केवल गैर-जिम्मेदार और भ्रष्ट नौकरशाह ही घबराते हैं आरटीआई से

अब तक हम सब सुनते और मानते आए थे कि ‘साँच को आँच नहीं’। यानी, जो ईमानदार है उसे डरने की जरूरत नहीं। मगर प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के लिए ऐसा नहीं है। हो सकता है कि इसके पीछे उनका अपना व्यक्तिगत अनुभव रहा हो। वह एक सच्चे और ईमानदार व्यक्ति के रूप में जाने जाते रहे हैं, मगर उन्हें बार-बार जताना और बताना पड़ा है कि वह अक्सर खुद को मजबूर पाते हैं और चाहकर भी सही फैसले नहीं ले पाते।

उनका मानना है कि आरटीआई कानून के तहत अधिकारियों की नोटिंग को सार्वजनिक किए जाने से ईमानदार अधिकारी काम करने से कतराने लगे हैं। सही कहा गया है कि जो जैसा होता है उसको सारी दुनिया वैसी ही दिखती है।

ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री एक बार फिर से नौकरशाही के जबरदस्त दबाव में हैं। इस बार शायद 2जी घोटाले में आरटीआई के कारण कुछ दस्तावेजों के सार्वजनिक हो जाने के बाद सरकार की जो फजीहत हुई, वह भी एक अहम उत्प्रेरक है।

आरटीआई कानून की समीक्षा के नाम पर प्रधानमंत्री ने इस विषय पर सार्वजनिक रूप से बहस चलाए जाने की जरूरत पर बल दिया है। एक तरह से यह अच्छा ही है। गुपचुप तरीके से संशोधन हो, इससे बेहतर है कि पहले विषय पर हर पहलू से चर्चा हो जाए।

नौकरशाही लंबे अरसे से आरटीआई कानून में मुख्य रूप से तीन संशोधन चाहती रही है: 1. फाइल नोटिंग और फैसला लिए जाने की प्रक्रिया से जुड़े ऐसे ही कुछ अन्य दस्तावेजों को आरटीआई कानून के दायरे से बाहर रखा जाना, 2. आवेदक के लिए सूचना मांगे जाने की वजह भी बताना अनिवार्य किया जाना और बताई गई वजह से असंतुष्ट होने पर लोक सूचना अधिकारी को आवेदन ख़ारिज कर सकने का अधिकार होना, और 3. आवेदन में पूछे जाने वाले प्रश्नों की संख्या या विषय के दायरे को सीमित किया जाना।

इससे पहले वर्ष 2006 में भी सरकार के भीतर ऐसी मुहिम चली थी, मगर तब व्यापक जन दबाव में सोनिया गांधी के निर्देश पर उसे स्थगित करना पड़ा था।

प्रधानमंत्री ऐसा क्यों नहीं करते कि वह सरकार के उन तथाकथित ईमानदार अधिकारियों को कहें कि वे आरटीआई कानून के अनुपालन से जुड़े ऐसे दृष्टांत जनता के सामने रखें, जिनसे यह पता चले कि इस कानून के कारण उन्हें ईमानदारी से काम करने में कैसे दिक्कत आ रही है और उन्हें काम से क्यों कतराना पड़ रहा है?

दरअसल, प्रधानमंत्री जिन नौकरशाहों को ‘ईमानदार’ कहना चाह रहे हैं, असल में वे ऐसे नौकरशाह हैं जो अपने बॉस को तो खुश रखना चाहते हैं, मगर आरटीआई क़ानून की वजह से नियमों को नज़रंदाज करने का जोखिम नहीं लेना चाहते। खुद मनमोहन सिंह अपने पूरे कैरियर में ऐसे ही ‘ईमानदार’ नौकरशाह रहे हैं जो कभी अपने बॉस को नाराज करने का जोखिम नहीं उठाते। तो उनकी जो ईमानदारी की परिभाषा है, उसी में दिक्क़त है।

जबकि हमारी और आपकी नज़र में ईमानदार अधिकारी वह है जो भ्रष्ट नहीं है, जो नियमों-क़ानूनों के हिसाब से अपना काम करता है और किसी लालच या भय से प्रेरित होकर या किसी दबाव में फैसले नहीं करता। ऐसे ईमानदार अधिकारियों को आरटीआई क़ानून से तो क्या, मौत का भी कोई ख़ौफ नहीं होता।

यह सही है कि आरटीआई क़ानून मौजूदा रूप में परफेक्ट नहीं है। इसकी समीक्षा जरूर होनी चाहिए। मगर इसमें ऐसे बदलाव हों जो वाकई लोकहित में हों। मसलन् 1. लोक सूचना अधिकारियों की तैनाती प्रतिनियुक्ति के आधार पर हो और नौकरशाहों को सूचना आयुक्त न बनाया जाए। 2. फाइल गायब कर देने वाले अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई हो। 3. सूचना मांगने वालों को बदले की किसी कार्रवाई से पूरा संरक्षण दिया जाए।

