हमने बहुत ही जिल्लत झेली है,लाखों कुर्बानिया दी है,हजारों सुहागिनो का सुहाग दाव पर लगा दिया था,हम भी यतीम थे,लेकिन एक दिन के लिये जेल जाकर स्वतंत्रता-संग्रामी होने की वाह वाही नही लूटी,किसी कारण से थाने में नाम आगया तो अपने को आगे कर नही चले,फ़िर कह रहा हूँ कि मत भूलो,हमारी संस्कृति बहुत मूल्यवान है.</p>
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	<item>
		<title>By: Brijmohanshrivastava</title>
		<link>http://srijanshilpi.com/archives/77#comment-4804</link>
		<dc:creator>Brijmohanshrivastava</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 26 Mar 2008 15:39:03 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[गाँधी जी के समय में समस्याएं दूसरी थीं आज दूसरी है  उल तरीके से हल सम्ब्हब नहीं है &#039; ओशो तो सबकी आलोचना करते थे किंतु उनपर कई मामलों में सहमत होने को मजबूर होना पढता है  ओशो द्वारा गांधीजी पर जो भी लिखा गया है उन पर भी विचार किया जाबे तो कभी कभी यह मानना पड़ता है की न तो बाबा राम्देओ ग़लत है न रजनीश ग़लत थे  आगे फिर अपने अपने विचार है मुंडे मुंडे मतिर भिन्न  तुंडे तुंडे सरस्वती]]></description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>गाँधी जी के समय में समस्याएं दूसरी थीं आज दूसरी है  उल तरीके से हल सम्ब्हब नहीं है &#8216; ओशो तो सबकी आलोचना करते थे किंतु उनपर कई मामलों में सहमत होने को मजबूर होना पढता है  ओशो द्वारा गांधीजी पर जो भी लिखा गया है उन पर भी विचार किया जाबे तो कभी कभी यह मानना पड़ता है की न तो बाबा राम्देओ ग़लत है न रजनीश ग़लत थे  आगे फिर अपने अपने विचार है मुंडे मुंडे मतिर भिन्न  तुंडे तुंडे सरस्वती</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: Srijan Shilpi &#187; Blog Archive &#187; गांधी की राह और मैं</title>
		<link>http://srijanshilpi.com/archives/77#comment-2730</link>
		<dc:creator>Srijan Shilpi &#187; Blog Archive &#187; गांधी की राह और मैं</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 02 Oct 2007 16:32:43 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[[...] गांधी की महानता पर उठते प्रश्न [...]]]></description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] गांधी की महानता पर उठते प्रश्न [...]</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: Srijan Shilpi &#187; भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के कर्ण</title>
		<link>http://srijanshilpi.com/archives/77#comment-333</link>
		<dc:creator>Srijan Shilpi &#187; भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के कर्ण</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 22 Jan 2007 20:58:57 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[[...] मुझे नहीं मालूम कि अनूप जी ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का कितना और किस दृष्टि से अध्ययन किया है। जहाँ तक मेरी बात है, मैंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास और उसमें विशेषकर गाँधी, नेहरू, सुभाष और भगत सिंह की भूमिका का अध्ययन करने के लिए काफी समय लगाया है। इस विषय से संबंधित दर्जनों पुस्तकों और सैकड़ों दस्तावेजों के विशद अध्ययन के दौरान जो बातें मेरे सामने अधिक से अधिक स्पष्ट होती गई हैं, उनके आधार पर प्रसंगवश कुछ बातों का जिक्र मैंने कर दिया था। मेरा उक्त दृष्टिकोण मेरे स्वतंत्र अध्ययन पर आधारित है और ज्यों-ज्यों इस विषय पर मेरा अध्ययन बढ़ता गया है, मेरी धारणा प्रबल होती गई है। [...]]]