गत दिसम्बर माह में मुझे ‘कवियों के कवि’ शमशेर बहादुर सिंह की कविताओं और उनपर लिखे गए आलोचनात्मक निबंधों का अवगाहन करने का अवसर मिला था और उसी क्रम में मैंने खुद भी उन पर एक आलोचनात्मक निबंध लिखा था। अपने चिट्ठाकार मित्र जयप्रकाश मानस जी के अनुरोध पर मैंने उसे ‘सृजन-गाथा’ में प्रकाशनार्थ भेज दिया था, जिसे उन्होंने अब पत्रिका के फरवरी, 2007 अंक में सहर्ष शामिल किया है।
सृजन गाथा पर मेरा उक्त निबंध मूल्यांकन स्तंभ के अंतर्गत शमशेरियत और हिन्दी कविता शीर्षक से उपलब्ध है, जिसमें शमशेर की कुछ प्रसिद्ध कविताओं के संदर्भ से उनकी यथार्थ काव्य-दृष्टि को समझने का प्रयास किया गया है।
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आह, तुम्हारे दाँतों से जो दूब के तिनकों की नोक
उस पिकनिक में चिपकी रह गई थी,
आज तक मेरी नींद में गड़ती है।
–मैने इसे पढ़ा है. आप इसे आलेख स्वरुप देकर लाये, बहुत साधुवाद. यूँ भी हम हमेशा आपकी लेखनी के कायल रहे हैं और इसी तरह आप लिखते रहें तो शायद हम भी कुछ बेहतर लेखन की ओर अग्रसर हो सकेंगे, अच्छा और गहरा पढ़कर. ढ़ेरों शुभकामनायें, साधुवाद और बधाई.