लोकतंत्र नहीं है अभी भारत में

भारत एक भीड़ है और मैं उस भीड़ में शामिल धक्के खाता हाशिए पर खड़ा एक नागरिक हूँ। सड़क, रेल, हवाई अड्डा, अस्पताल, स्कूल, कचहरी, थाना, जेल, मंदिर, राशन दुकान, सिनेमा घर, नगरपालिका, ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी, टेलीफोन एक्सचेंज, बिजली ऑफिस, बाजार, श्मशान — हर जगह भीड़ ही भीड़ है और मैं बेबस, निरीह, कतारबद्ध, धैर्य के साथ अपनी बारी के इंतजार में खड़ा हूँ। कभी-कभार थोड़ी देर के लिए मेरा धैर्य चुकने लगता है और मैं बेकाबू होने लगता हूँ। लेकिन कभी इतनी हिम्मत नहीं जुटा पाता कि कतार से बाहर निकलकर अपना काम पहले करवाने की धौंस जमा सकूं। मेरी तरह तीन-चौथाई से ज्यादा हिन्दुस्तानी नागरिक एक भीड़ से ज्यादा कुछ नहीं हैँ। उनकी कोई हैसियत नहीं है, कोई अहमियत नहीं है, कोई ताकत नहीं है। इस देश की सबसे बड़ी सच्चाई यही है कि यहां के तीन-चौथाई से ज्यादा नागरिक लोकतंत्र के हाशिए पर रहते हैं।

इस देश में हैसियत, अहमियत और ताकत केवल उनके पास है जिन्हें कभी किसी कतार में नहीं लगना पड़ता, जिन्हें हर मनचाही चीज जरूरत से अधिक, उनकी मर्जी होते ही सहजता से मिल जाती है। मेरे जैसे आम आदमी को हर जरूरी चीज जरूरत से कम मिल पाती है, वह भी समय पर और सहजता से नहीं मिलती। मुझे मालूम है कि संसाधनों और इंफ्रास्ट्रक्चर पर आबादी का दबाव बहुत अधिक है, उपभोग करने वाले बहुत अधिक हैं, इसलिए हर चीज के लिए यहां आपाधापी मची है और शायद इसी आपाधापी की वजह से भ्रष्टाचार भी बढ़ा है। लेकिन मैं इस आपाधापी और भ्रष्टाचार से आक्रांत हूं, बुरी तरह से परेशान हूं। मैं चाहता हूँ कि उपलब्ध संसाधनों, सुविधाओं और अवसरों का न्यायपूर्ण वितरण सुनिश्चित करने का कोई सिस्टम हो, ताकि मेरे हिस्से की चीज मेरी जरूरत के समय सहजता से मुझे मिल जाए। जब तक सभी नागरिकों के बीच संसाधनों, सुविधाओं और अवसरों की यह बराबरी कायम नहीं होती, तब तक मुझे यह कहना सबसे बड़ा झूठ लगता है कि यहां लोकतंत्र है।

दरअसल हमारे देश में “लोक” यानी पब्लिक नाम की ऐसी कोई चीज नहीं है, जिसका कोई तंत्र बन सके। यहां महज एक भीड़ है, जो बेबस है, जो एकजुट नहीं है, जो अनुशासित नहीं है, जो अपनी ताकत को नहीं पहचानती, जो सही निर्णय लेना नहीं जानती। लोकतंत्र हमारे लिए वह सपना है, जो यदि साकार हो जाए तो भारत में स्वर्ग उतर आए। जब सरकार और प्रशासक, जनता का हुक्म मानें, उनके हिसाब से चलें, और खुद को जनता का सेवक समझें। और जनता भी ऐसी हो जो समझदार हो, जिम्मेदार हो, अनुशासित हो और सबसे बढ़कर, सरकार को अपने काबू में रखना जानती हो।

