सत्तर निर्दोष बिहारी मजदूरों एवं अन्य हिन्दी भाषियों की हत्या हो जाने के बाद आखिरकार केन्द्र सरकार असम (असोम) में सक्रिय उल्फा उग्रवादियों के साथ अब सख्ती से निपटने के लिए मुस्तैद दिख रही है। ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित महिला असमिया साहित्यकार इंदिरा गोस्वामी द्वारा उल्फा की तरफ से की गई मध्यस्थता की पहल पर सरकार ने उल्फा उग्रवादियों के साथ शांति वार्ता का प्रयास किया था। उल्फा द्वारा हिंसा छोड़े जाने की शर्त पर उल्फा की सभी मांगों पर बातचीत करने के लिए सरकार सहमत भी हो गई थी। लेकिन उल्फा उग्रवादियों ने सेना की तरफ से किए जाने वाले संघर्ष विराम का इस्तेमाल हमेशा अपने नेटवर्क को मजबूत करने और नए हमलों की तैयारी में किया। इसलिए शांति वार्ता कभी किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच सकी।
पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आई.एस.आई. तथा बांग्ला देशी खुफिया एजेंसी डी.जी.एफ.आई. के साथ उल्फा के गहरे ताल्लुकात रहे हैं और उन्हीं के इशारे पर तथा उन्हीं की मदद से उल्फा अपनी गतिविधियाँ चला रहा है। इसके अलावा इन उग्रवादियों को चीन और बर्मा से भी मदद मिल रही है। भूटान ने भारत के कहने पर अपने यहाँ मौजूद भारत-विरोधी उग्रवादियों के विरुद्घ सफलतापूर्वक कार्रवाई की है। बर्मा ने भी ऐसा करने का आश्वासन दिया है। यह और बात है कि उल्फा नेताओं के साथ लगातार संपर्क में रहने वाली इंदिरा गोस्वामी अब भी उल्फा के इन विदेशी संबंधों के बारे में कोई जानकारी नहीं होने की मासूमियत दिखा रही हैं और सरकार से शांति वार्ता के लिए अनुकूल माहौल बनाने की अपील करती रही हैं। हकीकत यह है कि हिंसक वारदातों में लंबे अरसे से लिप्त रहे उल्फा का स्थानीय जनाधार असम में खत्म हो चुका है और अब वह विदेशी मदद के बल पर अपने अस्तित्व को बचाने की अंतिम लड़ाई लड़ रहा है। शत्रु देशों की मदद से कायरतापूर्ण हिंसा में लिप्त इन उग्रवादियों के साथ सख्ती से निपटा जाना बहुत जरूरी है। लेकिन सैन्य कार्रवाई समस्या का पूरा समाधान नहीं है।
हम जानते हैं कि असम में ऐसे हालात अचानक नहीं बने। केवल असम ही नहीं, पूर्वोत्तर के अधिकतर राज्यों में हालात बिगड़ने तथा असंतोष, विद्रोह और उग्रवाद का माहौल पनपने और विदेशी ताकतों को वहाँ सक्रिय होने का मौका मिलने के पीछे मुख्य रूप से तीन वजह रही हैं– अस्मिता का संकट, असुरक्षा की भावना और अविकास की स्थिति।
पूर्वोत्तर में 200 से अधिक अनुसूचित जनजातियाँ और 100 के करीब बोलियाँ हैं। सभी जनजातियाँ अपनी पहचान, संस्कृति और बोली को बचाए रखने के लिए एक-दूसरे के साथ तनाव भरे होड़ में लगी रहती हैं। इसको लेकर कई बार उनके बीच आपसी संघर्ष भी चलता रहता है। कभी-कभी अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए छोटी जनजातियाँ अपने से बड़ी और मजबूत जनजाति में जा मिलती है। परंतु, यह सब तो लंबे समय से चला आ रहा है।
मुश्किल तब शुरू हुई जब बांग्ला देश, म्यांमार (बर्मा) और नेपाल आदि पड़ोसी देशों से आने वाले शरणार्थियों और ‘घुसपैठियों’ लोगों की संख्या चिंताजनक रूप से बढ़ने लगी। चकमा शरणार्थियों की संख्या वर्ष 1964 से अब तक पिछले चालीस वर्षों में पैंतीस हजार से बढ़कर एक लाख से भी अधिक हो गई। सिक्किम में स्थानीय लेप्चर जनजाति की तुलना में नेपालियों का वर्चस्व बढ़ गया। त्रिपुरा में तो बंगाल मूल के लोगों ने सरकार तक बना ली। असम के चाय बागानों में काम करने के लिए संथालियों और बाहर से आने वाले हिन्दी भाषियों की संख्या भी काफी बढ़ गई।
