गाँधीजी की महानता पर अब स्वामी रामदेव ने भी प्रश्न-चिह्न लगा दिया है। उनका कहना है कि भारत की स्वतंत्रता के लिए अकेले गाँधी को श्रेय नहीं दिया जा सकता। वह अहिंसा के सिद्धांत को जन-जन तक पहुँचाने का श्रेय भी गाँधी को नहीं देना चाहते। वह कहते हैं कि साबरमती के संत, तूने कर दिया कमाल वाला गीत किसी चापलूस का लिखा हुआ है जिनसे गाँधीजी हमेशा घिरे रहते थे। बाबा रामदेव के इन बयानों को मीडिया में दिखाये जाने के बाद कई गाँधीवादियों और सांसदों की ओर से तीखी प्रतिक्रियाएँ आई हैं।
गाँधी की आलोचना का यह शगल कोई नया नहीं है। ओशो से लेकर बाबा रामदेव तक, हर उस व्यक्ति के लिए शायद ऐसा करना जरूरी भी हो जाता है जो स्वयं अपनी महानता को सिद्ध करना चाहते हैं। गाँधीजी का व्यक्तित्व एक ऐसा प्रतिमान है जिसके पैमाने से आधुनिक युग के हर महापुरुष के कद की माप होती है। बचपन में मैंने भारत वन्दना पढ़ी थी, जिसमें एक पंक्ति थी, तेरे उर में शायित गाँधी, बुद्ध, कृष्ण और राम। इस पंक्ति में भारत माता के हृदय में वास करने वाले महापुरुषों में गाँधी को बुद्ध, राम और कृष्ण के समकक्ष, यहाँ तक कि उनसे भी पहले स्थान दिया गया था।
हिन्दी चिट्ठा जगत में भी गाँधी पर अक्सर बहस होती रही है। अभी हाल ही में अफ़लातून जी ने गीता और गोलवलकर के संदर्भ में गाँधीजी के विचारों पर प्रकाश डाला। उसके प्रत्युत्तर में प्रतीक पांडेय ने भी अपने विचार व्यक्त किए। संजय बेंगानी भी गाँधीजी पर लिखते रहे हैं। ‘गाँधीगीरी‘ के बहाने भी गाँधी पर खूब चर्चा हुई है। शहीद दिवस के अवसर पर मैंने भी गाँधीजी पर पुनर्विचार किया था।
बहुत-से लोग मानते हैं कि यदि गाँधीजी की हत्या नहीं हुई होती तो शायद लोग अब तक उनको भूल चुके होते। आजादी के बाद देश के नीति-निर्धारकों ने गाँधी के विचारों को कभी लागू नहीं किया, किन्तु वोट हासिल करने के लिए गाँधीवाद की माला वे निरंतर जपते रहे। ओशो कहते थे कि यदि आजादी के बाद गाँधी के आदर्शों को अमल में लाकर उन्हें एकबार आजमा लिया गया होता तो भारत को अब तक गाँधीवाद के झंझट से मुक्ति मिल गई होती, क्योंकि लोगों का जल्द ही उससे मोहभंग हो गया होता। लेकिन गाँधीवाद पर अमल करने की हिम्मत किसी सरकार में नहीं हुई।
गाँधीजी की सोच और समझ से भले ही बहुत से लोग सहमत न हों, लेकिन उनमें एक खूबी ऐसी थी जो उनके बाद किसी अन्य महापुरुष में देखने को नहीं मिली। वह जिस बात को सही समझते थे, उसपर खुद भी अमल करते थे और दूसरों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करते थे। उनके मन, कर्म और वचन में कोई विरोधाभास नहीं था।
