मेरी पिछली पोस्ट “पार्टनर, मेरी पॉलिटिक्स यह है” पर टिप्पणी करते हुए अपने ज्ञानदत्त पाण्डेय जी ने एक बुनियादी सवाल पूछ लिया है:
शायद पूछा जा सकता है - “पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्यूं है?” मैं अच्छे भले लोगों को राजनैतिक मुद्दों पर कुकरहाव करते देखता हूं तो यह सवाल मन में आता है।
इसलिए इस बेहद जायज़ और जरूरी सवाल के जवाब से ही अपनी बात को आगे बढ़ाते हैं।
आज के जमाने में पेशेवर रूप से लिखने, पढ़ने, सोचने और बोलने के व्यवसाय में लगे लोगों को ‘बुद्धिजीवी’ या ‘इंटेलेक्चुअल’ कहा जाता है। पुराने जमाने में अपने यहाँ इसी प्रवर्ग के लोगों को ‘ब्राह्मण’ कहा जाता था। हम सभी जानते हैं कि वर्चस्वशील वर्णाश्रम व्यवस्था के दौर में कैसे यह प्रवर्ग जन्मजात जातिगत दायरे में आबद्ध हो गया और ‘स्वधर्म’ का त्याग कर चुके इस प्रवर्ग के लोगों में संकीर्णता, स्वार्थ और अवसरवाद के कारण इतना पतन आता गया कि ‘ब्राह्मण’ संज्ञा का अर्थ पूरी तरह बदल गया और ब्राह्मण कहलाया जाने वाला प्रवर्ग वास्तव में वर्णसंकरों का एक समुदाय बनकर रह गया।
‘ब्राह्मण’ शब्द के पुराने मूल अर्थ में चाणक्य एक सच्चे ब्राह्मण थे जो बहुत शिद्दत से यह मानते थे कि जिस देश में एक भी ‘ब्राह्मण’ मौजूद हो वह देश कभी पराधीन नहीं हो सकता। उन्हें जब यूनान के सम्राट अलेक्जेंडर की विश्व विजय की महत्वाकांक्षा और भारत की तरफ बढ़ रहे उसके अभियान की योजना का पता चला तो उन्होंने फौरन निश्चय कर लिया कि अलेक्जेंडर के इस अभियान को हर हाल में रोकना है और भारत को यूनान के अधीन होने से बचाना है। हम अपने इतिहास से जानते हैं कि चाणक्य ने अपने इस संकल्प को कैसे सफलतापूर्वक पूरा किया। चाणक्य ने केवल अपने स्वधर्म का पालन किया और एक योग्य शासक को सत्ता सौंपी। उन्होंने तत्कालीन भारत की राजनीति, अर्थनीति और समर नीति की पूरी आधार-शिला रखी, लेकिन उनका मकसद खुद सत्ता हासिल करना और सम्राट बनना कभी नहीं रहा।
आधुनिक काल में महात्मा गाँधी को भी हम उसी तरह के ‘ब्राह्मण’ की भूमिका में देख सकते हैं, जिन्होंने अपना युगधर्म पहचाना और उसे आखिरी सांस तक निभाने की कोशिश की। कहना न होगा कि प्राचीन भारत और आधुनिक भारत के बीच के दौर में लगभग हजार वर्षों का एक ऐसा अंतराल रहा, जब अपने स्वधर्म और युगधर्म को पहचानने वाले और उसे प्राणपन से निभाने वाले उस कोटि के मुकम्मल ‘ब्राह्मण’ कम ही पैदा हुए। हालांकि ब्राह्मणों की वह नस्ल कभी खत्म नहीं हुई और समय-समय पर वाणभट्ट, कबीर, समर्थ रामदास और गुरु गोविन्द सिंह जैसे ‘ब्राह्मण’ यहाँ बीच-बीच में होते रहे और हमारा देश और समाज अपना वजूद बचाये रख सका। अस्तु ….ये सब बातें आप सभी बेहतर जानते हैं।
