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(पिछली प्रविष्टि से आगे)….

पूर्वोत्तर में इतने बड़े पैमाने पर आई.एस.आई. की गहरी घुसपैठ से भारतीय गुप्तचर तंत्र की विफलता ही जाहिर होती है। एक तो विभिन्न गुप्तचर एजेंसियों के बीच आपसी समन्वय का अभाव दिखता है और दूसरे, गुप्तचर सूचनाओं के आधार पर आतंकवादी वारदातों को रोकने के लिए समय से कार्रवाई होने में चूक होती है। यह बात छिपी नहीं है कि हमारी गुप्तचर एजेंसियों में भी भ्रष्टाचार ने जड़ें जमा ली हैं। काउंटर इंटेलीजेंस के नाम पर मिलने वाले सीक्रेट फंड का दुरुपयोग बड़े पैमाने पर होता है और उस धनराशि का कोई ऑडिट नहीं होने के कारण उसका बड़ा हिस्सा इंटेलीजेंस गतिविधियों में लगने की बजाय अधिकारियों की जेब में चला जाता है। ऐसी ख़बरें भी आई हैं कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी सी.आई.ए. ने भी पूर्वोत्तर में बहुत गोपनीय तरीके से अपना जाल फैला लिया है। पूर्वोत्तर के उग्रवादी नेताओं को पश्चिमी देशों में शरण और अंतर्राष्ट्रीय समर्थन दिलाने में सी.आई.ए. की भूमिका होने का संदेह है। इस कार्य में पूर्वोत्तर में काम कर रहे विदेशी चर्चों और मानवाधिकार संगठनों तथा कुछ बुद्धिजीवियों का परोक्ष समर्थन भी उसे मिला है। उधर चीन की गृद्ध-दृष्टि तो पूर्वोत्तर के राज्यों पर लगी ही हुई है।

लेकिन हमारी सरकार की सतर्कता और तैयारी का आलम यह है कि पूर्वोत्तर के राज्यों तक पहुँचने के लिए परिवहन सुविधाओं का समुचित विकास भी नहीं किया गया है। सरकार को यह समझना चाहिए कि परिवहन सुविधा की जरूरत केवल सैन्य उद्देश्यों के लिए ही नहीं, बल्कि आर्थिक विकास के लिए भी है। पूर्वोत्तर के कुछ इलाके तो ऐसे हैं जहाँ आम लोगों को पहुँचने में अब भी एक-दो सप्ताह तक लग जाते हैं।

केन्द्र सरकार ने निस्संदेह पिछले कुछ वर्षों के दौरान पूर्वोत्तर के राज्यों को काफी आर्थिक सहायता दी है। बड़े-बड़े आर्थिक पैकेज पूर्वोत्तर को जारी किए गए हैं। लेकिन अक्सर ऐसा हुआ कि इस आर्थिक सहायता का वांछित परियोजना में समुचित इस्तेमाल नहीं हो पाया। कुछ धनराशि भ्रष्टाचार और बंदरबाँट में चली गई और शेष रकम खर्च नहीं हो पाने के कारण केन्द्र सरकार को वापस लौट आई। जिन परियोजनाओं में केन्द्र द्वारा मॉनिटर किए जाने की व्यवस्था है उसमें राज्य की नौकरशाही और राजनीतिक तंत्र को रकम डकारने का मौका हाथ नहीं लगता और वे रकम को वापस लौटा देना ही निरापद समझते हैं। लेकिन उग्रवाद से निपटने और प्राकृतिक आपदा के नाम पर जो रकम केन्द्र से भेजी जाती है उमसें बंदरबाँट करने और गुलछर्रे उड़ाने का उन्हें खूब मौका मिलता है। इसलिए सरकार को आँख मूँद कर क्षेत्रीय नौकरशाही और राजनीतिक तंत्र के हाथ में पैसा थमाने की बजाय पूरे पूर्वोत्तर क्षेत्र में ढाँचागत सुविधाओं के विकास के लिए आवश्यक परियोजनाओं पर अपनी निगरानी में कार्य कराना चाहिए।

उद्योग-धंधे और व्यापार के अन्य उपक्रमों के विकास के लिए शांति तथा सुरक्षा का माहौल कायम रखना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। सरकार ने वन्य-जीव अभयारण्य, हवाई अड्डों एवं सैन्य छावनियों आदि के लिए वहाँ काफी जमीन का अधिग्रहण किया है, लेकिन उनका समुचित मुआवजा स्थानीय जनता को नहीं मिल पाने के कारण भी उनमें असंतोष है। 

उग्रवादी संगठनों ने अपनी आय के स्रोत के रूप में मादक दवाओं के अवैध कारोबार का संगठित और व्यापक तंत्र विकसित कर लिया है। पूर्वोत्तर के बहुतेरे युवक मादक दवाओं के शिकार बन चुके हैं और वे एचआईवी-एड्स, आपराधिक प्रवृत्ति और आत्मविश्वास की कमी से ग्रसित हो रहे हैं। सेना और अर्धसैनिक बलों को कमजोर करने के लिए उग्रवादी संगठनों ने बड़ी संख्या में एचआईवी संक्रमित वेश्याओं का भी सहारा लेना शुरू कर दिया है। लंबी अवधि तक अपने घरों से दूर मोर्चे पर तैनात रहने वाले हमारे बहुत-से जवान उनके चंगुल में फँस जाते हैं और हमारे सैकड़ों जवान एचआईवी से संक्रमित हो चुके हैं। सरकारी एजेंसियों और गैर-सरकारी संगठनों को इस दिशा में भी विशेष ध्यान देने की जरूरत है।

