समय की डायरी में दर्ज हैं तटस्थों के अपराध

तटस्थ मतदाताओं का अपराध

आप तो जानते ही हैं कि जो निर्णायक मौकों पर तटस्थ रहते हैं, समय उनके भी अपराध लिखता है। क्या आप भी उन चालीस फीसदी तटस्थ मतदाताओं में शामिल हैं जो चुनाव के दौरान अपना वोट डालने मतदान केन्द्रों पर नहीं जाते? यदि हाँ तो आप भी समय की डायरी में दर्ज अपराधियों की सूची में शामिल हैं। इस देश की बदहाली के लिए जिम्मेवार लोगों का जब कभी जिक्र होगा तो उसमें आपका नाम प्रमुखता से लिया जाएगा। क्या आपको अपने इस अपराध का अहसास है?

सभी सरकारें अल्पमत की

देश में अब तक ऐसे राजनेता सत्ता पर काबिज होते रहे हैं जिन्हें सत्तर फीसदी से अधिक मतदाताओं का समर्थन हासिल नहीं रहा है। इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद हुए 1984 के आम चुनाव में सहानुभूति की प्रचंड लहर पर सवार राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस पार्टी को भारत के संसदीय लोकतंत्र के इतिहास में 415 सीटों के साथ अब तक का सबसे बड़ा बहुमत मिला था, लेकिन तब भी उसे भारत के केवल 31.20% मतदाताओं का ही समर्थन हासिल था।

देश में अब तक ऐसे राजनेता सत्ता पर काबिज होते रहे हैं जिन्हें सत्तर फीसदी से अधिक मतदाताओं का समर्थन हासिल नहीं रहा है।

उस आम चुनाव में मतदान का राष्ट्रीय औसत 63.56% था, और उसमें से कांग्रेस पार्टी को 49.10% मत हासिल हुए थे। पिछले चौदहवीं लोक सभा के आम चुनाव में देश भर के केवल 15.40% मतदाताओं का समर्थन पाने वाली कांग्रेस इस समय भारत सरकार की सत्ता पर काबिज है। पिछले आम चुनाव में 58.07% औसत राष्ट्रीय मतदान हुआ था, जिनमें से सरकार का नेतृत्व करने वाली भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को केवल 26.53% वोट प्राप्त हुए थे, जबकि भाजपा को 22.16% वोट, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी को 5.66%, बहुजन समाज पार्टी को 5.33% और समाजवादी पार्टी को 4.32% मतदाताओं का समर्थन हासिल हुआ था।

कई देशों में अनिवार्य है मतदान

अर्जेंटीना, आस्ट्रेलिया, ब्राजील, बेल्जियम, चिली, साइप्रस, इक्वाडोर, फिजी, यूनान, लक्जमबर्ग, सिंगापुर, स्वीटजरलैंड, पेरु, नौरु, उरुग्वे, तुर्की जैसे दुनिया के 32 देशों में अनिवार्य मतदान संबंधी क़ानून मौजूद हैं। हालांकि उनमें से केवल 19 देशों में इस क़ानून का पालन कराने के लिए थोड़ी-बहुत सख्ती बरती जाती है। आस्ट्रेलिया और ब्राजील में स्वास्थ्य, आदि जैसे किसी मान्य कारण का हवाला देकर नागरिक मतदान करने से बच सकते हैं। बगैर किसी मान्य कारण के आस्ट्रेलिया में मतदान नहीं करने वाले नागरिकों पर 20 डॉलर का जुर्माना लगाया जाता है, जिसे 21 दिनों के भीतर चुकाना अनिवार्य होता है, अन्यथा जुर्माने की राशि बढ़ा दी जाती है। अनिवार्य मतदान संबंधी क़ानूनी प्रावधान के कारण ही आस्ट्रेलिया में औसतन 90-95% मतदान होता है। बेल्जियम में मतदान करने से एकाधिक बार चूकने वाले नागरिकों से मतदान करने का अधिकार ही छीन लिया जाता है। पेरू और यूनान में मतदान नहीं करने वाले नागरिकों को सरकार से प्राप्त होने वाली सहायता और सेवा से वंचित कर दिया जाता है। बोलिविया में मतदान नहीं करने वाले नागरिकों को अपने बैंक खाते से तीन महीने तक वेतन आदि निकालने पर पाबंदी लगा दी जाती है। तुर्की में मतदान नहीं करने वाले नागरिकों पर तीन अमेरिकी डॉलर का जुर्माना लगाया जाता है।