लेकिन मैं कुछ विद्वानों के इस मत से सहमत हूँ कि गाँधीजी यदि लॉर्ड इरविन के साथ समझौते के समय अड़ गए होते तो भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फाँसी नहीं हुई होती और यदि गाँधी एवं नेहरू के मन में सुभाष चन्द्र बोस के प्रति दुराग्रह नहीं होता तो आजाद भारत को अपने उस अनमोल रत्न की सेवाओं से वंचित नहीं होना पड़ता। शायद गाँधीजी के मन में कहीं न कहीं यह महत्वाकांक्षा थी कि लोकप्रियता के मामले में कोई उनसे आगे नहीं निकल जाए, खासकर कोई ऐसा व्यक्ति जो उनके विचारों का विरोधी हो। उन्हें भगत सिंह और सुभाष चन्द्र बोस की बढ़ती लोकप्रियता रास नहीं आई थी। लेकिन गाँधीजी के मन में इस तरह की भावना जगाने वाले जवाहरलाल नेहरू थे, जो अपने संभावित प्रतिद्वंद्वियों को रास्ते से हटाना चाह रहे थे। जवाहरलाल नेहरू को अपना उत्तराधिकारी चुनकर उन्होंने संभवत मोतीलाल नेहरू के अहसान को चुकाने की कोशिश की थी। कभी मोतीलाल नेहरू ने भी कांग्रेस में गाँधीजी के नेतृत्व को स्थापित करने में सहयोग किया था। नेहरू परिवार को भारतीय लोकतंत्र का शाही घराना बनाने में गाँधीजी की अहम भूमिका थी। नेहरू ने अपने उस वंशवाद को आगे बढ़ाया और कांग्रेस के कई दिग्गज नेताओं को दरकिनार करते हुए उन्होंने अपने जीते जी इंदिरा गाँधी को कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष बना दिया। वंशवाद को आगे बढ़ाने का यह सिलसिला आज तक जारी है और अब इसे तमाम दूसरे राजनीतिक दलों ने भी अपना लिया है। नेहरू परिवार को चुनौती दे सकने वाले किसी शख्स की कांग्रेस पार्टी में कभी अहमियत नहीं रही। विडंबना की बात यह रही कि जिस नेहरू परिवार ने गाँधी का सबसे अधिक इस्तेमाल किया, वह वास्तव में हमेशा गाँधीवाद के आदर्शों के विपरीत दिशा में सक्रिय रहा है।
जैसा कि मैंने गाँधीजी पर अपने पिछले लेख में भी लिखा है कि यदि गाँधीजी आज मौजूद होते तो मौजूदा सत्ता-व्यवस्था के विरुद्ध उसी तरह का आंदोलन चला रहे होते जैसा आजादी के पूर्व वह अंग्रेजों के विरुद्ध चला रहे थे। गाँधीजी ने तत्कालीन परिस्थितियों में, अपनी समझ से जो कुछ किया, चाहे उसे आज सही समझा जाए या गलत, उसपर बहस करने से आज की समस्याओं का समाधान निकलने वाला नहीं है। उनके आलोचकों की महानता तो तब साबित हो पाएगी जब वे आज की समस्याओं को उसी ईमानदारी से सुलझाने की कोशिश करें जिस ईमानदारी से गाँधीजी ने अपने समय की समस्याओं को सुलझाने की कोशिश की थी।
आगे पढ़िए »

“गाँधीजी यदि अड़ गए होते तो भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फाँसी नहीं हुई होती”
“गाँधीजी के मन में कहीं न कहीं यह महत्वाकांक्षा थी कि लोकप्रियता के मामले में कोई उनसे आगे नहीं निकल जाए, खासकर कोई ऐसा व्यक्ति जो उनके विचारों का विरोधी हो।”
“जवाहरलाल नेहरू को अपना उत्तराधिकारी चुनकर उन्होंने संभवत: मोतीलाल नेहरू के अहसान को चुकाने की कोशिश की थी।”
क्या इसे गाँधी पर कीचड़ उछालना नहीं कहेंगे?
