भारतीय लोकतंत्र के तीन संवैधानिक स्तंभों के बीच का शक्ति संतुलन आज से पूरी तरह न्यायपालिका के पक्ष में झुक गया है। भारत के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली उच्चतम न्यायालय की नौ सदस्यीय संविधान पीठ ने आज जो ऐतिहासिक निर्णय दिया है उसके बाद विधायिका और कार्यपालिका के पास ऐसी कोई शक्ति नहीं बचेगी जिसके द्वारा वे न्यायपालिका के अंकुश से बाहर जा सकें। विधायिका के पास अभी तक संविधान की नौवीं अनुसूची के रूप में ऐसा ब्रह्मास्त्र था जिसका समय-समय पर प्रयोग करके वह अपने बनाए क़ानूनों को न्यायिक समीक्षा के नियंत्रण से बाहर रख पाने में सफल हो जाती थी। संसद ने इस ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करके अभी तक 284 क़ानूनों को न्यायिक समीक्षा की परिधि से बाहर रख लिया था, जिनमें भूमि सुधार और आरक्षण से संबंधित क़ानून शामिल हैं। लेकिन अब उच्चतम न्यायालय ने 24 अप्रैल, 1973 की तारीख के बाद नौवीं अनुसूची में शामिल किए गए क़ानूनों की न्यायिक समीक्षा का रास्ता खोल लिया है। न्यायिक समीक्षा की शक्ति का पाशुपतास्त्र अब संविधान की नौवीं अनुसूची रूपी ब्रह्मास्त्र पर भारी पड़ेगा। जहाँ तक कार्यपालिका के नारायणास्त्र की बात है, उच्चतम न्यायालय ने उसे पहले ही काफी हद तक श्रीहीन कर दिया है, क्योंकि राष्ट्रपति और राज्यपालों द्वारा अपने विवेकाधीन विशेष अधिकारों का प्रयोग करते हुए लिए जाने वाले निर्णयों को भी उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।
उच्चतम न्यायालय ने न्यायिक समीक्षा के इस शक्ति-विस्तार के लिए आधार बनाया है मौलिक अधिकारों और संविधान के बुनियादी ढाँचे को। विधायिका द्वारा बनाए गए किसी कानून या कार्यपालिका द्वारा की गई किसी कार्रवाई से यदि उच्चतम न्यायालय की दृष्टि में मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा या संविधान के बुनियादी ढाँचे में नुकसान पहुँचेगा तो वह उसे अवैध घोषित कर देगा। गौर करने लायक बात इसमें यह है कि मौलिक अधिकारों का तो संविधान में स्पष्ट उल्लेख है लेकिन बुनियादी ढाँचे के बारे में संविधान में कोई उल्लेख नहीं है। बुनियादी ढाँचे का सिद्धांत उच्चतम न्यायालय द्वारा 24 अप्रैल, 1973 को परिभाषित एक मौलिक अवधारणा है और समय-समय पर उसकी व्याख्या करने तथा उसके दायरे का किसी भी हद तक विस्तार कर सकने का अधिकार उसने अपने पास सुरक्षित रखा है। इस प्रकार उच्चतम न्यायालय ने अपनी शक्ति का असीमित विस्तार कर लिया है और संसद एवं सरकार अब उसकी शक्ति के सामने कमजोर हो गए हैं।
लेकिन यह संवैधानिक तंत्र के भविष्य के लिए खतरे की घंटी भी है, क्योंकि शक्ति संतुलन के एक पक्ष में झुक जाने से लोकतंत्र के विभिन्न स्तंभों के बीच टकराहट की आशंका बढ़ गई है। इसलिए इस ऐतिहासिक फैसले के बाद संविधान विशेषज्ञों के बीच विधायिका बनाम न्यायपालिका पर बहस तेज हो गई है।
केन्द्रीय उच्च शिक्षण संस्थानों में आरक्षण के प्रावधान तथा दिल्ली के रिहाइशी इलाकों में सीलिंग के मसले पर हाल ही में बनाए गए क़ानूनों के मामले में न्यायपालिका के हस्तक्षेप से बचने के लिए संविधान की नौवीं अनुसूची का सहारा लेना सरकार के लिए अब निरापद नहीं रहेगा। अब देखना यह है कि इन दो मुद्दों पर यदि न्यायपालिका प्रतिकूल रुख अपनाती है तो उसका सामना करने के लिए सरकार और संसद अपने तरकश से किस नए अस्त्र का संधान करते हैं।
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आज की परीस्थिती मे जहां राजनेता पैसो के लिये कुछ भी कर सकते हो शक्ति संतुलन विचारशील न्यायपालिका के पक्ष मे हो बेहतर प्रतित होता है।
मै इस निर्णय का स्वागत करता हूं !