भारत में मतदान अनिवार्य क्यों नहीं

वर्ष 1951 में अंतरिम संसद में लोक प्रतिनिधित्व विधेयक पर चर्चा के दौरान जब अनिवार्य मतदान का प्रस्ताव लाया गया था तब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने इस विचार के प्रति सैद्धांतिक सहमति दिखाई थी, लेकिन व्यावहारिक कठिनाइयों के कारण वयस्क मताधिकार के साथ अनिवार्य मतदान का प्रावधान क़ानून में उस समय शामिल नहीं किया जा सका। उसके बाद से कई संसद सदस्य और राजनीतिज्ञ मतदान को अनिवार्य बनाए जाने के लिए क़ानून बनाए जाने का मुद्दा उठाते रहे हैं। संसद में कई बार गैर-सरकारी विधेयकों के रूप में अनिवार्य मतदान विधेयक को पेश भी किया गया है और उन पर विस्तृत चर्चा भी हुई है।

पूर्व राष्ट्रपति आर. वेंकटरमण से लेकर अरुण शौरी, बच्ची सिंह रावत, रामदास अठावले, टी. सुब्बारामी रेड्डी, वी. नारायणसामी, जय प्रकाश अग्रवाल, मोरेश्वर सावे, आर. सुरेन्दर रेड्डी, आदि शंकर, गिरधारी लाल भार्गव, राशिद अल्वी जैसे अनेक सांसद इस मुद्दे को संसद में जोर-शोर से उठाते रहे हैं। लेकिन हर बार सरकार इस तरह के क़ानून को लागू करने में पेश आ सकने वाली व्यावहारिक कठिनाइयों और नागरिकों के मौलिक अधिकारों में हस्तक्षेप का बहाना बनाकर इस प्रस्ताव को ख़ारिज करती रही है। 1990 में दिनेश गोस्वामी की अध्यक्षता वाली चुनाव सुधार संबंधी समिति ने भी इस मुद्दे पर विचार किया था, लेकिन वह भी अनिवार्य मतदान के साथ जुड़ी परेशानियों को देखते हुए कोई ठोस सिफारिश नहीं कर सकी थी।

नकारात्मक मतदान का विकल्प

मतदान में भाग नहीं लेने वाले नागरिकों में से एक बड़ा तबका उनका है जो सभी राजनीतिक दलों और चुनावों में खड़े होने वाले उनके प्रत्याशियों से नाउम्मीद हो चुके हैं। यदि मतपत्र में सभी प्रत्याशियों को ख़ारिज करने वाला कोई विकल्प उन्हें उपलब्ध हो तो शायद वे ऐसा ही करना पसंद करेंगे। अनिवार्य मतदान का प्रावधान जब भी लागू होगा तो उसके साथ नकारात्मक मतदान करने का विकल्प मतदाताओं को अवश्य उपलब्ध कराना पड़ेगा, तभी वह कारगर हो सकेगा। मतदाता के सामने यह मजबूरी नहीं होगी कि वह नागनाथ और सांपनाथ में से किसी एक को चुने। इस प्रावधान में यह भी व्यवस्था करनी होगी कि यदि पचास फीसदी से अधिक मतदाता इस विकल्प को चुनते हैं तो अगले चुनाव में खड़े होने के लिए वे सभी प्रत्याशी स्वत: अयोग्य हो जाएंगे।

हालांकि THE CONDUCT OF ELECTIONS RULES, 1961 के नियम 49-O के तहत अब भी यह प्रावधान है कि यदि कोई मतदाता चाहे तो मतदान केन्द्र पर जाकर सभी प्रत्याशियों को खारिज करने के आशय से मतदान नहीं करने का अपना निर्णय दर्ज करा सकता है:

Elector deciding not to vote. – If an elector, after his electoral roll number has been duly entered in the register of voters in Form-17A and has put his signature or thumb impression thereon as required under sub-rule (1) of rule 49L, decided not to record his vote, a remark to this effect shall be made against the said entry in Form 17A by the presiding officer and the signature or thumb impression of the elector shall be obtained against such remark.

