हे मतदाता,
तुम इस देश के मालिक हो। अपने भाग्य के और इस देश के भाग्य के विधाता तुम ही हो। चुनाव में मतदान करते समय तुम अपने हाथ से अपना भाग्य लिखते हो। कोई ब्रह्मा, कोई खुदा, कोई गॉड तुम्हारा भाग्य नहीं लिखता। वह तुम, केवल तुम ही हो, जो खुद अपना भाग्य लिखते हो। यह तुमको ही तय करना है कि तुम अपना भाग्य, अपना भविष्य कैसा चाहते हो।
यदि तुम आज सुखी नहीं हो तो इसलिए कि पिछली बार जब तुम्हें अपना भाग्य लिखने का मौका मिला था, तब तुमने अपना भाग्य गलत व्यक्ति के हाथों में सौंप दिया था। कोई बात नहीं, तुमको एक बार फिर मौका मिला है। इस बार अपने विवेक का पूरा इस्तेमाल करो और सही फैसला करो।
याद रखो कि तुम्हारे दु:खों को दूर करने आसमान से कोई फरिश्ता नहीं आएगा। तुमको अपना फरिश्ता खुद चुनना है। उस फरिश्ते को शक्ति भी तुम ही दोगे। जैसे भगवती दुर्गा को सभी देवताओं ने थोड़ी-थोड़ी शक्ति दी थी और उस सम्मिलित शक्ति के बल पर उसने भयंकर राक्षसों का समूल नाश कर दिया था, उसी तरह तुम भी अपनी थोड़ी-थोड़ी शक्ति अपने फरिश्ते को दो। वह तुमसे मिली शक्तियों के बल पर ही तुम्हारी समस्याओं को हल करेगा और तुम्हारे सारे दु:खों को दूर करेगा। वह तुम्हारे बीच का ही कोई व्यक्ति है, वह तुम्हारे जैसा ही है। सोचो, खोजो….वह तुम्हें अपने बीच ही दिखाई देगा।
जिस किसी को भी तुम अपना फरिश्ता चुनना चाहते हो, उसकी भलीभांति परीक्षा कर लो। पता लगाओ कि उसका अतीत कैसा रहा है, उसने अब तक अपना फ़र्ज कितनी ईमानदारी, कितनी जिम्मेदारी, कितनी समझदारी और कितनी बहादुरी से निभाया है। छानबीन करो कि उसका स्वार्थ क्या है, उसकी महत्वाकांक्षा क्या है, उसका इरादा क्या है?
किसी भी प्रकार के झाँसे या बहकावे में मत आओ। तुम्हारी जिंदगी का यह सबसे महत्वपूर्ण, सबसे जिम्मेदारी भरा निर्णय है। उसके दावों, उसके वादों पर मत जाओ। तुम यह देखो कि क्या वह तुम्हारे बीच का आदमी है या नहीं। क्या वह तुम्हारा प्रतिनिधि बनने लायक है या नहीं? क्या वह तुम्हारी समस्याओं, चिंताओं और उम्मीदों से वाकिफ़ है या नहीं? क्या वह तुम्हारे जैसे ही रहता है, तुम्हारे जैसे ही बोलता है, तुम्हारे जैसे ही सोचता है, तुम्हारे जैसे ही करता है या नहीं? क्या वह वास्तव में तुम्हारे भले के लिए सोचता है या सिर्फ अपने और अपने परिवार के भले के लिए सोच रहा है?
देखो कि उसकी कथनी और करनी में कोई फ़र्क तो नहीं। किसी ऐसे व्यक्ति को अपना प्रतिनिधि हरगिज नहीं चुनना जिसके चुनाव जीत जाने के बाद तुम उससे सहजता से मिल न सको, और अपनी बात ठीक से सुना न सको।
तुम अपना नौकर चुनो, मालिक नहीं। अपनी मालकियत अपने पास बनाए रखो।
क्या तुमको ऐसा कोई उम्मीदवार चुनाव मैदान में दिखाई देता है? क्या कोई ऐसा व्यक्ति तुमसे वोट माँगने आया है? यदि हाँ तो चूकना मत, उसे अपना समर्थन जरूर देना। यदि ऐसा कोई व्यक्ति चुनाव में नहीं खड़ा है, तब भी वोट देने जरूर जाना। यह देख लेना कि जितने विकल्प तुम्हारे सामने हैं, उनमें से सबसे बेहतर कौन है? कौन तुम्हारी कसौटियों पर सबसे खरा उतर रहा है? उसकी पार्टी पर, उसके प्रचार पर मत जाना। यह भी मत सोचना कि चुनावी लहर उसके पक्ष में है या नहीं। उसके जीतने की संभावना है या नहीं। किसी सही उम्मीदवार को मिलने वाला हर वोट उसका हौसला बढ़ाएगा, भले ही वह चुनावी खेल में हार जाए। लेकिन किसी गलत उम्मीदवार को अपना समर्थन हरगिज मत देना। ऐसे किसी व्यक्ति को अपना वोट नहीं देना, जिसने चुनाव में किसी पार्टी का टिकट पाने के लिए लाखों-करोड़ों रुपये पार्टी फंड में निवेश किया है। ऐसा व्यक्ति चुनाव जीतने के बाद केवल भ्रष्टाचार ही करेगा और तुम्हारे हितों को बिल्कुल भूल जाएगा।
यदि तुम अठारह वर्ष या उससे अधिक उम्र के भारतीय नागरिक हो और यदि मतदाता सूची में तुम्हारा नाम दर्ज है तो नियत तारीख को मतदान करने जरूर जाना। यदि तुम ऐसा करने में चूकने की गलती करोगे तो ख्याल रखना कि तुम ऐसा करके अपने भविष्य की बेहतरी के दरवाजे खुद ही बंद कर लोगे। फिर भगवान से भी की गई तुम्हारी सारी प्रार्थना, सारी पुकार अनसुनी रह जाएगी।

नींद से जगाने वाला लेख लिख है शिल्पी साहब आपने.
लेकिन दिक्कत ये है कि सब “नौकर” नौकरी मिलने के बाद “मालिक” बन जाते है.
और इनमे से कम बुरे को चुनना भी कोई हँसी खेल नहीं है.
सत्य वचन भाई. हमारा मत पाया व्यक्ति अभी तक तो नहीं हारा
मुझे लगता है कि संसद और विधानसभाओं से ज्यादा स्थानीय निकायों के चुनावों को अहमियत देनी चाहिए। वहीं से हम अपने प्रतिनिधियों को चुनने और उन पर अंकुश रखने की बुनियादी लोकतांत्रिक ट्रेनिंग ले सकते हैं। बाकी तो अभी हमारे यहां संसदीय लोकतंत्र का जो भी स्वरूप है, उसमें अच्छे व्यक्ति चुन भी लिए जाएं तो नक्काखाने में तूती की आवाज़ बनकर रह जाते हैं। ऊपर से व्यक्ति के सत्ता के पास पहुंचकर बदलने की पूरी गुंजाइश रहती है, अगर उस पर किसी विचारधारा या समूह का अंकुश न रहे। महात्मा गांधी तो बिरले ही होते हैं।
ठीक लिखा है जी। हम भी इन बातों पर ध्यान देते हैं। यह जरूर है कि हमारा वोट पाया उम्मेदवार हारता ही रहा है।