वेबदुनिया पर प्रकाशित ओमप्रकाश का लेख ये तीन भारत…किसके ?” देश के भावी परिदृश्य का यथार्थपरक विश्लेषण करता है। लेखक की यह धारणा है कि अगले पाँच वर्षों के भीतर भारत स्पष्ट रूप से तीन भागों में बँट चुका होगा, जिसमें एक भाग करीबन 150 विशेष आर्थिक क्षेत्रों से मिलकर बना होगा, जिसके अधिष्ठाता बड़े उद्योगपति होंगे। जबकि देश के लगभग आधे भूभाग पर नक्सलियों एवं आतंकवादियों का वर्चस्व होगा और देश का बमुश्किल 40-45% हिस्सा ऐसा रह जाएगा, जहाँ लोकतांत्रिक सरकार का नियंत्रण रहेगा। यह आने वाले कल की बहुत भयावह, मगर वास्तविक तस्वीर है। लेकिन हमारे देश के राजनेता, नौकरशाह, उद्योगपति और बुद्धिजीवी निश्चिंत हैं। मीडिया और न्यायपालिका को भी इसकी खास परवाह नहीं है।
देश को नक्सलवाद और आतंकवाद से मुक्ति दिलाने के लिए न तो कोई राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाई देती है और न ही कोई कारगर रणनीति है। यही आलम रहा तो नक्सलवाद और आतंकवाद का नासूर अगले कुछ वर्षों में इतना दुखदायी बन जाने वाला है कि उसके उपचार के लिए एक बड़े ऑपरेशन की जरूरत होगी। इस तरह का ऑपरेशन तो अब कालचक्र ही कर पाएगा। सरकार और सेना के मौजूदा ढाँचे के बूते की बात तो यह रह नहीं गई है।
लोकतांत्रिक भारत की आम जनता को आने वाले वर्षों में अभूतपूर्व चुनौतियों के लिए तैयार रहना चाहिए। अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए सत्याग्रह और संघर्ष का रास्ता ही बचा है उसके पास। आतंकवाद, मँहगाई, बुनियादी अवसंरचना का अभाव, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार–आम जनता को इन भयावह चुनौतियों से लगातार और लंबे समय तक लड़ना होगा।
हमारे देश में इस हकीकत की तरफ भी ध्यान नहीं दिया गया कि भ्रष्टाचार और आर्थिक विषमता को दूर किए बगैर देश लंबे समय तक प्रगति की राह पर आगे नहीं बढ़ सकेगा। इसके विपरीत हमारे यहाँ भ्रष्टाचार और आर्थिक विषमता को विकास की प्रचलित पूँजीवादी अवधारणा के तहत बिल्कुल स्वाभाविक और यहाँ तक कि अनिवार्य मान लिया गया है। विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा प्रायोजित आर्थिक विकास का मॉडल स्वीकार कर लिए जाने के बाद अब काफी बातें हमारे दायरे से बाहर निकल चुकी हैं। किसी भी राजनीतिक पार्टी में इतना नैतिक साहस नहीं बचा है कि वह भूमंडलीकरण की आँधी को रोक सके। भ्रष्टाचार और आर्थिक विषमता के रूप में हमें भूमंडलीकरण की प्रक्रिया में शामिल होने की कीमत तो देनी ही होगी, क्योंकि भूमंडलीकृत बाजारवादी अर्थव्यवस्था नैतिक मूल्यों के आधार पर नहीं, बल्कि मुनाफे के सिद्धांतों के आधार पर चलती है। लेकिन ऐसा नहीं है कि ये प्रवृत्तियाँ केवल भूमंडलीकरण के चलते पैदा हुईं। दरअसल बीज रूप में ये प्रवृत्तियाँ हमारे देश में पहले से ही मौजूद थीं। परंतु पहले इन प्रवृत्तियों को स्वाभाविक मानकर नजरंदाज करने की बात नहीं होती थी। वामपंथी और समाजवादी विचारधारा वाली राजनीतिक पार्टियाँ कम से कम इन मुद्दों पर आरंभिक वर्षों में काफी मुखर रहा करती थीं। लेकिन बाद में सभी राजनीतिक दलों में विचारधाराओं का घालमेल होना शुरू हो गया। जनता के लिए उनके बीच अंतर कर पाना मुश्किल हो गया है।
