
मीडिया, मध्य वर्ग और आम जनता से वह शिकायत अब दूर होने लगी है, जो मुझे लंबे अरसे से रही है और जिसे समय-समय पर मैं अभिव्यक्त करता भी रहा हूं। शायद हम सभी को उस एक निमित्त का इंतजार था, जिसके माध्यम से हमारे भीतर की प्रखर चेतना संघनित होकर अभिव्यक्त हो सके। शायद वह समय अब ही आना था, जब भारत की बेजुबान जनता को कोई नैतिक प्रेरणा झकझोर कर यथास्थितिवाद को चुनौती देने के लिए एकजुट करने वाली थी।
पिछले वर्षों में मुझे कुछ ऐसे दूरदर्शी मनीषियों के सानिध्य में आने का अवसर मिला, जो शायद आने वाले समय की आहट को पहचानते थे। जिज्ञासा करने पर उन्होंने बताया था कि कुछ वर्ष इंतजार करो, परिस्थितियां बदलेंगी और वह सब होगा और ठीक उसी तरह से होगा, जैसा नियति ने निश्चित कर रखा है। जो उस महापरिवर्तन के दौर में युग-चेतना के सहभागी बनना चाहते हैं, उन्हें इस समय बस अपनी पात्रता का विकास करना चाहिए और जब सही समय आए तो सक्रिय होकर अपनी क्षमता के अनुसार योगदान करने के लिए तैयार रहना चाहिए।
मित्रो, वह समय आ चुका है, वह युग-चेतना भी अब सक्रिय हो चुकी है। हमें बस अपने भीतर के तार को उस युग-चेतना से जोड़ लेने भर की जरूरत है। हमें अपना पक्ष चुनने की जरूरत है। क्या हम अब भी उन कुटिल शक्तियों के हाथों की कठपुतलियां बने रहना चाहते हैं जो यथास्थिति बनाए रखकर सारी सत्ता और सारे संसाधन अपने अधिकार में बनाए रखना चाहते हैं? या फिर परिवर्तन-चक्र के सहगामी बनकर सारी व्यवस्था को पारदर्शी और जवाबदेह बनने के लिए बाध्य करके उसे सत्य और न्याय के अनुरूप ढालना चाहते हैं? यह हमें ही तय करना है।
अन्ना हजारे नामक परिघटना को समझिए। एक व्यक्ति अपनी पात्रता का जीवन भर विकास करता है। अपने कर्मों से, अपने विचारों से और अपने आचरण से एक आदर्श सामने रखता है। अहंकार और स्वार्थ से दूर रहता है। सादगी, सेवा और समर्पण के मार्ग पर चलता है। अपने चरित्र से वह एक ऐसी विश्वसनीयता अर्जित करता है कि उसके आह्वान पर, उसके नाम पर इस देश की बहुसंख्यक जनता उठ खड़ी होती है। पहले वह अपने गांव में क्रांति को संभव बनाता है, फिर अपने इलाके में, फिर अपने राज्य में और उसके बाद वह पूरे देश के मन-मस्तिष्क पर छा जाता है। पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य सदसंकल्प करवाते थे, “हम बदलेंगे, युग बदलेगा। हम सुधरेंगे, युग सुधरेगा।” अन्ना हजारे ने इसे चरितार्थ करके दिखाया।
सुधारों का, परिवर्तनों का दौर शुरू हो चुका है। इसके लिए सबसे पहले हमें अपने उन कानूनों को बदलना होगा, जो अप्रासंगिक हो चुके हैं और कुछ नए कानून बनाने होंगे। उसके बाद उन कानूनों के पालन को सुनिश्चित कराने के लिए सजगता दिखानी होगी। पहले हमने व्यवस्था में पारदर्शिता लाने के लिए सूचना का अधिकार हासिल किया। इस समय हम भ्रष्टाचार पर नकेल कसने के लिए लोकपाल का कानून बनवाने की प्रक्रिया में हैं। इसके बाद चुनाव सुधार, न्यायपालिका की जवाबदेही, समान शिक्षा, इलाज की सुलभता, न्याय की सुगमता, रोजगार की गारंटी, आवास की उपलब्धता, ऊर्जा की प्रचुरता, पर्यावरण संरक्षण, संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण, आदि कई विषयों पर लगातार और एक साथ तेजी से सक्रिय होने की जरूरत है।
अन्ना ने अपने-आप को बिल्कुल सही समझा कि वह एक निमित्त मात्र हैं और उनके माध्यम से कोई महान शक्ति कार्य कर रही है। उस महान शक्ति को अभी कई और अन्नाओं की तलाश है जिनके माध्यम से वह भारत में और भारत के माध्यम से पूरे विश्व में महापरिवर्तन की अपनी रूपरेखा को मूर्त रूप दे सके।
संबंधित आलेख :
- बाजार-सरकार बनाम जन-सहकार
- समय की डायरी में दर्ज हैं तटस्थों के अपराध
- लोकतंत्र नहीं हैं अभी भारत में
- उच्चतम न्यायालय का पाशुपत अस्त्र
- भारत में आसन्न वर्ग-संघर्ष की पृष्ठभूमि
- नहीं लगने देंगे सूचना के अधिकार में सेंध
- गांधी: एक पुनर्विचार
