बाबा नागार्जुन हमारे शहर दरभंगा की धड़कन हुआ करते थे। अंतिम समय तक वह अपनी जड़ों से जुड़े रहे। हमारी मातृभाषा मैथिली में विद्यापति के बाद वह सबसे बड़े कवि हुए। मैथिली में वह ‘यात्री’ नाम से लिखा करते थे। बच्चों, युवाओं और वृद्धों में वह समान रूप से लोकप्रिय थे। मुझे उनकी कविताओं से बचपन से ही अनुराग रहा है। कवि-सम्मेलनों में बाबा जहाँ कहीं जाते, समाँ बाँध देते थे। कभी-कभार वह जे.एन.यू. भी आते थे। जे.एन.यू. का माहौल उन्हें इतना रास आता कि एक बार वह जे.एन.यू. में पढ़ने के लिए मचल उठे। उन्होंने जे.एन.यू. की संस्कृति पर एक दिलचस्प कविता भी सुनाई थी। पाँच नवम्बर, 2006 को बाबा की नौवीं पुण्य तिथि थी। पिछले दिनों बाबा को याद करते हुए उनकी कविताओं का एक बार फिर से अवगाहन करने का अवसर मिला। उसी का पुरस्कार है उनपर केन्द्रित यह समीक्षात्मक आलेख। साथ में हैं बाबा की कुछ और कविताएँ। पहला भाग इससे पहले आप पढ़ चुके हैं। दूसरा भाग अब प्रस्तुत है। अनूप भाई की सलाह मानते हुए इनकी कड़ियाँ विकिपीडिया पर भी डाल दी गई हैं।
भाषा पर बाबा का गज़ब अधिकार है। देसी बोली के ठेठ शब्दों से लेकर संस्कृतनिष्ठ शास्त्रीय पदावली तक उनकी भाषा के अनेकों स्तर हैं। उन्होंने तो हिन्दी के अलावा मैथिली, बांग्ला और संस्कृत में अलग से बहुत लिखा है। जैसा पहले भाव-बोध के संदर्भ में कहा गया, वैसे ही भाषा की दृष्टि से भी यह कहा जा सकता है कि बाबा की कविताओं में कबीर से लेकर धूमिल तक की पूरी हिन्दी काव्य-परंपरा एक साथ जीवंत है। बाबा ने छंद से भी परहेज नहीं किया, बल्कि उसका अपनी कविताओं में क्रांतिकारी ढंग से इस्तेमाल करके दिखा दिया। बाबा की कविताओं की लोकप्रियता का एक आधार उनके द्वारा किया गया छंदों का सधा हुआ चमत्कारिक प्रयोग भी है। उनकी मशहूर कविता “आओ रानी, हम ढोएँगे पालकी” की ये पंक्तियाँ देखिए:
यह तो नई-नई दिल्ली है, दिल में इसे उतार लो
एक बात कह दूँ मलका, थोड़ी-सी लाज उधार लो
बापू को मत छेड़ो, अपने पुरखों से उपहार लो
जय ब्रिटेन की जय हो इस कलिकाल की!
आओ रानी, हम ढोएँगे पालकी!
रफ़ू करेंगे फटे-पुराने जाल की!
यही हुई है राय जवाहरलाल की!
आओ रानी, हम ढोएँगे पालकी!
