जो नैतिक है वही न्यासी हो सकता है

आशा है कि न्यासिता (ट्रस्टीशिप) के बारे में गांधीजी के सिद्धांतों और ओमप्रकाश कश्यप द्वारा उन सिद्धांतों में इंगित की गई ‘कमजोरियों’ से अब तक आप अवगत हो चुके हैं। दरअसल, कश्यप जी द्वारा की गई आलोचना को गांधीजी के ट्रस्टीशिप संबंधी सिद्धांतों की एक प्रतिनिधि आलोचना माना जा सकता है और अपने लेख में उन्होंने प्राय: वे सारी आपत्तियां व्यक्त कर दी हैं जो कि आम तौर पर इस सिद्धांत के संदर्भ में की जाती रही हैं।

कश्यप जी ने मोटे तौर पर गांधीजी के सिद्धांतों में पांच प्रमुख कमजोरियों को रेखांकित किया है:

1. इस सिद्धांत का दुरुपयोग पूंजीपति ट्रस्ट की आड़ में अनैतिक तरीकों से अर्जित किए गए धन को वैध बनाने में कर सकते हैं।

2. यह उसी दान-परंपरा का आधुनिक रूप है जिसे सामंती व्यवस्था के तहत धर्म का एक अंग माना जाता रहा है।

3. इस सिद्धांत में बहुसंख्यक आम जनता को विवेकहीन मानते हुए उनके हित के बारे में फैसला लेने का अनुचित अधिकार थोड़े-से पूंजीपतियों को दे दिया गया है।

4. इस सिद्धांत से हमारी व्यवस्था में मौजूद आर्थिक-सामाजिक विषमता का कोई स्थायी समाधान नहीं मिलता है।

5. यह उस श्रमिकसंघवाद का विरोधी विचार है जो श्रमिकों के संगठित संघर्ष द्वारा उत्पादन तंत्र पर अधिकार हासिल करके बेरोजगारी और आर्थिक विषमता को दूर करने का एक अधिक प्रगतिशील वैकल्पिक मार्ग प्रस्तुत करता है।

अब मैं न्यासिता संबंधी अपने उस व्यावहारिक मॉडल की अवधारणा आपके समक्ष रखने जा रहा हूँ, जिसका प्रस्ताव मैंने इससे संबंधित पिछली पोस्टों में किया था।

इसे समझकर आप ही बताएं कि क्या यह गांधीजी के आदर्शों के अनुरूप है और क्या इससे उन उपर्युक्त आलोचनाओं का निराकरण हो जाता है, जिसके कारण ट्रस्टीशिप संबंधी उनके सिद्धांतों को कभी अमल में लाने लायक नहीं समझा गया?

अपने स्तर पर मैंने संबंधित क़ानूनी प्रावधानों को भी देख लिया है और मेरे हिसाब से यह उनके दायरे में है।

  • न्यासी कोई भी बन सकता है, जरूरी नहीं कि वह कोई पूंजीपति हो।
  • इसका संबंध व्यक्ति की उस नैतिकता से है, जो सबके भले में अपना भला भी देखता है, न कि किसी तथाकथित धर्म से। (हाँ, यदि आप धर्म को उस नज़रिये से देख सकें, जिससे मैं देखता हूं तो आप न्यासिता को धर्म से जोड़ सकते हैं।)
  • ऐसा कोई भी व्यक्ति जिसके पास नैतिक उपायों से धन अर्जित करने, उस पर नियमानुसार कर आदि चुकाने, और जीवनोपयोग में होने वाले औसत स्तर के आवश्यक खर्च के बाद भी कुछ बचत हो जाती है तो यदि वह चाहे तो न्यासिता को अपना सकता है।
  • ऐसा व्यक्ति अपनी अधिकतम क्षमता के अनुरूप धनार्जन करे, मगर खर्च केवल औसत आवश्यकता के अनुरूप ही करे। जो बचत हो उसका एक अंश नियमित रूप से समाज के हित के लिए अपने ही पास अलग से रखे।
  • उसे करना क्या है? उसे केवल संकल्पपूर्वक यह सार्वजनिक घोषणा करनी है कि उसने अपनी बचत में से इतनी राशि समाज के हित के लिए अपने पास रखी है।
  • इस तरह हर एक व्यक्ति के पास अलग से संकल्पपूर्वक रखे गए धन के अंशों को मिलाकर जो वर्चुअल निधि बनेगी वह किसी एक खाते में जमा नहीं रहेगी और न ही किसी एक खाते से हस्तांतरित होगी।
  • आप पूछेंगे कि इसमें भला न्यासिता कहां से आ गई? इस तरह से सृजित हुई वर्चुअल निधि की न्यासिता इस बात से निर्धारित होगी कि उसका सदुपयोग व्यक्तियों की अपनी मर्जी से न होकर सामूहिक विवेक से तय होगा। इस तरह के सामूहिक विवेक को मैं ‘प्रज्ञा’ नाम देता हूं।
  • जरूरी नहीं कि इस तरह की वर्चुअल निधि केवल धन की हो। इस तरह की virtual pooling के तहत बनाया गया न्यास समय, श्रम और बुद्धि जैसे ऐसे संसाधनों का भी हो सकता है, जिनकी बचत संभव नहीं।