सत्ता की राजनीति के माहौल में विचारधाराओं का घालमेल स्वाभाविक ही है। विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के अपने विशिष्ट चरित्र तो उसी शर्त पर कायम रह सकते थे, जब वे विचारधारा की राजनीति को ही अपना साधन और साध्य, दोनों मानकर चलते। लेकिन जब सबका एकमात्र लक्ष्य सत्ता हासिल करना हो तो उनकी विचारधारा कैसे अलग-अलग रह सकती है। भारतीय जनता पार्टी को भी भलीभाँति समझ में आ गया कि केवल हिंदुत्व और मंदिर के मुद्दे पर वह सत्ता में आने और उसे कायम रख पाने में सफल नहीं हो सकती। उसे अपना जनाधार बढ़ाने के लिए कांग्रेस के चरित्र को आत्मसात करना पड़ा। राजनीतिक दलों के चारित्रिक वैशिष्ट्य के लोप ने जनता के लिए विकल्पों के अभाव की समस्या पैदा कर दी है। जब सभी राजनीतिक दल एक जैसी विचारधारा और नीति पर चल रहे हों तो आखिर जनता अपनी असंतुष्टि कैसे प्रकट करे और अपने भविष्य की बागडोर किसे सौंपे! सच कहा जाए तो राजनीतिक दलों से किसी बड़ी उम्मीद की स्थिति अब नहीं रह गई है। जनता को विकल्पों की तलाश में एक नई दिशा में देखना होगा। इस समय बहुत-से स्वैच्छिक और जमीनी सरोकारों के लिए प्रतिबद्ध व्यक्तियों एवं संस्थाओं द्वारा देश भर में सामाजिक, आर्थिक, बौद्धिक और सांस्कृतिक विकास की कोशिशें हो रही हैं। आने वाले वर्षों में जनता की उम्मीदें किसी हद तक इन्हीं संस्थाओं और व्यक्तियों से पूरी हो सकेंगी। इसलिए जनता यदि मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों पर अब और भरोसा करने के बजाय अपनी शक्ति और सदभावना का योगदान इस नई उभर रही वैकल्पिक दिशा में करे तो शायद बेहतर भविष्य को साकार किया जा सकेगा।
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बहुत भयावह तस्वीर है. राजनीतिक दलों से तो सही मायनों मे कोई भी उम्मीद करना बेकार है, उन्हें अपनों ही क्रिया कर्मों से कहां फुरसत है.
देश में इतनी भिन्नतायें हैं कि एक ही विचारधारा को लेकर कोइ राजनैतिक दल राष्ट्रीय नहीं हो सकता इसलिये कांग्रेस और भाजपा में कोई फर्क नहीं दिखता, ध्यान से देखें तो अब कांग्रेस और कम्यूनिस्टों में भी कोइ फर्क नहीं दिखता। सिंगूर इसका ताजा उदाहरण है। यह सब राजनैतिक मजबूरियां हैं जो इन दलों को अति नहीं करने देतीं और चरम तक जाने से रोकती हैं। मुझे खुशी है कि हमारा लोक और तंत्र इन दलों से कहीं ऊपर है जो इन दलों को मध्यमार्ग पर चला रहा है। इन दलों पर न सही, इन्हे चुनने वालों पर भरोसा रखें, भविष्य इतना भयावह नहीं लगेगा
अब न कोई नीति है और न विचारधारा . कांग्रेस,भाजपा और कम्युनिस्ट किसी की भी नीतियों में कोई अंतर नहीं है . एकदूसरे का विरोध भी सिर्फ़ दिखावा — ‘पॉश्चर’ — है . क्योंकि सभी एक ग्लोबल नीति कि मोहरे बने हुए हैं . सिंगूर इसका ताज़ा उदाहरण है . अब सिर्फ़ तंत्र है लोक नहीं . लोक अगर है भी तो हाशिये पर और उसकी कोई सुनवाई नहीं है .
सचमुच बहुत ही भयावह तस्वीर है, क्या वाकई ऐसा ही होगा?
अगर किसी भी राजनैतिक दल से उम्मीद करना बेकार होगा तो क्या हमें भी अन्य देशों की तरह सैन्य शाषन का सामना करना होगा? क्या सैन्य शाषन ही इन समस्याओं से निबटने में कारगर सिद्ध होगा? ऐसे बहुत से प्रश्नों का उत्तर कभी मिलेगा क्या?