क्या अण्णा ही हैं वह चिर-प्रतीक्षित?

करीबन दस साल पहले एक कविता लिखी थी, जिसे पहली बार इस ब्लॉग पर 17 मार्च, 2006 को और फिर 13 नवम्बर, 2007 को दोबारा पोस्ट किया था। उस कविता में जिस ‘चिर-प्रतीक्षित’ की संकल्पना थी, उसका कोई चेहरा सामने नहीं था और हमारे कुछ मित्रों,  मसलन ज्ञानदत्त जी, घुघूतीबासूति जी ने उसके बारे में जिज्ञासा प्रकट की थी।

आज अण्णा हज़ारे में कई लोग उस ‘चिर-प्रतीक्षित’ का अक्स देख सकते हैं। आपकी क्या राय है, बताइएगा। बहरहाल, वह कविता एक बार फिर से प्रस्तुत है:

कब से सुन रहा हूँ सुदूर से आती हुई
तुम्हारे पदचापों की मधुर ध्वनि
आ रहे हो तुम
धीरे-धीरे हमारे बीच
तुम्हारे आने की ख़बर
हमें सदियों से है
हम हर घड़ी तुम्हारे ही इंतजार में रहे हैं।

पहुँच चुके हैं धरा पर
तुम्हारे पगों के स्पंदन
आ तो चुके हो मगर छुपे हो
आम लोगों की ओट में
न हो तुम कोई राजकुमार
और न ही किसी पंडित की संतान
न तो तुम किसी नेता के बेटे हो
और न ही किसी अफसर के पुत्र
इतने सीधे-सादे हो तुम
कि लगते नहीं कि तुम ही हो।

पुराणों ने कह दी थीं तुम्हारे आने की कथाएँ
भविष्यवेत्ताओं ने भी कर दी भविष्यवाणियाँ
हमें तुम्हारा नाम-पता मालूम था हमेशा से
और तुम्हारे रूप व कर्म के विवरण भी
लेकिन तुम तो वैसे लगते ही नहीं !

सूर्योदय की सुनहरी किरणों में
झलकता था तुम्हारा तेजोमय रूप
वर्षा की इंद्रधनुषी फुहारों में
निखरता था तुम्हारी प्रभा का वलय
हवा की बहारों में
नादित होते थे तुम्हारे मधुर अस्फुट स्वर
हर साँस के साथ उमड़ती थी प्यास
तुम्हारी चिन्मयी शक्ति की लहरियों से जुड़ने की
लेकिन अब तुम जब इतने सम्मुख हो तो
तुम्हारी सहजता और सरलता ही असाधारण लगती है।

क्षमा करना
अवतारों-पैगम्बरों की कथाओं और दावों ने
बुद्धि भ्रष्ट कर दी है हमारी
शब्दों के भ्रमजाल से
विकृत हो चुकी है संप्रेषण की हमारी शक्ति
नेताओं, अभिनेताओं और साधुओं ने
दिग्भ्रमित कर दिया है हमें
निष्प्राण हो चुकी है हमारी संवेदना
हम तुमको ठीक से पहचान नहीं पा रहे हैं।

लेकिन फिर भी दिल में पक्का विश्वास है
तुम वही हो जिसका हमें जन्मों-जन्मों से इंतजार है
जिसके मन में न अहंकार है
और न ही कोई स्वार्थ है
जिसकी शक्ति प्रतिबद्ध है
न्याय और धर्म के लिए
हमारी सेवाएँ समर्पित हैं तुम्हारे ही लिए।

About Srijan Shilpi

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3 Responses to क्या अण्णा ही हैं वह चिर-प्रतीक्षित?

  1. Manav says:

    bahut hi achhi aur sargarbhit kavita.
    nice one

  2. The success of anti-corruption activist Anna Hazare’s protests could be both encouraging and ominous. Whether the benefits accruing out of Hazare’s movement will outweigh some inherent risks will be known in the coming days, maybe months.

    To the thousands rallying behind him, this is renewal of Gandhism, or the methods and principles of Mohandas Gandhi, and marks the start of a “second freedom movement”.

    Let’s look at some likely outcomes of this upsurge.

    What may be to be achieved? Freedom from corruption. From self-centred politicians who don’t look beyond their noses. From power-brokers. People will be able to haul up the corrupt the way they deserve to be. From the highest offices to small-fry government servants, everybody will fall in line. All this can be achieved by bringing in the Hazare-backed draft of a bill for a graft-busting ombudsman. There must be a much tougher Lokpal Bill than what is envisioned in a bill cleared by the government.

    To critics – and there are many – Hazare is pushing a nation to anarchy by not recognising either his limit or Parliament’s. He is hurtling people down a path of reckless and obstinate agitation that overlooks India’s successful democracy. Hazare’s agitation ignores the fact that the fundamentals of India as a nation-state have not eroded in anyway.

    As a consequence, the restive crowds on Delhi’s streets are giving the impression that India is a banana state without strong institutions. Which is simply not true.

    Both the above scenarios – of a new freedom and anarchy – cannot be casually dismissed.

    Prime Minister Manmohan Singh could have pre-empted things from coming to such a pass, but all his government managed to do was fumble, bumble and bungle.

    If the government is ‘sleeping’ – as is often said in Hindi about someone not aware of the reality – Hazare could be daydreaming. If one were to so sincerely believe that a law — no matter how draconian – could end corruption, this must be a dream, not vision.

  3. Summary of All scams of India : Rs. 910603234300000/-
    “दर्द होता रहा छटपटाते रहे,
    आईने॒से सदा चोट खाते रहे,
    वो वतन बेचकर मुस्कुराते रहे
    हम वतन के लिए॒सिर कटाते रहे”
    280 लाख करोड़ का सवाल है …
    भारतीय गरीब है लेकिन भारत देश कभी गरीब नहीं रहा”* ये कहना है स्विस बैंक के डाइरेक्टर का. स्विस बैंक के डाइरेक्टर ने यह भी कहा है कि भारत का लगभग 280 लाख करोड़ रुपये उनके स्विस बैंक में जमा है. ये रकम इतनी है कि भारत का आने वाले 30 सालों का बजट बिना टैक्स के बनाया जा सकता है.
    या यूँ कहें कि 60 करोड़ रोजगार के अवसर दिए जा सकते है. या यूँ भी कह सकते है कि भारत के किसी भी गाँव से दिल्ली तक 4 लेन रोड बनाया जा सकता है.

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