मगर, जैसा कि गंभीर विषयों के मामले में अक्सर होता है, हमारे पाठकों ने उसमें कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई। दिव्याभ और कविराज की जो दो प्रतिक्रियाएं मिलीं, उनमें भी ऐसा सूत्र कोई नहीं दिखा जिसको लेकर बात आगे बढ़ाई जाती। मुझे याद आता है कि हिन्दी ब्लॉगरों में घुघूती बासूती जी और अफ़लातून जी से भी शायद इस विषय पर अलग से कुछ चर्चा हुई थी, पर कोई संवाद सार्थक दिशा में आगे नहीं बढ़ सका था।
आज, जबकि भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन चलाने वाले लोग भी अपने-अपने ट्रस्ट और एनजीओ में फंड के हेर-फेर के मामले में कई तरह के सवालों के घेरे में आ रहे हैं, यह और भी जरूरी हो जाता है कि हम ट्रस्टीशिप के एक ऐसे मॉडल पर विमर्श करें, जो गांधीजी के आदर्शों के अनुरूप हो और वर्तमान दौर के लिए व्यावहारिक भी हो।
मगर, ऐसा किए जाने से पहले, यह भी जरूरी है कि हम उन स्वरों को भी ठीक से सुनें जो गांधीजी के ट्रस्टीशिप संबंधी सिद्धांतों की सम्यक् आलोचना करते हैं। इसलिए, प्रस्तुत है ओमप्रकाश कश्यप का यह लेख:
ऊपर से आकर्षक दिखने के बावजूद ट्रस्टीशिप के सिद्धांत में अनेक कमजोरियां हैं. यह सम्राटों-सामंतों की दान-परंपरा का आधुनिक संस्करण है. चूंकि धर्म स्वयं सामंती परिवेश की देन है, इसलिए प्रायः सभी धर्मग्रंथों में किसी न किसी रूप में दान की महत्ता गायी गयी है. राजा-महाराजाओं के दरबारी-चाटुकार उनकी दानशीलता का तो बखान करते थे, उसके लिए चारण-वृंदों को वृत्तिका पर रखा जाता था. उन सबका दायित्व अपने आश्रयदाता की प्रशंसा उसमें सदगुणों की स्थापना करना था. दानशीलता को राजा का सद्गुण माना गया था. मगर राजा के धनागम के स्रोत क्या हैं? उनका नैतिक स्वरूप क्या है? इस बारे में प्रायः कोई चर्चा नहीं होती थी. राजा का खजाना उसके जागीरदारों, जमींदारों, सेठों, व्यापारी संगठनों के प्राप्त कराधान, भेंट और सौगातों पर निर्भर रहता था. हालांकि राजा-सामंतों की कमाई के लिए धार्मिक ग्रंथों में आचार-संहिताएं थीं, मगर व्यवहार में उनका पालन कम ही होता था. बल्कि युद्ध के दौरान निरीह प्रजा से लूटे गए धन को भी राजा का पराक्रम बताते हुए राजदरबार में उसका प्रदर्शन अपनी उपलब्धि के बखान के लिए किया जाता था. भारतीय ग्रंथों में दान की महानता का वर्णन किया गया है. मगर दान की परंपरा ने ही भारतीय समाज में एक पराश्रित तथा दूसरे के श्रम पर पलने वाले वर्ग को जन्म दिया था, जिसका दुष्परिणाम देश आज तक भुगतता आ रहा है.
ट्रस्टीशिप के साथ खतरा यह है कि जैसे धर्म के आवरण में राजा की कमाई के सारे स्रोत छिपा दिए जाते थे, उनकी नैतिकता पर कभी कोई चर्चा नहीं होती थी, वैसे ही यह विचार पूंजीवाद की समस्त अतियों और अनाचारों पर पर्दा डालने का काम करेगा. यह अनुचित और असंवैधानिक माध्यम से कमाए गए धन का वैधानिकीकरण करता है. अपनी पूंजी और तज्जनित संसाधनों के दम पर ट्रस्ट अथवा उसके सदस्य यह समझाने में कामयाब हो जाते हैं कि उनका लाभार्जन का तरीका व्यापक जनहित में है. कि लाभ द्वारा अर्जित धन का उपयोग लोकहित में किया जाना है.
ट्रस्ट में धन के ‘धनार्जन’ के रास्ते पर भी सवाल नहीं उठाए जा सकते, न ही अपेक्षित होता है कि इस प्रकार के प्रश्नों को बीच में लाया जाए. स्वयं पूंजीपतियों को भी मालूम था कि ट्रस्टीशिप का विचार समाजवाद के विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया गया तो समाज की उनसे अपेक्षाएं बढ़ेंगी. उसपर हुई बहस पूंजीपतियों को कठघरे में खड़ा करेगी. इसलिए उन्होंने स्वयं ही उसको किसी भी प्रकार की बहस के दायरे से बाहर रखा. इसका एक परिणाम यह हुआ कि ट्रस्टीशिप का विचार कभी पुस्तकों से बाहर न आ सका.