[...] हम भारतीयों की एक बहुत बड़ी कमकोरी है कि हम सत्य को कभी स्वीकार नहीं कर सकते और जिनको हम महान मान लेते हैं उनके बारे में कही गई किसी भी अच्छी बुरी बात को सहन करन करने की हममें हिम्मत नहीं होती। कल योग गुरु स्वामी रामदेव ने गांधीजी के बारे में कुछ बात कह दी कि लोग माफ़ी मंगवाने के लिये उनके पीछे टूट पड़े। क्यों आज भी हम यह मानने को तैयार नहीं है कि आजादी की सफ़लता का श्रेय सिर्फ़ अकेले गाँधीजी को दिया जाना गलत है, अगर वाकई सिर्फ़ गांधीजी की वजह से हमें आजादी मिलनी होती तो कई वर्षों पहले मिल गयी होती जब उन्होने असहयोग आन्दोलन शुरु किया और बाद में उसे बन्द कर दिया था। आजादी दिलवाने में सुभाष बाबू, चन्द्र शेखर, भगत सिंह और ह्जारों शहीदों जिनका हम नाम भी नहीं जानते, का योगदान कम नहीं है। मेरे व्यक्तिगत मत से तो भारत की आजादी में अप्रत्यक्ष रूप से द्वितीय विश्व के खलनायक हिटलर का योगदान भी कम नहीं था जिसने विश्व युद्द के दौरान ब्रिटेन की हालत इतनी खोखली कर दी कि मजबूरन अंग्रेजों को भारत छोड़ना पड़ा। अगर स्वामी रामदेव ने यह बात कही है तो इसमे कुछ भी गलत नहीं है, हमं इस बात का स्वीकार करना चाहिये कि सिर्फ़ गांधीजी को आजादी का श्रेय देने से उन हजारों शहीदों का अपमान होता है जिन्होने अपनी जानें दी। क्रान्तियाँ कभी बिना खडग और बिना ढ़ाल के नहीं मिलती, अगर सिर्फ़ गांधीजी के तरीकों से आजादी की कामना करते तो शायद आज भी हम गुलाम ही होते! आजकल देश में एक ट्रेंड चला है जिसमें आप गांधीजी, गांधीवाद या गांधीगिरी की बात करने वालों को बुद्धिजीवी समझा जाता है और उनके बारे में कुछ भी कहने वालों को देशद्रोही जैसा समझा जाने लगा है। कांग्रेसियों के लिये तो सत्ता में आगे बढ़ने का जरिया भी है, आचरण भले ही गाँधीवादी ना हो पर बातें तो बड़ी बड़ी हाकेंगे। सृजन शिल्पी जी ने लिखा “लेकिन मैं कुछ विद्वानों के इस मत से सहमत हूँ कि गाँधीजी यदि लॉर्ड इरविन के साथ समझौते के समय अड़ गए होते तो भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फाँसी नहीं हुई होती और यदि गाँधी एवं नेहरू के मन में सुभाष चन्द्र बोस के प्रति दुराग्रह नहीं होता तो आजाद भारत को अपने उस अनमोल रत्न की सेवाओं से वंचित नहीं होना पड़ता। शायद गाँधीजी के मन में कहीं न कहीं यह महत्वाकांक्षा थी कि लोकप्रियता के मामले में कोई उनसे आगे नहीं निकल जाए, खासकर कोई ऐसा व्यक्ति जो उनके विचारों का विरोधी हो। उन्हें भगत सिंह और सुभाष चन्द्र बोस की बढ़ती लोकप्रियता रास नहीं आई थी। लेकिन गाँधीजी के मन में इस तरह की भावना जगाने वाले जवाहरलाल नेहरू थे, जो अपने भावी प्रतिद्वंद्वियों को रास्ते से हटाना चाह रहे थे। जवाहरलाल नेहरू को अपना उत्तराधिकारी चुनकर उन्होंने संभवत मोतीलाल नेहरू के अहसान को चुकाने की कोशिश की थी। कभी मोतीलाल नेहरू ने भी कांग्रेस में गाँधीजी के नेतृत्व को स्थापित करने में सहयोग किया था। नेहरू परिवार को भारतीय लोकतंत्र का शाही घराना बनाने में गाँधीजी की अहम भूमिका थी। नेहरू ने अपने उस वंशवाद को आगे बढ़ाया और कांग्रेस के कई दिग्गज नेताओं को दरकिनार करते हुए उन्होंने अपने जीते जी इंदिरा गाँधी को कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष बना दिया। वंशवाद को आगे बढ़ाने का यह सिलसिला आज तक जारी है और अब इसे तमाम दूसरे राजनीतिक दलों ने भी अपना लिया है। नेहरू परिवार को चुनौती दे सकने वाले किसी शख्स की कांग्रेस पार्टी में कभी अहमियत नहीं रही। विडंबना की बात यह रही कि जिस नेहरू परिवार ने गाँधी का सबसे अधिक इस्तेमाल किया, वह वास्तव में हमेशा गाँधीवाद के आदर्शों के विपरीत दिशा में सक्रिय रहा है। [...]
