आख़िर क्यों बदला सरकार ने अपना दृष्टिकोण?

नेताजी पर लेख-शृंखला के मेरे पिछले लेख पर नीरज दीवान जी ने टिप्पणी करते हुए एक जिज्ञासा व्यक्त की थी:

मैं यह भी सोच रहा हूं कि सत्तारूढ़ सरकार की कौन-सी मजबूरियां है जो मुखर्जी आयोग की मांग पर इच्छित दस्तावेज मुहैया नहीं कर सकी। किंतु यह भी सत्य है कि आयोग की सिफ़ारिशें या जांच आज्ञापक नहीं होतीं. ये सरकारों का विवेक है कि उसे स्वीकारें या अस्वीकारें. इस बिंदु पर भविष्य में किस तरह की क़ानूनी कसरत की जा सकती है.. अगले लेख में प्रकाश डालें.

नीरज जी की इस टिप्पणी पर अनुज धर ने निम्न शब्दों में प्रति-टिप्पणी करते हुए संक्षेप में उनके सवाल का उत्तर देने का प्रयास किया था:

I also take this opportunity to make some small comment on what Neerajji has written:

It is true that Govt has the right to accept or reject any report. But when the matter at hand concerns the fate of a national hero, the rejection should not be arbitrary. You will find it interesting to note that, legally speaking, the Govt continued to hold as late as February 2005 that they did not believe in the Taipei crash theory. What led to this turnaround is a mystery.

नीरज द्वारा उठाया गया प्रश्न और अनुज द्वारा दिया गया उत्तर अत्यंत महत्वपूर्ण है। दरअसल, पिछले माह कोलकाता उच्च न्यायालय में मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट को सरकार द्वारा खारिज किए जाने के विरोध में जो जनहित याचिका दायर की गई है, उसमें भी यह मुद्दा उठाया गया है। मेरे अनुरोध पर अनुज जी ने अपने उत्तर को विस्तार से अब एक आलेख के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है।

अनुज धर हिन्दुस्तान टाइम्स द्वारा नेताजी की कथित मृत्यु के संबंध में भारत की आम जनता की तरफ से शुरू की गई जाँच के लिए विशेष रूप से तैनात पत्रकारों की टीम के सदस्य रहे थे। लेकिन कतिपय कारणों से किसी ठोस निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले ही हिन्दुस्तान टाइम्स द्वारा  उक्त जाँच से विमुख हो जाने के बाद अनुज ने व्यक्तिगत स्तर पर यह जाँच जारी रखी और कई वर्षों के अनवरत शोध से मिले तथ्यों को विस्तारपूर्वक और प्रामाणिक रूप से अपनी किताब Back from Dead: Inside the Subhas Bose Mystery  में दर्ज किया है। इस किताब का हिन्दी संस्करण शीघ्र प्रकाश्य है। उनके संबंध में सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि उनके व्यक्तिगत प्रयासों द्वारा ताईवान सरकार से हासिल किए गए दस्तावेजों से ही मुखर्जी आयोग को अपने निष्कर्षों पर पहुँचने में निर्णायक मदद मिली। ताईवान के राष्ट्रपति कार्यालय की वेबसाइट के निम्न स्क्रीनशॉट में अनुज धर द्वारा इस संबंध में किए गए ई-पत्र व्यवहार को देखा जा सकता है:

तो अब प्रस्तुत है, अनुज धर का आलेख -

दशकों तक नेताजी की मौत का मामला रहस्य की चादर में लिपटा रहा है। पहले जब इस विषय पर पर्याप्त सूचना उपलब्ध नहीं थी और भारत तथा विदेशों में इस मामले के समाधान के लिए अनुकूल माहौल भी नहीं था तो उस रहस्य के बरकरार रहने का औचित्य समझ में आ सकता था। लेकिन अब इस तरह की स्थिति नहीं है और हम अनुमानों और कल्पनाओं का सहारा लिए बगैर तथ्यों और सबूतों के आधार पर अब इस रहस्य पर से पर्दा हटा सकने में सक्षम हैं, जिसे अब तक बनाए रखने के लिए सरकार जिम्मेवार रही है।

इस आलेख में मैं इस विषय से जुड़े बुनियादी और कुछ हद तक कानूनी पहलू पर प्रकाश डालने का प्रयास करूँगा, जिसमें बहुत-से पाठकों की भी दिलचस्पी होगी। पृष्ठभूमि के लिए मैं याद दिलाना चाहूँगा कि सरकार ने मुखर्जी आयोग के इस निष्कर्ष को पिछले वर्ष खारिज कर दिया था कि ताईवान में एक विमान हादसे में नेताजी की कथित मृत्यु की ख़बर वास्तव में उनके गोपनीय ढंग से सोवियत संघ चले जाने की योजना को छिपाने के लिए जानबूझकर प्रचारित की गई थी।

