बेमानी है यह ‘सुरक्षा’ सूचना हेतु शहीद होने वालों के लिए

सूचना हासिल करने की ‘हिमाकत’ करना दिनों-दिन अधिक खतरनाक बनता जा रहा है। ऐसे माहौल में कम-से-कम दर्जन भर आरटीआई कार्यकर्ताओं की शहादत के बाद संवेदनशील बने केन्द्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) ने यह तय किया है कि अब से किसी आरटीआई आवेदक की ‘हत्या हो जाने के बाद यदि उसके परिवार का कोई सदस्य आयोग से शिकायत करे तो वह संबंधित विभाग या कार्यालय को अपनी वेबसाइट पर उस शहीद’ आरटीआई कार्यकर्ता द्वारा मांगी गई सूचना को प्रकाशित करने का निर्देश देगा। क्रांतिधर्मी सोच वाले सूचना आयुक्त शैलेष गांधी की पहल पर केन्द्रीय सूचना आयोग के इस संकल्प को इस उम्मीद में काफी सराहा जा रहा है कि इससे आरटीआई कार्यकर्ताओं पर होने वाले जानलेवा हमलों में कमी आएगी।

सूचना आयुक्त शैलेष गांधी

मगर इस उम्मीद को बेमानी साबित होते देर नहीं लगेगी। ऐसा लगता है कि इस समस्या को अत्यंत सरलीकृत ढंग से लिया गया है और इसके सभी पहलुओं पर पर्याप्त विचार नहीं किया गया है।

पहली बात तो यह है कि आरटीआई के तहत जो सूचना मांगी जाती है वह सरकारी अभिलेखों में पहले से मौजूद होती है और उसे संबंधित विभाग के लोक सूचना अधिकारी द्वारा आवेदक को तीस दिन के भीतर देनी होती है। ऐसे में, यदि किसी आरटीआई कार्यकर्ता पर सूचना के लिए आवेदन करने के बाद और सूचना मिलने से पहले कोई जानलेवा हमला होता है या कोई धमकी मिलती है तो शक की सूई सबसे पहले उस विभाग के अधिकारियों और विशेषकर उसके प्रमुख की तरफ क्यों नहीं घूमनी चाहिए?

इसे समझिए जरा। किसी गैर-सरकारी व्यक्ति को पता कैसे चल जाता है कि किस आरटीआई कार्यकर्ता ने सरकार से ऐसी सूचना मांगी है जिससे उसके गलत कारनामे सामने आ सकते हैं ?

और, सरकार को कैसे पता चल जाता है कि फलां पते पर रहने वाले फलां आवेदक ने अमुक विभाग से जो अमुक-अमुक जानकारियां मांगी थी उसे अब उजागर करने की जरूरत नहीं, क्योंकि अब उसकी हत्या हो चुकी है!

सूचना लोक सूचना अधिकारी के स्तर से ही मिल जानी चाहिए और आवेदक के पते पर डाक से ही आ जाना चाहिए। सूचना आयोग में अपील की जरूरत सामान्य तौर पर नहीं पड़नी चाहिए।

केन्द्रीय सूचना आयोग को यह सुनिश्चित करने का प्रयास करना चाहिए कि आरटीआई कार्यकर्ताओं की हर अस्वाभाविक मौत के मामले में दर्ज होने वाले एफआईआर में संबंधित विभाग के उन अधिकारियों के साथ-साथ विभाग-प्रमुख का नाम भी संदिग्ध अभियुक्त के तौर पर शामिल हो, जिनके नियंत्रण में सूचना थी।

आखिर, सीआईसी को इतना कष्ट करने और आरटीआई आवेदक की शहादत के बाद उसके परिजनों को भी इतना दु:खी करने की जरूरत क्यों पड़नी चाहिए। जो सूचना जिस विभाग से मांगी गई है वह नियत तिथि तक आवेदक के पते पर नियमानुसार डाक से पहुंचा दी जाए और यदि आवेदक स्वयं मौजूद नहीं है तो उस पते पर रहने वाला कोई अन्य स्वजन उसे ग्रहण कर लेगा। संबंधित विभाग की ओर से तो वह सूचना आरटीआई कानून के विहित प्रावधानों के तहत ही उजागर हो जानी चाहिए। यदि आवेदक के पते पर उस सूचना को ग्रहण करने वाला कोई व्यक्ति न मिले और डाक संबंधित विभाग के पास वापस लौट आए तो वह विभाग उस सूचना को अपनी वेबसाइट पर स्वयं डाल दे। इसके लिए आरटीआई आवेदक की हत्या होने की शर्त और फिर उसके किसी परिजन द्वारा सूचना आयोग के पास शिकायत लेकर जाने की शर्त क्यों?