मैने अपने विचार यहाँ लिखे हैं http://nahar.wordpress.com/2006/11/30/swamiramadev/
@ संजय भाई
नहीं संजय भाई इन बातों को कीचड़ उछालना नहीं कह सकते सच बोलना कीचड़ उछालना नहीं होता।
गांधी जी एक महापुरुष थे इसमे कोई शक नही है।
यही कारण है कि आज जिस किसी को भी सुर्खियो मे आना होता है, सस्ती लोकप्रियता हासील करनी होती है वह गांधीजी के पिछे हाथ धो कर पड जाता है।
आजादी के पुर्व भारत के ४० करोड लोगो मे से यदि १०करोड लोग भी गांधीजी के नेतृत्व को स्वीकार करते रहे हों, तो इसका मतलब है विश्व मे आजतक ऐसा कोई दूसरा नेता पैदा नही हुआ है जिसे इतना बडा जनसमर्थन प्राप्त हो! मैने सिर्फ २५% जन समर्थन की बात की वास्तविकता इससे कहीं ज्यादा है।
आजादी के लिये गांधीजी का योगदान को नकारा जाना एक मुर्खता है।
आजादी के बाद उनके सिद्दांतो की प्रासंगिकता एक दूसरा पहलू है।
गांधीवाद की उपयोगीता को गांधीजी की महानता से जोडा नही जा सकता। ब्रिटीश जनता ने भी एक विजेता प्रधानांत्री चर्चील को युद्ध के बाद नकार दिया था, इससे चर्चील की उपलब्धीया कम नही हुयी थी।
बाबा रामदेव योग के बड़े आचार्य हैं . इस पारम्परिक विद्या के समर्थ साधक हैं और इसके प्रचार-प्रसार के लिए उनकी जितनी तारीफ़ की जाए कम है .
पर ऎतिहासिक और राजनैतिक परिदृश्य के टिप्पणीकार के रूप में उनकी पृष्ठभूमि और योग्यता संदिग्ध है . अपनी प्रसिद्धि के प्रभाववश अब वे अपने कार्यक्षेत्र और गतिविधि के ‘स्पेस’ के बाहर जाकर कुछ ज्यादा ही अहमन्य टिप्पणियां करने लगे हैं . इसका नुकसान उस बड़े लक्ष्य — योग के प्रचार-प्रसार — को ही होगा जिसे वे लेकर चले थे .
सब काम सबके लिए नहीं बने हैं . जैसे बाबा रामदेव योग के साथ प्रवचन तो देते ही थे, बाद में सम्भवतः मुरारी बापू के रसवर्षा करने वाले गायन से प्रेरणा लेकर वे गाने भी लगे . यकीन मानिये इतना बेसुरा गाते हैं कि क्या कहा जाये. लय-ताल तो इस योगगुरु के आस-पास भी नहीं फ़टकती . भई योग सिखाने आये हो योग सिखाओ , इस गाने के लफ़ड़े में फंस कर फ़ज़ीती क्यों कराते हो ? पर नहीं साब अब हम प्रसिद्ध हो गये हैं जनता हमारा कच्चा-पक्का सब बर्दास्त कर लेगी .
रही बात गांधी की , तो उन पर क्या-क्या नहीं कहा गया और क्या-क्या नहीं लिखा गया . हम अपने व्यक्तित्व के अनुरूप छोटे-छोटे पैमानों से गांधी जैसे महामानव को मापते हैं . मापते रहें . गांधी कोई बताशा तो हैं नहीं कि आलोचना की बारिश में घुल जायेंगे .
अभी नेहरू के प्रति उनकी विशेष कमजोरी की चर्चा होती है. अगर वे सरदार पटेल को प्रधानमंत्री के लिये प्रस्तावित कर देते तो इतिहास इस बात पर चर्चा करता रहता कि कैसे एक गुजराती ने गुजराती का अनुचित समर्थन किया . तब उन्हें प्रान्तीयतावादी कहा जाता .
देश आज़ाद हुआ . दिल्ली में चमक-दमक ,उत्साह और आतिशबाज़ी के बीच नेहरू समेत सभी कांग्रेसी नेता आनंद के हिंडोले में झूल रहे थे . अपनी उपलब्धि से निस्पृह गांधी सांप्रदायिक सद्भाव के लिये अपनी ‘वन मैन आर्मी’ के साथ अकेले नोआखाली के हिंसक अंधेरे में अपना काम कर रहे थे . भाई सृजन शिल्पी उनमें मह्त्वाकांक्षा ढूंढ रहे हैं . अगर वे चाहते तो उन्हें इस देश का राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री होने से कौन रोक सकता था . और मित्र सृजनशिल्पी उनमें महत्वाकांक्षा ढूंढ रहे हैं .
हमने आज़ादी के बाद गांधी को पूरी तरह भुला दिया . गांधी की तरफ पीठ किये देश पूरी तरह ‘नेहरूवियन मॉडल’ पर चल रहा था, पर हर छोटी-बड़ी गलती के लिये गालियां गांधी को पड़ती रहीं .