यह प्रश्न विचारणीय है कि नेताजी की मृत्यु के संबंध में सरकार का दृष्टिकोण क्या रहा है? वर्ष 1997 में कोलकाता उच्च न्यायालय में इस मामले को अंतिम रूप से निपटाए जाने के लिए एक जनहित याचिका दायर की गई थी। मामले की सुनवाई के दौरान भारत सरकार की तरफ से पेश वकील ने विगत वर्षों में सरकार के पास मौजूद गोपनीय सूचनाओं के आधार पर जो बातें अदालत को बताईं उसी को ध्यान में रखते हुए अदालत ने अप्रैल 1998 में सरकार को इस मामले की जाँच के लिए एक नया आयोग गठित करने का आदेश दिया। अदालत के उस आदेश में सरकार के वकील के इस बयान का उल्लेख इस प्रकार किया गया है:

“प्रतिवादी (भारत सरकार) के विद्वान वकील ने न्यायालय को स्पष्ट आश्वासन दिया कि भारत सरकार का यह मानना रहा है और अब भी वह मानती है कि इस मामले में आगे और / नई जाँच किए जाने की आवश्यकता है और यह सूचना कि नेताजी की मृत्यु 18 अगस्त, 1945 को विमान दुर्घटना में हुई थी विसंगतियों, विरोधाभासों से भरी है और इसलिए अंतिम नहीं है।”

अर्थात् भारत सरकार उस समय नेताजी की ताइपेई में मृत्यु के बारे में आश्वस्त नहीं थी क्योंकि उसकी सत्यता के बारे में संदेह के कारण मौजूद थे। सरकार ने न्यायालय के आदेश पर विचार किया और उस पर विभिन्न लोगों से विचार-विमर्श करने के बाद 14 अप्रैल, 1999 को जो अधिसूचना जारी की उसके निम्न अंश पर गौर कीजिए:

और जबकि कलकत्ता उच्च न्यायालय ने भी भारत सरकार को विधि के अनुसार गहन रूप से जाँच करने, यदि जरूरत हो, तो एक जाँच आयोग का गठन करने के निदेश दिए जिससे कि इस विवाद को समाप्त किया जा सके;

और जबकि पश्चिम बंगाल विधान सभा द्वारा 24.12.1998 को एक संकल्प पारित किया गया जिसमें नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के पते-ठिकाने से संबंधित रहस्य को समाप्त करने के लिए इस मामले में नए सिरे से जाँच किए जाने की मांग की गई;

और जबकि केन्द्रीय सरकार का यह मत है कि सार्वजनिक महत्व के एक सुनिश्चित मामले, अर्थात् नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की 1945 में गुमशुदगी के बारे में एक गहन जांच किए जाने के प्रयोजन से एक जाँच आयोग का गठन किया जाना जरूरी है;

अत: अब जांच आयोग अधिनियम 1952 (1952 का 60) के खण्ड 3 के उपखंड (1) और (2) के द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए केन्द्रीय सरकार एतद्द्वारा भारत के सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री एम.के. मुखर्जी सहित एक जांच आयोग का गठन करती है।

इस अधिसूचना से साफ जाहिर है कि सरकार के पास नेताजी की मृत्यु के बारे में कोई असंदिग्ध जानकारी नहीं थी और इसीलिए उसका यह मत था कि आयोग का गठन किया जाना जरूरी था, जिसके लिए कोलकाता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश प्रभाशंकर मिश्रा ने आदेश दिया था।

उक्त अधिसूचना में उच्चतम न्यायालय के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति मनोज कुमार मुखर्जी की अध्यक्षता में गठित नए आयोग को जाँच के लिए दिए गए निम्न प्रश्नों से भी यह साफ जाहिर होता है कि सरकार के पास नेताजी की मृत्यु के संबंध में कोई निश्चयात्मक सूचना नहीं थी। यदि उसके पास ऐसी ठोस सूचना रही होती तो उसने आयोग द्वारा जाँच किए जाने हेतु इस तरह के प्रश्न तैयार नहीं किए होते:

(क) क्या सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु हो चुकी है या वे जीवित हैं;

(ख) यदि उनकी मृत्यु हो चुकी है तो क्या उनकी मृत्यु, जैसा कि कहा गया है, हवाई दुर्घटना में हुई थी;

(ग) क्या जापानी मंदिर में जो अस्थियाँ रखी हैं वे नेताजी की अस्थियाँ हैं;

