गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस के बालकांड में भगवान शिव के मुख से कुछ ‘अनमोल’ वचन कहलवाए हैं। किंतु ये वचन इतने कटु और अशोभनीय हैं कि सहज विश्वास नहीं होता कि ये रामचरितमानस जैसे महान और पवित्र काव्य के ही अंश हैं। अपशब्दों का ऐसा कवित्वमय प्रयोग विरले ही संसार के किसी अन्य महान साहित्य में देखने को मिलेगा। जरा आप भी एक बार फिर से इन अनमोल वचनों पर गौर फरमाएँ:
कहहि सुनहि अस अधम नर ग्रसे जे मोह पिसाच।
पाषंडी हरि पद बिमुख जानहिं झूठ न साच।। 114 ।।
अग्य अकोबिद अंध अभागी। काई विषय मुकर मन लागी।।
लंपट कपटी कुटिल विसेषी। सपनेहुँ संतसभा नहिं देखी।।
कहहिं ते बेद असंमत बानी। जिन्ह कें सूझ लाभु नहिं हानि।।
मुकर मलिन अरु नयन बिहीना। रामरूप देखहिं किमि दीना।।
जिन्ह कें अगुन न सगुन बिबेका। जल्पहिं कल्पित बचन अनेका।।
हरिमाया बस जगत भुमाहीं। तिन्हहि कहत कछु अघटित नाहीं।।
बातुल भूत बिबस मतवारे। ते नहिं बोलहिं बचन बिचारे।।
जिन्ह कृत महामोह मद पाना। तिन कर कहा करिअ नहिं काना।।
कबीर के कई अध्येताओं का मानना है कि तुलसीदासजी द्वारा रामचरितमानस में व्यक्त किए गए उपर्युक्त विचार राम के संबंध में कबीर की अवधारणा की भर्त्सना करने के उद्देश्य से ही शिव-पार्वती संवाद के रूप में प्रस्थापित किए गए हैं। यहाँ तक कि पूरे उत्तरकांड की रचना के पीछे एकमात्र यही उद्देश्य माना जाता है। प्रश्न उठता है कि आखिर इन दो महान राम भक्त कवियों के बीच दृष्टिकोण का ऐसा घोर अतंराल कहाँ है कि तुलसीदासजी को इतने कटुतम शब्दों में कबीर की ‘बानी’ पर प्रहार करने के लिए उद्यत होना पड़ा। इतना ही नहीं, हिन्दी साहित्य के महानतम आलोचक आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कबीर की राम के प्रति भक्ति को महज शुष्क ज्ञानमार्गी साधना बतलाकर उनकी रचनाओं को श्रेष्ठ साहित्य का दर्जा देने से इन्कार कर दिया। यदि गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कबीर की कविता के महत्व को पहचानने और उसे साहित्य में प्रतिष्ठित करने के लिए उत्कट प्रयास नहीं किए होते तो आज हम कबीर की रचनाओं के आस्वादान से वंचित रह गए होते। प्रस्तुत लेख में हम तुलसी के राम और कबीर के राम के बीच बुनियादी अंतर की पड़ताल करने और उसके कारणों की तह में जाने का प्रयास करेंगे।
कबीर के राम पुराण-प्रतिपादित अवतारी राम नहीं हैं। अवतारी राम कबीर को पसंद नहीं आते। अवतारवाद और कबीर के विचारों में कोई सामंजस्य नहीं है। कबीर के राम बुनियादी रूप से तुलसी के राम से भिन्न हैं। वह स्पष्ट रूप से कहते हैं :
नां दशरथ धरि औतरि आवा। नां लंका का रावं सतावा।
……………………………………………..
कहै कबीर विचार करि, ये ऊले व्यवहार।
याहीथें जे अगम है, सो वरति रह्या संसार।’
कबीर के राम तो अगम हैं और संसार के कण-कण में विराजते हैं। कबीर के राम इस्लाम के एकेश्वरवादी, एकसत्तावादी खुदा भी नहीं हैं। इस्लाम में खुदा या अल्लाह को समस्त जगत एवं जीवों से भिन्न एवं परम समर्थ माना जाता है। पर कबीर के राम परम समर्थ भले हों, लेकिन समस्त जीवों और जगत से भिन्न तो कदापि नहीं हैं। बल्कि इसके विपरीत वे तो सबमें व्याप्त रहने वाले रमता राम हैं। वह कहते हैं:
व्यापक ब्रह्म सबनिमैं एकै, को पंडित को जोगी।
रावण-राव कवनसूं कवन वेद को रोगी।
कबीर राम की किसी खास रूपाकृति की कल्पना नहीं करते, क्योंकि रूपाकृति की कल्पना करते ही राम किसी खास ढाँचे (फ्रेम) में बँध जाते, जो कबीर को किसी भी हालत में मंजूर नहीं। कबीर राम की अवधारणा को एक भिन्न और व्यापक स्वरूप देना चाहते थे। इसके कुछ विशेष कारण थे, जिनकी चर्चा हम इस लेख में आगे करेंगे। किन्तु इसके बावजूद कबीर राम के साथ एक व्यक्तिगत पारिवारिक किस्म का संबंध जरूर स्थापित करते हैं। राम के साथ उनका प्रेम उनकी अलौकिक और महिमाशाली सत्ता को एक क्षण भी भुलाए बगैर सहज प्रेमपरक मानवीय संबंधों के धरातल पर प्रतिष्ठित है।