नागार्जुन की भाषा और उनके छंद मौके के अनुरूप बड़े कलात्मक ढंग से बदल जाया करते हैं। यदि हम अज्ञेय, शमशेर या मुक्तिबोध की कविताओं को देखें तो उनमें भाषा इस कदर बदलती नहीं है। ये कवि अपने प्रयोग प्रतीकों और बिम्बों के स्तर पर करते हैं, भाषा की जमीन के स्तर पर नहीं। उनके समकालीन कवि त्रिलोचन शास्त्री ने मुक्तिबोध और नागार्जुन की कविताओं की तुलना करते हुए एक बार कहा था–
मुक्तिबोध की कविताओं का अनुवाद अंग्रेजी या यूरोप की दूसरी भाषाओं में करना ज्यादा आसान है, क्योंकि उसकी भाषा भले भारतीय है, पर उसमें मानसिकता का प्रभाव पश्चिम से आता है; लेकिन नागार्जुन की कविताओं का यूरोपीय भाषाओं में अनुवाद बहुत कठिन होगा। यदि ऐसी कोशिश भी हो तो तीन-चार पंक्तियों के अनुवाद के बाद ‘फुटनोट’ से पूरा पन्ना भरना पड़ेगा।
यही असल में बाबा की कविताओं के ठेठ भारतीय और मौलिक धरातल की पहचान है, जो उन्हें अपने समकालीन दौर के कई प्रमुख कवियों–जैसे अज्ञेय, शमशेर और मुक्तिबोध से अलग भाव-भूमि पर प्रतिष्ठित करता है। इसी से जुड़ी एक बात और। ये कवि मुख्य रूप से साहित्य के आंदोलनों से, वह भी पश्चिम-प्रेरित आंदोलनों से प्रभावित होकर कविता करते रहे, जबकि नागार्जुन भारतीय जनता के आंदोलनों से प्रेरित और प्रभावित होकर, या यों कहें कि उनमें शामिल होकर कविता करते रहे हैं। बाबा भले ही वामपंथी विचारधारा से जुड़े थे, परंतु उनकी यह विचारधारा भी नितांत रूप से भारतीय जनाकांक्षा से जुड़ी हुई थी। यही कारण है कि वर्ष 1962 और 1975 में जब अधिकांश भारतीय ‘कम्यूनिस्ट’ रहस्यमय चुप्पी साधकर बैठे रहे थे, तब बाबा ने उग्र जनप्रतिक्रिया को अपनी कविताओं के माध्यम से स्वर दिया था। इन्हीं मौकों पर बाबा ने ‘‘पुत्र हूँ भारत माता का’’, ‘‘और कुछ नहीं, हिन्दुस्तानी हूँ महज’’, ‘’क्रांति तुम्हारी तुम्हें मुबारक’’, ‘’कम्युनिज्म के पंडे’’, “कट्टर कामरेड उवाच” तथा “इन्दुजी, इन्दुजी क्या हुआ आपको” जैसी कविताएँ लिखी थीं।
बाबा की कविताओं की भाव-भूमि प्रयोगवादी और नई कविता की भाव-भूमि से काफी भिन्न है, क्योंकि इन प्रवृत्तियों की ज्यादातर कविताएँ समाज-निरपेक्ष और आत्मपरक हैं, जबकि बाबा की कविताएँ समाज-सापेक्ष और जनोन्मुख हैं। उनके समकालीन कवियों की रचनाओं के संदर्भ में देखने पर यह बात ज्यादा साफ तौर पर समझ में आती है कि बाबा की कविता का बदलते भाव-बोध के बदलते धरातल के साथ किस तरह का रिश्ता रहा है, अर्थात् यह उन सबसे किस हद तक जुड़ती है और किस हद तक अलग होती है।
अज्ञेय और शमशेर जैसे कवियों की रचनाएँ कलावादी (art for art’s sake) भाव-भूमि पर प्रतिष्ठित हैं, जबकि नागार्जुन की कविताएँ जीवनवादी (art for life’s sake) भाव-भूमि पर। यह अंतर इन दोनों तरह की कविताओं के कथ्य, शिल्प और भाषा–तीनों स्तर पर देखा जा सकता है। निराला की उत्तरवर्ती दौर वाली कुछ कविताएँ, जैसे ‘कुकुरमुत्ता’ और ’तोड़ती पत्थर’ भी जनवादी भाव-भूमि के करीब हैं। दोनों का मूल स्वर प्रगतिशील चेतना से सरोकार रखता है। निराला जहाँ खत्म करते हैं, बाबा वहाँ से शुरू करते हैं।
रघुवीर सहाय और श्रीकांत वर्मा की कविताओं की भाव-भूमि बुनियादी रूप से बाबा की कविताओं से भिन्न है और यह भिन्नता मूलत: प्रतिबद्धता एवं सरोकार से संबंधित है। फिर भी, इन तीनों कवियों की काव्य-चेतना के बीच एक अंतर्संबंध भी है, जिसे रेखांकित करते हुए इब्बार रब्बी कहते हैं–
वह समाज जो आदमी का शोषण कर रहा है, उसकी मानसिकता को उजागर करते हैं अप्रत्यक्ष रूप से श्रीकांत वर्मा; उसके स्रोतों की पोल खोलते हैं रघुवीर सहाय; और उससे लड़ना सिखाते हैं नागार्जुन।