जनता की भूमिका

हमारे पास सरकार पर नियंत्रण रखने के साधन और अवसर बहुत कम हैं। चुनाव में वोट डाल देने के बाद अगले चुनाव से पहले हमारे पास सरकार और अपने जन-प्रतिनिधियों के बारे में फैसले लेने का कोई मौका नहीं होता। चुनाव के समय भी हमारे पास विकल्प अत्यंत ही सीमित होते हैं। हमें सांपनाथ और नागनाथ के बीच ही किसी एक का चुनाव करना होता है। भारतीय लोकतंत्र का चुनावी खेल एक मजाक से अधिक कुछ नहीं रहा है। यह चाहे कितना ही निष्पक्ष और साफ-सुथरा हो, तब भी सरकार के गठन में जनता के फैसले की भूमिका हाशिए पर सिमटी होती है। आम चुनावों में औसत राष्ट्रीय मतदान शायद ही कभी साठ फीसदी से अधिक होता है और उन मतों में से सरकार बनाने वाली मुख्य पार्टी को शायद ही कभी तीस फीसदी से अधिक मत मिलता है। इस प्रकार, केन्द्र में जो पार्टी सरकार का नेतृत्व करती है, उसे शायद ही कभी देश के एक चौथाई मतदाताओं का भी समर्थन मिल पाता है।

सरकार के गठन का असली खेल तो मतों की गिनती हो जाने और चुनाव परिणामों की घोषणा हो जाने के बाद शुरू होता है। चुनावी समीकरण को देखते हुए सत्ता हथियाने के लिए परस्पर विरोधी विचारधारा वाले राजनीतिक दलों के बीच गठबंधन होता है। हम जाति, मजहब, क्षेत्रीयता, आदि के नाम पर इस कदर बँटे हुए हैं कि राजनीतिक दल जनमत का अपने-अपने पक्ष में आसानी से ध्रुवीकरण कर लेते हैं। भारतीय संसदीय लोकतंत्र की मौजूदा चुनावी व्यवस्था में शायद ही कभी ऐसी सरकार बन पाएगी, जिसे देश के पचास फीसदी से अधिक मतदाताओं का समर्थन मिल पाए। जब तक ऐसी कोई सरकार नहीं बनती, तब तक हम नहीं कह सकते कि देश में लोकतंत्र है। यह तब होगा जब भारत की भीड़, पब्लिक की भूमिका में आएगी, सामूहिक रूप से फैसले लेगी, शत-प्रतिशत मतदान करेगी और जिस पार्टी या प्रत्याशी को वोट देगी उसे स्पष्ट रूप से पचास फीसदी से अधिक वोट देगी।

मीडिया की भूमिका

देश के अधिकतर नागरिकों को इस बात की भी पर्याप्त सूचना नहीं होती कि सरकार क्या कर रही है, कैसे कर रही है और क्यों कर रही है। सरकार अपना दायित्व कहां नहीं निभा रही है, वह कहां गड़बड़ी कर रही है और वह क्यों ऐसा कर रही है, इस पर नज़र रखने का दायित्व प्रेस और मीडिया का है। यदि वह अपना दायित्व ठीक से निभाए, संसद और सरकार को जनता से जोड़े रखे, सरकार की गड़बड़ियों को उजागर करे, जनता की आकांक्षाओं-अपेक्षाओं को सरकार तक पहुँचाए, तो लोकसेवकों और जनप्रतिनिधियों पर जनमत का अंकुश बना रहे। लेकिन वह पब्लिक या पाठक/दर्शक के लिए नहीं, बल्कि सिर्फ अपने मालिकों के मुनाफे के लिए काम करती है। मीडिया हमारे यहां लोकतंत्र के चौथे खंभे की भूमिका में नहीं रह गया है। वह इंफोटेनमेंट का एक कारपोरेट बिजनेस भर है, जिसे विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की कतार में रखने की बजाय अब फिल्मों और टीवी धारावाहिकों के कारोबार के साथ जोड़कर देखा जाना चाहिए। मीडिया में संसद और सरकार के कामकाज के बारे में विश्लेषणपरक जानकारी के लिए स्पेस लगातार सिकुड़ता जा रहा है और उसकी जगह क्राइम, क्रिकेट, सेक्स, फिल्म, हास्य, मनोरंजन और सेंसेशन लेते जा रहे हैं। न्यूज चैनलों की बाढ़-सी आ गई है, लेकिन असली न्यूज कहीं ढूंढ़े नहीं मिल रहा। “जल बिच मीन प्यासी, मोहि सुन-सुन आवे हांसी” वाली बात हो रही है। टीआरपी रेटिंग के खेल, विज्ञापन बाजार के अनुचित दबाव और चैनलों के बीच नंबर वन बनने की होड़ ने मीडिया का स्तर काफी नीचे गिरा दिया है।