ट्रस्टीशिप के सिद्धांत को समझाने के लिए गांधीजी धर्म का सहारा लेते हैं. संभवत: वे उम्मीद करते हैं कि धर्म का आकर्षण अथवा डर पूंजीपतियों को लोककल्याण के पथ पर चलने का विवश कर देगा. यहां वे भूल जाते हैं कि पूंजीपति और राजनेता ही हैं जो परस्पर मिलकर धर्म को ताकतवर बनाते हैं. बदले में धर्म भी उनकी अनैतिक सत्ता को वैधता प्रदान करता है. ट्रस्टीशिप में पूंजीपतियों से अपेक्षा की जाती है कि वे जनसमस्याओं को एक जिम्मेदार अभिभावक की भांति देखें. अपने विवेक से उनके निदान के लिए आवश्यक उपाय भी करें. इससे निर्णय प्रक्रिया में आम आदमी की महत्ता घट जाती है. अप्रत्यक्ष रूप में समाज के बहुसंख्यक वर्ग को अविवेकी मानकर उसकी उपेक्षा करने का ट्रस्टीशिप का विचार पूंजीपतियों को अतिरिक्तरूप से अधिकार संपन्न करता है. उसकी अगली पीढ़ी जब चाहे उस निर्णय को वापस ले सकती है अथवा ट्रस्ट के नियमों में फेरबदल कर सकती है. पूंजीपति अपनी परिसंपत्तियां श्रमिक के श्रम के बल पर अर्जित करता है. अपने मुनाफे के मामूली हिस्से को ही वह ट्रस्ट के संचालन में लगाता है. ट्रस्ट में लगी पूंजी श्रमिक के खून-पसीने की कमाई होती है. इसके बावजूद श्रमिक को यह अधिकार नहीं होता कि वह ट्रस्ट के काम में हस्तक्षेप कर सके अथवा पूंजीपति को कोई सलाह दे सके. ट्रस्टी के रूप में जिन व्यक्तियों को यह जिम्मेदारी सौंपी जाती है, उनका चयन पूंजीपति द्वारा किया जाता है. अतः वे उसी का हितसाधन करते हैं.
इस तरह देखा जाए तो ट्रस्टीशिप से आर्थिक-सामाजिक विभाजन के निदान का स्थायी उपाय कभी संभव नहीं है. शायद यही कारण है जो यह विचार पुस्तकों से बाहर कभी नहीं आ सका.
ट्रस्टीशिप को ‘श्रमिकसंघवाद’ (Syndicalism) का विरोधी विचार भी कहा जा सकता है, जो श्रमिकों को संगठित होने, संघर्ष करने और अपनी एकजुटता के दम पर समस्त उत्पादनतंत्र पर अधिकार कर लेने का आवाह्न करता है. अभिसंघवाद श्रमिक सहकारिता का विस्तार था, एक ऐसा सुधारवादी आंदोलन जिसमें अभिकल्पना की गई थी कि श्रम-संघ उत्पादक कारखानों को हड़ताल, विरोध-प्रदर्शन के माध्यम से अपने हाथों में ले लेंगे. श्रमिकसंघवाद का उद्देश्य समस्त श्रमिकों को एक झंडे, एक संगठन के रूप में संगठित करना है, जिसपर उसके साधारण से साधारण सदस्य का नियंत्रण हो. इसके व्याख्याता बेकुनिन का मानना था कि इससे पूंजीवाद की समस्त बुराइयों का हल खोजा जा सकता है. श्रमिक-संघवाद के लागू होने से बेरोजगारी और आर्थिक विषमता अपने आप समाप्त हो जाएंगी. चूंकि उस समय उत्पादक एवं उपभोक्ता का कोई अंतर ही नहीं रहेगा, इसलिए वस्तुओं का उत्पादन व्यक्ति की आवश्यकताओं के अनुरूप होगा, न कि लाभार्जन की वांछा से. गांधीजी का ट्रस्टीशिप का विचार एक परिकल्पना से आगे नहीं बढ़ पाता. दूसरी ओर पूंजीवाद के विरोधस्वरूप उपजे दर्शनों में उसके विकल्पों पर गंभीरतापूर्वक विचार किया गया है.