></description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] मुझे नहीं मालूम कि अनूप जी ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का कितना और किस दृष्टि से अध्ययन किया है। जहाँ तक मेरी बात है, मैंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास और उसमें विशेषकर गाँधी, नेहरू, सुभाष और भगत सिंह की भूमिका का अध्ययन करने के लिए काफी समय लगाया है। इस विषय से संबंधित दर्जनों पुस्तकों और सैकड़ों दस्तावेजों के विशद अध्ययन के दौरान जो बातें मेरे सामने अधिक से अधिक स्पष्ट होती गई हैं, उनके आधार पर प्रसंगवश कुछ बातों का जिक्र मैंने कर दिया था। मेरा उक्त दृष्टिकोण मेरे स्वतंत्र अध्ययन पर आधारित है और ज्यों-ज्यों इस विषय पर मेरा अध्ययन बढ़ता गया है, मेरी धारणा प्रबल होती गई है। [...]</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: फुरसतिया &#187; सबको सम्मति दे भगवान</title>
		<link>http://srijanshilpi.com/archives/77#comment-313</link>
		<dc:creator>फुरसतिया &#187; सबको सम्मति दे भगवान</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 12 Jan 2007 18:53:28 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[[...] पहली बात तो यह कि मैंने यह लेख गांधीजी के बारे में अपनी सोच बताने के लिये लिखा था। बाबा रामदेव के बयान का उल्लेख करती सृजन शिल्पीजी पोस्ट का पहला पैराग्राफ और सागर भाई के बाबा रामदेव को शाबासी देने के संदर्भ से अधिक मैंने इन पोस्टों के संबंध में कुछ नहीं लिखा। न ही मैंने बाबा रामदेव या ऒशो के बयान पढ़े थे जिनके लिंक सृजन शिल्पी की पोस्ट में थे। मेरे जो भी विचार थे वे बाबा रामदेव के बयान को लेकर थे। सृजन शिल्पी जी और सागर भाई की प्रतिक्रियायें पढ़ने के बाद मैंने सारे लेख, लिंक देखे और अब अपनी बात रखना चाहता हूं। [...]]]></description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] पहली बात तो यह कि मैंने यह लेख गांधीजी के बारे में अपनी सोच बताने के लिये लिखा था। बाबा रामदेव के बयान का उल्लेख करती सृजन शिल्पीजी पोस्ट का पहला पैराग्राफ और सागर भाई के बाबा रामदेव को शाबासी देने के संदर्भ से अधिक मैंने इन पोस्टों के संबंध में कुछ नहीं लिखा। न ही मैंने बाबा रामदेव या ऒशो के बयान पढ़े थे जिनके लिंक सृजन शिल्पी की पोस्ट में थे। मेरे जो भी विचार थे वे बाबा रामदेव के बयान को लेकर थे। सृजन शिल्पी जी और सागर भाई की प्रतिक्रियायें पढ़ने के बाद मैंने सारे लेख, लिंक देखे और अब अपनी बात रखना चाहता हूं। [...]</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: फुरसतिया &#187; चल पड़े जिधर दो डग-मग में</title>
		<link>http://srijanshilpi.com/archives/77#comment-300</link>
		<dc:creator>फुरसतिया &#187; चल पड़े जिधर दो डग-मग में</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 08 Jan 2007 19:55:08 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[[...] बहरहाल, बाबा की बात तो बाबा जाने हमारे चिट्ठाजगत में भी बाबा रामदेव के बतान के बहाने काफ़ी कुछ लिखत-पढ़त हुयी। पहले शिल्पीजी ने लेख लिखा-गाँधी की महानता पर उठते प्रश्न। जनवरी में गांधी पर पुनर्विचार करने वाले शिल्पीजी ने साल खतम होते-होते नवंबर में उनकी महानता पर सवाल उठा दिये। लगे हाथ सागर चंद नाहर ने बाबा रामदेव की पीठ ठोंक दी कि वाह स्वामी रामदेव क्या बहादुरी की बात कही है। [...]]]></description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] बहरहाल, बाबा की बात तो बाबा जाने हमारे चिट्ठाजगत में भी बाबा रामदेव के बतान के बहाने काफ़ी कुछ लिखत-पढ़त हुयी। पहले शिल्पीजी ने लेख लिखा-गाँधी की महानता पर उठते प्रश्न। जनवरी में गांधी पर पुनर्विचार करने वाले शिल्पीजी ने साल खतम होते-होते नवंबर में उनकी महानता पर सवाल उठा दिये। लगे हाथ सागर चंद नाहर ने बाबा रामदेव की पीठ ठोंक दी कि वाह स्वामी रामदेव क्या बहादुरी की बात कही है। [...]</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: हिमांशु शर्मा</title>