साभार : आर.के. लक्ष्मण

सूचना का अधिकार

सूचना के अधिकार संबंधी क़ानून बनने के बाद जागरूक नागरिकों के पास कहीं गड़बड़ी दिखने पर और उससे खुद को प्रभावित होता महसूस करने की स्थिति में सरकार से सूचना मांगने का एक तरीका मिला है। लेकिन सूचना मांगने में हमारी जनता उतनी कुशल नहीं है, जितने कुशल सूचना को छिपाने में हमारे नौकरशाह हैं। इस क़ानून की भी अपनी सीमाएँ हैं। इस क़ानून के बनने के बाद जनता को सूचना देने का जो अप्रिय और विशालकाय काम नौकरशाहों के मत्थे आ गया है, उससे बचने की वे हर संभव कोशिश करते हैं। नतीजतन, इस क़ानून के तहत अपीलों की संख्या बढ़ रही है, जिसके कारण सूचना आयोग भी कोर्ट की ही तरह सुस्त चाल से उन पर सुनवाई कर पा रहे हैं। वहां भी मामले की सुनवाई के लिए तारीखों पर तारीखें दी जाने लगी हैं और सूचना पाने के लिए जनता को ठीक वैसी ही परेशानी होने लगी है, जैसा कि न्याय पाने के लिए होती है। फिर भी, प्रेस और मीडिया की गैर-जिम्मेदारी को देखते हुए जागरूक नागरिकों को ही सूचना के अधिकार के तहत जरूरी सूचनाएं हासिल करके खुद ही सिटीजन जर्नलिस्ट की भूमिका निभानी होगी। हमारे ब्लॉगरों में भी जितने साथी इस भूमिका को निभा सकें, उतना बेहतर होगा।

न्यायपालिका की भूमिका

सरकार को संविधान और क़ानून की मर्यादा के भीतर रखने और उसके अनुरूप कार्य करने के लिए बाध्य करने का दायित्व न्यायपालिका का है, लेकिन उसका हाल भी किसी से छिपा नहीं है। हमारी अदालतें वकीलों को अमीर बनाने के लिए बनी हैं। जनता को न्याय पाने के लिए बहुत ऊँची कीमत चुकानी पड़ती है। फिर भी, न्याय मिल जाएगा, इसकी कोई गारंटी नहीं होती। यहां देर भी होती है और अंधेर भी होता है। निचले स्तर की ज्यादातर अदालतें तो भ्रष्टाचार के बदनाम अड्डों में तब्दील हो चुकी हैं। असल में, पुलिस, क़ानून और अदालतों का भय अपराधियों को नहीं, बल्कि केवल शरीफ और निरीह नागरिकों को रह गया है, वह भी इसलिए कि उन्हें इंसाफ की उम्मीद में अनगिनत परेशानी उठाकर, गाढ़ी कमाई लुटाते हुए जिंदगी के सारे कामकाज छोड़कर वर्षों तक अदालतों के जो चक्कर लगाने पड़ते हैं, उनसे वे बचना चाहते हैं। भारतीय न्यायपालिका को यदि अन्यायपालिका कहा जाए तो शायद कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी, क्योंकि वह न्याय, जो समय पर न मिले और जिसके लिए जनता को इतनी बड़ी कीमत चुकानी पड़े, इतनी परेशानी उठानी पड़े, वह वास्तव में एक अन्याय ही है। इसलिए जब तक फौजदारी के ऐसे मामले न हों कि उन्हें पंचायत, आर्बिट्रेशन, मीडिएशन, काउंसिलिएशन, लोक अदालत, आदि जैसे वैकल्पिक न्याय के उपायों से सुलझाया न जा सके, तब तक हमें न्याय पाने के लिए अदालतों का रुख करने से बचना चाहिए।