इस अंतर और अंतर्संबंध को इससे भी बेहतर ढंग से समझने के लिए इन तीनों कवियों का वर्ष 1975 के ‘आपातकाल’ के प्रति नजरिया देखना महत्वपूर्ण होगा। श्रीकांत वर्मा आपातकाल के पक्ष में खड़े थे; रघुवीर सहाय ‘हँसो, हँसो जल्दी हँसो’ जैसी कविताओं के माध्यम से सांकेतिक प्रतिवाद कर रहे थे; जबकि बाबा नागार्जुन न सिर्फ तीखे तेवर वाली कविताएँ लिखकर, बल्कि स्वयं आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेकर और जेल की सज़ा भुगतकर आपातकाल का विरोध कर रहे थे। इसी तरह यदि हम मुक्तिबोध की कविता से बाबा की कविताओं की तुलना करें तो पाते हैं कि मुक्तिबोध की कविता गहन विचारशीलता और स्वातंत्र्योत्तर भारत के मध्यवर्गीय चरित्र में निहित सुविधाजीविता और आदर्शवादिता के बीच के अंतर्द्वन्द्व की कविता है, जिसमें आम आदमी का संघर्ष आत्मसंघर्ष के रूप में है। मुक्तिबोध अपने समय के संघर्षों से सैद्धांतिक स्तर पर जुड़ते हैं, दार्शनिक अंदाज में। जबकि नागार्जुन की कविता ‘अनुभवजन्य भावावेग से प्रेरित’ है और आत्म-संघर्ष की बजाय खुले संघर्ष के स्वर में है। वह अपने समय के संघर्षों से व्यावहारिक धरातल पर जुड़ते हैं, एक सक्रिय योद्धा की तरह।
बाबा की कविताएँ सौंदर्य के भाव-बोध और भाषा-शैली आदि के स्तर पर सबसे अधिक केदारनाथ अग्रवाल और त्रिलोचन शास्त्री की कविताओं की भाव-भूमि के करीब हैं। इन तीनों कवियों के बुनियादी संस्कार और सरोकार काफी हद तक एक जैसे हैं और इसी वजह से तीनों एक धारा के कवि माने जाते हैं। फिर भी, बाबा की कविताएँ बाबा की कविताएँ हैं और वे केदार एवं त्रिलोचन की कविताओं की तुलना में अपनी अलग छाप छोड़ती हैं।
मुझे उनकी एक कविता ‘बादल को घिरते देखा है’ स्कूल के दिनों से याद है। कुछ पंक्तियाँ सुनिए:
अमल धवल गिरि के शिखरों पर,
बादल को घिरते देखा है।
छोटे-छोटे मोती जैसे
उसके शीतल तुहीन कणों को,
मानसरोवर के उन स्वर्णिम
कमलों पर गिरते देखा है,
बादलों को घिरते देखा है।
तुंग हिमालय के कंधों पर
छोटी बड़ी कई झीलें हैं,
उनके श्यामल नील सलिल में
समतल देशों से आ-आकर
पावस की ऊमस से आकुल
तिक्त-मधुर बिसतंतु खोजते
हंसों को तिरते देखा है।
बादल को घिरते देखा है।
उनका मैथिली गीत, “श्यामघटा, सित बीजुरि-रेह” भी मुझे अति प्रिय है:
श्याम घटा, सित बीजुरि-रेह
अमृत टघार राहु अवलेह
फाँक इजोतक तिमिरक थार
निबिड़ विपिन अति पातर धार
दारिद उर लछमी जनु हार
लोहक चादरि चानिक तार
देखल रहि रहि तड़ित-विलास
जुगुलकिशोरक उन्मद रास

इतने सुंदर लेख के लिए धन्यवाद. भले ही अपलोड करने के कुछ साल बाद देख रहा हूं. यही इंटरनेट का प्रताप है. आभार.
pad ke bahut aacha laga …
aapki kavita mere dil ko bha gayi hai …….
i like yr poetry,stories,eassy,letter..and else more
bahut badhaiya lekh hai.very good
बाबा की कविताओं और भाव संसार के देशीपन को बड़े सहज ढंग से उदघाटित किया है आपने। वैसे भी बाबा अपनी कविताओं के अनुवादक स्वयं ही हैं। बाबा को समझने की नई समझ देता है आपका यह आलेख।
सृजन शिल्पी से परिचय के बाद, सच है कि मैंने ये आलेख देर से पढ़ा, लेकिन खुशनसीब हूं। साधुवाद…
baba ki saeal sahaj gyan se sarabor ojaswi vani aur lekh sda man ko chhoojate hain .baba nagarjun jaise mahan vyaktitwa yug yugantar me ek hi bar janam lete hain jo apni mohak snehmayi chhavi man per ankit kar jate hain .aap ko sadhuwad dena chahungi ki aap ne baba ke liye itne saral shabdon me lekh likhkar ek prerak sndesh diya .usha sharma
editor in chief
samay srijan times
I am a research scholar in Hindi and doing my topic on nagarjuna katha sahitya. kindly mail me some material pertaining to baba Nagarjun’s views about agriculture and rural development in his novels and other writings.
