कुछ अरसे से मैं ‘कवियों के कवि’ शमशेर बहादुर सिंह पर एक लेख लिखने की सोच रहा था। इसलिए इस महीने जब-जब समय मिला, उनकी कविताओं और उनपर लिखे गए आलोचनात्मक लेखों का अध्ययन करता रहा। शमशेर पर मेरा वह लेख आप सृजन गाथा के आगामी माह के अंक में पढ़ सकेंगे। फिलहाल, यहाँ शमशेर की कुछ कविताएँ प्रस्तुत हैं:
चूका भी हूँ मैं नहीं!
चूका भी हूँ मैं नहीं
कहाँ किया मैंने प्रेम
अभी।
जब करूँगा प्रेम
पिघल उठेंगे
युगों के भूधर
उफन उठेंगे
सात सागर।
किंतु मैं हूँ मौन आज
कहाँ सजे मैंने साज
अभी।
सरल से भी गूढ़, गूढ़तर
तत्व निकलेंगे
अमित विषमय
जब मथेगा प्रेम सागर
हृदय।
निकटतम सबकी
अपर शौर्यों की
तुम
तब बनोगी एक
गहन मायामय
प्राप्त सुख
तुम बनोगी तब
प्राप्त जय!
*****
बात बोलेगी
बात बोलेगी
हम नहीं।
भेद खोलेगी
बात ही।
सत्य का मुख
झूठ की आँखें
क्या-देखें!
सत्य का रुख
समय का रुख है:
अभय जनता को
सत्य ही सुख है,
सत्य ही सुख।
दैन्य दानव; काल
भीषण; क्रूर
स्थिति; कंगाल
बुद्धि; घर मजूर।
सत्य का
क्या रंग है?-
पूछो
एक संग।
एक–जनता का
दुःख एक।
हवा में उड़ती पताकाएँ
अनेक।
दैन्य दानव। क्रूर स्थिति।
कंगाल बुद्धि: मजूर घर भर।
एक जनता का–
अमर वर: एकता का स्वर।
-अन्यथा स्वातंत्र्य-इति।
*****
वह सलोना जिस्म
शाम का बहता हुआ दरिया कहाँ ठहरा!
साँवली पलकें नशीली नींद में जैसे झुकें
चाँदनी से भरी भारी बदलियाँ हैं,
खाब में गीत पेंग लेते हैं
प्रेम की गुइयाँ झुलाती हैं उन्हें:
- उस तरह का गीत, वैसी शाम-सा है
वह सलोना जिस्म।
उसकी अधखुली अंगड़ाइयाँ हैं
कमल के लिपटे हुए दल
कस भीनी गंध में बेहोश भौंरे को।
वह सुबह की चोट है हर पंखुड़ी पर।
रात की तारों भरी शबनम
कहाँ डूबी है!
नर्म कलियों के
पर झटकते हैं हवा की ठंड को।
तितलियाँ गोया चमन की फ़िजा में नश्तर लगाती हैं।
- एक पल है यह समाँ
जागे हुए उस जिस्म का!
जहाँ शामें डूबकर फिर सुबह बनती हैं
एक-एक
और दरिया राग बनते हैं कमल
फानूस रातें मोतियों की डाल
दिन में
साड़ियों के से नमूने चमन में उड़ते छबीले; वहाँ
गुनगुनाता भी सजीला जिस्म वह-
जागता भी
मौन सोता भी, न जाने
एक दुनिया की
उमीद-सा
किस तरह।

साधुवाद शमशेर बहादुर सिंह की कविता पढवाने के लिये. लेख का इंतजार रहेगा.
अच्छा लगा ये कवितायें फिर से पढ़कर!
कवियों के कवि शमशेर की कविताओं से मुलाकात अच्छी लगी . इस वर्ष जनवरी में शांतिनिकेतन में आयोजित एक कार्यक्रम में रंजना अरगड़े जी से मिलना हुआ था . उनकी शमशेर पर बहुत अच्छी पुस्तक है और बाद के दिनों में शमशेर उन्हीं के पास रह रहे थे .
[...] आप सृजन गाथा पर उपलब्ध मेरे उक्त निबंध शमशेरियत और हिन्दी कविता का इसी चिट्ठे में पूर्व प्रकाशित शमशेर की कुछ कविताओं के साथ रसास्वादन कर सकते हैं। [...]
dhanyvad,lekh ka bahut besabri se intjar hai