अविनय,कृतघ्नता और घनघोर अज्ञान का साक्षात मानवीकरण देखना हो तो हमारे देश में कमी नहीं . एक ढूंढो हज़ार मिलते हैं की तर्ज़ पर . एक क्षेत्र विशेष में अपने महत्वपूर्ण योगदान के बावजूद बाबा रामदेव ने भी अपना नाम उन्हीं में लिखवा लिया है. गांधी कोई सत्ताधारी नहीं थे जो अपने लिये ‘लालू चालीसा’ लिखवा लेते . लोक गीत किसी देश और समाज की ‘सामूहिक स्मृति’ का हिस्सा होते हैं . इतने सामूहिक कि उनका कोई लेखक खोज पाना भी मुश्किल, बल्कि असम्भव होता है . जनुश्रुतियों और लोकगीतों का हिस्सा कोई कब और कैसे बनता है और उसमें असंख्य लोग कैसे और किस तरह अपना योगदान देते हैं , यह अभी बाबा रामदेव की समझ के बाहर है . यह चापलूसी और विपणन का समय है और वे वही समझते हैं
गांधी पर सही टिप्पणी कोई मंडेला कर सकता है जो इस हिंसक और व्याभिचारी समय में भी उनके बताये कठिन और अव्यवहारिक कहे जाने वाले रास्ते पर चलने का साहस करे और एक अन्यायपूर्ण व्यवस्था पर विजय पाये . और यही नहीं — विजय पाने के उपरांत महज़ कुछ ही समय राष्ट्रपति रहने के उपरांत वह राष्ट्रपति पद अपने साथी को किसी पुष्प स्तवक की तरह भेंट कर दे . यह है गांधी होने का अर्थ . अगर पृथ्वी पर मंडेला हैं, तो समझिये गांधी जीवित हैं और प्रासंगिक हैं . पर इस अर्थ को समझने के लिये वैसा अकुंठ मन भी तो चाहिये .
तरह-तरह के पूर्वग्रहों , अर्धसत्यों और संदेहों से घिरे अविश्वासी मन में गांधी किसी संवाद की तरह नहीं, विवाद की तरह ही रह पायेंगे . पर वे हमारे मन में एक आलोड़न की तरह रहेंगे यह सत्य अटल है .
एक राष्ट्रनायक के रूप में गांधी की मानवसुलभ कमजोरियों पर या उनकी तथाकथित गलतियों पर भी चर्चा होनी चाहिये और होती रही है . पर मानवता की जाज्वल्यमान मशाल के रूप में उनका नाम लेते समय उस गरिमा का — उस आभा का — थोड़ा-बहुत नूर हममें भी झलकना चाहिये .
मन बहुत अशांत है अब समाप्त करता हूं .
प्रियंकर जी,
आपके विचारो से मै पूरी तरह सहमत हूं। आपसे निवेदन है कि इस टिप्पणी को आप एक पूरी पोष्ट के रूप मे प्रकाशित करें।
प्रियंकर जी,
बापू के प्रति आपकी अनन्य आस्था का यह भाव स्तुत्य है। भावावेश में जब आप लिखते हैं तो आपके शब्दों में इतनी ऊर्जा भर जाती है कि वे पाठकों को झकझोर कर नए सिरे से सोचने पर विवश कर देते हैं। लेकिन मैं यह जानकर किंचित अपराधी-सा महसूस कर रहा हूँ कि मेरे लेख की कुछ पंक्तियों ने आपके मन को इस क़दर अशांत कर दिया।
स्वामी रामदेव द्वारा असमय दिए गए बयानों के बहाने गाँधीजी पर एक बार फिर से बहस छिड़ गई है। यह बहस आप जैसे कई संवेदनशील व्यक्तियों के लिए अप्रिय है। मैं भी बाबा रामदेव के संबंध में आपकी अधिकतर टिप्पणियों से असहमत नहीं हूँ। ऐसा लगता है कि आने वाले समय में बाबा रामदेव अपना कार्यक्षेत्र योग तक ही सीमित नहीं रखेंगे। जिस तरह से वह राजनीतिक मसलों पर सचेष्ट हो रहे हैं, उसको देखते हुए कोई आश्चर्य नहीं होगा कि देर-सबेर वह किसी-न-किसी रूप में राजनीति में सक्रिय होने का फैसला कर लें। यह तो जाहिर है कि इस समय वह भारत के सर्वाधिक लोकप्रिय व्यक्तियों में से एक हैं और शायद कभी राष्ट्र का राजनीतिक नेतृत्व सँभालने का अवसर मिलने पर वह अपनी इस लोकप्रियता को भुनाने से चूकेंगे नहीं। मैं आपकी बात से सहमत हूँ कि बाबा रामदेव के इस तरह के पचड़ों में पड़ने से उनके मूल उद्देश्य को ही नुकसान पहुँचेगा।