कबीर नाम में विश्वास रखते हैं, रूप में नहीं। हालाँकि भक्ति-संवेदना के सिद्धांतों में यह बात सामान्य रूप से प्रतिष्ठित है कि ‘नाम रूप से बढ़कर है’, लेकिन कबीर ने इस सामान्य सिद्धांत का क्रांतिधर्मी उपयोग किया। कबीर ने राम-नाम के साथ लोकमानस में शताब्दियों से रचे-बसे संश्लिष्ट भावों को उदात्त एवं व्यापक स्वरूप देकर उसे पुराण-प्रतिपादित ब्राह्मणवादी विचारधारा के खाँचे में बाँधे जाने से रोकने की कोशिश की। इस बात को बाद में कबीर के ही टक्कर के, परंतु ब्राह्मणवादी विचारधारा के पोषक भक्त-संत तुलसीदास पचा नहीं सके और उन्होंने एक तरह से राम-नाम के साथ कबीर द्वारा संबद्ध की गई क्रांतिधर्मिता को निस्तेज करने के लिए ‘रामचरितमानस’ की रचना की। कबीर के राम-नाम की अवधारणा को अपने आस्थापरक विवेक से काफी कुछ महात्मा गाँधी ने भी समझा और आत्मसात किया था। यह अवधारणा लाख षड्यंत्रों और कुचेष्टाओं के बावजूद लोकमानस में अब भी जीवित है और आगे बनी रहने वाली है।
कबीर के लिए राम का वेद-पुराण सम्मत होना जरूरी नहीं है। यह अलग बात है कि तुलसीदासजी और उनके बाद से लेकर अब तक के बहुत से विद्वानों ने कबीर के राम को वेद-पुराण प्रतिपादित अवधारणा के दायरे में समेट लेने की बेहद कोशिश की है। लेकिन हैरानी और सुखद आश्चर्य की बात है कि वे लोग भी जो वेदों और पुराणों की प्रामाणिकता में विश्वास नहीं रखते, कबीर के ‘रमता राम’ की अवधारणा से न सिर्फ सहमत होते हैं, बल्कि उसे चित्त-संस्कारवश आत्मसात भी करते हैं।
कबीर में अपनी राम-विषयक अवधारणा को लेकर कोई मतांधता नहीं दिखाई देती। वे इस संबंध में कोई अड़ियल रुख नहीं अपनाते। वे तुलसीदासजी की तरह कृष्ण की मूर्ति के सामने भी यह हठ नहीं करते कि धनुष-बाण लेकर आओ, तब ही मैं तुम्हारे सामने शीश नवाऊंगा। ऐसी आग्रही भक्ति का भाव न तो कबीर में दिखाई देता है और न ही किसी अन्य निर्गुण भक्त संत में। बल्कि कबीर की दृष्टि तो ठीक इसके विपरीत है। अवतारवाद से संबद्ध कुछ सामाजिक अवधारणाओं के चलते उसका विरोध करने के बावजूद कबीर अवतारों के उन लीला-प्रसंगों को मुग्ध-भाव से स्वीकार करते हैं जिनमें प्रेम और ईश्वर की सर्वव्यापकता के मार्मिक चित्रण हुए हैं। कबीर राम के पर्यायवाची के रूप में ईश्वर के उन बहुत से नामों का प्रयोग भी करते हैं जो पुराण-परंपरा और विभिन्न संप्रदाय-मज़हबों में ईश्वर के लिए प्रयुक्त किए जाते हैं। वे अपने राम को हरि, गोविन्द, केशव, माधव, नरसिंह, अल्लाह, खुदा, साहब, करीम, रहीम, रब, गोरख, विष्णु, महादेव, सिद्ध, नाथ आदि कुछ भी कह लेते थे, कहने की रौ में जो नाम सहज रूप से आ जाए। लेकिन ईश्वर के लिए वह चाहे जिस किसी नाम का प्रयोग करते हों, ऐसा करते समय ईश्वर के प्रति उनकी धारणा में कोई अंतर नहीं आता। इस मामले में सगुण भक्त कवि कुछ विशेष सजगता बरतते हैं, वे अपने आराध्य को ब्रह्म का अवतार मानते हुए भी न सिर्फ उनके किसी खास रूप के प्रति निष्ठा रखते हैं, बल्कि उनके नाम के पर्यायवाचियों का प्रयोग करते हुए भी सावधानी बरतते हैं। वे अपने आराध्य को दूसरे नाम-रूपों से भिन्न बताने की सतर्क कोशिश करते हैं। इन सबके बावजूद यह एक गंभीर अध्ययन का विषय है कि कबीर जैसे निर्गुण भक्त कवि ‘राम’ नाम पर ही विशेष बल क्यों देते हैं।
कबीर के राम निर्गुण-सगुण के भेद से परे हैं। दरअसल उन्होंने अपने राम को शास्त्र-प्रतिपादित अवतारी, सगुण, वर्चस्वशील वर्णाश्रम व्यवस्था के संरक्षक राम से अलग करने के लिए ही ‘निर्गुण राम’ शब्द का प्रयोग किया–‘निर्गुण राम जपहु रे भाई।’ इस ‘निर्गुण’ शब्द को लेकर भ्रम में पड़ने की जरूरत नहीं। कबीर का आशय इस शब्द से सिर्फ इतना है कि ईश्वर को किसी नाम, रूप, गुण, काल आदि की सीमाओं में बाँधा नहीं जा सकता। जो सारी सीमाओं से परे हैं और फिर भी सर्वत्र हैं, वही कबीर के निर्गुण राम हैं। इसे उन्होंने ‘रमता राम’ नाम दिया है। अपने राम को निर्गुण विशेषण देने के बावजूद कबीर उनके साथ मानवीय प्रेम संबंधों की तरह के रिश्ते की बात करते हैं। कभी वह राम को माधुर्य भाव से अपना प्रेमी या पति मान लेते हैं तो कभी दास्य भाव से स्वामी। कभी-कभी वह राम को वात्सल्य मूर्ति के रूप में माँ मान लेते हैं और खुद को उनका पुत्र। निर्गुण-निराकार ब्रह्म के साथ भी इस तरह का सरस, सहज, मानवीय प्रेम कबीर की भक्ति की विलक्षणता है। यह दुविधा और समस्या दूसरों को भले हो सकती है कि जिस राम के साथ कबीर इतने अनन्य, मानवीय संबंधपरक प्रेम करते हों, वह भला निर्गुण कैसे हो सकते हैं, पर खुद कबीर के लिए यह समस्या नहीं है। वह कहते भी हैं:
“संतौ, धोखा कासूं कहिये। गुनमैं निरगुन, निरगुनमैं गुन, बाट छांड़ि क्यूं बहिसे!”