This piece of writing is quite helpful for research students.Thanks a lot.
Dear Sir,
Nagarjun is my favourite poet because his poems are touching my heart. I read your article two times. I very much appreciate you. Plz write more about Baba’s lok chetana.
thanking you
Manjit singh
JNV Hassan
Karnataka
sir, i am a research scholar in hindi, deptt of hindi, banaras hindu university. i am doing research on nagargun. i am very happy to read your essay. i think it’s very good and effective essay. i hope you will be successful.
kripya MOHAN RAKESH aur AGYEYA par kuch samagri layen.
AWANISH
Mukherjee Nagar
DELHI
aapka yah prayaas atyant sarahniyae hai.
bahut badhiya prayas. samay ke sath vividhdta bhi aayegi, vishwas hai. darbhanga ko to aapne aur avinash-g ne garw ka mouka diya hai.
ham sbhi abhari hain.
uma,
dhanbad.
kya bhaw or kya bhasa dono star par bahoot hi badhiya likha hai aapne.bihinn kaviyo se tulna karte hooy likhna is lekh ko or bhi sresth bana diya hai.
प्रोत्साहन के लिए आप सभी का धन्यवाद।
अनूप भार्गव जी,
विकिपीडिया पर ललित कुमार द्वारा शुरू की गई ‘कविता कोश’ नामक परियोजना वाकई बहुत सराहनीय प्रयास है और हम सभी को इसकी समृद्धि के लिए योगदान करना चाहिए। उसमें अभी कवियों पर इस तरह के समीक्षात्मक लेखों को शामिल करने की अनुमति नहीं है। अभी केवल कविताएँ और कवि-परिचय ही वहाँ संग्रहित किए जा रहे हैं। बाहरी लिंक्स के लिए भी वहाँ विकल्प होना चाहिए।
अफ़लातून जी,
आपने अरविन्द दास के सौजन्य से जेएनयू पर बाबा की पंक्तियाँ याद दिलाई, इसके लिए धन्यवाद। आपके बारे में मित्रों से सुनता रहा हूँ। आप साहित्य पर भी क्यों नहीं लिखते!
रघुवीर सहाय जी ने आपात काल मेँ चिंगुरने की बात मानी भी है . उस दु:शासन-पर्व मेँ भवानीप्रसाद मिश्र ‘त्रिकाल – सन्ध्या’ कर रहे थे. उस दौर मेँ ‘रणभेरी’, ‘यकीन’, ‘भूमिपुत्र’ (गुजराती) मेँ वे कविताएँ छपीं थीँ . धर्मवीर भारती ने इन्हेँ न छाप पाने की मजबूरी जताई थी, अलबत्ता आपात काल की समाप्ति पर विशेषांक में मध्यपृष्ट पर एक ओर जयप्रकाश नारायण की तथा दूसरी ओर मुनादी छापी थी .
नवल – नवेलियों का
उन्मुक्त लीला-प्रांगण
यह जेएनयू
असल में कहा जाए तो कह ही डालूं
बड़ी अच्छी है यह जगह
बहुत ही अच्छी
और क्या कहूँ ।
http://arvinddas.blogspot.com/2006/09/blog-post_23.html
बहुत सुन्दर और जानकारी भरा लेख है | धन्यवाद ।
विकिपीडिया का जो आपने सन्दर्भ दिया वह भी देखा । अच्छा लगा ।
विकिपीडिया पर एक प्रयास यह भी चल रहा है :
http://hi.literature.wikia.com/wiki/
क्या हमें इन दोनों में कोई तालमेल नहीं बिठाना चाहिये (हिन्दी कविता के क्षेत्र में ) ?
बहुत बढिया लेख !
पढ़कर अच्छा लगा
एक बार फिर बाबा नागार्जुन के लेखन पर शानदार लेख लिखने के लिये बधाई !
बधाई जानकारी पूर्ण लेख के लिए ।
बाबा पर जानकारी पूर्ण लेख पढ़कर काफ़ी अच्छा लगा. आगे मौका मिलने पर उनके उपन्यासों के बारे में एक-एक कर लिखें. आप बाबा को सम्पूर्ण रूप से (जितना हो सके उतना) नेट पर लाने का प्रयास करें. बधाई इतने अच्छे लेख के लिये.