लेकिन बाबा रामदेव के संबंध में चर्चा बाद में। प्रसंग चूँकि महात्मा गाँधी का है, इसलिए पहले उनके ही संबंध में फोकस करते हैं। आप मेरे इस कथन से क्षुब्ध हुए हैं कि गाँधीजी के मन में कहीं-न-कहीं यह भाव था कि लोकप्रियता के मामले में भगत सिंह या सुभाष चन्द्र बोस कहीं उनसे आगे न निकल जाएँ। मैंने यह भी लिखा है कि गाँधीजी के मन में इस तरह का भाव जगाने वाले नेहरूजी थे। यह धारणा अकेले मेरी नहीं है। ऐसा बहुत-से विद्वान, इतिहासकार और टिप्पणीकार मानते रहे हैं और यह धारणा सर्वथा निराधार नहीं है। भगत सिंह या सुभाष चन्द्र बोस के साथ उनका मतभेद केवल सैद्धांतिक नहीं था और बात केवल अहिंसा बनाम हिंसा की नहीं थी। यह एक ऐतिहासिक सच्चाई है कि जब गाँधीजी के खुलेआम विरोध के बावजूद हरिपुरा अधिवेशन में सुभाष चन्द्र बोस को बहुमत से कांग्रेस का अध्यक्ष चुन लिया गया तब इसे उन्होंने व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया। हालात ऐसे बना दिए गए कि सुभाष चन्द्र बोस को कांग्रेस से इस्तीफा देकर अपनी अलग पार्टी बनानी पड़ी। इसी तरह भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के बचाव में गाँधीजी द्वारा अधूरे मन से प्रयास किए जाने को भी कई इतिहासकार उचित नहीं मानते। गाँधीजी कर्मफल के सिद्धांत को मानते थे और वह अकसर इस सिद्धांत का सहारा लेकर तत्कालीन घटनाक्रमों और परिस्थितियों की व्याख्या किया करते थे। यदि वह सिद्धांत सही है तो क्या उन्हीं के तर्काधार से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि हत्या के समय गाँधीजी को लगी तीन गोलियाँ दरअसल उन तीन नौजवान शहीदों को फाँसी से बचा पाने में उनकी विफलता के दोष का प्रतिफल थीं? ऐसा निष्कर्ष निकाला जाना किसी को भी एक क्रूर तर्क लग सकता है, लेकिन भगत सिंह के भावुक समर्थक ही नहीं, बहुत-से स्वतंत्र टिप्पणीकार भी कुछ इसी तरह का निष्कर्ष निकालने के लिए बाध्य हैं। आपने लिखा है कि गाँधीजी यदि चाहते तो आजादी के बाद उन्हें राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री बनने से कौन रोक सकता था! तो उन्हें बनना चाहिए था राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री और अपने जीते जी उन क्रांतिकारी आदर्शों एवं विचारों को कार्यान्वित करने का प्रयास करना चाहिए था, जिन्हें वह सही समझते थे और जिनके आधार पर वह रामराज्य के स्वप्न को साकार करना चाहते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया, क्योंकि उनकी महत्वाकांक्षा राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री बनने की नहीं थी। वह त्याग की जीवंत प्रतिमूर्ति बने रहना चाहते थे और अपने महात्मापन की कीमत पर सत्ता संभालने के लिए तैयार नहीं थे। उन्होंने उस नेहरू को बाकायदा उत्तराधिकारी मनोनीत करके सत्ता सौंप दी, जो न सिर्फ उनकी नीतियों पर चलने के लिए तैयार नहीं थे, बल्कि उनकी सलाह को मानने से भी इन्कार करने लगे थे। जब वह नेहरू के सत्तामोह के सामने विवश होकर देश के विभाजन के लिए सहमत हो गए तो उस ग्लानि को छिपाने के लिए उनके पास दंगों को शांत करने के लिए एकाकी प्रयास करने हेतु निकल पड़ने के अलावा और विकल्प ही क्या बचा था!