लेकिन यह प्रावधान स्पष्ट और कारगर नहीं है। इससे गोपनीय मतदान के नियम का उल्लंघन भी होता है क्योंकि मतदाता को यह बात निर्वाचन अधिकारी को बतानी होती है कि वह किसी प्रत्याशी के पक्ष में मतदान नहीं करना चाहता। इसलिए भारतीय निर्वाचन आयोग ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में मतदाताओं के लिए आखिर में अलग से एक विकल्प “उपर्युक्त में से कोई नहीं” प्रदान किए जाने के लिए सरकार से 2001 और 2004 में दो बार सिफारिश की थी। निर्वाचन आयोग ने इसके लिए THE CONDUCT OF ELECTIONS RULES, 1961 के नियम 22 और 49B में अनुकूल संशोधन किए जाने का प्रस्ताव किया है। उच्चतम न्यायालय में इस विषय पर पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज की जनहित याचिका भी 2003 से विचाराधीन है और निर्वाचन आयोग ने न्यायालय में भी इस मसले पर याचिकाकर्ता के प्रस्ताव से पूरी सहमति दिखाई है।

जाति और धर्म के नाम पर जनमत का ध्रुवीकरण करने के प्रबंधन की कला में माहिर ये राजनेता जनता को उसकी संप्रभुता से वंचित रखकर पीढी-दर-पीढ़ी सत्ता और सुविधा पर कुंडली मारकर बैठे रहना चाहते हैं।

जाहिर है कि अधिकतर राजनेता और राजनीतिक दल चुनाव सुधारों के इन प्रस्तावों से भयभीत हैं। उन्हें इन प्रस्तावों में अपने अस्तित्व के लिए खतरे की घंटी सुनाई देती है। इसलिए जब भी इन सुधारों की बात आती है तो वे तमाम बहानेबाजी करने लगते हैं। जाति और धर्म के नाम पर जनमत का ध्रुवीकरण करने के प्रबंधन की कला में माहिर ये राजनेता जनता को उसकी संप्रभुता से वंचित रखकर पीढी-दर-पीढ़ी सत्ता और सुविधा पर कुंडली मारकर बैठे रहना चाहते हैं।

सरकार और राजनेता तो नहीं चाहेंगे, लेकिन आशा की जानी चाहिए कि जनमत की प्रबल आकांक्षा को देखते हुए निर्वाचन आयोग और उच्चतम न्यायालय  देर-सबेर अनिवार्य मतदान और नकारात्मक मतदान का विकल्प मतदाताओं को प्रदान करने का रास्ता निकाल देंगे। तब तक सभी मतदाताओं का यह फर्ज है कि चुनावों के दौरान वे मतदान के दिन चुनाव केन्द्र पर अवश्य जाएं और अपने मताधिकार का प्रयोग अवश्य करें, भले ही आप किसी के पक्ष में मतदान नहीं करने का तरीका अपनाएँ। यही एक तरीका बचा है जिससे राजनीतिक दल सही प्रत्याशियों को चुनाव मैदान में उतारने के लिए मजबूर होंगे।

गुजरात विधान सभा चुनाव में मोदी की ‘हैट्रिक’ के बाद अगले वर्ष संभावित लोक सभा के आम चुनाव के मद्देनजर यह आलेख आपको कुछ सोचने और एक मतदाता के रूप में कोई ठोस निर्णय लेने के लिए मानसिक तैयारी का एक आधार प्रदान करे, तो अपनी प्रतिक्रियाओं से अवगत कराइएगा।

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9 Responses to समय की डायरी में दर्ज हैं तटस्थों के अपराध

  1. मतदान अनिवार्य ना भी हो तो ऐसा किया जा सकता है कि मतदान के लिए केवल एक दिन ही तय ना हो। एक ही सीट पर पांच-छह चरण में मतदान हो। या हफ्तेभर तक आफिस अवर्स में वोट डाला जा सके।
    जाति धर्म के नाम पर मतदान तो तब तक होगा जब तक समाज में हम स्वयं जाति का परित्याग नहीं करते। बमुश्किल एक दो फीसद लोग ही जाति-धर्मेत्तर विवाह करते हैं। अन्य संबंधों-व्यवहारों में भी स्वजातीय को वरीयता देते हैं। समाज बदले तो नेता बदलें।
    मतदान का गिरता प्रतिशत नेताओं और कारपोरेटियों की चिंता का विषय कतई नहीं है।

  2. ramkishorfiroda says:

    kabhi no voting ke bare me bhi bataiye.

