
हम दिल्ली वाले अपने कई धार्मिक त्यौहार सड़कों पर मनाने में अपनी शान समझते हैं। वोट बैंक की राजनीति के कारण सरकार भी इसे संरक्षण देती है। दिल्ली यातायात पुलिस ऐसे अवसरों पर अपने अविवेक का परिचय देते हुए सार्वजनिक परिवहन को ठप्प या बाधित कर देती है। सिख धर्म के कुछ पर्वों के अवसर पर सड़कों पर जुलूस और लंगर के आयोजन किए जाते हैं। इन आयोजनों के अवसरों पर दिल्ली के कुछ व्यस्ततम मार्गों पर चलने वाली सार्वजनिक परिवहन की बसों को रोक दिया जाता है। निजी वाहनों को फिर भी वैकल्पिक मार्गों से जाने दिया जाता है, लेकिन बसों के जरिए सफर करने वाले हजारों यात्री कई किलोमीटर पैदल चलने के लिए मजबूर होते हैं या फिर ऑटो चालकों की मनमानी के शिकार होते हैं। निजी वाहन भी उस दौरान सड़कों पर कछुए की भांति सरकते हुए कई घंटों में उन इलाकों को पार कर पाते हैं। सड़कों पर धार्मिक आयोजन करने और जुलूस निकालने के मामले में इस्लाम, हिन्दू और जैन धर्म के अनुयायी भी कुछ कम नहीं। यहां तक कि गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय त्यौहारों और अंबेडकर जयंती जैसे कुछ अवसरों पर भी दिल्ली के कुछ प्रमुख मार्गों पर सार्वजनिक परिवहन ठप्प कर दिया जाता है।
केन्द्रीय सचिवालय, संसद और केन्द्रीय दिल्ली के विभिन्न कार्यालयों में कार्य करने वाले वे कर्मचारी, जो सार्वजनिक परिवहन की बसों से ऑफिस पहुँचते हैं, गणतंत्र दिवस के अवसर पर राजपथ पर होने वाली परेड की रिहर्सल और उसके बाद बीटिंग रीट्रिट के कारण पूरे सप्ताह बेहद परेशान रहते हैं। राजपथ से कई किलोमीटर पहले ही बसों को रोक दिया जाता है और उसके बाद उन्हें पैदल चलकर ऑफिस पहुँचना होता है। हजारों महिलाएं और पुरुष परेशान होते रहते हैं, और पुलिस एवं सेना के जवानों की बदतमीजियां झेलते रहते हैं। पैदल राजपथ पार कर अपने ऑफिस पहुँचना भी एक विकट समस्या होती है। राजपथ पर चल रही परेड के कारण दोनों तरफ से आवागमन अवरुद्ध कर दिया जाता है। राजपथ के दोनों तरफ हजारों लोग परेड रुकने का काफी देर इंतजार करने के बाद जब बेसब्र हो उठते हैं तो खुद बेरिकेड हटा कर राजपथ पार करने की कोशिश करते हैं। इस दौरान पुलिसकर्मियों के साथ खूब तकरार भी होती है। इतने में हजारों लोग जब तेजी से भागते हुए राजपथ पार कर जाते हैं तो पुलिस-सेना के जवानों के पास बेबस होकर तमाशा देखते रह जाने के सिवा कोई उपाय नहीं होता। कुछ देर के लिए भगदड़ जैसा माहौल बन जाता है, उसके बाद रूकी हुई परेड फिर से शुरू हो जाती है। कुछ देर में हजारों लोग फिर दोनों तरफ जमा हो चुके होते हैं, कुछ देर इंतजार करते हैं और एक अंतराल के बाद फिर एक भगदड़ मचती है और उसके बाद फिर परेड चालू हो जाती है।
मजे की बात यह है कि निजी वाहनों का प्रयोग करने वालों को वैकल्पिक मार्ग से आगे बढ़ने दिया जाता है। यही कारण है कि ऐसे अवसरों पर हर व्यक्ति गंतव्य तक पहुंचने के लिए अपने निजी वाहन का प्रयोग करने के लिए मजबूर होता है, जिसके कारण सड़कों पर दबाव कई गुना बढ़ जाता है और दिल्ली ठहरी हुई नजर आती है। मैं पिछले कई वर्षों से इन नजारों को देखता रहा हूँ और खुद भी इन परिस्थितियों का शिकार होता रहा हूँ। यदि ऐसे अवसरों पर यातायात पुलिस निजी वाहनों के बजाय सार्वजनिक परिवहन को सड़कों पर सुचारू ढंग से चलने दे तो स्थिति काफी सुधर सकती है। क्योंकि एक निजी वाहन में एक से दो व्यक्ति ही एक बार में सफर करते हैं जबकि एक बस में पचास से अधिक लोग एक साथ सफर कर सकते हैं। हालांकि ऐसे मौकों पर लोग मेट्रो रेल का प्रयोग करके या एक ही रूट पर जाने वाले कई यात्री निजी कारों में पूलिंग करके कुछ हद तक परेशानी से बचने का प्रयास भी करते हैं। लेकिन जिन इलाकों में मेट्रो रेल की सेवाएं नहीं हैं या फिर जो लोग निजी कारों की पूलिंग नहीं कर पाते, उन्हें सबसे अधिक परेशानी झेलनी पड़ती है।
चाहे धार्मिक आयोजन हों या राष्ट्रीय उत्सव, सड़कों पर इसे मनाए जाने की परंपरा खत्म होनी चाहिए। यातायात पुलिस और दिल्ली सरकार के परिवहन विभाग को धार्मिक नेताओं और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों के साथ इस संबंध में बैठक करके खुलकर चर्चा करनी चाहिए और उन्हें इस बात के लिए सहमत कराया जाना चाहिए कि वे अपने जुलूस और धार्मिक आयोजन सड़कों पर नहीं करेंगे।
गणतंत्र दिवस के अवसर पर राजपथ पर इतने बड़ा आयोजन करके हमारा कौन-सा राष्ट्रीय हित सधता है? क्या यह उचित नहीं होगा कि इस आयोजन को प्रतीकात्मक रूप से ही मनाया जाए और इसे इंडिया गेट और राजपथ के छोटे से हिस्से तक सीमित कर दिया जाए?
लाखों नागरिकों की परेशानियों का ख्याल किए बगैर इस तरह से किए जाने वाले आयोजनों को जनता नफरत से देखने लगी है। यकीन मानिए, जो लोग सड़कों पर इस तरह की बदइंतजामी झेलने और जाम में फंसने के लिए मजबूर होते हैं वे इन उत्सवों के आयोजकों के साथ-साथ यातायात पुलिस को भी दिल से कोसते हैं और ढेर सारी बददुआ देते हैं।
क्रमश:
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हम तो यही कहेंगे रास्ता या तो सबके लिये बंद हो या सबके लिये खुला।
इसकी तकलीफ तो उन्हें भी होती है जब वो उत्सव नही मना रहे होते है बल्कि सड़क पर अपनी मोटर गाड़ी में सवार हार्न बजा रहे होते हैं. काश लोग उसी समय यह बात सोचे की अब हम सड़क का इस्तेमाल उत्सव और रैली के लिए नही करेंगे. लोगो की सोच के साथ पुलिस वालो को भी अपना काम करना चाहिए.