जाहिर है कि अभी यह एक अवधारणा मात्र है और इस विषय पर मैं ऐसे सभी व्यक्तियों से संवाद करने को तत्पर हूं जो इसके महत्व को किसी हद तक समझ सकते हैं।

लेकिन मेरा इरादा इसे व्यवहार में आजमाने का भी है और इस ब्लॉग पर इस उद्देश्य से मैं एक स्थायी पृष्ठ अलग से बनाने जा रहा हूं, जो इस तरह के न्यास का एक व्यावहारिक मूर्त्त मॉडल सामने रखेगी। यदि आप इस अवधारणा के मूलभूत तत्वों से सहमत हो पाते हैं तो इस न्यास में आपका स्वागत है। यदि आपके मन में इससे जुड़ा कोई भी सवाल उठता है तो आप बेहिचक यहां टिप्पणी के तौर पर उसे दर्ज कर सकते हैं।

जैसा कि गांधीजी ने स्वयं कहा था कि

इस प्रश्न का कोई महत्व नहीं है कि इस अवधारणा के अनुसार कितने लोग सच्चे न्यासी के रूप में आचरण कर सकते हैं। अगर यह  सिद्धांत सही है तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि इस पर अनेक लोग चल रहे हैं या केवल एक ही आदमी चल रहा है। प्रश्न केवल दृढ़ आस्था का है।

न्यासिता दरअसल नि:स्वार्थता का ही एक व्यापक रूप है। जब अर्जित ‘अर्थ’ के प्रति ‘स्व’ के भाव का लोप हो जाता है और व्यक्ति नि:स्वार्थ भाव से उस अर्थ को परमार्थ के प्रति समर्पित कर देता है तो यह प्रक्रिया न्यासिता बन जाती है।

नि:स्वार्थता के अलावा यह विवेकशील व्यक्तियों का कर्तव्य भी है, जैसा कि कबीर कह गए हैं:

जो जल बाढ़ै नाव में, घर में बाढ़ै दाम।
दोनों हाथ उलीचिये, यही सयानो काम।।

सनातन परंपरा में इसे सृष्टि का पहला नियम माना जाता है कि देने से घटता नहीं है। ऐसा माना जाता है कि परमार्थ की दृष्टि से सुपात्र को किया गया अंशदान उपयुक्त समय पर उसी तरह वापस लौट आता है, जैसे सतत प्रवाहित नदी में जल की आपूर्ति अनवरत कायम रहती है।

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4 Responses to जो नैतिक है वही न्यासी हो सकता है

  1. Prataap says:

    मेरे ब्लॉग पर आने हेतु आपका धन्यवाद ।

    इतने उत्कृष्ट कार्य के लिए भी आपका आभार. पूरी श्रृंखला में आपकी तन्मयता व गंभीरता नज़र आती है।
    मैं न्यासी के बारे में और जानना चाहता हूँ। आपके ऊपर पोस्ट में दिए हुए लिंक्स पढ़े।

    आपकी ही पिछली पोस्ट का एक अंश :

    ट्रस्टीशिप में पूंजीपतियों से अपेक्षा की जाती है कि वे जनसमस्याओं को एक जिम्मेदार अभिभावक की भांति देखें. अपने विवेक से उनके निदान के लिए आवश्यक उपाय भी करें. परंतु इस निर्णय प्रक्रिया में आम आदमी की महत्ता घट जाती है. समाज के बहुसंख्यक वर्ग को अविवेकी मानकर उसकी उपेक्षा करने का ट्रस्टीशिप का विचार पूरी तरह पूंजीपतियों की अनुकंपा पर निर्भर रहता है. इससे समाज के आर्थिक-सामाजिक विभाजन का स्थायी समाधान संभव नहीं.

    क्या अब तक trusteeship का दुरूपयोग अधिक हुआ है बजाय सदुपयोग के?
    यदि हो सके तो इनका समाज की बेहतरी के योगदान के बारे में भी बताएं।

    साथ ही N.G.O के बारे में भी बताएं।

    आभार !

    • @ प्रताप,

      तो आपने पोस्ट पढ़ने का प्रमाण दे दिया। :)

      बस, थोड़ी-सी मौज ली थी आपसे।

      आपने जो प्रश्न उठाए हैं, उन्हें इस श्रृंखला की अगली पोस्ट या पृष्ठ में शामिल करूंगा।

  2. @ प्रताप,

    लेख को पढ़ने की जहमत उठाए बिना टिप्पणी दर्ज करने के लिए आपका भी आभार ! :)

    आपके निर्देशानुसार दिए गए लिंक से होते हुए अध्यात्म से संबंधित आपके ब्लॉग पर जाना सुखद रहा।

  3. Prataap says:

    बहुत उपयोगी जानकारी दी है आपने,आभार !

    मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है,कृपया अपने महत्त्वपूर्ण विचारों से अवगत कराएँ ।
    http://poetry-kavita.blogspot.com/2011/11/blog-post_06.html

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