बाहरी लोगों की आबादी बढ़ने और उसी के साथ-साथ संसाधनों एवं सत्ता पर उनका वर्चस्व बढ़ता देखकर पारंपरिक स्थानीय आबादी को अपने अस्तित्व पर संकट महसूस होने लगना अस्वाभाविक नहीं है। इस मनोवैज्ञानिक सच्चाई को समझते हुए उनके अंदर जड़ जमा चुकी असुरक्षा की भावना को दूर किया जाना आवश्यक है।
पूर्वोत्तर के राज्य देश की राजधानी तथा देश के अन्य भागों से भौगोलिक रूप से इतने दूर हैं कि विकास और आधुनिकता की किरणें वहाँ तक देर से पहुँच पाती हैं। ऐसे में होना यह चाहिए था कि पूर्वोत्तर पर विशेष ध्यान दिया जाता, लेकिन आजादी के पचास वर्षों तक इस दिशा में पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। वहाँ उग्रवाद की लहर जब तेजी से फैलने लगी, तब केन्द्र सरकार सचेत हुई और पिछले पाँच-सात वर्षों से अपेक्षाकृत विशेष ध्यान पूर्वोत्तर के राज्यों पर दिया जाने लगा है। यहाँ तक कि केन्द्र में अलग से पूर्वोत्तर विकास मंत्रालय की स्थापना इसी उद्देश्य से की गई है।
प्राकृतिक संसाधनों तथा जैव विविधता के मामले में पूर्वोत्तर अत्यंत समृद्ध क्षेत्र है। प्राकृतिक तेल, औषधीय गुणों वाली वनस्पति, बाँस तथा अन्य प्रकार के उपयोगी जैव संसाधनों का पूरे पूर्वोत्तर क्षेत्र में भंडार है। यदि इन संसाधनों का सही तरह से इस्तेमाल किया जाता तो यह क्षेत्र विकास की राह में इतना पीछे नहीं रहता। साक्षरता के मामले में पूर्वोत्तर के राज्य राष्ट्रीय औसत से काफी आगे हैं। मिजोरम तो केरल के बाद शत-प्रतिशत साक्षरता के लक्ष्य को हासिल करने वाला दूसरा राज्य है। लेकिन इस सबके बावजूद आर्थिक विकास के मामले में यह क्षेत्र काफी पिछड़ा रहा है। इसका मुख्य कारण यह है कि यहाँ विकास के लिए आवश्यक ढाँचागत सुविधाओं का सख्त अभाव है। परिवहन, दूरसंचार, बिजली और आर्थिक संसाधन की समुचित व्यवस्था आज तक नहीं हो पाई है। व्यापार और आय के परंपरागत स्रोत बंद हो गए। वस्तुओं के विनिमय के माध्यम से अपना कारोबार करने वाली जनजातियों को व्यापार में कर-व्यवस्था लागू हो जाने के बाद काफी परेशानी उठानी पड़ी।
पूरे पूर्वोत्तर क्षेत्र में व्यापार-तंत्र पर नियंत्रण उन लोगों का है जो यहाँ दूसरे राज्यों से आकर बस गए हैं। स्थानीय मूल आबादी में इस स्थिति के खिलाफ धीरे-धीरे असंतोष फैलना शुरू हुआ और इसलिए जब 1980 के दशक में कई उग्रवादी संगठन अलगाववाद का नारा देकर क्षेत्र में सक्रिय हुए तो उन्हें जनसमर्थन भी आसानी से मिल गया।
केन्द्र सरकार ने इस समस्या की मूल वजह को पूरी तरह से समझे बगैर ही उग्रवाद से निपटने के लिए सैन्य कार्रवाई शुरू कर दी। बेशक सेना और अर्धसैनिक बलों को क्षेत्र में भेजा जाना जरूरी था, लेकिन उसके साथ-साथ पूर्वोत्तर के आर्थिक विकास की बाधाओं को दूर करने का ईमानदारी भरा प्रयास भी उतना ही जरूरी था। यदि ऐसा किया जाता तो सेना और अर्धसैनिक बलों को स्थानीय जनता का सहयोग मिलता और उनका असंतोष कम हो जाता। इससे उग्रवादी संगठनों की शक्ति कमजोर हो जाती।
लेकिन देर से ही सही, केन्द्र सरकार को अपनी गलती का अहसास हुआ और उसने पूर्वोत्तर को अंधाधुंध आर्थिक सहायता देना शुरू कर दिया। लेकिन तब तक पूर्वोत्तर राज्यों की नौकरशाही और राजनीतिक नेतृत्व ने क्षेत्रीय अशांति और अस्थिरता की स्थिति से फायदा उठाने का एक सिस्टम विकसित कर लिया। वे केन्द्र से क्षेत्रीय उग्रवाद के नाम पर मोटी धनराशि ऐंठने में जुट गए और इस तरह उन्हें उग्रवाद के जारी रहने में ही फायदा नजर आने लगा।
