‘कमीना’ शब्द का अतीत में जो भी अर्थ रहा हो, वर्तमान में ‘कमीनापन’ समस्त दुष्ट प्रवृतियों के समुच्चय को समग्र रूप से ध्वनित करने वाला शब्द बन गया है। जहां कहीं किसी खलनायक को कोई विशेषण देना हो तो अब एकमात्र इसी शब्द से काम चल जाता है। इसके विपरीत ‘ईमानदारी’ सज्जनता के समस्त पहलुओं को एक साथ ध्वनित करने वाला शब्द है।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने भले और बुरे इंसान में फ़र्क़ करने की कसौटी यह बताई थी कि जो दूसरों को सुखी देखकर खुश हो, वह भला आदमी है और जो दूसरों को दु:खी देखकर खुश हो, वह बुरा आदमी है। इसी तर्ज़ पर, कमीने और ईमानदार व्यक्ति के बीच फ़र्क़ करने की मोटे तौर पर एक कसौटी यह हो सकती है कि जो अपने स्वार्थ के लिए दूसरों को, यथासंभव, दु:खी न करने की चेष्टा करे वह ईमानदार है और जो अपने स्वार्थ के लिए दूसरों को दु:खी करने की यथासंभव चेष्टा करे, वह कमीना है।
लेकिन, एक दूसरा बड़ा फ़र्क़ भी है। कमीना हमेशा छिप कर वार करता है, जबकि ईमानदार पहले चेतावनी दे देता है। ईमानदार व्यक्ति जब अपने न्यायपूर्ण हितों के लिए सत्य के सहारे आगे बढ़ता है तो वह किसी को दु:खी नहीं करने की भरसक चेष्टा करने के बावजूद लड़ाई में खुलकर सामने आ जाने की वजह से कई लोगों की नाराजगी मोल ले लेता है और बहुत-सी अनचाही परेशानियों से घिर जाता है। जबकि कमीना व्यक्ति अपने स्वार्थ की पूर्ति या अहं की तुष्टि की राह में बाधक बन सकने वाले व्यक्ति को रास्ते से हटाने के लिए हर तरह के कुचक्र रचते रहने के बावजूद परदे के पीछे छिपे रहने की कोशिश करता है।
इसलिए, किसी कमीने से निपटने के लिए पहले उसके बारे में सतर्क हो जाना जरूरी है। उसके कुचक्रों का पर्दाफाश होते ही कमीने को पस्त होने में देर नहीं लगती।
यदि आप ईमानदार हैं, पर अपने आसपास छिपे कमीनों के प्रति सतर्क नहीं हैं तो सच की लड़ाई में जीतने की बात तो दूर जाने दीजिए, आप सामान्य जिंदगी भी खुशहाली से नहीं जी सकते।
शायद इसीलिए निकोलाई चेर्नीशेव्स्की ने कहा है कि “अच्छी जिंदगी केवल कमीनों के लिए होती है, उनके लिए नहीं जो ईमानदार हैं”।
आप क्या सोचते हैं?

आपके लेख में सत्य की छाप है। सुरक्षा बेहतर उपाय है। सचेतनता और जागरुकता के लिये कलमकार का प्रयास साधुवाद के योग्य है।
फिर आप कैसे जी सकते है एक आदमी अपना परिवार पाले ९ बजे से ७ बजे तक नौकरी
उसके बाद परिवार की जरूरत उसके बाद केवल टी व् पर देख कर आदमी कुढ़ सकता है
@ rajendar prasad,
क्यों नहीं है! जरूर है, जो कोई भी सच और इंसाफ का आग्रही है, वह जरूर भ्रष्टाचार और अनैतिकता के खिलाफ आवाज उठा सकता है। इसमें जाति-धर्म जैसे आधार कैसे बाधक बन सकते हैं? क्या आपको बाल्मिकी होने के कारण भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने से रोका गया है?
यदि हां, तो आप हमें बताइए, मेल लिखिए, या फिर टिप्पणी में ही दर्ज कर दीजिए, अपनी बात।
क्या बाल्मिक भ्रस्टाचार के खिलाफ आवाज उठा नहीं सकता
वाह,वाह! क्या बात है! टिप्पणियों की प्रतिटिप्पणी भी हो रही है। जय हो! इन बातों पर फ़िर कभी और लिखा जायेगा।
प्रिय सृजनशिल्पी का लिखना कितना जरूरी हो गया है ! लिखना-टहलना साथ-साथ हो। सप्रेम,
स्वागत स्वीकार किया जाए
@ मसिजीवी,
स्वीकार है जी। अब अक्सर नज़र आने की कोशिश करेंगे।
@ अनूप भाई साहब,
आपकी उक्त पोस्ट पर निम्न पंक्तियां अत्यंत प्रासंगिक लगीं:
“ईमानदार अधिकारी /कर्मचारी के लिये जरूरी है कि वह इतना चकड़ हो कि बेईमानों के इरादे समय रहते भांप ले और उस पर बिना किसी हल्ले के अंकुश लगा सके। ऐसे अवसर कम से कम बनने दे जिसमें बेइमानी की गुंजाइश रहे।”
“किसी भी सिस्टम में ईमानदार बने रहने के लिये जरूरी है कि लोग आपकी कार्यकुशलता, क्षमता, निर्णय की गुणता, दूरदर्शिता और और अन्य तमाम गुणों की बात यह कहते हुये कहें -और वो ईमानदार भी है।”
वैसे, इस पोस्ट में मैंने ईमानदारी को बेईमानी के बरक्स नहीं, बल्कि कमीनेपन के बरक्स देखने की कोशिश की है। यदि बेईमान या भ्रष्ट व्यक्ति कमीना भी हो तो उससे निपट पाना अक्सर किसी ईमानदार व्यक्ति के लिए अत्यंत दुष्कर होता है।
अरे, अरे! किधर भाई वाह! जय हो स्वागत है।
ईमानदारी कोई गर्व का विषय नहीं है में हमने अपनी बात कही है!
ईमानदार होने में बेइमानों से सतर्कता शामिल है। सच में एक सच्चा ईमानदार लल्लू नहीं हो सकता। अन्यथा तो वह मौके का मारा ईमानदार है – जिसे बेइमान बनने का मौका न मिला!
सच में अभी पहली लाईन भी नहीं पढ़ी है…मगर आपको देख कर इतना खुश हुए इतने दिन बाद कि तुरंत कमेंट करने लग गये..अब पढ़ते हैं और फिर कमेंट करेंगे.