गौरतलब है कि भारत सरकार का यह दृष्टिकोण सत्ता में किसी पार्टी विशेष के होने की वजह से नहीं था। जब कोलकाता उच्च न्यायालय में इस मामले पर सुनवाई चल रही थी जब केन्द्र में संयुक्त मोर्चा की सरकार थी। जब न्यायालय का फैसला आया तब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे और जब आयोग अपनी जाँच के अंतिम दौर में था तब डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बन चुके थे। और इस पूरी अवधि के दौरान सरकार का आधिकारिक दृष्टिकोण अपरिवर्तित रहा। चूँकि मुखर्जी आयोग की जाँच प्रक्रिया पर मेरी नजर लगातार बनी रही थी, इसलिए इस तथ्य को मैं दावे के साथ कह सकता हूँ।

जब मुखर्जी आयोग में विभिन्न पक्षों की दलीलों पर सुनवाई चल रही थी तो केन्द्रीय सरकार की पैरवी कर रहे वकील ने वर्ष 2005 के शुरु में आयोग को क्या कहा, आप जानते हैं? उसने ताइपेई विमान दुर्घटना की सत्यता के विरोध में दलीलें दी और सरकार को इस बात का श्रेय भी दिया कि उसी की वजह से आयोग सही तथ्यों को उजागर कर पाने में कामयाब रहा है। ये बयान आधिकारिक रूप से दर्ज हैं। आयोग के समक्ष जो साक्ष्य पेश किए गए उससे पता चला कि भारत सरकार सहित संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन और ताईवान की सरकारों को भी ताइपेई विमान दुर्घटना की सत्यता पर संदेह रहा है।

सरकार ने मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट के अध्ययन के लिए सात महीने से अधिक वक्त लिया। और उसके बाद उसने पलटी मारी और महज एक पंक्ति में आयोग की रिपोर्ट को खारिज कर दिया। बाद में, गृह मंत्री शिवराज पाटिल ने संसद में दावा किया कि नेताजी की मृत्यु ताईवान में विमान दुर्घटना में ही हुई थी।

पता नहीं, आप इन तथ्यों से क्या निष्कर्ष निकालेंगे! लेकिन मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार के लिए मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट को खारिज करने के अपने फैसले का न्यायालय में बचाव कर पाना मुमकिन नहीं हो सकेगा। मेरा मानना है कि सरकार की यह नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वह जनता को यह बताए कि सात महीने तक रिपोर्ट का अध्ययन करने के दौरान उसे ऐसा कौन-सा सुराग हाथ लगा जिसके आधार पर उसे नेताजी की कथित मृत्यु के बारे में कई वर्षों के अपने दृष्टिकोण को बदलने के लिए बाध्य होना पड़ा।

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10 Responses to आख़िर क्यों बदला सरकार ने अपना दृष्टिकोण?

  1. asit guin says:

    dear pankaj bengani,
    British ordered assassination of Netaji.
    Now facts are coming out that British ordered assassination of Netaji Subhas Bose after he escaped from house arrest in 1941 and left India to create first Indian National Army to fight the British imperialists. Eunan O”Halpin of Trinity College, Dublin, made the stunning revelation on Sunday evening while delivering the Sisir Kumar Bose lecture at the Netaji Research Bureau. A history professor, O”Halpin said the British Special Operation Executive’s plan to assassinate Bose, popularly known as “Netaji” (the leader), on his way to Germany was foiled as he changed his route and went via Russia. O”Halpin said he had handed over the classified documents backing this to Krishna Bose, a former MP and wife of Netaji’s nephew Sisir Bose who drove him out of Kolkata on the wintry night of Jan 17, 1941 in secrecy. Netaji’s relative Sugato Bose, a professor of history in the Harvard University, said he had already informed Prime Minister Manmohan Singh about the matter. “I met the prime minister on July 26 and informed him of the existence of the documents and told him that unveiling these documents would not affect bilateral ties with UK in any way. Netaji himself was not against the people of Britain but the imperial government,” said Bose. But who really killed the real Indian hero of independence? Netaji had unified Indians and Muslims in the Indian National Army that drove British Army to its knees and came up to Imphal, Manipur and raised India flags on India soil. The Taiwan plane crash where the world knows Netaji died was the biggest cover up. According to international think tanks, British were behind killing Netaji. British were eager to get rid of Netaji because with Netaji’s presence they could not have split India into India and Pakistan. British ruled India with the policy of divide and rule. Netaji did not like that unlike other Indian leaders like Nehru or Mahatma Gandhi. Some say, Netaji was handed over to Russians by the Japanese and Stalin ordered his execution. But now British archives are making it clear that British may have executed him in secret. This was an act of Anglo-Japan secrete pact. Because Japan is also involved, so they spread the lie on air crash. If that was the case, then it was in violation of international prisoner of war rules and norms. British gained a lot from Netaji’s disappearance forever. They could split India into India and Pakistan. They could make millions of Indians wage war against each other based on religion and make many more millions homeless. It was an ideal lesson taught to Indians by the British before British had diluted their empire in Asia. Netaji would have never tolerated this. And their lies the motivation for killing Netaji. O”Halpin said the British thought Netaji would travel to Germany from Afghanistan via Iran, Iraq and Turkey and informed representatives in Istanbul and Cairo to carry out the operation. “I think the British government should make public all the relevant documents about Netaji, since this issue is not going to affect ties between India and United Kingdom in any way now,” he said. The revelation comes at a time when the Mukherjee Commission probing the mysterious disappearance of Bose 60 years ago comes to the end of its inquiry. The panel, which has received several extensions and is to submit its report on Nov 14, will visit Russia in September to establish a trail of the leader’s alleged movements after August 1945 when he was supposed to have died in a plane crash in Taiwan.
    So Japan sold Netaji to British and British killed him.