इससे आम जनता का तो बुरा हाल हो गया। वह एक तरफ से उग्रवादी संगठनों और दूसरी तरफ से सैन्य बलों के दो पाटों के बीच पिसने लगी। उग्रवादी संगठन अपना खर्च चलाने के लिए जोर-जबरदस्ती, धमकी और आतंक के बल पर जनता और व्यापारियों से रकम उगाहने लगे। धीरे-धीरे आपराधिक तत्वों का भी इस क्षेत्र में प्रवेश हो जाने के बाद जबरन अवैध टैक्स वसूली का बाकायदा एक संगठित उद्योग विकसित हो गया। चाय बागान मालिकों और अन्य व्यवसाय में लगे व्यक्तियों के लिए दोतरफा टैक्स चुकाना मजबूरी बन गया। ऐसी ख़बरें भी सामने आई कि जबरन अवैध टैक्स की वसूली के लिए ये उग्रवादी दिल्ली तक आने लगे और यहाँ रह रहे पूर्वोत्तर के नागरिकों से नियमित वसूली करके ले जाने लगे। लेकिन इस डर से कि उनके स्थानीय घरों पर अब तक रह रहे संबंधियों को कोई खतरा न हो, ये लोग पुलिस को कुछ भी नहीं बताते थे। उग्रवादी और आपराधिक संगठनों के पास दिल्ली एवं अन्य महानगरों में रह रहे पूर्वोत्तर मूल के नागरिकों के पते-ठिकाने दर्ज रहते हैं। खासकर असम, त्रिपुरा और नागालैंड राज्यों के नागरिकों के साथ यह परेशानी ज्यादा है। दिल्ली में रह रहे पूर्वोत्तर के इन नागरिकों का तो कहना था कि यदि पुलिस को इस बारे में वे बतायें भी तो जैसा कि पुलिस का स्वभाव है, वह दिल्ली में रह रहे सभी ‘चिंकियों’ को थाने में हाजिर होने का हुक्म सुना देगी।
लंबे समय से चल रही हिंसा और जोर-जबरदस्ती के इस माहौल से पूर्वोत्तर की जनता अब तंग आ चुकी है और उसने उग्रवादी संगठनों के समर्थन से अपना हाथ पीछे खींच लिया है। फलत: इन संगठनों की शक्ति अब चुकने लगी है और वे मृतप्राय होने लगे हैं। इसी हताशा के चलते वे अपने आतंक और वजूद को कायम रखने की कोशिश में इधर कुछ समय से फिर निर्दोष बिहारी मजदूरों और हिन्दी भाषियों की हत्या जैसी कायरतापूर्ण कार्रवाइयों में सक्रिय हो रहे हैं। (अगली प्रविष्टि में जारी….)
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काफी अच्छा विश्लेषण.
उग्रवादीयों को समर्थन इसी लिए मिला था की वहाँ के मूल निवासीयों को अस्तित्व का संकट सताने लगा था.
व्यापार बाहरी लोगो के हाथो में होने का मूल कारण यह है की स्थानिय प्रजा वेपारी स्वभाव की नहीं है, जैसे सिंधी, मारवाड़ी या गुजराती है. स्थानिय प्रजा सरकारी नौकरी चाहती है.
बहुत अच्छा लेख। पूर्वोत्तर के राज्यों मे असुरक्षा की भावना तो है ही, इसके साथ साथ सामूहिक विकास ना हो पाने की नाराजगी भी है।
आपने अपने लेख मे बड़े अच्छे तरीके से समझाया है, साधुवाद स्वीकारें।
अगले लेख का इन्तज़ार रहेगा।
[...] (पिछली प्रविष्टि से आगे)…. [...]
[...] And as per Himanshu, India has been fighting the islamic terrorists till now and from now on it’ll have to fight off Christian Terrorists as well which are starting to crawl out from under their rocks in the eastern states of India while Srijan Shilpi is also pondering on what can be the solution for this Assam issue. However, all this is sponsored terrorism, whether its funded by an enemy country or the local politicians. Else what will burning of shops and vehicles in Bangluroo(erstwhile Bangalore) will be called, an action which some followers of islam executed in supposed opposition to execution of Saddam! [...]
Hi Shilpi could you please translate what you wrote in English if its not a big burden for you.
maybe we can have a discussion after I understand what you wrote.
Thanks