नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के बारे में जब भी मैं सोचता हूँ, मुझे महाभारत के महारथी कर्ण का स्मरण हो आता है। यदि महाभारत के कुछ अन्य महारथियों के रूपक का भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महानायकों के संदर्भ में प्रयोग करूँ तो मुझे महात्मा गाँधी, श्रीकृष्ण की और जवाहरलाल नेहरू, अर्जुन की भूमिका में दिखते हैं। उस रूपक में भगत सिंह की संगति कुछ हद तक मुझे एकलव्य के पात्र में मिलती है। इस रूपक से सीमित अर्थों में ही सही, लेकिन नेताजी, नेहरू, गाँधी और भगत सिंह की नियति और भूमिका के बारे में मेरा द्वंद्व काफी हद तक स्पष्ट हो जाता है। पिछले दिनों जब मैंने हिन्दी चिट्ठा जगत में गाँधी पर चली बहस के दौरान भगत सिंह, नेताजी, नेहरू और महात्मा गाँधी के आपसी रिश्तों के संबंध में कुछ बातें कही थीं, तब भी मेरे जेहन में यह रूपक कहीं न कहीं था। महापुरुषों के बीच इस तरह की तुलना से अनूप शुक्ला सहित कुछ अन्य साथी सहमत नहीं थे। अनूप शुक्ला ने चिट्ठा चर्चा करते समय यहाँ तक लिखा
शिल्पीजी के इन विचारों से यह लगता है कि गांधी-नेहरू राष्ट्रनायक न होकर एकता कपूर के सीरियल के कोई कलाकार थे जो तमाम दूसरे लोगों को अपने रास्ते से हटाने की जुगत में ही लगे रहे। गांधी-इरविन समझौते में गांधी के न अड़ने की बात कहकर वे पता नहीं क्या साबित करना चाहते हैं उस समय की परिस्थितियां क्या थीं यह हम केवल इतिहास के अध्ययन से जान सकते हैं।
मुझे नहीं मालूम कि अनूप जी ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का कितना और किस दृष्टि से अध्ययन किया है। जहाँ तक मेरी बात है, मैंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास और उसमें विशेषकर गाँधी, नेहरू, सुभाष और भगत सिंह की भूमिका का अध्ययन करने के लिए काफी समय लगाया है। इस विषय से संबंधित दर्जनों पुस्तकों और सैकड़ों दस्तावेजों के विशद अध्ययन के दौरान जो बातें मेरे सामने अधिक से अधिक स्पष्ट होती गई हैं, उनके आधार पर प्रसंगवश कुछ बातों का जिक्र मैंने कर दिया था। मेरा उक्त दृष्टिकोण मेरे स्वतंत्र अध्ययन पर आधारित है और ज्यों-ज्यों इस विषय पर मेरा अध्ययन बढ़ता गया है, मेरी धारणा प्रबल होती गई है।
पिछले कुछ अरसे से मेरे अध्ययन के केन्द्र में नेताजी रहे हैं। दस वर्ष पहले भी मैंने नेताजी पर कुछ अध्ययन किया था और आजाद हिन्द फौज में काम कर चुके कई स्वतंत्रता सेनानियों से जाकर मिला भी था। उसके आधार पर मैंने नेताजी के संबंध में एक लेख भी तैयार किया था, लेकिन किसी संपादक ने उसे छाप सकने का जोखिम उठाना मंजूर नहीं किया। इंटरनेट जैसे माध्यम उस वक्त मेरी पहुँच से बाहर थे और ब्लॉगिंग का तो तब आविष्कार भी नहीं हुआ था। लेकिन पिछले वर्ष जब मुझे नेताजी के कथित रूप से लापता हो जाने की जाँच पर जस्टिस मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट और उनके निष्कर्षों को पढ़ने का मौका मिला, तब मुझे एक बार नए सिरे से नेताजी से संबंधित ऐतिहासिक तथ्यों की तह में जाना जरूरी लगा। कनाट प्लेस में किताबों की कई छोटी-बड़ी दुकानों और दिल्ली के कुछ अच्छे पुस्तकालयों में उपलब्ध नेताजी से संबंधित किताबों को मैंने छान मारा। इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री को भी टटोला। इस क्रम में सबसे अधिक महत्वपूर्ण था अनुज धर की किताब बैक फ्रॉम डेड : इनसाइड दि सुभाष बोस मिस्ट्री के हाल ही में जारी दूसरे संस्करण का अध्ययन और उनसे कई दौर में हुई ऑनलाइन और टेलीफोन पर बातचीत। वह पिछले कई वर्षों से नेताजी से संबंधित तथ्यों के अध्ययन में जुटे रहे हैं और उनकी वेबसाइट मिशन नेताजी पर इस विषय से संबंधित काफी सामग्री उपलब्ध है। उन्होंने सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत नेताजी से संबंधित गोपनीय दस्तावेजों को हासिल करने के लिए हाल ही में एक अभियान भी शुरू किया है, जिसके अनुभवों को आप उनकी ही जुबानी यहाँ पढ़ सकते हैं। चूँकि ये बातें काफी संवेदनशील हैं इसलिए इसके बारे में तथ्यों एवं प्रमाणों के साथ ही विस्तार से उल्लेख करना उचित होगा।
आज नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का 110वाँ जन्म दिन है। उनके जन्म-दिन को हमलोग देशप्रेम दिवस के रूप में मनाते हैं। वह भारत माता के सबसे महान देशभक्त सपूत हैं। महात्मा गाँधी ने उनको देशभक्तों के देशभक्त की संज्ञा दी थी। सत्ता-लोलुप नेहरू और भारतीय लोकतंत्र के शाही परिवार के उत्तराधिकारियों की तमाम नापाक कोशिशों के बावजूद नेताजी के प्रति भारतीय जनमानस में आस्था और आदर का भाव लगातार बढ़ता ही गया है। ‘अर्जुन’ को भले ही ‘कृष्ण’ का सतत संरक्षण और आशीर्वाद मिला हो, लेकिन जनता के दिलों में ‘रश्मिरथी कर्ण’ का जो स्थान रहा है वह ‘अर्जुन’ को कभी नसीब नहीं हो पाएगा।