स्मरणीय है कि जिस समय महात्मा गांधी ‘हिंद स्वराज’ में आधुनिक सभ्यता और मशीनीकरण की आलोचना कर रहे थे, उसको ‘शैतानी सभ्यता’ कहकर उसका तिरष्कार कर रहे थे, शेष दुनिया विशेषकर पश्चिम में पूंजीवाद के विरोध नए-नए विचारों का जन्म हो रहा था. पूंजीवाद के आलोचकों में एक अराजकतावादी पियरे जोसेफ प्रूधों भी था, जो व्यक्तिगत संपत्ति की अवधारणा का ही विरोधी था—‘व्यक्ति संपत्ति चोरी है. व्यक्तिगत संपत्तिधारक चोर है.’ उसका यह कथन बुद्धिजीवी हलकों में खलबली मचाए हुए था. प्रूधों के अलावा मार्क्स, ऐंगल्स, फ्यूरियर, राबर्ट ओवेन, बेकुनिन आदि विचारक पूंजीवाद के निरंकुश विस्तार से नाखुश थे. इन सबके विचारों में भिन्नता थी, किंतु वे सभी इस तथ्य पर एकमत थे कि समाज में व्याप्त आर्थिक असमानता अन्यान्य बुराइयों के लिए पूंजीवाद जिम्मेदार है. इसलिए समाज के वास्तविक कल्याण के लिए, विकास का लाभ जनसाधारण तक पहुंचाने के लिए पूंजीवाद पर अंकुश लगाना अत्यावश्यक है.
उन सबसे अलग गांधीजी ‘हिंद स्वराज’ में तीखेपन के साथ मशीनों और आधुनिक सभ्यता की आलोचना तो करते हैं, मगर पूंजीपतियों की आलोचना नहीं कर पाते. वे संपत्ति पर समाज का अधिकार तो स्वीकारते हैं, किंतु उसके समान विभाजन के लिए कोई नई व्यवस्था का सुझाव देने के बजाय पूंजीपतियों से ही अपेक्षा करते हैं कि वे स्वयं को समाज की संपत्ति का रखवाला मानें. यह पूंजीवाद के प्रति समझौतावादी रवैया अपनाने जैसा है.
ट्रस्टीशिप में पूंजीपतियों से अपेक्षा की जाती है कि वे जनसमस्याओं को एक जिम्मेदार अभिभावक की भांति देखें. अपने विवेक से उनके निदान के लिए आवश्यक उपाय भी करें. परंतु इस निर्णय प्रक्रिया में आम आदमी की महत्ता घट जाती है. समाज के बहुसंख्यक वर्ग को अविवेकी मानकर उसकी उपेक्षा करने का ट्रस्टीशिप का विचार पूरी तरह पूंजीपतियों की अनुकंपा पर निर्भर रहता है. इससे समाज के आर्थिक-सामाजिक विभाजन का स्थायी समाधान संभव नहीं.
(क्रमश:)

मुझे नहीं मालुम कि ट्रस्टीशिप क्या है; क्या दुर्गुण हैं। यह लगता है पैसा आसुरिक ताकतों के पास है। उसे वापस लाना है। बहुत कुछ देवासुर संग्राम की तरह। उस संग्राम में देवता किसी रूल बुक से चलते हों, ऐसा नहीं है।
हम किसी फूलप्रूफ प्रणाली की तलाश में बहुत समय खोटा नहीं करते। एक प्रणाली, जो ठीक ठीक लगती हो को ले कर शुरू करते हैं और कोर्स करेक्शन की गुंजाइश रखते हैं। वही प्रबन्धन के हिसाब से होना चाहिये।
और, विषय से इतर, धर्म कोई वल्गर शब्द नहीं है। उसी तरह पूंजीवाद भी कोई वल्गर शब्द नहीं।
@ ओमप्रकाश कश्यप,
आपके ब्लॉग पर मूल लेख मैंने पढ़ लिया था और सोचा था कि उसे क्रमिक रूप से यहां फिर से प्रस्तुत करूं। क्योंकि ब्लॉग के अधिकतर पाठक लंबे लेखों पर टिकते नहीं हैं, खासकर तब जब विषय भी गंभीर हो।
सृजनशिल्पी पर जो लेखांश मैंने टिप्पणी के रूप में दिया था, वह असल में ‘हिंद स्वराज’ पर मेरे लंबे आलोचनात्मक लेख का एक हिस्सा है. उस लेख ‘ट्रस्टीशिप की सैद्धांतिकी और गांधीवाद के अंतर्विरोध’ का मात्र एक हिस्सा, ‘गांधीजी के ट्रस्टीशिप संबंधी सिद्धांत के कमजोर पक्ष’ मैंने आपके लेख पर प्रतिक्रिया के रूप में जोड़ दिया था. पूरा आलेख ब्लाग ‘आखरमाला’ पर दिया गया है. इंटरनेट पर अभी वैचारिक विषयों को लेने का गंभीर चलन नहीं है. ‘सृजनशिल्पी’ ने मुझे प्रभावित किया था, इसलिए टिप्पणी के बहाने उससे जुड़ने की कोशिश की. मुझे आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी, क्या मैं कभी जान सकूंगा कि ‘सृजनशिल्पी’ के सृजन के पीछे किस ‘शिल्पी’ का हाथ है?
पूरा लेख यहां है.