		<link>http://srijanshilpi.com/archives/77#comment-268</link>
		<dc:creator>हिमांशु शर्मा</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 07 Dec 2006 15:36:57 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[खैर भई, हम्-जैसे पढे-लिखे लोग मीडिया द्वारा उडाई ऐसी बातों पर बहस करने से ज्यादा कर भी क्या सकते हैं. ना कोइ ये जानना चाहता है कि स्वामी रामदेव जी ने क्या और क्यों कहा &#124; हर एक-दो महीने बाद किसी ना किसी बात पर गांधी जी के बारे में सबके पास कुछ ना कुछ होता है, वो भी नकारात्मक&#124;  क्या गांधी जी किसी सकारात्मक बात पर कार्य और फिर बहस सम्भव है?]]></description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>खैर भई, हम्-जैसे पढे-लिखे लोग मीडिया द्वारा उडाई ऐसी बातों पर बहस करने से ज्यादा कर भी क्या सकते हैं. ना कोइ ये जानना चाहता है कि स्वामी रामदेव जी ने क्या और क्यों कहा | हर एक-दो महीने बाद किसी ना किसी बात पर गांधी जी के बारे में सबके पास कुछ ना कुछ होता है, वो भी नकारात्मक|  क्या गांधी जी किसी सकारात्मक बात पर कार्य और फिर बहस सम्भव है?</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: ललित कुमार</title>
		<link>http://srijanshilpi.com/archives/77#comment-265</link>
		<dc:creator>ललित कुमार</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 05 Dec 2006 23:30:31 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[गाँधी के व्यक्तित्व से जो लोग स्वंय को मापते हैं -वह स्वंय को छोटा ही पाते हैं। और शायद इसीलिये ऐसे लोग अपनी खीज के कारण गाँधी को छोटा दिखाने के लिये दार्शनिक होने का बहाना करके बेसिर पैर की बाते करते हैं। जब भी गांधी के बारे में चर्चा होती है तो मैं एक ही बात कहता हूँ -अगर हम ये मान भी लें कि गांधी में हज़ार बुराईयाँ थी -लेकिन क्या हमें यह नहीं चाहिये कि हम उस शख्सियत की कुछ अच्छाईयों को देखें -और उन अच्छाईयों से कुछ सीखें? अपने को दार्शनिक साबित करने का इससे आसान तरीका नहीं हो सकता कि किसी बडी हस्ती के बारे में किसी बहाने कुछ बुरा कह दो -और अगर आप राष्ट्रपिता जैसी हस्ती चुनते हैं तो आपको खबरों में आने में एक पल भी नहीं लगेगा। रामदेव जी योग को बढावा दे कर बहुत सुन्दर कार्य कर रहे हैं -लोकप्रियता उन्हें पहले से ही बहुत हांसिल है -उन्हें इस तरह की ऊल-जुलूल बातें शोभा नहीं देती। योगी निंदा नहीं करता और ना ही किसी बहस में पडता है ना ही किसी बहस को जन्म देता है।]]></description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>गाँधी के व्यक्तित्व से जो लोग स्वंय को मापते हैं -वह स्वंय को छोटा ही पाते हैं। और शायद इसीलिये ऐसे लोग अपनी खीज के कारण गाँधी को छोटा दिखाने के लिये दार्शनिक होने का बहाना करके बेसिर पैर की बाते करते हैं। जब भी गांधी के बारे में चर्चा होती है तो मैं एक ही बात कहता हूँ -अगर हम ये मान भी लें कि गांधी में हज़ार बुराईयाँ थी -लेकिन क्या हमें यह नहीं चाहिये कि हम उस शख्सियत की कुछ अच्छाईयों को देखें -और उन अच्छाईयों से कुछ सीखें? अपने को दार्शनिक साबित करने का इससे आसान तरीका नहीं हो सकता कि किसी बडी हस्ती के बारे में किसी बहाने कुछ बुरा कह दो -और अगर आप राष्ट्रपिता जैसी हस्ती चुनते हैं तो आपको खबरों में आने में एक पल भी नहीं लगेगा। रामदेव जी योग को बढावा दे कर बहुत सुन्दर कार्य कर रहे हैं -लोकप्रियता उन्हें पहले से ही बहुत हांसिल है -उन्हें इस तरह की ऊल-जुलूल बातें शोभा नहीं देती। योगी निंदा नहीं करता और ना ही किसी बहस में पडता है ना ही किसी बहस को जन्म देता है।</p>
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