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मैं अब भी यही कह रहा हूं कि इन विचारों से यह लगता है कि गांधी-नेहरू राष्ट्रनायक न होकर एकता कपूर के सीरियल के कोई कलाकार थे जो तमाम दूसरे लोगों को अपने रास्ते से हटाने की जुगत में ही लगे रहे। और मैंने जो इतिहास के
अध्ययन की बात लिखी थी उसमें मेरी अज्ञानता छिपी थी और है भी। मैंने इन लोगों के बारे में जो पढ़ा वह एक आम आदमी की तरह पढ़ा। किसी विद्वान की तरह नहीं और मेरी सीमित जानकारी में ये सभी लोग आम आदमी से ऊपर मानसिकता के लोग थे। इनके बारे में यह सुनना कि ये लोग एक दूसरे को उठाने-गिराने में इस कदर लगे रहे, कम से कम मुझे यकीन नहीं होता। गांधी, नेहरू, सुभाष, भगतसिंह में महाभारत के पात्र खोजने का तरीका वह तरीका है जिसमें आप पहले कद तय कर लेते हैं और तब उसके लिये उपमा तलासते हैं। कर्ण अभिशप्त महारथी थे, कुंवारी कन्या की कोख से पैदा हुये थे उनके कौन से साम्य
थे सुभाषजी से? कम से कम आजादी की लड़ाई तक दोनों के दुश्मन साझा थे -वे अंग्रेज थे। जबकि कर्ण और दूसरे पांडव एक दूसरे के खिलाफ़ थे। बहरहाल, संभव है आपका विस्तार से सालों का किया अध्ययन इस बात का प्रमाण देता हो आपको लेकिन मेरा दिल इनमें से किसी महापुरुष को इतना घात-प्रतिघात में संलग्न होने की बात से सहमत नहीं हो पाता। नेहरू सत्ता लोलुप थे या नहीं यह भी व्यक्तिगत सोच की बातें हैं। जो शक्स पूरे १६ देश का नीतिनिर्धारक रहा और एकमात्र जननायक रहा उसके लिये, बावजूद तमाम उनकी गलतियों के, यह सोचना कि उसके सारे काम सत्तालोलुपता से संचालित थे , कम से कम मेरा मन ऐसा मानने के लिये तैयार नहीं होता।
आशा है कि आगे भविष्य में कुछ और ज्ञानभरी बाते पता चलेंगी जब आपके पास अपने सालों के अध्ययन को लिखने का पर्याप्त समय होगा!
नेताजी हमारे देश के महान सपूत थे। उनकी जन्मदिन पर उनको विनम्र होकर याद कर रहा हूं। आपकी पोस्ट इसका माध्यम बनी इसके लिये आपका आभार!
अनूप जी, क्या कर्ण इसलिए अभिशप्त थे कि कुंवारी कन्या के कोख से पैदा हुए थे? जब मुझे कर्ण की ट्रैजडी और नेताजी की ट्रैजडी में कुछ साम्यता दिखती है तो यह अत्यंत सकारात्मक और उदात्त अर्थ में है, उस घटिया अर्थ में नहीं जो आपको दिख गया!
सत्य के सूर्य को सत्तापरस्ती का बादल चाहे जितना ढँकने की चेष्टा करे, कभी न कभी वह बादल छँटता ही है और सत्य का प्रकाश धरती पर फैल जाता है। मुझे पूरी उम्मीद है कि आप जैसे ‘आम आदमी’ तक भी कभी-न-कभी यह प्रकाश जरूर पहुँचेगा।
महान सपूत नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को हार्दिक नमन।
नेताजी का जो स्थान हमारे मन में है वह हमेशा अमिट रहेगा उसे कोई गां…. जाने दीजिये कहीं फिर से बात निकल गयी तो दूर तक चली जायेगी।
नहीं यार, फिर टकराव!!
नेताजी को किसी अन्य को नीचा दिखाये बिना भी याद किया जा सकता है.
वे भारत के सपूत थे. हमारे लिए आदर्श हैं. जब-जब भारत को जुझारूपन की जरूरत होगी, नेताजी याद आएंगे.
नेताजी को नमन.
सृजन शिल्पी जी,
कर्ण के व्यक्तित्व का आकर्षण तो बहुत लाजमी है। लेकिन आप नेताजी के बारे में और लिखें, एक पाठक के नाते आपसे माँग है । यह जरूरी है कि उनकी बहादुरी से ज्यादा उनके सामयिक अन्तर्राष्ट्रीय घटनाक्रम के विश्लेषण की चर्चा हो ।
शिल्पीजी, कर्ण को कहा जाता है अभिशप्त महारथी यह मैंने लिखा। कुंवारी कन्या की कोख से जन्म लेने में उन सूर्यपुत्र का क्या दोष! मैंने यह कहने की कोशिश की थी कर्ण और नेताजी में साम्य दिखाये बिना भी नेताजी के बारे में लिखा जा सकता है। बहरहाल, आप जो ठीक समझें!
अनूप जी, अभिशप्त होने में कर्ण का कोई गुनाह कारण नहीं था, बल्कि उनको अभिशापित करने वालों की क्षुद्रता ही उसका कारण था। नेताजी के साथ जो कुछ हुआ, उसे कर्ण के उदाहरण से ही सबसे बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। जाहिर है कि यह मेरी दृष्टि है और आप इससे असहमत होने के लिए स्वतंत्र हैं। लेकिन मेरी बातों के वक्र अर्थ लगाएँगे तो स्वस्थ संवाद करने में दिक्कत होगी।
मैंने महात्मा गाँधी की तुलना श्रीकृष्ण से और जवाहरलाल नेहरू की तुलना अर्जुन से करके उनकी शान में ऐसी कोई गुस्ताखी नहीं कर दी, जैसा कि आप खुद उक्त तुलना के स्तर को गिराकर एकता कपूर के धारावाहिक के पात्रों से तुलना करके कर बैठे हैं! मुझे वाकई हैरानी होती है यह देखकर कि आपको कर्ण के चरित्र और नेताजी के चरित्र की साम्यता के उक्त संदर्भ में कर्ण के चरित्र में केवल यही दो विशेषता देखने को मिल सकी कि कर्ण अभिशप्त महारथी थे और कुँआरी माता की कोख से पैदा हुए थे। राष्ट्रकवि दिनकर का ‘रश्मिरथी’ लिखने का सारा प्रयोजन, लगता है, व्यर्थ ही गया!