लेकिन बाद में तुलसीदासजी ने जब ‘रामचरितमानस’ में ‘अगुनहिं सगुनहिं नहिं कछु भेदा’ कहकर कबीर के ‘रमता राम’ और अपने ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ अवतारी राम को ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था के आधिपत्यवादी उद्देश्यों के तहत एक में मिलाने की कोशिश की, तब से गड़बड़ियाँ शुरू हो गईं और यह गड़बड़ी आज तथाकथित सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पीड़ादायी सामाजिक-राजनीतिक दंश के रूप में हमारे सामने है।
कबीर को सीधे-सीधे अवतारी राम से विशेष परेशानी नहीं है। कबीर को परेशानी है अवतारी राम के साथ जुड़ी उस पुराण-प्रतिपादित अवधारणा से, जिसके मुताबिक राम वर्णाश्रम व्यवस्था रूपी धर्म की रक्षा करने और उस व्यवस्था की ‘मर्यादा’ को न मानने वालों को दंडित करने के लिए अवतार ग्रहण करते हैं। धर्म की पुराण-प्रतिपादित अवधारणा वर्णाश्रम-व्यवस्था का ही पर्यायवाची है। जबकि कबीर इस वर्णाश्रम-व्यवस्था के घोरतम विरोधी हैं। वह वर्णाश्रम व्यवस्था कबीर को कतई मान्य नहीं है, जिसमें किसी व्यक्ति को सिर्फ इसलिए अछूत और पशु से भी हीन मान लिया जाता हो, जिसमें सिर्फ इसलिए उसे ज्ञान और भक्ति के अयोग्य ठहरा दिया जाता हो, क्योंकि वह किसी खास जाति में पैदा हुआ है। कबीर का उस वर्ण-व्यवस्था के प्रति गहरा विरोध है जिसमें बहुजन समाज के व्यक्तियों को शताब्दियों से पीढ़ी दर पीढ़ी दंडित किया जा रहा है और उन्हें इस दंड के कारण का पता तक नहीं है।
“कबीर के नस-नस में इस अकारण दंड के प्रति विद्रोह का भाव भरा था”– आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की यह पंक्ति वर्णाश्रम व्यवस्था के प्रति कबीर के तीव्र विरोध को सटीकता से रेखांकित करती है। वर्णाश्रम-व्यवस्था के हितचिंतकों द्वारा अपने उद्देश्यों के अनुकूल राम कथा को इस सूक्ष्मता से बुना गया है कि लोकमानस में वे पूरी तरह से रच-बस गई हैं। यह परिघटना कोई थोड़े समय में घटित नहीं हुई है। निश्चय ही यह क्रम कबीर के बहुत पहले से ही, पुराणों के शुरुआती रचना-काल से ही शुरु हो गया होगा। कबीर को भी लोकपरंपरा से अवतारी राम के जीवन की वे घटनाएँ जानने-सुनने को मिली होंगी और उनपर सहज विश्वास कर लेने के कारण वह उन सबको सच भी मानते होंगे। वे घटनाएँ कबीर की मानवीय संवेदना के ठीक विपरीत थीं। कबीर कैसे स्वीकार कर सकते थे कि उन्हीं के समान एक दलित, शंबूक को सिर्फ इस अपराध के लिए कि वह शूद्र होते हुए भी आत्म-साक्षात्कार पाने की अनधिकारिक चेष्टा कर रहा था, जिस राम ने मृत्युदंड दे दिया था, वह ईश्वर के अवतार हैं, खुद परब्रह्म हैं!
कबीर की संवेदना में जिस ईश्वर की कल्पना और अनुभूति व्याप्त है, वह ईश्वर तो न सिर्फ सबको एक समान मानता है, बल्कि सबमें एक समान भाव से व्याप्त है। उनकी संवेदना में बसे राम तो ‘बाहर-भीतर सकल निरंतर’ हैं। ब्राह्मणवादी वर्चस्वशील व्यवस्था के स्वार्थों और हितों के अनुरूप ढाले गए, पुराण-प्रतिपादित अवतारी राम भला कबीर की विराट मानवीय संवेदना के धरातल पर कैसे प्रतिष्ठित हो सकते थे! ‘रमता राम’ एक मौलिक अवधारणा है। हालाँकि कबीर के पहले भी यह अवधारणा विद्यमान थी, लेकिन जनसामान्य में इस अवधारणा को पहली बार कबीर ने ही प्रतिष्ठित किया। ‘राम’ नाम की कुछ व्याख्याएँ पहले से प्रचलित थीं। एक व्याख्या यह थी कि निरंतर ब्रह्म के ध्यान में लीन रहने वाले योगियों के हृदय में जो रमण करते हैं, वह राम हैं। एक दूसरी व्याख्या इससे भी अधिक व्यापक थी कि जो सृष्टि के कण-कण में रमण करते हैं, वही राम हैं। भक्त प्रह्लाद ने भी इसी भाव का साक्षात कर दिखाया था। कबीर की संवेदना इसी व्याख्या के अनुकूल थी। यह ईश्वर की सबसे सहज और सरल व्याख्या थी। कबीर ने कण-कण में रमने वाले इसी ‘रमता राम’ को अपना आराध्य बनाया। राम-नाम का मंत्र तो उन्हें सदगुरु से ही मिल गया था। गुरु रामानंद की राम-नाम की अवधारणा भी व्यापक थी, वह राम को महज अवतार नहीं मानते थे, बल्कि स्वयं परात्पर ब्रह्म मानते थे। यदि यह सच है कि गुरु रामानंद से ही कबीर को भक्ति और राम-नाम की दीक्षा मिली थी, तब यह भी स्वीकार किया जा सकता है कि कबीर के रमता राम की अवधारणा में भी रामानंद का विशेष प्रभाव है। लेकिन कबीर के ‘रमता राम’ में जो धार है, जो तेजस्विता है, वह कबीर की अपनी है। उन्होंने अपने ‘रमता राम’ को वर्णाश्रम-व्यवस्था के प्रतीक ‘अवतारी राम’ के मुकाबले खड़ा कर दिया और यह एक अचूक अस्त्र साबित हुआ।