  3. virendra dwivedi says:

    आपने अनिवार्य मतदान के बारे में अलग-अलग देशों के बारे में जो जानकारी दी उसके लिये बहुत-बहुत धन्यवाद…लेकिन मैं देश में मतदान अनिवार्य करने से सहमत नहीं हूं क्योंकि हर बात के लिये कानून बनाने के चक्कर में भारत का संविधान दुनिया में सबसे बड़ा लिखित संविधान तो कहलाने लगा लेकिन देश के लोगों में कानून का पालन करने का संस्कार नहीं पैदा हो सका…उदाहरण के तौर पर दिल्ली में सार्वजनिक स्थानों पर सिगरेट पीना मना है लेकिन लोग इतने ज्यादा समझदार हैं कि वो सिगरेट पियेंगे तो सार्वजनिक स्थलों पर ही पियेंगे…ऐसे में मेरा मानना है कि कानून बनाने पर ज्यादा जोर देने की बजाय लोगों में जिम्मेदारी का भाव लाने की जरुरत है कि मतदान से इस देश का निर्माण करता है और क्या वो इस देश का विध्वंस करना चाहते हैं? अगर नहीं तो वोट देकर देश का निर्माण करें…जहां तक नकरात्मक वोटिंग की बात है तो जनता के लिये ये अच्छा विकल्प हो सकता है… जिससे भ्रष्ट औऱ अपराधियों को सत्ता से बाहर किया जा सके ।

  4. Dr. Chandra Kumar Jain says:

    matadhikar ke mahatva aur desh ke navnirman mein nagrik hone ke nate farz kee samajh ke liye vyapak campaign kee jaroorat hai.
    aap bharat mein chinjen thopkar logon ko jimmedar banane kee khushfahmee se aakhikar niraash hee honge.
    negative vote ke vikalp ke badle,sahee candidates ke namnkan ke liye kanoon sakhta kyon na kiya jaye ?
    kam-se-kam koii to chehra chunega har matdata.
    MAT KE LIYE ZOR MAT DALIYE,MATI AUR MANAS KA NIRMAN KIJIYE.
    JADON KO NAJANDAZ KAR SIRF PHOOL-PATTIYON KO SEENCHNE SE LOKTANTRA KAISE PHOOLEGA-PHALEGA ?
    AAP HEE BATAYEN…SHRIMAN

  5. @ ज्ञान जी,

    यदि आपका आशय मताधिकार के लिए मतदाता की शैक्षिक योग्यता से है तो जब देश में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मंत्री और सांसद बनने के लिए शैक्षणिक योग्यता को आधार नहीं बनाया जाता तो फिर एक आम मतदाता के लिए योग्यता को कैसे आधार बनाया जा सकता है?

    यह जरूर है कि नागरिकों को अपने मौलिक अधिकारों और मौलिक कर्तव्यों के बारे में जागरूक होना चाहिए। हमारे लोकतंत्र में जनता के बीच इस तरह की जागरूकता फैलाने का दायित्व राजनीतिक दलों के साथ-साथ पत्रकारिता का भी है।

    देखा यह गया है कि मतदान नहीं करने वालों में से एक बड़ी तादाद पढ़े-लिखे समझदार नागरिकों, बुद्धिजीवियों और अमीर लोगों की होती है, जो लाइन में घंटे-आध घंटे लगकर मतदान करने की परेशानी से बचना चाहते हैं। निरक्षर, गरीब आम आदमी ही सबसे अधिक मतदान करने जाता है।

  6. मतदान करना ही चाहिए।
    दिक्कत यह है कि हम बतौर एक नागरिक अपने अधिकारों के प्रति तो अत्यधिक जागरूक रहते हैं पर कर्तव्यों के प्रति अति उदासीन।

  7. जो प्रजा लोकतंत्र का सम्मान कर मतदान नहीं करती वह तानाशाही को भोगने के लायक है.

    अच्छा लेख.

  8. Gyan Pandey says:

    क्षमा करें – जब तक भारतीय मतदाता अपने वोट की अहमियत के प्रति जागरूक नहीं है; तब तक एक व्यक्ति – एक मत का सिद्धांत मुझे सही नहीं लगता और उसका गलत प्रयोग सर्वत्र दिखता है। आप कोई भी सिस्टम लगालें एक व्यक्ति – एक मत के साथ, वह कारगर नहीं होगा। पहले मतदाता का स्तर तो बढ़े।

  9. सही है। चुनाव में भाग तो लेना चाहिये।

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