खुशी भी हुई कि बात विवाद से हट कर स्वस्थ चर्चा तक आ गई, बहुत बहुत बधाई । उम्मीद है कि आप अफ़लातून जी की मांग को भी पूरा करेंगे क्यों कि कई लोग (मैं भी) अन्तराष्ट्रीय घटनाक्रम के विश्लेषण की चर्चा चाहते हैं।
सुभाष चन्द्र बोस और कर्ण ! तुलना अच्छी है । हाँ अनूप जी, कर्ण केवल कुँआरी माताओं के पुत्र ही नहीं होते । वे भी कर्ण होते हैं जिनकी महानता को नकारा जाता है, या कम करके आँका जाता है । जिन्हें किसी अर्जुन को बड़ा दिखाने के लिए थोड़ा कद काटकर दिखाया जाता है ।
सृजन जी, मैंने महाभारत के पात्रों को कई परिस्थियों में रखकर देखा है और जीवन में कई लोगों में उन पात्रों को पाया है। किन्तु इतनी सही तुलना कम ही देखी है ।
अनूप जी व उन जैसे अन्य बहुत से लोगों से मेरा अनुरोध है कि जीवन के या पुराणों के पात्र पूजा करने के लिए नहीं होते। उनके जीवन को हमें समझना होता है, हो सके तो उसपर विचार करना होता है, यदि हम इस योग्य हों कि कुछ सीख सकते हैं तो सीखना चाहिये । ये सब हमें जीवन का दर्शन सिखा सकते हैं । प्रकृति तक कभी-कभी सम्पूर्ण (perfect) नहीं होती, वह तक कुछ गल्तियाँ कर जाती है तो फिर हम मनुष्यों में सम्पूर्णता क्यों ढूँढ रहे हैं?
और जब कोई हमें इन महानायकों के जीवन का कोई अप्रिय या नागवार पहलू दिखाता है तो हम उस पर टूट पड़ते हैं। इतिहास इसलिए पढ़ा जाता है कि हम उससे कुछ सीखें। किसी को भी भगवान बना उसे एक चौकी पर चढ़ा उसे फूलमाला पहनाना ही सम्मान करना नहीं है, असली सम्मान तो तब है जब हम उनपर चर्चा करें, उनके जीवन के दर्शन को समझें, उन्हें भी मानव मान कुछ सीखें । वे मानव ही थे, हाँ, हमसे बेहतर और जीवन में कुछ कर गुजरने की लगन वाले मानव।
सृजन जी, इस विषय पर सोचने के लि॓ए एक नया पहलू देने के लिए धन्यवाद ।
नेता जी पर लिखे लेख की प्रतीक्षा है ।
मैं आपकी बात से पूरी तरह सहमत हूँ। कोई भी पूर्ण नहीं होता और शायद आपका उद्देश्य भी किसी का मानमर्दन करना नहीं है। लेकिन इतिहास का यथोचित अध्ययन बाध्य करता है कि हर नेता के सभी पहलुओं को समग्रता से परखा जाए। इस दृष्टि से आपकी पहल सराहनीय है। इस दिशा में आने वाले लेखों की प्रतीक्षा रहेगी।
लेख और उस पर बहस अच्छी है, बस थोड़ा व्यक्तिगत होने से बचेंगे तो इसमें बहुत कुछ सीखने को है। शिल्पी जी और अनूप जी, आप दोनो मेरे रेडियो कार्यक्रम में आएँ। इस विषय पर तो नहीं लेकिन हाँ चर्चा तो होगी ही और अच्छा भी लगेगा। मेरी टी आर पी बढ़ेगी सो अलग।
सृजन शिल्पी द्वारा की गई तुलना –सुभाष बाबू की पौराणिक चरित्र कर्ण से तुलना रोचक लगी .
इसके साथ ही दिनकर का सुप्रसिद्ध काव्य ‘रश्मिरथी’ और मराठी उपन्यासकार शिवाजी सावंत का कर्ण के चरित्र पर लिखा कालजयी उपन्यास ‘मृत्युंजय’ मन-मस्तिष्क में तैरने लगे . कैसा उदात्त चरित्र और उसका कितना उत्कृष्ट निरूपण . तुलना सर्वथा उपयुक्त है . प्रतिभा की अवमानना और अपमान के ऐसे अवसर मानव संस्कृति के इतिहास में विरल ही होते हैं, और जब होते हैं तो जनता की सामूहिक स्मृति — लोक-मानस — उन्हें शताब्दियों तक याद रखता है . और अपनी स्मृति कोशिकाओं में रची-बसी अनोखी न्याय तुला पर तौल कर ऐसा पोएटिक जस्टिस — काव्य न्याय — करता है कि उनकी लोकप्रियता की सीमा नहीं रहती . इतिहास का कोई भी सफ़लतम व्यक्ति उनकी लोकप्रियता के सामने बौना हो जाये , वे ऐसी किंवदंती बन जाते हैं . इस तरह ‘लोक स्मृति’ इतिहास द्वारा किये गये अन्याय को अपने ढंग से न्याय में परिवर्तित कर देती है.
सुभाष बाबू के साथ भी कुछ ऐसा ही अन्याय हुआ था. पर यहां अन्याय करने वाला ‘चिन्हित’ नहीं है. गांधी के व्यक्तित्व को देखते उन पर इस तरह के आरोप वैसे भी टिकते नहीं हैं . तो क्या उस ऐतिहासिक प्रक्रिया का कोई दोष था सुभाष बाबू के राजनैतिक फ़ैसले जिसके प्रतिरोध में खड़े पाये गये ? गांधी के विशाल व्यक्तित्व की छाया में बहुत से प्रतिभाशाली व्यक्तित्वों को वैसा खुला मंच नहीं मिला जैसा गांधी की अनुपस्थिति में मिल सकता था . पर क्या इसमें गांधी का कोई दोष है ? गांधी के राजनैतिक निर्णयों की समीक्षा करने पर हमें कहां-कहां भावनात्मक दबाव और परिस्थितिजन्य निरंकुशता के छींटे दिखाई देते हैं ? तत्कालीन राजनैतिक परिस्थितियों, सुभाष बाबू के तात्कालिक राजनैतिक अतिउत्साह और समय से पहले लिये गये निर्णयों के अलावा क्या सुभाष बाबू के साथ हुए अन्याय का कुछ दोष गांधी पर भी आता है?
सुभाष बाबू की मौत के रहस्य ने इस अध्ययन को और भी मुश्किल और चुनौतीपूर्ण बना दिया . सृजन शिल्पी अपने अध्ययन द्वारा इस गुत्थी को समझने का प्रयास करते और समस्या के मुख्य कारकों को चिन्हित करने का प्रयास करते दिखाई देते हैं . उनके निर्णयों से नाइत्तफ़ाकी रखते हुए भी इतना स्वीकार करने की बौद्धिक ईमानदारी तो हममें होनी ही चाहिये .
अनूप जी से वैचारिक सहमति रखते हुए भी और सबको ‘सन्मति दे भगवान‘ जैसे अच्छे हस्तक्षेप के बावजूद गांधी पर हुई बहस में उनका रुख प्रारम्भ से ही कुछ संदिग्ध सा लगता रहा है .