लोकमानस की सतत संवर्धनशील परिकल्पना भी राम को सिर्फ कथानकों और आख्यानों से कहीं बहुत व्यापक मानती आई है। आख्यानों के बाहर के राम को कबीर ने अपनी विलक्षण भक्ति के माध्यम से परिपुष्ट कर दिया। ‘रमता राम’ की, आख्यानों के बाहर के राम की, निर्गुण राम की, समस्त मूर्तियों से भी अधिक व्यापक मूर्ति की भक्ति भी संभव है, यह बात कबीर ने भली-भाँति सिद्ध कर दी। कबीर के राम को हर कोई अपनी भावना, अपनी कल्पना के अनुसार अपना सकता है। हर कोई अपना खुद का ‘राम’ गढ़ सकता है। हर कोई सहज भक्ति कर सकता है। ‘जहँ-जहँ डोलों सोई परिक्रमा, जो कछु करों सो सेवा। जब सोवों तब करों दंडवत, पूजों और न देवा।’ इस तरह कबीर ने बिना किसी से मंदिर में जाने का अधिकार माँगे सबको राम सुलभ करा दिया। अब चमार, जुलाहे और अछूत भी राम को पूज सकते हैं, पा सकते हैं। कबीर ने राम का लोकतंत्रीकरण कर दिया। दरअसल, ईश्वर का यही लोकतंत्रीकरण हिन्दी साहित्य का भक्ति आंदोलन था, जिसकी स्वतंत्रतामूलक एवं समतामूलक प्रवृत्तियों को तमाम कोशिशों के बावजूद दोबारा कभी अवरुद्ध नहीं किया जा सका। कबीर के ‘रमता राम’ की आज के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक जीवन में यही उपादेयता और प्रासंगिकता है।
यदि काव्य कला, सौंदर्य और संवेदना के धरातल पर भी देखें तो कबीर की रचनाओं को आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जैसे महान आलोचकों द्वारा शुष्क, ज्ञानमार्गी, अटपटी, रहस्यवादी, ज्ञान की प्रकृत परंपरा और प्रक्रिया का निषेध करने वाली, लोकविरोधी आदि विशेषण दिया जाना अत्याचार ही लगता है। जिस लोकधर्म और लोकमंगल की भावना को काव्य का केन्द्रीय सरोकार बताया जाता है, उसी कसौटी पर कबीर की काव्य-संवेदना किसी भी अन्य कवि से उन्नीस नहीं ठहराई जा सकती। व्यापक मानवता के प्रति उन्मुख कबीर के काव्यगत सरोकार सिर्फ इसलिए लोकविरुद्ध नहीं हो जाते कि वह ईश्वर को किसी खास देश-काल-रूप-कथानक की सीमा में मानने की बजाय उसे सृष्टि के कण-कण में व्याप्त मानते हैं। कबीर सिर्फ इसलिए रहस्यवादी और ज्ञान की प्रकृत परंपरा का निषेध करने वाले नहीं हो जाते क्योंकि वह संस्कृत के आदिम ग्रंथों में लिखी हुई बातों को बिना कोई तर्क-विवेक किए ज्यों-का-त्यों स्वीकार करने से इन्कार कर देते हैं और अपनी ‘आँखन देखी’ सच पर डटे रहते हैं। कबीर की भाषा सिर्फ इसलिए शुष्क और अटपटी नहीं हो जाती कि वह काव्य-परंपरा से अनभिज्ञ हैं और वह उसकी परवाह भी नहीं करते। कबीर की भाषा कितनी सरस और काव्योनुकूल है इसका पता तो सिर्फ इसी से लग जाता है कि एक निरक्षर संत की वाणी होकर भी वह सैकड़ों वर्षों से लोककंठों में सुरक्षित है और आगे भी सुरक्षित रहने वाली है। और यह तो सचमुच आश्चर्य की बात है कि कबीर जैसे प्रेम के अद्भुत दीवाने को आचार्य शुक्ल जैसे उद्भट विद्वान ने ज्ञानाश्रयी शाखा के कवियों के पाले में बैठाकर उनकी रचनाओं को मानक साहित्य मानने से इन्कार कर दिया।
अंत में एक बात और, क्या कबीर सचमुच राम-नाम के द्वंद्व से भी ऊपर उठे हुए नहीं थे? कबीर का वह मशहूर पद ‘अलह राम की गम नहीं, तहां कबीर रहा ल्यौ लगाय’ क्या हमें नामातीत की तरफ नहीं ले जाता? ‘हमरे राम रहीम करीमा, कैसो अलह राम सति सोई। बिसमिल मटि बिसंभर एकै, और न दूजा कोई।।’–यह पद क्या हमें नामों के द्वंद्व से भी मुक्त होने की प्रेरणा नहीं देता? जिस प्रश्न पर बुद्ध कभी मौन रह जाया करते थे, उसका उत्तर देने की व्यर्थता क्या कबीर ने भी अपनी संपूर्ण मुखरता के बावजूद इस तरह के पदों के माध्यम से नहीं सिद्ध कर दी? इस धरातल पर यदि हम कबीर को देखें तो वह उतने ही ऊँचे, विराट और असाधारण नजर आते हैं जितना हमारी मानस-कल्पना में बसा कोई भी महाकवि अधिक से अधिक हो सकता है।
कबीर पर अन्यत्र उपलब्ध सामग्री :
कबीरा खड़ा बाजार में : कबीरदास और उनके दोहे – निठल्ला चिंतन पर तरुण की प्रस्तुति

thank you for providing information so i like your web site.