संसद की भूमिका

सरकार पर अंकुश रखने का सबसे प्रत्यक्ष दायित्व संसद का है। सांसदों के पास सरकार से प्रश्न पूछकर, विभिन्न संसदीय नियमों के तहत प्रस्ताव लाकर, लोक लेखा समिति एवं विभिन्न संसदीय स्थायी समितियों की रिपोर्टों, आदि के माध्यम से कार्यपालिका को अपने नियंत्रण में रखने की शक्ति है। लेकिन भारतीय संसदीय प्रणाली में विधायिका और कार्यपालिका के बीच स्पष्ट पृथक्करण नहीं होने के कारण सरकार पर यह नियंत्रण अत्यंत ढीला है। सरकार चूंकि बहुमत वाले दल या गठबंधन के संसद सदस्यों से ही बनती है, इसलिए लोक सभा के आधे से ज्यादा सांसद सरकार के हर सही-गलत फैसले के साथ ही खड़े रहते हैं। सत्ता पक्ष के जो सांसद सरकार में मंत्री बन जाते हैं, वे कार्यपालिका को नियंत्रण में रखने वाले सांसद की भूमिका नहीं निभा पाते और जो सांसद मंत्री नहीं बन पाते, वे कई बार प्रधानमंत्री या पार्टी अध्यक्ष को इतना परेशान नहीं करना चाहते कि भविष्य में उनके मंत्री बनने की संभावनाएं धूमिल हो जाएं। हालांकि गठबंधन सरकारों के दौर में ऐसा भी होने लगा है कि सरकार के समर्थक दल या सत्ता पक्ष के सांसद भी कभी-कभार विपक्षी तेवर अख्तियार कर लेते हैं, लेकिन सत्ता में बने रहने की सुविधा का स्थायी मोह अक्सर उनके ऐसे आकस्मिक तेवरों पर हावी रहता है। ऐसे में सरकार कई बार ऐसे फैसले लेने में भी कामयाब हो जाती है जो देश के जनमत के विपरीत हो। यदि विधायिका पूरी तरह से कार्यपालिका से पृथक हो तो सरकार पर अधिक प्रभावी ढंग से नियंत्रण में रखना उसके लिए संभव हो सकेगा।

जनता और जन-प्रतिनिधियों के बीच संवाद की जरूरत

जनता के पास अपने सांसदों के कार्य एवं आचरण पर निगरानी रखने और उन्हें अपनी समस्याओं एवं शिकायतों से अवगत कराने का एक कारगर मंच होना चाहिए। संसद की दर्शक दीर्घा में जनता के लिए बैठने का स्थान अत्यंत सीमित है और एक व्यक्ति को एक घंटे के लिए ही उसका पास मिलता है। सौ करोड़ से अधिक जनसंख्या वाले इस देश की अधिकतर जनता अपने प्रतिनिधियों को करीब से कार्य करते हुए नहीं देख पाती है, इसलिए उनके बारे में गुण-अवगुण के आधार पर राय नहीं बना पाती। हालांकि, पिछले वर्ष ही लोक सभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी की पहल पर संसदीय परिसर में लोक सभा टेलीविजन की स्थापना का एक सराहनीय प्रयास किया गया है, जो न केवल संसद की दर्शक दीर्घा के देशव्यापी टेली-एक्सटेंशन की तरह काम करता है, बल्कि संसद और जनता के बीच दोतरफा संवाद को भी बढ़ावा दे रहा है।

कार्यपालिका की भूमिका

कार्यपालिका जनता के प्रति अपने दायित्व से लगातार पीछे हटती जा रही है और वह निजीकरण और विदेश पूंजी के भरोसे उन्हें छोड़ देने की राह पर चल पड़ी है। वह जानबूझकर अपना काम लापरवाही और लेटलतीफी से करती है ताकि लोग उससे उम्मीद करने के बजाय निजी कंपनियों की सेवाओं पर भरोसा करने के लिए बाध्य हो जाएँ। हमारी सरकारें जनमत के बजाय अब निजी एवं विदेशी पूंजीपतियों के इशारे पर चलने लगी हैं। यदि सरकार अपने इस रवैये पर कायम रही तो जनता को आखिरकार सोचना पड़ेगा कि वह सरकार को टैक्स का भुगतान क्यों करे, जिसके बल पर मंत्रियों और नौकरशाहों को वेतन-भत्ते और तमाम सुविधाएँ मिलती हैं।

जनता में व्यापक जागरूकता, अनुशासन और उनकी संगठित सक्रियता से ही सच्चे लोकतंत्र का हमारा सपना साकार हो सकता है।

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20 Responses to लोकतंत्र नहीं है अभी भारत में