  2. asit guin says:

    Japan agreed to eliminate Netaji;
    In WW-I, Japan was an ally of British. Before WW-II, Japan-US trade war and political war started, this led to actual war between US and Japan. So British became an enemy to Japan by diplomatic manipulation as US – British alliance was there. After WW-II, Japan revived their old connection with British via spies. Japanese and British spies were enough linked before WW-II. Japanese spies agreed to eliminate Netaji. Motive was to appease the British and purchase security for Japan royal family. Thus, Japan sold Netaji to British and British eliminated him. The false news of air crash was Japan’s fabrication. In any controversial case, liar is to be suspected first.
    Netaji’s plan to start second independence war with the help of USSR was known to Japan. There was enough scope for British and Japanese spies to develop a common minimum program against pro-communist agenda of Netaji. Why should Japanese imperialism agree to patronize emergence of independent India as a permanent communist ally? Is it not more logical to fulfill British condition and purchase favor? Why Japan royal family was not tried as a war criminal? What is the mystery behind this favor? Japan agreed to eliminate Netaji;
    In WW-I, Japan was an ally of British. Before WW-II, Japan-US trade war and political war started, this led to actual war between US and Japan. So British became an enemy to Japan by diplomatic manipulation as US – British alliance was there. After WW-II, Japan revived their old connection with British via spies. Japanese and British spies were enough linked before WW-II. Japanese spies agreed to eliminate Netaji. Motive was to appease the British and purchase security for Japan royal family. Thus, Japan sold Netaji to British and British eliminated him. The false news of air crash was Japan’s fabrication. In any controversial case, liar is to be suspected first.
    Netaji’s plan to start second independence war with the help of USSR was known to Japan. There was enough scope for British and Japanese spies to develop a common minimum program against pro-communist agenda of Netaji. Why should Japanese imperialism agree to patronize emergence of independent India as a permanent communist ally? Is it not more logical to fulfill British condition and purchase favor? Why Japan royal family was not tried as a war criminal? What is the mystery behind this favor?

  3. Anuj Dhar says:

    Thank you all for kind words. I’d like to draw the attention of all to this story:

    http://www.ibnlive.com/news/rti-to-help-track-netajis-ashes/35499-3.html

    अब यह तो सब जानते है कि नेताजी की मृत्यु वैसे नही हुई थी जैसे कि बताया जाता है, पर आखिर कैसे हुई थी? क्या राज है? क्या मेरे जीवन में मै जान पाउंगा?

    Pankaj ji

    I will write another article. We have but only two options. Whether or not the truth will be established in near future depends on media and political leaders. There have been similar cases abroad, but they were resolved by the people of those countries. I think 10 per cent of the interest shown in Jessica Lall case will suffice here.

    Regards

  4. pankaj bengani says:

    अनुजजी को उनके शोध एवं सृजनजी आपको इसे प्रस्तुत करने के लिए बहुत धन्यवाद और साधुवाद.

    अब यह तो सब जानते है कि नेताजी की मृत्यु वैसे नही हुई थी जैसे कि बताया जाता है, पर आखिर कैसे हुई थी? क्या राज है?

    क्या मेरे जीवन में मै जान पाउंगा?