सृजन शिल्पी का विश्लेषण सही हो या न हो पर निराधार नहीं है . यह ऐसा धुआं नहीं है जिसके पीछे आग बिल्कुल भी न हो . इसे अनूप जी जैसे होशियार आदमी से बेहतर भला और कौन जानेगा .
पर इन्हीं अनूप जी को, गांधी के विरुद्ध बात-बात में गोडसे को उद्धृत करने वाले गोडसे-भक्त नाहर जी के यह विचार कि ‘देश का जितना नुकसान गांधीजी के सिद्धांतों और नेहरूजी की वजह से हुआ उतना किसी और वजह से नहीं हुआ’ न केवल विरोध के लायक नहीं लगे बल्कि ‘पठनीय’ लगे और प्रमेन्द्र का यह बयान कि ‘ देश को गांधियों के चंगुल से मुक्त कराना होगा’ (मानो गांधी कोई माफ़िया सरगना हों) उन्हें ‘ओजस्वी’ लगा . ऐसे में उनकी मुंह देखकर तिलक करने की प्रवृत्ति, उनकी चुनी हुई चुप्पी, यहां तक कि उनकी सधी हुई सदाशयी टिप्पणियां भी चिट्ठाकारों को सृजनशिल्पी के निष्कर्षों से ज्यादा ‘मायावी’ और ‘मायालोकीय’ प्रतीत होती हैं . सो वे माया-मोह से थोड़ा ऊपर उठेंगे ऐसी आशा रखना अन्यथा न होगा.
कई बार लगता है कि उनका अभिजात्य उन्हें अंतर्जालीय ‘चेंगडों’ से दो-दो हाथ करने से रोकता है . और सज्जनों को सीख देते समय वे सौरव गांगुली की तरह फ़ॉर्म में आ जाते हैं. इस मामले में वे बाबा तुलसीदास की परम्परा में हैं जो कहते हैं: ‘बंदउं संत असज्जन चरना’ . असज्जन की वंदना इसलिये कि दुष्ट आदमी दो मिनट में आपके अभिजात्य को छियाछार कर सकता है — उस अभिजात्य को जिसे आपने परत-दर-परत बरसों से बड़े जतन से अपने व्यक्तित्व पर चढाया है.
अनूप जी से करबद्ध अनुरोध है कृपया वे कुछ समय इस बात की समीक्षा के लिये भी निकालें कि सृजन शिल्पी द्वारा गांधी पर शुरु की गयी बौद्धिक बहस सागरचंद नाहर से होती हुई जब प्रमेन्द्र तक पहुंचती है तो वह किस कदर गंदली होती जाती है. गांधी और सुभाष दोनों का पक्ष इसी आत्म-समीक्षा में निहित है .
हे भगवान,
सुभाषबाबु यह सब पढते तो दुःखी ही होते। हम लोगों ने बेवजह दंगल किया हुआ है।
मेरे विचार से हमारे देश के सभी जननायद महान थे. उनके बीच किसी प्रकार की तुलना करना बेमानी होगा। क्योंकि सबकी मंजिल एक ही थी, बस रस्ते अलग अलग थे।
यह भी सच है कि हमारे कई नायकों के साथ घोर अन्याय भी हुआ है। पर इससे उनकी छवि पर कोई असर नहीं हुआ।
गान्धीजी राष्ट्रनेता थे, वो जिधर देखते देश भी उधर ही देखता। ऐसा करिश्मा और कोई नहीं कर पाया था। पर गान्धीजी में भी दुर्गुण थे। तो क्या हुआ, किसमें नहीं थे। मैने हमेशा कहा है कोई सर्वगुण सम्पन्न नहीं होता।
नेताजी जैसा जुझारूपन और सरदार जैसी हिम्मत भी किसी में नहीं थी।
टिप्पणीयों में कुछ लोग व्यक्तिवादी होकर अनर्गल लिख रहे हैं जो अशोभनीय है, ये पहले भी ऐसा करते आए हैं और लोग आपत्ति करते रहे हैं, पर इन पर कोई असर नहीं होता!!
प्रियंकर भाई साहब
आप उपाधियाँ बड़ी मजेदार देते हैं, आपकी दी हुई इस तीसरी उपाधि को सहर्ष स्वीकार करता हूँ। ( पहली असंस्कारी, दूसरी बेगानी शादी का अब्दुल्ला और तीसरी गोडसे भक्त”, चौथी का इन्तजार है। )
आप बड़े भाई हैं छोटों को कुछ देना आपका कर्तव्य है और जो आप मुझे यदा कदा देते रहते हैं बहुत अच्छा लगता है। इसी बहाने कम से कम यह लगता है कि आप मुझे अपना तो समझते हैं और इतने महान व्यक्ति के अपना समझने की वजह से मैं भी गौरवान्वित महसूस करता हूँ।
भई, तुलना तो बहुत इन्नोवेटिव दिखी।
हाँ चिट्ठाकारों मे लट्ठम-लट्ठा और चिल्लम चिल्ली बेवजह हो रही है। देखो भैया, अपन को ज्यादा पता वता है नहीं ( अब इ सब हमरे पैदा होने के पहले की बातें है ना)। लेकिन जहाँ तक हमने पढा है देश की आजादी में सभी का योगदान था, किसी का कम या ज्यादा। लेकिन हाँ पूछ सिर्फ़ उनकी हुई, जिनको कांग्रेस ने अपने पोस्टर बैनर मे रखा। कई लोगों के योगदान को लगभग नकार ही दिया गया, नेताजी उनमें से एक थे।
खबरदार जो अब कोई, एक दूसरे से पंगा लिया। नेताजी, बापू और नेहरू की आत्मा को कष्ट पहुँचेगा, वैसे ही देश की राजनैतिक दुर्दशा हुई पड़ी है, ऊपर से ब्लॉगर्स भी उस राह पर चलेंगे तो ये तीनों बेचारे दु:खी तो होंगे ही ना।
प्रियंकरजी,
कहा गया है न! जहां न जाये रवि
वहां जाये कवि! आपकी निगाह अद्भुत है! आप वंदनीय हैं जो सागर, प्रेमेन्द्र और शिल्पी तथा अन्य के ब्लाग पर की गयी सहज, बिना किसी योजना की टिप्पणियों में इतने मन्तव्य खोज लिये। मुझे आश्चर्य है कि अपने व्यक्तित्व की इन पहलुओं से अनजान कैसे रहा अब तक!