veryy bast
Sir, Sargun, nirgun ek hai, duja bharam vikar, nirgun sahib aap hain, sargun sant vichar
for sargun bhakti sir, _________akhian hari darshan ko pyasi, dekhan chahe kamal nayan ko , hardam rahe udasi, kesar tilak mala motian ki, brindaban ki basi, jehi tan lage soi tan jane, logan ke man haasi,_________________kahen kabir suno bhai sadho,main lahon karbat kashi______
bahut hee badhiya jankari di hai
सकल हंस को बंदगी साहेब आपने यह मेसेज दे कर हमको क्रितार्ध कियाहै हम आपके शुक्र गुजारहै की आपने हमारी बिनती सुनाली ऐ सही आप हमें सतसंग का लाभ दे औरकभी गुजरात में आओ तो हमें सेवाके मोके की आशा रखते है बंसबयालिश के सभी हुजुर आचार्य के चरनोमे हमारी परिवार के बंदगी साहेब मेरा पता बी ४०७ पार्ट २ अस्वमेघ फ्लेट अकोटा गुजरात बड़ोदा ३९००२० साहेब बंदगी
एक राम दशरथ का बेटा।
दूजे राम घट—घट में लेटा।।
तीजे राम ते जगत पसारा।
चौथे राम जगत सौं न्यारा।।
सद्गुरू कबीर साहेब के राम घट—घट वासी राम हैं। वो संपूर्ण जगत में व्याप्त हैं।
saheb bandgi me guru kabir ke charanome satnam saheb bandingi saheb paylagu saheb oor bansbayaliske har guru ke charanome bandgi karata hu har kabir panth ke sabhi ko meri bandgi hai me gujrat ke baroda saher se hu aor sahebguru kabir ke panth me meri tisari pedhi hai aor hum sadguru kabir saheb ki daya aor dhanidharam das sahebki asim kripase hame ye sobhagya prapt huaa he ke hum satya ki rah par hai me aasha karatahu ke har jaher pogram ki c d live satsang is web said pe dalde taki hum vahanapahoch paye par saheb ke darshan kar har satsang ka labh sabko mile meri yah vinati hai ki har jagah janha aarti ho vaha ki c d d vd har web said par rakhi jay saheb bandgi satanam
Mere ko ” kakka keval naam hai babba braham sharir, rarra sab me ram rayaa taaka naam kabir | ” sandhaya aarti chahiye agar koi kripa karke yahan likh de toh bahut meharbani hogi.
Dhanyawaad
*****SAT SAHEB*****
“KABIR KE RAM”BAHUT SUNDER LIKHA HAI.KABIR KA RAM NIRAKAR HAI.SAB MEIN RAHTE HUE BHI SABSE NYARA HAI.KABIR KE RAM KO SAMAJHNE SE PAHLE KABIR KO SAMJHNA ZAROORI HAI.KABIR KYA HAI.”KAKKA KEWAL BRAHMA HAI,BABBA BEEJ SHAREER.RARRA YAME RUM RAHA,TAAKA NAAM KABIR.” AUR KAHTE HAIN “PAANI SE PAIDA NAHI,SWAASA NAHI SHAREER.ANNA AAHAR KARAT NAHI,TAAKA NAAM KABIR.”KABIR KE BARE MEIN LIKHNA SURAJ KO DEEPAK DIKHANA HAI.KIYON KI “RAVI(SURAJ)KA TEJ GHATE NAHI,JO GHAN(BAADAL)JURE GHAMAND.SANT VACHAN PALTE NAHI,PALAT JAYE BRAHMAND.”
RAVJOT SINGHJI REALLY NICEEE
VERYY NICEE
VERYY NICE
this is very useful knowledge for me about ma i history
this very nice but i am also want abaut bhakti andolan or kabirdas ji
SAHEB BANDAGI,
SAHEB KI CHARNO ME SADAR BANDAGI,
APKE ADESHANUSAR AUR APKE MARGDARSHAN SE AAGE KADAM BADAKAR DEKHA PER AAGE JAANE ME MUJHE KATINAI HO RAHI HAI. ASHA HAI KI AAP HI MERA HATH THAM KAR AAGE LE JAYENGE, AAPSE MILAN KI AASH ME… (LEKHA)
divya nayan maya ka khulia
brram aakhandet suje
ke sukhram brram ka khulia
agam dham tab suje ,,,,,,,,,,,,
razab gange gyan ki karam ret ruk jay
paap phahadda phodati hari gure sarane jay
…………………………………..
sukya sab sansar hai khavya or sovye
dukhye das kabir he jage or rove
…………………………………….
hati fasiyo kich me kun deve hatt
ke bal chute aapke ke kade samrath
………………………………………
namo namame nath tu nirdhara adhar
lajja rakhan ramji anand karan appar
बहुत बढिया लेख है और इतनी अच्छी जानकारी देने के लिए आपका धन्यवाद SAHEB BANDAGI
nice post!
SAHEB BANDAGI
MAIN BALODA BAZAR DIST. RAIPUR (C.G.)SE HU. AAP SAB KA LEKH PADHKAR BAHUT ACHHA LAGA.
THANKING YOU !
SATYANAM SADGURU SRI SAHEB SAHEB BANDAGI !!
Can any body tell me name of books on Saint Kabir
Also tell me where and how to get those books / ebooks.
DEAR SIR
WHATEVER U WRITE EXCATLY CORRECT, BUT TODAY IT IS VERY DIFFICULT TO FIND FOLLOWER OF SAINT KABIR.
I WORSIP HIM LIKE “DADU DUJA KOI NAHI KABIR SRIJANHAR” PARANTU MERE PAS JANKARI HE ANUBHUTI NAHI HE.KOI PARTVI PER PERFECT SAINT KABIR JAISA NAHI HE,JO TIN GUNO SE AAGE BAT KARTA HO. MERE YAHI SAMASYA HE TATYA GYANI PERFECT FOLLOWER OF DHARAMDAS JI MAHARAJ.