आपने बाबा रामदेव के संबंध में कहा है कि यह चापलूसी और विपणन का समय है और वे वही समझते हैं। मैं बाबा के समर्थन में या गाँधीजी के विरोध में नहीं लिख रहा हूँ, लेकिन जहाँ तक विपणन की तकनीकों को आजमाने और अपनी लोकप्रियता को भुनाने की बात है, बाबा रामदेव उसी परंपरा पर अपने कदम बढ़ा रहे हैं, जो गाँधीजी ने शुरू की थी। जैसा कि ओशो ने गाँधीजी के साथ अपनी मुलाकात के संस्मरण का जिक्र किया है, बापू भी बनियागिरी में माहिर थे। वह छोटे-से बच्चे से भी अपने ऑटोग्राफ की कीमत वसूलना नहीं भूलते थे। कहने की जरूरत नहीं कि वह यह सब आजादी की लड़ाई का खर्च जुटाने के लिए करते थे। बाबा रामदेव भी कुछ इसी तकनीक से योग के प्रचार-प्रसार के लिए धनराशि जुटाने में लगे हैं तो इसे गलत कैसे कहा जा सकता है!
गाँधीजी की महानता, उनके महात्मापन, उनके त्याग, उनकी सरलता और सादगी, उनकी स्वच्छता-प्रियता, जनता के नब्ज को अचूक रूप से समझने की उनकी अद्वितीय काबिलीयत, उनकी ईमानदारी, उनकी सत्य-निष्ठा, उनकी राम-भक्ति…..बेमिसाल है और मैं भी आपकी तरह और दूसरे लाखों-करोड़ों लोगों की तरह गाँधीजी के इन देवसुलभ गुणों का क़ायल रहा हूँ। मेरी हैसियत नहीं है कि गाँधीजी की शान में गुस्ताखी के कुछ शब्द कह सकूँ। फिर भी, समसामयिक विषयों पर लेखन करना मेरी फितरत में है और प्रसंगवश कुछ ऐसी बातें लिख गया हूँ जो एक अरसे से मेरे जेहन में रही हैं। आप उनसे असहमत होने के लिए स्वतंत्र हैं, किंतु इसे गाँधीजी के प्रति मेरी अश्रद्धा नहीं समझें। बापू मेरे प्रेरणास्रोत हैं। दरअसल वह मेरा पहला प्यार हैं। चौदह वर्ष की आयु में जब मुझे पहली बार उनकी आत्मकथा पढ़ने को मिली थी तो मैं उसे दर्जनों बार पढ़ता रहा था। तब से लेकर आज तक गाँधी वाङमय का एक बड़ा हिस्सा पढ़ चुका हूँ। आज के संदर्भ में उनके विचारों की प्रासंगिकता के सवाल पर गाँधीवादी विद्वानों से अकसर चर्चा होती रही है। खासकर, उनके आर्थिक सिद्धांतों और ट्रस्टीशिप के सिद्धांत के अध्ययन में मेरी विशेष दिलचस्पी है। यहाँ तक कि गाँधी साहित्य में अतिशय गोता लगा लेने के कारण कुछ-कुछ उसी तरह के ‘केमिकल लोचा’ का शिकार भी रह चुका हूँ, जिसे ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ फिल्म में दर्शाया गया है, और मेरे सपने में बापू अक्सर आकर बातें करने लगे थे।
प्रिय आशीष भाई,
वैचारिक सहमति के लिये धन्यवाद ! जहां तक मेरी प्रतिक्रिया को पोस्ट के रूप में डालने की बात है तो यह काम अब आप ही अपने चिट्ठे पर कर दें . और क्या लिखूं .
****
प्रिय भाई सृजनशिल्पी जी ,
इंटरनेट पर हो रही बहसें सामान्यतः मानविकी , विशेषकर इतिहास के किसी भी गम्भीर अध्ययन से रहित देश के उच्च मध्य वर्ग के बीच में प्रचलित अधकचरे और सुने सुनाये तथ्यों का ही प्रस्फुटन होता है . पर यह इस माध्यम के लोकतांत्रिक होने का एक प्रमाण भी है . अतः सामान्यतः मैं इस तरह के तथ्यों को नजरअंदाज ही करता हूं क्योंकि उन्हें कोई विशेष तवज्जो नहीं देता .
पर चूंकि यह प्रतिक्रिया सृजनशिल्पी जैसे प्रबुद्ध रचनाकार की कलम से आई थी तो थोडा दुख हुआ और प्रतिक्रिया देने का मन हुआ . पर आपका का ‘रिजोइंडर’ पढ कर बेहद सुकून मिला और बेचैनी दूर हुई . आपसे तो वैचारिक मतभेद रखना भी तोष देगा . दिक्कत बौद्धिक बहस और मतभेद से नहीं है, बद्धमूल पूर्वग्रहों और अविचार से है .