आप निश्चय ही दिव्य द्ष्टि सम्पन्न हैं जो आप यह जान सके कि मेरा अभिजात्य उन्हें अंतर्जालीय ‘चेंगडों’ से दो-दो हाथ करने से रोकता है और मेरे अन्दर मुंह देखकर तिलक करने की प्रवृत्ति
है तथा शायद इसीलिये मेरा अभिजात्य मुझे अंतर्जालीय ‘चेंगडों’ से दो-दो हाथ करने से रोकता है और मैं डरता हूं क्योंकि दुष्ट व्यक्ति मेरे अभिजात्य को छियाछार कर सकता है जिसे मैंने परत-दर-परत बरसों से बड़े जतन से अपने व्यक्तित्व पर चढाया है|
मुझे इन सब के बारे में कुछ नहीं कहना क्योंकि मुझे लगता है जिसको जितना अकल होती है उतनी बात करता है। आपकी समझ मेरे बारे में शायद मुझसे बेहतर है। मेरे व्यक्तित्व के तमाम अनजान पहलुओं मुझे परिचित कराने के लिये आपका आभार!
जय हिन्द (नेताजी को इससे बेहतर श्रद्धांजलि और क्या हो सकती है ?)
अब मेरी छोटी सी टिप्पणी-
क्या किसी की महानता दर्शाने के लिये किसी अन्य से तुलना जरूरी है ?
क्या बौद्धिक वाद-विवाद व्यक्तिगत आक्षेपों से बचकर स्वस्थ और शालीनता से नहीं किया जा सकता?
सृजन, आपके विचार हमेशा से बड़े रोचक और स्पष्ट होते हैं। आपके माद्दे के लेखकों की रचनाओं पर भविष्य में भी बहस होगी ही, अतः अनुरोध है कि सिंपथी के साथ ही एंपथी का भी प्रयोग करें।
हिन्दी ब्लॉगजगत में जिस बात का अभाव अखरता है वो है स्वस्थ चर्चा। जहाँ अपने विचारों से परे कोई विचार आया कि हम बिफर उठते हैं और फिर लड़ाई वैचारिक मंच से उतरकर व्यक्तिगत आक्षेपों के दंगल में उतर आती है। संयम और दूसरे के विचारों का सम्मान हम सभी को सीखना है। जैसे आपका दृष्टिकोण आपको प्रिय है वैसा दूसरे के साथ भी होता होगा यह मानना ज़रूरी है, बनिस्बत इसके कि विचार को ओछा बताकर हम सामने वाले को यह कहें कि तुम्हें ये राय रखने का हक़ ही नहीं है। इस पोस्ट के अलावा यहाँ केवल प्रियंकर की टिप्पणी समयोचित और सभ्य लगी।
वाह देबूदा!
आपकी भी नजर बहुत कमाल की है इस पेज की १६-१७ में से आपने सबसे सभ्य और समयोचित टिप्पणी ढूंढ ली। जिस टिप्प्णी में एक नहीं दो नहीं तीन व्यक्तियों पर व्यक्तिगत आरोप लगाये गये। अगर कोई गांधीजी के सिद्धान्तों से सहमत ना हो तो उसे गोडसे-भक्त की उपाधि दी गयी हो। वह टिप्प्णी आपको सबसे सभ्य लगी हो ऐसी दिव्य दृष्टि को मैं प्रणाम करता हूँ।
जब बात नेताजी की चल रही हो और महाशय गांधीजी की पुरानी बातों के गड़े मुर्दे उखाड़े, प्रमेन्द्र, सागर को कोसें और अनूप जी के बारे में अनर्गल लिखें यानि बात कीर्तन की हो और वे खलिहान की बातें करें यह टिप्प्णी आपको समयोचित लगती है तो एक बार फ़िर में आपकी दिव्य दृष्टि को प्रणाम करता हूँ।
इस पेज की सबसे श्रेष्ठ टिप्प्णी जो घुघुतिबासुति जी ने की है वह आपकी दिव्य दृष्टि से कैसे निकल गयी?
AB AAPKE SAMANE AATI HAI SARVESHAISHTH TIPPNI :
“NO COMMEENT”
ABHI EXAM CHAL RAHA HAI, 4 FABRUARY KE BAAD HATH SAAF KIYA JAYEGA.
सबसे आश्चर्यजनक टिप्पणी देबाशीष भाई की रही.
सृजनजी चाहे गाँधी पर लिखे या सुभाष पर विवाद हो ही जाता है. भाई सृजन क्या राज है?
और मियाँ, सब लठम-लठ हो रहे हैं, और आप शांति से तमाशा देख रहे हैं?!!
समयोचित और सभ्य टिप्पणी कर्ता को भी बधाई.
कमाल है दादा,
आपने ऐसी टिप्पणी की!
प्रियंकरजी की टिप्पणी आपको सबसे अच्छी लगी? आश्चर्य!!
ये आदमी इस हद तक व्यक्तिवादी हो जाते हैं कि इन्हे होश ही नही रहता कि किसको क्या कह रहे हैं।
@पंकज
प्रिय पंकज, अभी मेरे इतने बुरे दिन नहीं आए कि अनर्गल और अशोभनीय का अर्थ मुझे उस व्यक्ति से सीखना पड़े जिसकी भाषा का नमूना है कि फ़लाने से सबकी ‘फटती है’ . और इस अश्लीलता की ओर इंगित करने पर भी शुरुआती हिचकिचाहट के बाद बेशर्मी से दांत चिआरता हो .अत: भाषा की अपनी समझ का स्तर न ही प्रदर्शित करो तो अच्छा है .
और अभी अनूप जी के भी इतने बुरे दिन नही आए हैं कि उन्हें तुम्हारे जैसे ‘अबोध’ के समर्थन की जरूरत हो .
@ सागरचंद नाहर
प्रिय भाई नाहर जी,
कृपया एक बार पुन: अपने चिट्ठे पर जाएं और देखें कि एक सामान्य टिप्पणी को आप अपने साथ जोड़ रहे हैं और अपने को ‘असंस्कारी’ मान रहे हैं. हालांकि इसका अर्थ यह भी नहीं है कि मैं आपको संस्कारी होने का प्रमाणपत्र दे रहा हूं. उसकी कोई जरूरत भी नहीं बनती.
गांधी पर हो रही बहस में एकाधिक बार अपने समर्थन में गोडसे की लिंक देने वाले को क्या तो कहा जाए जरा बताइये ?
मैं महान नहीं हूं , सामान्य आदमी हूं पर आपसे स्नेह है इस बात का प्रत्याख्यान नहीं करूंगा . और
एक बार पुन: अनुरोध करूंगा कि कृपया अपने ‘आइकन्स’ के चुनाव में समझदारी बरतें.