  1. आपका ब्‍लॉग बहुत पहले से पढ़ता रहा हूं…कल फेसबुक पर आपका लिंक मिला…

    बदलाव की मानसिकता रखने वालों के स्‍वार्थी हो जाने के अलावा एक समस्‍या ये भी है कि बदलाव की बयार लाने वालों के कुनबे में स्‍वार्थी लोग सबसे पहले जुड़ते हैं और इस प्रकार पूरी विचारधारा या अभियान पर सवाल खड़े करने वालों को मौका देते हैं और उसकी नैया डुबाने में भी महती भूमिका अदा करते हैं…अन्‍ना के बारे में मैं कुछ नहीं कहूंगा क्‍योंकि मैं ज्‍यादा जानता नहीं पर स्‍वामी रामदेव का स्‍वाभिमान मंच ऐसे लोगों का एक बहुत बड़ा जमावड़ा है..
    .
    फेसबुक और ट्विटर जैसे प्‍लेटफार्म आने के बाद लंबा लेख या ब्‍लॉग पढ़ने की लोगों की आदत में बदलाव आ गया है…अब एक या दो पंक्ति में लिखी बात ही लोगों को रुचती है…मेरे ख्‍याल से सरोकारों की कमी नहीं शायद आदत ही छूट गई है….राजनीति पर एकाध पंक्ति के चुटकुले या व्‍यंग्‍योक्तियों की भरमार है…गंभीर पढ़ने वाले अब भी हैं…

    और हां मनोरंजन से हमें भी कोई एलर्जी नहीं है…पर सब कुछ पढ़ लेते हैं सिवाय अपनी विद्वत्‍ता का आतंक जमाने वाले लेखकों के :)

  2. @ भुवनेश शर्मा

    1. यह लेख तो चार साल पहले लिखा था, आपकी नज़र अब गई।
    2. हमारे देश में जो लोग बदलाव की मानसिकता रखते हैं, या ऐसे लोग जो यथास्थितिवादी नहीं हैं और आगे बढ़ना चाहते हैं, वे कई कारणों से स्वार्थी भी हो गए हैं। तो अब वे सिर्फ इतना सोचते हैं कि मेरा भला कैसे हो। इसलिए वह सत्ता और पूंजी के अनुकूल आचरण करने लगे हैं, भले ही वह अनीतिपूर्ण हो।
    3. यदि सोच यह हो कि ‘सबके भले में मेरा भी भला शामिल है’ तो वास्तविक बदलाव आने में देर नहीं लगेगी।
    4. मैं आप-जैसे पाठकों के लिए ही ब्लॉगिंग करता हूं, उनके लिए नहीं जिनका मन हर घड़ी मनोरंजन की तलाश में ही बेचैन रहता है और सरोकारों के लिए जिनके पास न तो धैर्य होता है और न वक्त। आप भी ऐसे पाठकों की ज्यादा परवाह न करें। :)

  3. बहुत बढि़या लेख… एक अरसे बाद आपको पढ़ने का अवसर मिला
    मेरा मानना है कि सामंतवाद और व्‍यक्तिपूजा का कैंसर आजादी के बाद और अब भी बहुत तेजी से पांव पसार रहा है… नेहरू-गांधी परिवार की चर्चा ना भी करें तो भी मन से हम अभी भी सामंतवादी मानसिकता में जी रहे हैं..
    मैं कांग्रेस या बीजेपी की बात नहीं कर रहा पर सिंधिया परिवार के गढ़ से जो एक अदना सा आदमी उठकर प्रधानमंत्री पद तक पहुंचा वहां अब भी उसी परिवार की पूजा होती है, ये एक उदाहरण है…सामंतवाद ने लोकतंत्र का मुखौटाभर पहन लिया…व्‍यक्तिपूजा में हम आकंठ डूबे हुए हैं.

    आपसे पूरी तरह सहमत हूं कि हम भीड़ से ज्‍यादा कुछ नहीं जिनके अपने अलग-अलग हित हैं…दिग्‍गी के दस साल के कुशासन के बाद बीजेपी सत्‍ता में आती है या फिर सपा की गुंडागर्दी से त्रस्‍त जनता जब मायावती को पूर्ण बहुमत से चुनती है तो शुरूआत में ही लगता है कि चलो ये ठीक हुआ पर बाद में कमोबेश वही लूटपाट और अराजकता जो भारतीय सत्‍ताधीशों की पहचान है, देखने को मिलती है…