HARSH CHOUBISA
Kabir, teen lok sab Ram japat hain, jaan mukti ko dhaam
Ramchandra Vashisht muni kiya, tin kahi sunaayo naam
Meaning: Teen lok (prithvi, swarg aur narak and pataal lok), in teenon lokon mein log Ram (Dashrath putra Ram ka naam) naam japte hain, yeh soch kar ki isse mukti hojaayegi. lekin kud Ramchandra ji ne Vashisht Muni ji se naam liya tha, aur Vashist muni ji ne kabhi RAM manter nahi diya tha !! unh ne to OM naam diya tha !! !! Ramchandra ji to khud vishnu ji ki avatar the aur unka RAM RAM manter nahi hai !!! RAM RAM to ik code word banaya tha ki hamesha manter jaap karte rehna !!
Bahut achhi baat hai ik aap mein bhagwan ke leye itni sharda hail lakin agar aap JAI SHRI RAAM kar ke mukti chahate ho ko kabhi possible nahi ho sakta !!
Jaise aapne ghar mein electricity ka connection leya hua hai !! agar aap vo connection na le ke sirf ye khete raho ki BIJALI PANKHE CHALTI HAI , LIGHT CHALATI HAI , YE KAR DETI HAI….. to uska koi fayida nahi ho ga !! Aapko us ka Electricity department se uska connection lena padega to bijali fayida degi !!
Ise he agar aap JAI SHRI RAM he khete rahoge to koi fayida nahi hoga .
Aaapko pure GURU se pura manter lena padega to vo manter jaap fayida de ga ,
AUR bhagat ji agar aap thoda sa vichar RAM ji ki jindgi par karen to unki jindgi to hamese jiyada dukhon mein gujari , shaydi hote he banvaas ho gaya , banvass ke time Sita ji ko raven utha ke le gaya , fer sita ji ko raven ke lok se planning , kabhi samudhar rasta nahi de raha , to kabhi kuch panga , fer yudh mein crore janta ki death ho gayi , fer kitni mushkil se raven mara vo bhi vibhiksahn ne bataya ke raven ki nabhi mein amrit hai !! aur fer sita ji ko raven ke lok se AGANI PARIKSHA kar ke aya the aur sita ji safaal bhi ho gayi thi lakin ik sirf DHOBHI ke kehne par Sita ji ko ghar se bahar naikal diya !!! Sita ji kahi jungle mein rishi ke asram meiin aur RAM Chandra ji raaj kar rehe the !!
Ye soch ke dekho bahgat ji ye kya jindgi hoyi ??? sari jindagi dukon mein nikal gayi !!
Kabir, Vashisht muni se tatveta gyani, shodh kar lagn dharae
Sita haran maran Dashrath ko, ban ban Ram firae
Meaning: Vashisht Muni jaise tatveta gyani ne Ram-Sita ke vivah ka shubh lagn dharaa tha, lekin us lagn (time) ka parinaam yeh hua ki, Sita haran hua, Dashrath ji ki mrityu hui aur Ram ban ban mein bhatke!!
Kabir, samudr paati lankagaye, sita ko bhartaar
taahi Agast muni peey gayo, inmein ko kartaar
Meaning: Samudra par pul baandh kar Sita ka bhartaar matlab, pati, Ram ji, Lanka (sri Lanka) gaye, lekin ek Agast Muni ne saat samundron ko ek baar ghoot bhar liya tha aur kulla kar diya tha, vaapis sab apne sthaano par bhar gaye the, Ram ji ko to ek samundr par pul baandhne ke liye Nal-Neel ki sahaayta leni padi, to in dono mein kaun kartaar hua, Ram ji ya Agast muni!!
Kabir, kaate bandhan vipati mein, kathin kiya sangraam
chinho re nar praaniyaa, Garud bado ki Ram
Meaning: jab Ravan se yudh ke dauraan, meghnaath (ravan ke ladke) ne naagfaans mein Ram-Lakshman sahit saari sena ko baandh diya tha, tab Garud ne aa kar Ram aur doosron ke bandhan kaate the, to inmein kaun bada hua Ram ya Garud!! Ram ka bandi chhor (bandhno se chhudvaane waala) to Garud hua!!
Wonderfull writing. Please, note that Tulasi is right and Kabir is also right.This depends upon own spiritual feeling. Every thing is true with respect to something.(Theory of relativity).Whatever we think in our mind becomes a WORD.Words become action.Actions become habit.Habits become our charactor.Charactor takes a Form in others mind. This form is indicated by a NAME.Kabir is a name of a person who lived with above stated charactor/form.Now,he is formless.His body is no more.Nothing is in name.If kabir was known by some other name, his form will be still the same as with name kabir.This is is also true with Tulsi/Rambola.Spiritual feelings differ individual to individual.Nither tulsi nor kabir are opposing to each other.This is we thinking so.Tulsi was a learned man his approach towards god was different.No one was leader of any caste or religion. Both were opposite to the then exisiting society.both are great with their spiritual height.
read here more about true god and kabir vani
http://www.orkut.com/Community.aspx?cmm=43463146
if u need satsung cd or free books please contact me here
http://www.orkut.com/Profile.aspx?uid=17105901317585690786
or
sanjiv177@yahoo.com
बहुत बढिया लेख है और इतनी अच्छी जानकारी देने के लिए आपका धन्यवाद vivek kumar dumka
SAHEB BANDAGI,DO you have satsang video.If you have please send me.Saheb Bandagi
Jai Shri Ram
is naam ko lene vaal hi jaanta hai ki isme kitna anand hai …
vajaye iske ki hum log Ram ji mai difference kare ki Kabir ke Ram or tulsi ke Ram …
us param pita paremeswar ko apna bana lo or bolo …
na tulsi ke na kabir ke ..Ram to mere hai …
mere Ram ..mere Ram..