पंकज, संजय, सागरः मुझे और कुछ लिखने की ज़रूरत नहीं क्योंकि यह पहले ही लिख चुका हूं।
@ अनूप शुक्ला
प्रिय भाई अनूप जी,
हमारी भी जय-जय, तुम्हारी भी जय-जय का नज़रिया औसतन ठीक होगा पर गंभीर मुद्दों को जो लोग ‘तुच्छ और छिछले’ स्तर पर ले आते हैं उनका कड़ा से कड़ा विरोध होना चाहिये ऐसा मेरा मानना है, शायद आप भी सहमत हों .
कवि हूं कि नहीं यह तो भविष्य बताएगा पर नज़र जरूर है भगवान की दी हुई .
अगर व्यंग्य में वंदनीय लिखा हो तो आपका व्यंग्य सर-माथे,
और खुदा-न-खास्ता कहीं सच में लिखा हो और सगुणोपासक हों तो लिखियेगा तस्वीर भेज दूंगा. वंदना में सुविधा होगी.
गांधी के प्रति अपमान और हिकारत से भरी किसी भी पोस्ट पर आप जैसा प्रबुद्ध व्यक्ति यूं ही सहज और मंतव्यरहित कैसे हो सकता है यह मेरी समझ के बाहर है. यही नहीं बल्कि वह उसे ‘पठनीय’ और ‘ओजस्वी’ के विशेषण से नवाज़ कर प्रोत्साहित भी करता है. आपकी ऐसी टिप्पणियां आपकी पोस्ट ‘सबको सन्मति दे भगवान’ को मुँह चिढाती हैं. ऐसा विभाजित व्यक्तित्व क्यों ? आप कोई पंकज बेंगानी थोड़े ही हैं जिनकी कच्ची कौड़ी है .
आपसे झूठ नहीं बोलूंगा , मेरे पास दिव्य-दृष्टि बिल्कुल नहीं है पर दृष्टि जरूर है. वही आंख — वही दृष्टि — जो व्यक्ति के लेखन-प्रतिमानों को बार-बार परख कर बहुत से पारभासी तथ्यों को कई बार पारदर्शी बना देती है.
पर यह अन्तत: होता पर्यवेक्षण ही है. इसीलिये मैंने आप पर टिप्पणी करते हुए भी लिखा है ‘प्रतीत होता है’ तथा यह भी कि ‘कई बार लगता है’. यानी आपके हस्तक्षेप की और प्रतिवाद की गुंजाइश थी . पर आप तो लगता है इसका सत्यापन कर रहे हैं. आप जैसे खिलंदड़े इन्सान को इतना विचलित होते देखना अज़ीब-सा लग रहा है. थोड़ा दुख भी हो रहा है .
‘जिसको जितनी अकल होती है वो उतनी बात करता है’, आपकी इस बात से मेरी पूरी, उभयपक्षीय और बिलाशर्त सहमति है .
चलते-चलते एक बात और कहूंगा, चेले मूड़ना आसान है, उनके किये पर आंख मींच लेना और भी आसान, पर उन पर काबू रखना जरा मुश्किल है .
आप तो ‘राग दरबारी’ के अनन्य उपासक हैं कहीं ऐसा न हो कि ‘छोटे पहलवानों’ का दल पंचायत को मखौल बना दे . सो सावधान रहने की और सावधान करते रहने जरूरत है .
प्रिय भाई देबाशीष,
मेरी जिस टिप्पणी में अशोभन के दर्शन किये गये उसमें आप को कुछ ‘समयोचित और सभ्य’ जान पड़ा यह पढ़ कर थोड़ी तसल्ली हुई.
जो लोग गांधी जैसे इतिहास-पुरुष पर असहमति के नाम पर कुत्सित वार कर रहे थे — उनकी नीयत और सदाशयता पर ही शक कर रहे थे– वे ही लोग मेरे अपने समकालीन,लगभग समवयसी और समझ की लगभग एक जैसी तरंग-दैर्घ्य पर खड़े मेरे एक मित्र चिट्ठाकार अनूप शुक्ला पर की गयी मेरी टिप्पणी के पार्श्व-संगीत पर भरतनाट्यम कर रहे हैं. आदमी की सोच में इतनी फ़ांक हो तो काहे का मुद्दा और कैसी बहस .
@संजय बेंगानी
प्रिय भाई संजय जी,
बधाई हेतु धन्यवाद! (भले ही वह लेफ़्टहैण्डेड कॉम्प्लीमेंट क्यों न हो)
आपसे पूरी तरह सहमत हूं कि अब सृजनशिल्पी महोदय को हस्तक्षेप करना चाहिये और यह भी बताना चाहिये कि उनकी पोस्टों पर ही होने वाले विवादों के पीछे क्या राज है ?
इस बहस को मैंने ‘नेताजी बनाम नेहरू’ पर केन्द्रित करना चाहा था। दरअसल, जो बात मैं आगे कहने वाला हूँ, इस पोस्ट में उसकी केवल भूमिका भर बाँधी थी। मैंने अपने इस लेख में पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि नेताजी बनाम नेहरू के संदर्भ में जो बातें आने वाले समय में मैं रखने वाला हूँ वह कुछ लोगों को विस्फोटक लग सकती हैं, इसलिए तथ्यों और प्रमाणों के सहारे ही उन्हें रखना उचित होगा। सत्य की प्रकृति ही कुछ ऐसी होती है कि वह बेहोश लोगों को झकझोर कर रख देती है और भ्रांत एवं एकांगी धारणाओं से निर्मित दृष्टिकोण को चकनाचूर कर देती है। नेताजी बनाम नेहरू की उक्त तुलना पर उठे आपत्तियों के स्वर की तीव्रता से ही यह जाहिर होता है कि तीर निशाने पर लगा है और कुछ न कुछ ऐसा अशिव जरूर है जो इस सत्य से आहत हुआ है। फिल्म ‘गुरु’ में इस आशय का एक संवाद आता है कि जब लोग तुम्हारा विरोध करने लगें तो समझो कि तुम सही रास्ते पर आगे बढ़ रहे हो।
लेकिन हिन्दी चिट्ठा जगत में अक्सर ऐसा होता है कि बहस के समय साथी लोग मूल मुद्दे से हटकर गैर-प्रासंगिक बातों में उलझ जाते हैं।
नेताजी से जुड़े सच के प्रकाश में आने के दूरगामी प्रभावों से कांग्रेस एवं कुछ अन्य राजनीतिक दलों, भारतीय लोकतंत्र के शाही घराने, सत्ता, सरकार और नौकरशाही की घबराहट का कारण तो मुझे समझ में आता है, लेकिन अपने को आम आदमी कहने वालों को इससे इतनी दिक्कत क्यों है, यह मेरी समझ से बाहर है। क्यों लोग महात्मा गाँधी, नेताजी, भगत सिंह और नेहरू जैसे इतिहास-नियंता महापुरुषों को देव प्रतिमाओं की तरह बस पूजना चाहते हैं लेकिन इतिहास और सत्य के असुविधाजनक किंतु जरूरी सवालों की कसौटी पर उन्हें परखे जाते देखना गवारा नहीं करते, यह मैं नहीं समझ पाता। महापुरुषों के प्रति इन लोगों की विचित्र-सी असहिष्णु समदृष्टि मुझे हैरान करती है। सभी सही हैं, सबको साथ में लेकर चलो- इस सुविधावादी मानसिकता के लोग किसी अजनबी हकीकत को इतनी हिकारत की दृष्टि से क्यों देखते हैं, यह वाकई मुझे समझ में नहीं आता।
लपेटे रहो प्रियंकर भाई,
एक साथ मुझे, सागर भाई, अनूप जी, पंकज जी, सहित कइयो को लपेट लिया है, यह संख्या कब तक ५६ पहुँच रही है?