पूर्वोत्तर के लोगों को अक्सर राष्ट्र की मुख्यधारा में शामिल किए जाने की बात की जाती है, लेकिन इसका पूर्वोत्तर के लोग कई बार यह आशय निकालते हैं कि उनसे अपनी भाषा, संस्कृति और क्षेत्रीय अस्मिता को भूलकर शेष भारतीयों की तरह बन जाने के लिए कहा जा रहा है और इस बात से वे चिढ़ते हैं। वे चाहते हैं कि सांस्कृतिक मामलों में उन्हें स्वायत्त रहने दिया जाए और केन्द्र सरकार पूर्वोत्तर में बुनियादी ढाँचागत सुविधाओं का विकास करने तक अपनी भूमिका सीमित रखे। अपना बाकी विकास वे खुद ही करना चाहते हैं। उन्हें कई बार यह भी लगता है कि केन्द्र सरकार पर अत्यधिक निर्भरता उनके लिए घातक सिद्ध हो रही है।

इसलिए, भारतीय संविधान के दायरे में यथासंभव स्वायत्तता प्रदान करते हुए उन्हें केन्द्रीय आर्थिक सहायता जारी रखना और साथ ही साथ उग्रवादी संगठनों के साथ सख्ती से निपटना ही पूर्वोत्तर की समस्या का सही समाधान है। लेकिन केन्द्र द्वारा दी जा रही आर्थिक सहायता का समुचित इस्तेमाल सुनिश्चित करने के लिए उसपर लगातार निगरानी रखे जाने की भी जरूरत है। उग्रवादियों के साथ कारगर तरीके से निपटने के लिए सेना एवं अर्धसैनिक बलों के साथ-साथ गुप्तचर एजेंसियों को पहले से अधिक चौकस भूमिका निभानी होगी।

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4 Responses to “पूर्वोत्तर: समस्या और समाधान”

  1. on 17 Jan 2007 at 2:28 pm प्रतीक पांडेय

    बहुत अच्छा और जानकारीपूर्ण आलेख है।

  2. on 21 Jan 2007 at 6:07 pm घुघुतीबासुती

    लेख अच्छा है । खुशी की बात है कि सृजन जैसे लेखक इस मुद्दे को उठा रहे हैं । इन राज्यों व वहाँ रहने वालों के बारे में सोचें तो किसी भी आम व्यक्ति को वहाँ की समस्या समझ आ जाए । किन्तु यदि सोचें तब न ? पर प्रशन उठता है कि क्यों सोचा जाए ?
    1. वहाँ से लोकसभा के बहुत कम मत हैं।
    2. वे केन्द्र से बहुत दूर हैं ।
    3. आम नेता का उनसे कोई लेना देना नहीं है ।
    4. ऐतिहासिक तौर से भी वे कभी भी बाँकी भारत से जुड़े नहीं ।
    5. न वे हमसे दिखते हैं न उनसे राजनीति वालों को कुछ मिलेगा ।
    6. उन्हें साथ लेकर चलना हमारी ईगो की जरूरत है , न कि हृदय की ।
    7. या फिर हमारी सीमा सुरक्षा की जरूरत ।
    और भी ऐसे बहुत से कारण हैं जिनके रहते हमने व हमारी सरकार ने उनकी अवहेलना की है । ये सभी बातें सभी छोटे भू-भागों पर लागू होती हैं, जैसे उत्तराखंड । किन्तु क्योंकि वहाँ के लोग धार्मिक, भाषाई, सामाजिक व कुछ अन्य कारणों से बाकी देश से जुड़े हैं । वहाँ हिन्दुओं के तीर्थ स्थल हैं, वहां के लोग सेना में हैं आदि । और फिर वह दिल्ली से इतना दूर भी नहीं है ।
    उत्तर पूर्व देश से बुरी तरह से कटा हुआ है । वहाँ के बच्चे इतनी दूर बाकी भारत में पढ़ने आते हैं । पैसे हों या न हों उन्हें हवाई यात्रा करनी ही पड़ती है । यदि वे वहाँ पढ़ें तो माता पिता को चिन्ता रहती है कि वे या तो आतंकवादी बन सकते हैं या उनके द्वारा अगवा किए जा सकते हैं ।
    जब ये बच्चे अपने साथियों को किसी भी जायज या नाजायज कारण से सेना या पुलिस द्वारा सताते देखते हैं तो इनका युवा खून खौल उठता है । फिर आतंकवाद से जुड़ना कुछ कठिन भी नहीं ।
    यदि स्वतंत्रता के बाद इन इलाकों का विकास हुआ होता तो आज ये देश से जुड़े होते । ये इलाके चीन, म्यांमार या अपने आसपास के इलाकों से व्यापार करते थे, हमने ये रास्ते तो बंद कर दिये और नये नहीं खोले । सो अब ये और देश हमारी मूर्खताओं का फल भुगत रहा है ।
    मत पाने के लिए जो बांगलादेशियों को यहाँ आने दिया गया है वह तो एक बड़ा कारण है ही ।
    आशा है भविष्य में भी सृजन ऐसे मुद्दे उठाते रहेंगे ।

  3. on 11 Mar 2008 at 8:59 pm monechee

    Hello Srijan

    It would also great if you can translate this one.

    Thanks

  4. on 11 Mar 2008 at 9:29 pm Srijan Shilpi

    Roman transliteration of the two articles on NE can be found on the following links:

    http://en.girgit.chitthajagat.in/srijanshilpi.com/archives/85
    http://en.girgit.chitthajagat.in/srijanshilpi.com/archives/86

    I think it would serve your purpose. You are welcome for further discussion, if interested.

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