  5. मैं भी मैथिली जी बात से सहमत हूँ, कि शायद सरकारों के लिये राष्ट्रनायक उनके अपने दल के ही होते हैं।
    इस जानकारी के लिये अनुज जी को और आपको धन्यवाद।

  6. @ अफ़लातून जी,

    किताब का अंग्रेजी संस्करण ऑनलाइन भी उपलब्ध है, जिसका लिंक ऊपर पोस्ट में दिया गया है। इसे मानस पब्लिकेशंस, दिल्ली ने प्रकाशित किया है। हिन्दी संस्करण की समीक्षा इस चिट्ठे पर शीघ्र ही करूंगा। अनुज के कहने पर हिन्दी संस्करण को प्रेस में भेजे जाने से पहले भाषागत दृष्टि से पुनरीक्षण के लिए मैं उसको पढ़ने वाला हूँ।

    आप सही कह रहे हैं, अभी भूमिका ही चल रही है। दरअसल, यह भूमिका बहुत जरूरी है और हम यही चाहते हैं कि जो सही तथ्य हैं वह आधिकारिक रूप से खुद सरकार ही जनता को बताए। इसलिए न्यायालय, सूचना का अधिकार और मीडिया के माध्यम से हम सरकार को इस मुद्दे पर जनता की अदालत के कठघरे में खड़ा करना चाहते हैं।

    यहाँ मैं एक बात स्पष्ट कर दूँ कि नेताजी से जुड़ा सच इसलिए भी जनता के समक्ष प्रकट नहीं हो सका क्योंकि स्वयं नेताजी अपने को सबके सामने नहीं लाना चाहते थे और उनके प्रति निष्ठावान रहे व्यक्तियों ने भी उनकी गोपनीयता की रक्षा करने की भरसक चेष्टा की। लेकिन नेताजी के बारे में गुप्तचर एजेंसियों के माध्यम से भारत सरकार के अलावा विश्व की कई अन्य सरकारों के पास जो गोपनीय जानकारी रही है, उसे जनता के समक्ष उजागर करने से बचने के पीछे आधुनिक राजनीतिक इतिहास की सबसे बड़ी साजिश है। 

    सरकार शपथपूर्वक यह स्वीकार कर चुकी है कि यदि नेताजी से जुड़ा सच जनता के समक्ष आ गया तो सारे देश में अराजकता फैल जाएगी और कई मित्र राष्ट्रों के साथ हमारे रिश्ते खराब हो जाएंगे। लेकिन भारत की 99.9 फीसदी जनता सरकार की इस राय से कतई सहमत नहीं होगी। आख़िर, नेताजी के संबंध में ऐसा कौन-सा सच हो सकता है, जो सरकार को इतना भयानक लगता है? सच से ऐसा क्या डरना! वह भी नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जैसे महानतम देशभक्त से जुड़े सच के बारे में! और यदि सच वह है जिसे सरकार उजागर करने में सरकार को भय हो रहा है तो फिर वह बार-बार इस झूठ की आड़ क्यों लेती है कि उनकी मौत 1945 में विमान हादसे में हो गई थी?

    जब तक भारत सरकार नेताजी से जुड़े वास्तविक तथ्यों के बारे में आधिकारिक रूप से श्वेत पत्र जारी नहीं करती, तब तक जनता की नजर में उसकी विश्वसनीयता हमेशा प्रश्नों के दायरे में रहेगी।

  7. अनुज धर की किताब के प्रकाशक,मूल्य आदि की सूचना भी यहाँ दीजिए । जनता की जाँच के तथ्य तो सामने आने चाहिए।अभी तो भूमिका ही चल रही है।प्रतीक्षा रहेगी।

  8. @ मैथिली जी,
    मेरे ‘अध्ययन’ के बारे में आपकी टिप्पणी के लिए धन्यवाद, लेकिन वह शायद मेरी पिछली पोस्ट में कही गई बातों के संदर्भ में है। यह आलेख मेरे पत्रकार मित्र अनुज धर का है। मैंने केवल उसकी भूमिका लिखी है और मूल रूप से अंग्रेजी में लिखे उनके लेख का हिन्दी भाषांतर किया है। 

    अनुज जी अपने इस लेख के संदर्भ में पाठकों की प्रतिक्रियाएँ जानने को उत्सुक हैं।

  9. maithily says:

    शायद सरकारों के लिये राष्ट्रनायक उनके अपने दल के ही होते हैं.
    सृजनशिल्पी जी, आपके गहन अध्ययन से मैं अभिभूत हूं.
    - मैथिली

  10. तथ्यपरक विश्लेषण।

    सरकारों का यह ढुलमुल रवैया जरूर दिलों में शुबह पैदा करता है, सरकारें अपने राष्ट्र नायकों के लिये इतनी ढुलमुल तो नहीं हो सकतीं।

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