इस फ़ैसले के दूरगामी परिणाम होंगे ।हमें यह भी याद रखना होगा कि न्यायपालिका में आरक्षण का प्राविधान न होने के कारण तथा विधायिका की भाँति जनता से सीधे न चुने जाने के कारण टकराहट की सम्भावानाएं बढ़ेंगी जो अन्तत: जनता और समाज के अहित में भी हो सकती हैं।
कल जब यह समाचार पढ़ा तभी से उम्मीद थी की आपका लेख पढ़ने को मिलेगा।
टकराव तो बढ़ना ही है क्यों कि संसद नहीं चाहेगी कि उसके पर कतरे जायें। जैसा कि सुभाष कश्यप कहते हैं मेरा भी यही मानना है कि विधायिका को कानून बनाने का अधिकार है लेकिन वो संविधान के मौलिक सिद्धांतों के अनुरूप है यह नहीं यह तय करना सुप्रीम कोर्ट का काम है।
यथार्थ और सामयिक लेख ।
अजी आखिर पाशुपतास्त्र के आगे कौनो असतर वसतर टिक सके है। बड़ी खुशी हुई जानकर।
इन भ्रष्ट नेताओं को सबक सिखाने के लिये और क्या रास्ता बचा है। न्यायापालिका का हस्तक्षेप आज के हालातों को देखकर तर्कसंगत लगता है भले ही आगे चल कर कोई भी टकराव हो।
वर्तमान परिस्थितियों में इस समाचार से मुझे भी बहुत खुशी हो रही है, किन्तु ऐसी स्थिति में संविधान में कोई सकारात्मक परिवर्तन भी नहीं हो पायेगा। समय के साथ बदलना तो जीवन का लक्षण है, इसका त्याग कितना उचित है?
विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका–लोकतंत्र के इन तीनों स्तंभों की शक्तियों का स्रोत संविधान है और वह सर्वोच्च है। संवैधानिक संस्थाओं की शक्तियों से भी बड़ी एक शक्ति है, जिसे संप्रभुता कहते हैं, और वह भारत की जनता के पास है। विधायिका और कार्यपालिका पर अंकुश रखने का दायित्व और अधिकार न्यायपालिका के पास है, लेकिन यदि कभी न्यायपालिका का विवेक किसी कारण से जनता के व्यापक हितों से भटक जाए तब जनता की संप्रभुता शक्ति न्यायपालिका की शक्तियों पर अंकुश लगाने के लिए सक्रिय हो सकती है। लोकतंत्र में सर्वशक्तिमान जनता है। जनता के पास अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और जनांदोलन का विकल्प है। न्यायालय ने आपातकाल को अवैध घोषित नहीं किया था, लेकिन जनता के दबाव के कारण सरकार को आपातकाल खत्म करना पड़ा था। जनता में न्यायपालिका के प्रति भरोसा जब तक कायम है, तभी तक उसके पाशुपत अस्त्र की शक्ति का प्रभाव रहेगा। परिस्थितियाँ उत्पन्न होने पर जनता संविधान को बदल सकती है। न्यायाधीश मनुष्य ही होते हैं, ईश्वर द्वारा भेजे गए फरिश्ते नहीं। वे वेतनभोगी न्याय विशेषज्ञ से अधिक कुछ नहीं होते। मानवीय विकारों से वे पूर्णतया अछूते नहीं होते। केवल कुछ न्यायाधीश सौ करोड़ से भी अधिक जनता के अंतिम भाग्य-विधाता नहीं हो सकते। लॉर्ड एक्टन की यह प्रसिद्ध उक्ति हमें भूलनी नहीं चाहिए कि ’Power corrupts, and absolute power corrupts absolutely’.
[...] Someone with some sense would be clearly able to see that all this is nothing but attempts to create anarchy by anti-social elements as opposing by burning property of fellow citizens would not bring a dead man to life. However Srijan Shilpi brought some good news in the form of the recent ruling of Supreme Court of India where the judiciary bench passed a ruling due to which the state assemblies will no longer be able to keep any of their decisions out of reach of judicial evalution, something which they did now and then as the constitution had given them the right to do so, which resulted in many unfair and unpleasant laws made and imposed on people by their state assemblies and no one was able to challenge them. [...]