शायद यहाँ टिप्पणी न करता अगर आज चिट्ठा चर्चा पर आपके द्वारा अपने नाम को चमकते हुये न देखा होता। खैर बदनाम करोगे तो क्या नाम न होगा!
एक बात और जितने बड़े गान्धी है उससे भी बड़ी उनके विवादों की चर्चा है, जो मुझे आशा ही नहीं विश्वास है कि निरन्तर जारी रहेगी। और देश का युवा वर्ग अपने प्रश्नों की खोज करता रहेगा! जहाँ भी गान्धी जैसे थे उनको पूजा और कोसा जाता रहेगा!
वैचारिक तालिबानिता से बेहतर है सबको साथ लेकर चलने का लोकतंत्र।
आपके लेखन को मैने हमेशा एक ‘फिलासफर ‘ के विचारों के रूप मे ही पढा और मुझे पसन्द भी है क्यूँ कि मेरी सोच को नया आयाम मिलता है. टिप्पणी करने मे हमेशा हिचकिचाहट रही..नेताजी के बारे मे और भी जरूर पढना चाहती हूँ.
प्रियंकर भाईसाहब,
आप सार्वजनिक जगहों पर मेरा नाम लेकर अनाप शनाप लिखना बन्द कर दें तो बडी कृपा होगी।
वैसे भी आपके श्रीमुख से ‘तुच्छ और छिछले’ लोगों का वर्णन शोभा नहीं देता.
सादर आभार।
अच्छा होता प्रियंकर अपने विचार मात्र सुभाष पर केन्द्रित रखते, पर हमेशा की तरह वे फिर व्यक्तिगत प्रहारों पर उतर आए.
पंकज या सागर को किसी के सर्टीफिकेट की आवश्यक्ता नहीं है कि वे कच्ची या पक्की कौड़ी हैं. वे क्या हैं, उनके कार्य बोलते हैं, शब्दों की आवश्यक्ता नहीं.
अब अनूपजी को जो चेले मुड़ने की बात आपने कही है, अगर उसका इशारा मेरी तरफ भी है तो बता देना चाहता हूँ कि आज तक मैंने मात्र नेतृत्व ही किया है, स्वीकारा नहीं है.
मेरे कोई गुरू और आदर्श नहीं हैं. मैं अपने से ज्यादा ज्ञानियों की इज्जत जरूर करता हूँ.
भारी-भरकम शब्दों का प्रयोग तो मुझे आता नहीं. गाँधी कोई भगवान नहीं कि उनपर कोई उँगली ही ना उठा सके. और हाँ मैं सावरकर, शिवाजी वगैरह की विचारधारा को पसन्द करता हूँ, बिना संकोच कहता हूँ, गोडसे से भी नफरत नहीं करता. हाँ देश की सेवा के लिए शायद आपसे ज्यादा गाँधीजी का सम्मान करता हूँ.
कभी कभी ये बात कह कर भी बात को खत्म किया जा सकता है :
‘हम सहमत हैं कि हम असहमत हैं”
विवाद अच्छा रहा , कई नई नई बातें जानने को मिलीं लेकिन कोई मानें या न मानें अब यह चर्चा ‘व्यक्तिगत’ होती जा रही है और इसे बस यहीं समाप्त कर देना बेहतर होगा ।
गांधी या सुभाष में से कौन ज्यादा महान था , इस के निर्णय से अधिक महत्वपूर्ण है ‘हिन्दी चिट्ठा जगत’ में लिखनें वालों का आपसी सौहाद्र, प्रेम और एक दूसरे के प्रति अच्छी भावना ।
क्यों कि मैं अब तक इस चर्चा में शामिल नहीं था , इसलिये –
May I have the Last Word please ?
[...] पिछले दिनों शिल्पीजी ने सुभाष जयन्ती के अवसर पर नेताजी को याद करते हुये एक लेख लिखा। उस लेख में उन्होंने हमारी एक पुरानी टिप्पणी का उल्लेख करते हुये नेताजी की तुलना महाभारत के कर्ण से की। हमने ‘मर्द की जबान एक होती है’ का सबूत देने के चक्कर में अपनी पुरानी टिप्पणी का समर्थन किया और यह बताया कि हां, हम अब भी यही मानते हैं कि हमारे महापुरूष इसने खराब नहीं थे कि आपस में एक-दूसरे के खिलाफ़ साजिश रचते रहें। [...]
मुझे यह टिप्पणियां पढते हुए बहुत दु:ख हो रहा है। जो लोग इसे स्वस्थ चर्चा मान रहे है, वो जरा अपने ब्लॉग पर स्वस्थ और अस्वस्थ चर्चा मे मापदण्ड लिखकर बताएंगे क्या?
इतने ज़हीन लोग और ऐसी स्तरहीन चर्चा? व्यक्तिगत टिप्पणी करना किसी भी पढे लिखे व्यक्ति को शोभा नही देता, जो ऐसा करते है, वे जीवन मे कभी भी स्वस्थ चर्चा के लायक नही है। ज्यादा कहकर मै किसी और बवाल को बढावा नही देता, बस इतना कहूंगा कि सृजन-शिल्पी जी, जो इस ब्लॉग के आयोजक है, वे इस पोस्ट पर टिप्पणी यथाशीघ्र बन्द करें।
गजब चर्चा है भाई। हमने भी अपने नाम का उल्लेख देख कर यह पूरी चर्चा पढ़ी। हमारे सृजन शिल्पी जी से दो आग्रह हैं। पहला नेताजी से संबद्ध लेख जल्द प्रकाशित करें, दूसरा सबसे जबरदस्त आग्रह। यह विस्तार से बतायें कि “अशिव” क्या होता है?