    मेरे चंबल क्षेत्र में जो अपराधों के लिए कुख्‍यात है अपराध दर इतनी नहीं खासकर मेरे शहर में तो अपराध दर एकदम नगण्‍य-सी है… कारण अपराधियों को सत्‍ता में रहकर लूटने के अवसर मिल गये तो छिछोरे अपराधों से तौबा कर ली है… और वही जनता मेहनत करके खून पसीना बहाकर जो कमा रही है उसको अनगिनत प्रकार के टैक्‍स लगाकर उस खजाने को खुल्‍लमखुल्‍ला लूटा जा रहा है…

    भारतीय जनमानस क्रांति जैसे विचारों को अपने हृदय में स्‍थान नहीं देता है और ना ही अन्‍याय करने पर विद्रोह पर उतारू होता है ऐसे में महंगाई के बढ़ते रहने पर वो चुपचाप किसी तरह अपनी रोटी के इंतजाम में लगा हुआ है और सुबह के अखबार के साथ कुछ मिनट सरकार को कोस लेता है…
    अवतारवादी में गहरी आस्‍था रखने वाले समाज में विद्रोह पनप ही नहीं सकता…उसे तो कंस और रावण का अत्‍याचार सहना ही है जब तक कोई मसीहा जन्‍म नहीं लेता…

    लेख और भी लंबा होता तो कोई समस्‍या नहीं थी…विषय पठनीय हो तो पूरी किताब भी पढ़ी जा सकती है…

    टिप्‍पणी ही इतनी लंबी हो गई कि पाठकगण इस पर भी आपत्ति ना करने लगें :)

  4. Bhagat Singh says:

    प्रिय मित्र,

    जब कभी आपको थोड़ा वक्त मिले तो ध्यान दीजिएगा कि किस तरह भारत स्वाभिमान पक्ष दिन-रात इस काम में लगा हुआ है कि हम अपने सपनों का भारत बना सकें। हम ऐसा भारत बनाना चाहते हैं जिसका सपना स्वतंत्रता संग्राम के हमारे सेनानियों ने कभी देखा था। उनकी आत्माएं आज भी मुझे चैन से नहीं सोने देती जब मैं देखता हूं किअंग्रेजों के बनाए हुए वही 34735 कानून आज भी लागू हैं। वही इंडियन पीनल कोड, वही इंडियन फोरेस्ट एक्ट, वही लैंड एक्विजिशन एक्ट…। मेरा दिल खून के आंसू रोता है जब मैं अपने सामने आज के नेताओं को भारत माता को लूटते हुए देखता हूं। हम सब कहते हैं कि ये नेता खराब हैं, …। ये नहीं हमारा सिस्टम खराब है। मैं कहता हूं इसे बदल डालो। हम पूरी व्यवस्था बदल देंगे।

    कसम है भगत सिंह के शरीर के किए गए एक-एक टुकड़े की।

    जय हिन्द, जय भारत।

  5. आपके लेख में भारतीय लोकतंत्र में सूचना के अधिकार की भूमिका को सुव्यवस्थित तरीके से दर्शाया गया है, जो भारतीय लोकतंत्र में व्याप्त नौकरशाही की प्रवृत्ति को समाप्त करने में कारगर सिद्ध होगा।

  6. @ अपराजित,

    आपने हिन्दी ब्लॉग जगत की नब्ज को सही पकड़ा। मैंने आपका ब्लॉग देखा। आपका लेखन अपनी समस्त दार्शनिकता के बावजूद ब्लॉग जगत के पाठकों की अपेक्षाओं के अनुकूल है, क्योंकि उसमें संक्षिप्तता के साथ-साथ रोचकता भी है।

  7. वोट डालने की ज़िम्मेदारी से बचने वाले समुदाय पर चिंतन शुरू भी न कर पाया था कि लेख की लंबाई और उबाऊपन की परेशानियों से भरे मासूम से दिखनेवाले कमेंट्स पर हैरान रह गया । उनकी मासूमियत पर भारत महादेश की सारी चिंताएँ निछावर कर देने को मन मचलने लगा।
    हिन्दी के मूर्धन्यों का यह अघो‍‍‍षित अध्यादेश भी अब ही समझ पड़ा कि हिन्दी (और बिला शक हिन्दी के ब्लागजगत में) में पठनीय होने की पहली शर्त चुटकुलों की तरह रोचक और संक्षिप्त लेखन है।