Sab mai hai or sabke hai Ram,Shri Ram jai Ram jai jai Ram
Har dil mai Baste hai Ram,Shri ram jai ram jai jai ram
JAi Shri Ram
kabir saheb ko satlok me dekhne wale aur parmatma kehne wale sant—>dharm dasji/garib dasji/malook ji/nanak ji/ghisa ji/ ravi das ji
kabir saheb aur gorakhnath discussion–02
gorakh nath asks
” aapki itni lambi aayu hai ? lekin aap to baalak se lagte ho”
kabir ji answer
1. jo bujhe soi bavra kya hai umar hamari
2. asankh yug parlay gayi tab ke brahmchari
3. koti niranjan ho gaye parlk sidhari
4. hum to sada mahbub hain soham brahmchari
5. arbon to brahma gaye unanchas koti kanhaiya
6. saat koti shambhu gaye mor ek nahi palaiya
7. kotin narad ho gaye mohammad se chari
8. devatan kiinti nahi kya srishti bechari
9. nahi budha nahi balak nahi bhat bhikhari
10. kahe kabir suno o gorakh yah hai umar hamari
कबीर सागर–” अमर मूल” पेज 196 की साखी:–>
साखी:- नाम भेद जो जान ही, सोई वंश हमार! नातर दूनीया बहुत ही, ब्ड मुआ संसार!!
sakhi:-naam bhed jo jaane hi,soi vansh hamara! natar duniya bhuat hi boodh mua sansaar!!
पेज 205:–नाम जाने सो वंश तुम्हारा, बीना नाम बूड़ा संसारा !!
naam jaane so vansh tumhara, bina naam budha sansaara!!
पेज 205:–सोई वंश सत् शब्द समाना, शब्द ही हेत कथा नीज गयाना !!
soi vansh sat shabd samana, shabd hi heath katha nij gyana!!
पेज 205:–बीना नाम मीट नही संशा, नाम जाने सो हमरे वंशा !
bina naam mite nahi sansha, naam jaane so humre vansha!
नाम जाने सो वंश कहलावे, नाम बीना मूकती ना पावे !
naam jaane so vansh kahlaave, naam bina mukti na paaven!
नाम जाने सो वंश हमारा, बीना नाम बूड़ा संसारा !
naam jaane so vansh humaara, bina naam buda sansaara!
पेज 205:–बींद के बालक रहें उरझाई, मान गुमान और प्रभुताई!
bind ke balak rahen uarjhaain, maan-gumaan aur prabhutaai!
Gita me Tatvedarshi ka Indication–>
18.TATVEDARSHI WO HI JO UALTA-TREE EXPALIN KAREGA(CH 15 MANTER 1-4)
KABIR”AKSHAR PURUSH 1 PAD HAI, NIRANJAN WAKI DAAL
TEENO DEVA SHAKHA HAIN YE PAAT ROOP SANSAAR”
19.JO BRAHM KE DIN-RAAT(AGE)BATA DEGA WO TATVEDARSHI SANT HOGA
(GITA 8 KA 17)
(1. AGE OFF INDER–> 72*4 YUG
2. AGE OFF BRAHMAJI–>1DAY=14 INDER MAR JAATE HAIN
TOTAL AGE–>100 YEAR’S (720,00000 CHATURYUG)
3. AGE OFF VISHNUJI–>7 BRAHMA MARTE HAIN
TOTAL AGE–>504000000 CHATURYUG
4. AGE OFF SHIVJI–>7 VISHNU DIED
TOTAL AGE–>3528000000 CHATURYUG
(ye teeno Brhma-Vishnu-Shiv Devi Bhagwat Mahapuran me apne aap ko bhai-2 accept karte hain.sherawali/ashtangi/prikriti ko apni mata aur teeno janm-mritu me hain ye bhi accept karte hain)
5. AGE OFF MAHASHIV–>70000 SHIV DIED
6. AGE OFF BRAHM–>1000 MAHA SHIV DIED)
famous line of AARTI
“PAAR-BRAHM Parmeshwar tum sab ke swami”
gita — kaal kehta hai ki main to lok-ved(suna-sunaya gayn) main hi god hun par vastivik to anya hi hai jo teeno lokon main parvesh karke sabka bharan poshan karta hai
Defination of GOD
*********************************************************************
jo andhe ko aankh de, kodi ko kaaya de, nirdha ko maya de, ge badha de, be-aulaad ko
aulaad de, moksh de……hum ko aisa god chahiye tha aur aaj ke sare sant aise ko bhagwan bata rahe hain jo 1 lakh logon ko daily maar kar khaata hai……………..chahe koi bhi ho………………wo samne nahi aata nirakaar rahta hai.
kabiir vani “kharbon to brahma mar ghai/ arbon mar ghai vishnu/ croron mar ghai shiv ji,
mera to ek pal bhi nahi ghaya hai. main to ajar-amar hoon”
**********************************************************************
Proof of God is Visible like a Man in all Religion’s:–
(1)Ved=(Agni Tanu Asti=Parmatma ShaShareer Hai),Kabir Dev comes so many places
(2)Nanak Ji=Hakka Kabir Karim Tu BeAab Parvardigar,Nanak Neech Kahe Bichar Dhanak roop raha KARTAR
(3) Quran Majid,
Tajurma- Fateh Mohd. khan Saheb Jalndheri
Prakashak– Farid Book depot. (P) Ltd-Delhi-6 Page no.-576
surat:furkani-25
1.Aayat No.58–>Aur uis khuda-e- (ZINDA PAR BHROSA RAKHO JO (KABHI) nahi marega……
2.Aayat No.59 Jis ne Aasmano Aur Zameen ko Aur jo kuch in dono ke darmiyaan hai 6 DIN ME PAIDA KIYA, PHIR ARSH(Takht) PAR JAA THAHRA… to uis ka haal kisi BA-KHABAR se maloom kar lo
(4)BIBLE=Parmatma ne Manushon ko Apne Roop me Banaya
(5)राधा-स्वामी बुक “जीवन चरीटर बाबा जैमल सीँघ ” पेज 20
परमात्मा ने इंसान बनाए. इंसान को उस प्रभु ने अपना रूप बनाया.
(6) बुक संतमट प्रकाश भाग-4 पेज 264
महाराज जी:- हमारी इतनी बुद्धी और अकल न्ही की हम संत की पढ़वी को समझ सकें. फीर भी सुनो– रानी इंडुमती कबीर साहेब के समय हुआ थी.