अतुल जी, आप शिव को जानने में मन लगाएँ, अशिव के बारे में जानकर क्या करेंगे, वह भी विस्तार से? जैसा कि सत्यम् शिवम् सुन्दरम् के परम सूत्र में कहा गया है, सत्य ही शिव है अर्थात् जहां सत्य है वहीं शिव है। जो मन सत्य के प्रति जिज्ञासु नहीं होता और असत्य के मलिन परदे से ढँका रहता है, उसमें अशिव का वास होता है, अर्थात् वहाँ शिवत्व का अभाव हो जाता है। ऐसा अशिव मन जब कभी सत्य से टकराता है तो उसे आघात लगता है। आशा है, आप मेरे उक्त कथन में इस शब्द के प्रयोग का तात्पर्य समझ गए होंगे।
नेताजी पर लेखों की श्रृंखला शीघ्र शुरू की जाएगी। दरअसल, जनता की अदालत में यह मामला पूरी तरह लाने से पहले अभी कुछ जरूरी प्रमाण एकत्र किए जाने हैं। केन्द्रीय सूचना आयोग के पास इस मामले में सरकार के खिलाफ अपील लंबित है और उच्चतम न्यायालय में जाने की तैयारी भी चल रही है।
फिलहाल पाठकों से मेरी गुजारिश है कि मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट सहित मेरे लेख में दिए गए सारे लिंक्स पर उपलब्ध जानकारी को देख लें।
आप बहुत तथ्यपरक ढंग से बात समझाते हैं। अशिव का अर्थ बताने को धन्यवाद। कहीं रजनीश के कैसेट मे सुना था , बच्चा हर वह काम करता है जो उसे मना किया जाता है क्योंकि वह नास्तिक होता है। जब तक नास्तिक बन कर सारा असत्य नही समझा जायेगा तो सत्य की महत्ता कैसे समझ आयेगी? इसीलिये “अशिव” का अर्थ जानना जरूरी था।
[...] नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के जन्म दिन पर प्रकाशित मेरे लेख पर पाठकों की व्यापक प्रतिक्रियाएँ आई थीं। आपमें से कई पाठकों ने मुझसे नेताजी से जुड़े तथ्यों के बारे में विस्तार से लिखने का आग्रह किया था। लेकिन विषय अत्यंत संवेदनशील होने के कारण मैं जरूरी प्रमाणों के उपलब्ध होने का इंतजार कर रहा था। नेताजी के कथित रूप से लापता हो जाने से संबंधित अधिकांश आधिकारिक दस्तावेजों को सरकार ने अब तक अति गोपनीय श्रेणी में रखा है। यहाँ तक कि कोलकाता उच्च न्यायालय के आदेश पर उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस मनोज मुखर्जी की अध्यक्षता में गठित जाँच आयोग को भी सरकार ने बारंबार अनुरोध किए जाने के बावजूद इस मामले से संबंधित कई दस्तावेज नहीं उपलब्ध कराए और जाँच में अपेक्षित सहयोग भी नहीं दिया। मुखर्जी आयोग ने अपनी रिपोर्ट में सरकार के इस रवैये के बारे में विस्तार से लिखा है। इसके बावजूद मुखर्जी आयोग ने अपने काम को बखूबी अंजाम दिया और जाँच के पाँच प्रमुख बिन्दुओं पर 8 नवम्बर, 2005 को पेश अपनी रिपोर्ट में निम्नानुसार ठोस निष्कर्ष दिए: (क) क्या सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु हो चुकी है या वे जीवित हैं? [...]
अनूप भार्गव जी के ‘अंतिम शब्द’ के बाद भी टिप्पणियां आ ही रहीं हैं और अलग से भी पोस्ट लिखे ही जा रहे हैं. 26 जनवरी की शाम से 09 फ़रवरी की दोपहर तक शहर से बाहर था . सागर भाई को उनके मेल के संक्षिप्त जबाब में सूचित करके गया था . आज ही लौटा हूं .
मूल बातों को दरकिनार कर बेवजह शहीदी बाना धारण किया जा रहा है और जिनका जिक्र कहीं हाशिये पर था या नहीं भी था, उनका नाम बड़ी होशियारी से कई-कई बार लेकर ‘हुसकाया’ जा रहा है . शिवपालगंज के वैद जी का पूरा हुनर दिख रहा है . पता नहीं मुझे हस्तक्षेप करना चाहिये कि नहीं .
सारे लोग राजनीती करने वाले ही थे । गांधीजी, भगतसिंग वैसे नही थे..पर बाकि सब सत्तालोलुप थे ।
वस्तुत: १९३५ के गवर्नमेंट ऒफ़ इंडीया एक्ट के तहत भारत के राज्यों को स्वतंत्रता मिल चुकी थी. वहा १९३७ से लोकनियुक्त सरकारें थी. कॊन्ग्रेस पार्टी में दो गुट थे. एक गुट था समाजवादीयोंका (नेहरु, सुभाष ) और दुसरा था गांधीवादियोंका (पटेल, क्रिपलानी इत्यादी).
समाजवादी गुट के सुभाष सर्वोच्च नेता थे. पर गांधीवादी गुट ने षडयंत्र कि तहत उन्हे कॊन्ग्रेस से निकाल बाहर किया. तब जो समाजवादीयों का नेत्रुत्व कांग्रेस मे अपने आप नेहरु के पास आ गया. १९३७ के चुनाव से समाजवादी और ताकदवर हो गये.
सत्ता समाजवादींयो को मिलना तय था. अब असली लडाइ थी दोस्तो में. नेहरु और बोस में.
बोस महायुद्ध का फ़ायदा उठा के ने जापान और जर्मनी से मदद ली, तो नेहरु ने कहा की ’मुझे तलवार दो, मै खुद जाके सुभाष से लडुंगा’.
बोस को सिर्फ़ गांधी ने समर्थन दिया जब सुभाष सेना लेके आये. क्युंकी वह राजनीती से परें थे.
उसी वक्त जीना ने भी अपना सत्ता में हिस्सा मांगना चालु किया. १९३७ के चुनाव के पराभव का नतिजा था कि १९४० में उन्होने पाकिस्तान के अलग करने कि मांग की.
पाकिस्तान अलग देके नेहरु को भारत पे कब्जा मिल गया…सुभाष को तो रास्तेंसे हटाया गया था.
Swatantra Ambar me JO Ravi Ka prakash hai.
Wo Bharti Prabhawati Ka Sut Subhash Hai