माननीय सूचना आयुक्त शैलेष गांधी इतना तो समझते ही होंगे कि आज का कोई परिवार अपने घर में भगत सिंह नहीं चाहता। जो कोई व्यक्ति आज भगत सिंह बनने की जुर्रत करता है वह अपने परिवार वालों को सूचित करके क्रांतिकारी हरकतें नहीं करता। इसलिए प्लीज, परिवारवालों को बख्श दीजिए और उनसे यह सब जहमत उठाने को मत कहिए कि आप सूचना आयोग में यह फरियाद दर्ज करायें कि हमारे परिवार में शहीद हुए ‘भगत सिंह’ ने जिस-जिस विभाग से जो-जो सूचना मांगी थी वह अब जनहित में सार्वजनिक कर दी जाए।

केन्द्रीय सूचना आयोग यदि वाकई आरटीआई कार्यकर्ताओं पर होने वाले जानलेवा हमलों को रोकना चाहता है और यदि वह वाकई सक्षम है तो उसे यह सुनिश्चित करने का प्रयास करना चाहिए कि ऐसी हर अस्वाभाविक मौत के मामले में दर्ज होने वाले एफआईआर में संबंधित विभाग के उन अधिकारियों के साथ-साथ विभाग-प्रमुख का नाम भी संदिग्ध अभियुक्त के तौर पर दर्ज हो, जिनके नियंत्रण में सूचना थी।

क्योंकि जब भी किसी आरटीआई कार्यकर्ता पर कोई हमला होता है या उसे डराने-धमकाने या परेशान करने की कोई कोशिश सूचना के लिए आवेदन करने के बाद और सूचना मिलने से पहले होती है तो इसका स्वाभाविक अर्थ निकलता है कि सूचना जिस संबंध में मांगी गई है उस मामले में कोई भ्रष्टाचार हुआ है और उसमें संबंधित विभाग के शीर्ष अधिकारियों या मंत्री की संलिप्तता है और उन्होंने ही सूचना को प्रकट करने से बचने के लिए आवेदक को रास्ते से हटाने की कोशिश की है, भले ही उन्होंने इसके लिए उस बाहरी व्यक्ति का सहारा लिया हो जो भ्रष्टाचार से लाभान्वित हुआ हो।

क्या सीआईसी ने इस पहलू पर भी गौर किया है कि कल यदि किसी आरटीआई कार्यकर्ता की हत्या के बाद सीआईसी संबंधित विभाग को मांगी गई सूचना अपनी वेबसाइट पर डालने के लिए कहे और वह विभाग इस दलील के साथ सीआईसी में आ धमके कि संबंधित आरटीआई आवेदक की मौत की वजह हत्या नहीं, बल्कि दुर्घटना या आत्महत्या या स्वाभाविक मौत है, और इसलिए उसे सूचना को तब तक प्रकाशित करने से छूट मिलनी चाहिए, जब तक कि किसी सक्षम अदालत में आवेदक की मौत की वजह हत्या सिद्ध न हो जाए और जब अदालत में वह मौत हत्या सिद्ध हो जाए तो विभाग यह कहे कि पहले यह भी सिद्ध हो कि हत्या की वजह उसी विभाग से मांगी गई सूचना थी।

जिस बात की ओर मैं संकेत करना चाह रहा हूं और जिसे केन्द्रीय सूचना आयोग ने भी एक तरह से मान लिया है कि आरटीआई कार्यकर्ताओं पर हो रहे जानलेवा हमलों के पीछे खुद सरकारी विभागों की भी प्रमुख भूमिका है। यदि ऐसा है तो क्या केन्द्रीय सूचना आयोग का दायित्व केवल इतना है कि वह उस विभाग को संबंधित सूचना को उजागर करने का निर्देश भर दे?

(क्रमश:)

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One Response to बेमानी है यह ‘सुरक्षा’ सूचना हेतु शहीद होने वालों के लिए

  1. padmsingh says:

    सूचना अधिकार के कानून को और कठोर और प्रभावी बनाया जाना चाहिए और कुछ NGO भी सूचना अधिकार के लिए काम कर सकती हैं जिसका सदस्य बन कर उस एनजीओ के माध्यम से सूचना मांगी जा सकती है जिससे वैयक्तिक रूप से कोई व्यक्ति भ्रष्टाचार का कोपभाजन बनने से बच सकता है

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