यह सच है कि पुराने मूल अर्थ में ‘ब्राह्मण’ या आज के प्रचलित अर्थ में जिसे ‘बुद्धिजीवी’ कहा जाता है, उसका कार्यक्षेत्र बहुत व्यापक रहा है। कला, साहित्य, संस्कृति, धर्म, दर्शन, विज्ञान, गणित, चिकित्सा, तकनीकी अनुसंधान एवं आविष्कार, शिक्षण, अर्थव्यवस्था आदि तमाम क्षेत्रों में उसकी भूमिका रही है। वर्तमान दौर में ये सभी कार्यक्षेत्र अत्यंत व्यापक और जटिल हो गए हैं और हर क्षेत्र में विशेषज्ञता की जरूरत है। लेकिन जिस एक कार्यक्षेत्र की सुव्यवस्था और संतुलन पर इन सभी कार्यक्षेत्रों का उन्नयन निर्भर है, वह आज भी राजनीति ही है। यदि राजनीति गर्त में जा रही हो तो आप किसी अन्य क्षेत्र के बारे में बहुत आशावान नहीं रह सकते।
जब हमारे दौर के ‘अच्छे-भले’ बुद्धिजीवी लोगों ने राजनीतिक परिदृश्य से उदासीन होकर स्वार्थी, अहंकारी, महत्वाकांक्षी दुष्ट लोगों के लिए राजनीति का मैदान खुला छोड़ दिया हो तो उसका गर्त में जाना स्वाभाविक है। इस हद तक कि ‘राजनीति’ शब्द ही अपने-आप में एक नियाहत ही गंदा, “taboo” शब्द बन गया है। यहाँ तक कि राजनेता लोग ही अब व्यापक राष्ट्रहित के किसी मुद्दे पर आम सहमति बनाए जाने की जब बात करते हैं तो कहते हैं कि इस मुद्दे पर ‘राजनीति’ नहीं होनी चाहिए। प्रकारांतर से वे भी ये मानते हैं कि राजनीति एक गंदा काम है और वे लोग एक गंदा काम ही करने में लगे रहे हैं, लेकिन कुछ मामले इतने महत्वपूर्ण या पवित्र हैं कि उनमें इस तरह की गंदी हरकत नहीं करनी चाहिए।
इसलिए, ज्ञान जी, जब आप कहते हैं कि “मैं अच्छे भले लोगों को राजनैतिक मुद्दों पर कुकरहाव करते देखता हूं तो यह सवाल मन में आता है”, तो मुझे आपका यह कथन तनिक भी अस्वाभाविक नहीं लगता। मुझे आप जैसे उन प्रबुद्ध और प्रज्ञावान लोगों से शिकायत नहीं है जो अपनी-अपनी विशेषज्ञता और अभिरुचि के क्षेत्र में अपना दायित्व ईमानदारी और निष्ठा के साथ निभा रहे हैं। हर व्यक्ति के कार्यक्षेत्र का अपना दायरा, अपनी अभिरूचि, विशेषज्ञता और काबिलियत होती है।
लेकिन तथाकथित बुद्धिजीवियों की उस जमात को देख-सुनकर कई बार जरूर क्षोभ का अनुभव होता है जो शातिर और कमीने किस्म के राजनेताओं के पिछलग्गू या दलाल बनकर राजनीतिक बहस में पाखंडी बुद्धि विलास के लिए सक्रिय रहते हैं, और अपनी निजी वास्तविक जिंदगी में हर काम स्वार्थ और अवसरवाद से प्रेरित होकर करते हैं।