मौजूदा आरटीआई क़ानून में यह प्रावधान है कि आवेदक को यह बताना नहीं होगा कि उसे कोई सूचना क्यों चाहिए। यह प्रावधान आरटीआई कानून की जान है और इस प्रावधान को बड़ी जद्दोजहद से क़ानून में शामिल कराया जा सका था। लेकिन सरकार अब चाहती है कि इस क़ानून में आरटीआई आवेदनों को ‘फिल्टर’ किए जाने की गुंजाइश हो और लोक सूचना अधिकारी केवल ऐसे आवेदन ही स्वीकार करे जो उसकी राय में ‘लोकहित’ में हों। दरअसल सरकार आरटीआई क़ानून की बुनियाद को ही बदल देना चाहती है। मौजूदा क़ानून के  तहत सरकार केवल ऐसी सूचना को देने से इनकार कर सकती है जिसे प्रकट किया जाना लोकहित में नहीं हो।

सरकार कह रही है कि समय और संसाधनों की सीमितता के कारण आरटीआई क़ानून के अनुपालन में दिक्कत हो रही है। इसलिए वह पूछे जाने वाले प्रश्नों की संख्या या उसके विषय के दायरे को भी सीमित कर देना चाह रही है। इस दिशा में कोई कदम उठाने की बजाय सरकार को करना यह चाहिए कि ऐसे सभी दस्तावेज और अभिलेख वह खुद सार्वजनिक कर देने की पहल करे जो आरटीआई क़ानून के मुताबिक गोपनीय श्रेणी में नहीं आते।

इसका मतलब यह नहीं है कि आरटीआई क़ानून मौजूदा रूप में परफेक्ट है और इसकी कोई समीक्षा नहीं होनी चाहिए। मेरी राय में, पिछले सात साल के अनुभव में आरटीआई क़ानून की जो कमजोरियां सामने आई हैं, उनके मद्देनज़र इस क़ानून में तीन खास बदलाव किए जाने बहुत जरूरी हैं:

1. सरकारी विभागों में नियुक्त किए जाने वाले लोक सूचना अधिकारी और अपीलीय प्राधिकारी संबंधित विभाग के ही अधिकारी न हों, बल्कि वे दूसरे विभागों से हों और उन्हें प्रतिनियुक्ति के आधार पर तैनात किया जाए। संभव हो तो उनका अलग से एक काडर हो, जिसका नियंत्रण केन्द्रीय / राज्य सूचना आयोग के पास हो। सूचना आयोगों में भी नौकरशाहों को नियुक्त किए जाने की परंपरा खत्म हो और उनमें ऐसे आयुक्त नियुक्त किए जाएं, जिनकी विश्वसनीयता जनता के बीच हो।

2. आरटीआई क़ानून के तहत सूचना मांगे जाने पर यदि लोक सूचना अधिकारी यह उत्तर दे कि मांगी गई सूचना जिस फाइल या दस्तावेज में थी, वह अब गायब हो गई है तो ऐसे मामलों में संबंधित अधिकारियों की जिम्मेवारी निश्चित की जाए और उनके खिलाफ कठोरतम कार्रवाई की जाए।

3. आरटीआई के तहत सूचना मांगने वालों को परेशान किए जाने, उन्हें धमकी दिए जाने या अन्य किसी भी तरह से उन्हें हतोत्साहित किए जाने के मामलों में संबंधित विभागीय अधिकारियों की भूमिका की भी जांच हो और उनके खिलाफ क़ानूनन उचित कार्रवाई की जाए।

पहले ही विश्वसनीयता का गंभीर संकट झेल रही सरकार के मुखिया ने आरटीआई क़ानून में जिस तरह के नापाक संशोधनों की दिशा में अपने सुझाव दिए हैं, उससे ऐसा लगता है कि उनके भीतर लोक सेवक की भावना आज तक नहीं आ पाई है। शायद वह लोकहित की दृष्टि से कभी सोच ही नहीं पाते, क्योंकि वह जनता के आदमी नहीं है, वह आम जनता का प्रतिनिधित्व नहीं करते। दरअसल, वह लोकप्रिय बनने का खतरा उठाना चाहते भी नहीं, बस स्वामी-भक्ति करके सत्ता में बने रहना चाहते हैं।

जो सरकार एक तरफ बिना मांगे ही प्रस्तावित लोकपाल को संवैधानिक दर्जा दिए जाने की बात कर रही हो, वह आरटीआई क़ानून को बेजान बनाने पर क्यों तुली हुई है? आख़िर, जब सूचना ही उपलब्ध नहीं होगी तो कोई लोकपाल में शिकायत किस आधार पर करेगा? खासकर ऐसे हालात में, जब सरकार ने प्रस्तावित लोकपाल विधेयक में यह प्रावधान कर रखा हो कि यदि शिकायतकर्ता बिना पर्याप्त आधार के लोकपाल में शिकायत करेगा तो उसको मिलने वाला दंड दोषी भ्रष्ट अधिकारी को मिलने वाले दंड से भी अधिक होगा।

(क्रमश:)

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2 Responses to केवल गैर-जिम्मेदार और भ्रष्ट नौकरशाह ही घबराते हैं आरटीआई से

  1. इस बारे में काफ़ी कुछ सहमत होते हुये असहमति के कई बिंदु हैं! लेकिन लेख अच्छा लगा! :)
    सृजन शिल्पी को फ़िर से सक्रिय देखना अच्छा लगा!

    • @ अनूप शुक्ल,

      असहमति होना तो संवाद के लिए शुभ संकेत है। असहमति के बिन्दु व्यक्त किए जाएं और उन पर चर्चा हो।

      वैसे, एक बार फिर चतुर्दिक आलोचना से घबरा कर सरकार ने क़ानून में संशोधन के विचार फिलहाल त्याग दिए हैं।

      सक्रियता को नियमित रखने का प्रयास जारी है।

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