पहले कबीर साहेब मालीक मे जा क्र वीलीन हो हुए, फीर रानी हुई. जब रानी ने सचखण्ड मे जाकर कबीर साहीब की पदवी देखी तो कहने लगी,” महाराज! यादी आप पहले ही बता देते की मैं ही अकालपुरुष हूँ तो
मैं भजन-सुमिर्न कर-कर के व्यर्थ ही परेशान ना होती!” कबीर साहीब ने कहा ” तुमको उस समय विश्वास नही आना था!” यादी ह्मे आज से पहले संत पर विश्वास आ जाता तो हुमारा काम ना बन जाता? हम आज यहाँ पर भतकेते ना होते!
om=kaa/brahm/shar bahgwan/1000 hand power god/eat one lakh peoples every day/father of brahma-vishnu-shiv/husband of mata sherawali/maha vishnu-maha shiv-maha brahma/bhakt of poorn brahm/apni bahkti gita main Anutamam(ghatiya) batata hai/kisi ke bhi samne nahi aata/kisi bhi jap/tap se nahi/ tatvegyan se pura samjha jaata hai/kehta hai gita main ki jo mujhe tatve se nahi jaanat uis ko main lakh84 main daal deta hun/om naam ki bhakti/janm-mritu main hai/gita-quran isi ne shareer main ghus kar boli thi/aaj kal brahmkumari dharm bana raha hai/gita ch18 manter64 main apna isht dev bhi batata hai/apne bhakton ko bhi maar kar kha jaata hai
Shristi Rachna in Kabir Vani
सृष्टि रचना, परमेश्वर कबीर साहिब जी की अमृतवाणी से:-
धर्मदास ये जग बौराना,कोई न जाने पद निरवाना
यही कारन मैं कथा पसारा,जग से कहियो राम न्यारा
यही ज्ञान जग जीव सुनाओ ,सब जीवों का भरम नशाओ
अब मैं तुमसे कहो चिताई,त्रयदेवन की उत्पति भाई
कुछ संक्षेप कहों गुहराई,सब संशय तुम्हरे मिट जाई
भरम गए जग वेद पुराना, आदि राम का भेद न जाना
राम-२ सब जगत बखाने,आदि राम कोई बिरला जाने
ज्ञानी सुने तो हिरदै लगाई,मूर्ख सुने सो गम ना पाई
माँ अष्ठंगी (शेरावाली) पिता निरंजन,वे जम दारुण वंशन अंजन
पहले कीन्ह निरंजन(काल,ओमकार) राय,पीछे से माया उपजाई
माया रूप देख अति शोभा,देव निरंजन तन मन लोभा
कामदेव धर्मराय (काल,ओमकार) सताए,माया को तुरतही धर खाए
पेट से देवी करी पुकारा,हे साहेब(कबीर परमात्मा) मेरा करो उबारा
टेर सुनी तब हम(कबीर परमात्मा) तहां आये,अष्ठंगी को बंद छुड़ाये
सतलोक में कीन्हा दुराचारी,काल निरंजन दीन्हा निकारी
माया समेत दिया भगाई,सोलह संख कोस दूरी पर आई
अष्ठंगी और काल अब दोई,मंद कर्म से गए बिगोई
धर्मराय (काल) को हिकमत कीन्हा,नख रेखा से भग(योनी) कर लीन्हा
धर्मराय (काल) कीन्हा भोग विलासा,माया को रही तब आशा
तीन पुत्र अष्ठंगी जाये,ब्रह्मा विष्णु शिव नाम धराए
तीन देव विस्तार चलाये,इनमे ये जग धोखा खाये
सतपुरुष को कैसे पावै, काल निरंजन जग भरमावे
Meaning of Ram?
1ST RAM–>BRAHMA-VISHNU-SHIV (4 HAND GOD)
2ND RAM–>MATA/SHERAWALI (8 HAND GOD)
3RD RAM–>BRAHM/SHAR (1000 HAND GOD)
4TH RAM–>PAR-BRAHM/AKSHAR (10000 HAND GOD)
5TH RAM–>POORN-BRAHM/PAAR-BRAHM/PARM AKSHAR/SAHIB (INFINITE HAND GOD)
famous line of AARTI
“PAAR-BRAHM Parmeshwar tum sab ke swami”
Ram is indication power of god
Kabir”tum kaun Ram ka karte jaap, jisse katein na teeno tap”
bhoot uatarna/shraap na lagna/pitteron ka khush hona
kabir”Ram-2 ye jagat bakhane Adi-Ram koi birla hi jane”
Hi Vikas,
Saheb Bandagi !!!
Bahut achha laga aapase milake.
I know Panth Sri PrakashMuninam Saheb. I have taken “Diksha” of Kabir panth.
Please tell me if you have any info abt Saint Kabir, soft links,online articles etc.
Saheb Bandagi !!
I’m devotee of kabir panthi. Do you know panth sri prakashmuni naam saheb.saheb bandgi
We thank for good notes you have given me and my other friends.
congratulation for yours Website.
It’s rocking.
Nadeem Saifi
GOOD KNOWLEDGE KEEP WRITING
TELL US MORE LINK LIKE THIS MY E MAIL ADDRESS
PURPLECASUAL@YAHOO.CO.IN
संत कबीर के राम के बारे में इससे अच्चा विश्लेषण आज तक मैने नही देखा न गुरुवों से सुना आप का सोध सराहनीय है और आप से आग्रह है की कबीर के विषय में और अच्छे लेख आप लगातार लिखते रहेंगे
mujghe apne school ke project ke liye kabir ke bare me information chauiye thi aur yahan se mujhe bahut achcha information mila hai. thank you
Deepak
mai hindi ko apni mata or mother ke samaan maanta hu. or iski araadhna karne wale kavirdas jaisi mahaan aatmao ko mai poojta hu. lekh padkar aatma or man saant ho gya.
Maine apaka yah sadguru KABIR Saheb par likha gaya lekh padha. Muje bahut khushi ho rahi hai ki aaj bhi kabir ke bare me log janana chahate hai.
Aapako is mahan karya ke liye “Salute”.
बहुत बढिया लेख है और इतनी अच्छी जानकारी देने के लिए आपका धन्यवाद