किन्तु, बौद्धिक वर्ग के जिन व्यक्तियों का पेशागत कार्यक्षेत्र तथा जिनकी अभिरुचि एवं विशेषज्ञता राजनीति से ही संबंधित है, कम से कम उनका तो यह दायित्व बनता है कि वे मौजूदा और भावी हालात का सम्यक विश्लेषण कर सकने के लिए अपनी स्वतंत्रता और वस्तुपरकता बरकरार रखें। यदि ऐसे कुछ प्रबुद्ध और प्रज्ञावान व्यक्तियों में भी युगबोध की सही पकड़ हो और उसके अनुरूप वे अपना स्वधर्म समझ सकें तो राजनीति के हालात सही पटरी पर लौट सकते हैं। संयोग कहें या नियति, मेरी अभिरुचि और पेशे का कार्यक्षेत्र राजनीति ही है। अपनी नौकरी के दौरान भी रोजाना राजनीति के ही अलग-अलग आयामों को करीब से और बारीकी से देखने का मौका मिलता है। मेरा युगबोध मुझे स्वाभाविक रूप से राजनीति को ही स्वधर्म बनाने के लिए प्रेरित करता है। ज्ञान जी, मेरी पॉलिटिक्स इसलिए है। आप चाहे जो समझें।
पिछली पोस्ट पर नीरज गोस्वामी जी ने कहा:
आज आप के ब्लॉग पर आना हुआ ये देखने कि आप में गीत ग़ज़ल के प्रति कितनी रूचि है।
नीरज जी, गीत-ग़ज़ल मेरे दिल की धड़कन है। साहित्य, कला, संगीत और फिल्म मुझे बहुत भाते हैं और हर रोज कुछ घंटे इनके बीच जीता हूँ और अपनी जीवन-ऊर्जा भी उनसे ही ग्रहण करता हूँ। जीने की ललक और जीवन में कुछ सार्थक काम करने की आकुलता उसी से पैदा होती है। लेकिन उन क्षेत्रों से मैं केवल ग्रहण ही करता हूँ। मेरी प्रतिभा और विशेषज्ञता उनमें नहीं है, मैं उन क्षेत्रों में कोई योगदान नहीं कर सकता। खुद ‘इंज्वाय’ कर सकता हूँ, पर दूसरों को ‘इंटरटेन’ नहीं कर सकता। हालांकि कभी-कभार उन विषयों में आलोचनात्मक या समीक्षात्मक लिखने का प्रयास करता हूँ, पर मुझे मालूम है कि यह काम दूसरे लोग बढ़िया कर रहे हैं, कर सकते हैं। शायद, मुझे वही काम करना चाहिए और वही बात करनी चाहिए जो मैं सबसे बेहतर कर सकता हूँ।
आज रंगकर्मी ब्लॉग पर अनुराग अमिताभ जी ने दुष्यंत कुमार जी की अत्यंत बेमिसाल और धारदार पंक्तियाँ पेश की हैं, जो हमारे दौर के बुद्धिजीवियों पर बहुत ही सटीक रूप से लागू होती हैं। ऐन मौके पर दुष्यंत जी की इन बेहतरीन पंक्तियों की याद दिलाने के लिए अनुराग जी के प्रति हर्दिक आभार सहित ये कुछ पंक्तियाँ यहाँ पेश-ए-खिदमत हैं :
तुम्हारे पाँवों के नीचे कोई जमीन नहीं,
कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यकीन नहीं।
मैं बेपनाह अँधेरे को सुबह कैसे कहूँ,
मैं इन नजारों का अंधा तमाशबीन नहीं।
तेरी जुबान है झूठी जम्हूरियत की तरह,
तू एक जलील सी गाली से बेहतरीन नहीं ।

आज इस पोस्ट को दुबारा पढ़ा। आप से पूरी सहमति है।
राजनीति ने जिन्दगी को दूभर किया है। इस से निजात की राजनीति करनी होगी ही।
आपने बहुत सटीक अन्दाज में – जो आपके लेखन की विशिष्टता भी है – अपनी बात साफ की। परिप्रेक्ष्य स्पष्ट होना अच्छा रहा। अन्यथा तो राजनीति हाईली सुपरफ़ीशियल ही लगती है।!