  8. एकदम सच कहा कि कार्यपालिका जानबूझकर अपना काम लापरवाही और लेटलतीफी से करती है ताकि लोग उससे उम्मीद करने के बजाय निजी कंपनियों की सेवाओं पर भरोसा करने के लिए बाध्य हो जाएं। वैसे औरों की तरह मैं भी इसी राय का हूं कि लेख को दो किस्तों में बांट कर पब्लिश करना चाहिए था।

  9. “इस देश में हैसियत, अहमियत और ताकत केवल उनके पास है जिन्हें कभी किसी कतार में नहीं लगना पड़ता, जिन्हें हर मनचाही चीज जरूरत से अधिक, उनकी मर्जी होते ही सहजता से मिल जाती है।”

    बहुत सशक्त विश्लेषण है आपका. लिखते रहें, बहुत लोग इस कारण इन विषयों पर सोचने को मजबूर हो जायेंगे.

    लेख की लम्बाई: सवाल बोरियत का नहीं पठनीयता का है. जाल पर 200 शब्द का लेख अधिक पठनीय होता है. अधिकतम 300 शब्द — शास्त्री जे सी फिलिप

    हिन्दीजगत की उन्नति के लिये यह जरूरी है कि हम
    हिन्दीभाषी लेखक एक दूसरे के प्रतियोगी बनने के
    बदले एक दूसरे को प्रोत्साहित करने वाले पूरक बनें

  10. जी हां, लेख लंबा हो गया। कभी-कभार ही लिखने बैठ पाता हूं तो सोचा कि उस समय मन में आ रही बातें एक बार में ही बयान कर डालूं।

    मैं मनोरंजन के लिए नहीं लिखता और न ही कोई भड़ास निकालनी होती है। आप साथियों की ऊब समझ में आने लायक है। यदि लेखन की शैली में रोचकता का पुट न हो तो स्वाभाविक रूप से ऐसा हो जाता है। कोशिश करूंगा कि इस तरह के मुद्दों पर भी रोचक शैली में बात रखी जाए।

    आपकी टिप्पणियों एवं सुझावों के लिए हार्दिक धन्यवाद।

  11. यथार्थ वर्णन किया है। यह तो रावण राज्य है, हर कहीं अशान्ति, अन्याय, अभाव, असदाचरण…. किन्तु समाधान क्या है?

  12. बहुत बढ़ीया लगा पढ़कर…

    सुनीता(शानू)

  13. बहुत अच्छा लेख लिखा है विस्तार से।

  14. SHUAIB says:

    बहुत दिनों बाद आपका पढा – दिल को छूलिया। बढिया अंदाज़े बयां है।

  15. बहुत ही सुन्दर आलेख, हाँ दो एक किस्तों में देते तो बेहतर था।

  16. Ramashankar Sharma says:

    वास्तव में पोस्ट काफी लंबी हो गई है. विषय गंभीर जरूर है लेकिन इतना लंबा होने से थोड़ा उबाऊ हो गया है. इसे दो-तीन हिस्सों में बांट देते तो बेहतर रहता. बहरहाल आज विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका तीनों अपनी जवाबदेही से कोसों दूर हो चुके हैं. रही बात चौथे स्तंभ की तो वह भी इसकी तैयारी में लगा है.

  17. शिल्पी जी
    आपकी पोस्ट बहुत लंबी है, इसलिए पूरी नहीं पढ़ पाया। लेकिन पहले एक दो पैरो से आपकी बात समझ में आ गई। देखिए, आम लोगों की अहमियत एक भीड़ से अधिक तभी बनेगी जब सारा सरकारी काम, शिक्षा आदि उनकी भाषा में होगा। तभी वो समझ पाएंगे कि हो क्या रहा है, तभी ऊपर बैठे लोगों को लगेगा कि नीचे वाले लोग भी समझते हैं कि हम क्या कर रहे हैं। हर राज्य में उनकी भाषा में काम होना चाहिए। जब तक हमारे यहाँ इन कामों के लिए केवल अंग्रेज़ी रहेगी तब तक अधिकतर लोगों की अहमियत ऐसी ही रहेगी और लोकतंत्र केवल नाम का ही होगा।

  18. paramjitbali says:

    बहुत ही बढिया लेख लिखा है…एक आम आदमी आज की राजनिति के कारण बहुत बेबस हो चुका है…।

  19. बहुत ही बढ़िया!!

  20. लोकतंत्र के सभी पहलुओं को खंगालता बहुत ही शानदार लेख।
    बहुत अच्छा लिखा आपने।

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