नरेन्द्र मोदी की छाया तले बैठकर , अपने व्यसाय के हानि-लाभ के मद्देनजर, गांधी को गरियाना एक बात है और उन पर गंभीर बहस करना दूसरी बात है . जब गांधी को उनके देश में — उस देश में जिसके लिये उन्होंने क्या-क्या नहीं सहा — गालियां पड रही हों तो उनका कुछ हिस्सा इस अदने से नागरिक को भी मिले तो यह उसके होने की सार्थकता नहीं तो और क्या है .
और फिर अब तो विवादी होना ही लोकप्रिय होना है . अतः जिस महापुरुष और आस्था के प्रतीक का जितना मानभंजन और मानमर्दन किया जा सके उतना देशत्वबोध और राष्ट्रबोध की चूलें हिलाने के लिये अच्छा है . यही पोस्ट-माडर्न और सबाल्टर्न के तहत हो रहा है .
अब बाजार देश और राष्ट्र की सीमाएं और राष्ट्रबोध विलुप्त कर देगा . नये आदमी की आस्था का केन्द्र बाजार होगा . और बाजार के लिये गांधी और गांधी के विचार न केवल गैरजरूरी हैं वरन उनके हितसाधन और लूट में बाधक भी हैं . अतः यह देखना भी रोचक होगा कि अधिकतर गांधीविरोधी क्या इस बाजारू लूट के आंशिक हिस्सेदार या बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मोटी तनख्वाह पाने वाले मुलाजिम हैं ? उत्तर भारत के ग्रामीण इलाकों में एक कहावत है जो इन दिनों बार-बार याद आती हैः
‘ जैसा खावे अन्न , वैसा होवे मन ‘
मन बहुत तेजी से बदल रहा है . यह तो स्पष्ट दिख रहा है . हमारी सदाशयता से भरी बौद्धिक बहस भी यदि उस बाजार के ही हितसाधन का उपकरण बन जाये तो आश्चर्य कैसा !
‘ गांधी पर बहस : प्रियंकर की टिप्पणियां ‘ ,http://samatavadi.wordpress.com/
मेरे विचार यहाँ लिखे है :
http://ashokdhamija.blogspot.com/2006/11/baba-ramdevs-talk-on-mahatma-gandhi.html
धन्यवाद्
अशोक धमीजा
>>>>
गांधी के नाम पर राजनीति करने वालों के प्रति उपजी हमारी घृणा कभी-कभार चेतन-अचेतन में गांधी के प्रति निकल जाती है. वस्तुतः इसका गांधी से कोई लेना-देना नहीं है.
सृजनशिल्पीजी, आशीष जी, प्रियंकर जी के विचारों में गंभीर भाव देखकर हर्षित एवं प्रभावित हुआ हूं. मैं यह मानता हूं कि गांधी मेरे जीवन में आए तमाम मूर्धन्य विद्वानों में सर्वश्रेष्ठ रहे हैं. बाक़ी राजनीतिक मापदन्डों पर वे भले ही खरे ना उतरें हों लेकिन तत्कालीन परिस्थितियों में उनसे बेहतर नेतृत्व मुझे दूर तक नज़र नहीं आता. उनके समकालीन नेताओं (नेताजी बोस, सरदार पटेल और पंडित नेहरू) में कहीं न कहीं वह पूर्णता नहीं थी जो भारतीय जनमानस को पूर्णतया प्रतिबिंबित करती हो.
यहां यूनीकोड हिन्दी में गांधी जी आत्मकथा पढ़कर उनके विचारों से साक्षात्कार करें.
http://wikisource.org/wiki/सत्यके_प्रयोग_अथवा_आत्मकथा
गाँधी के व्यक्तित्व से जो लोग स्वंय को मापते हैं -वह स्वंय को छोटा ही पाते हैं। और शायद इसीलिये ऐसे लोग अपनी खीज के कारण गाँधी को छोटा दिखाने के लिये दार्शनिक होने का बहाना करके बेसिर पैर की बाते करते हैं। जब भी गांधी के बारे में चर्चा होती है तो मैं एक ही बात कहता हूँ -अगर हम ये मान भी लें कि गांधी में हज़ार बुराईयाँ थी -लेकिन क्या हमें यह नहीं चाहिये कि हम उस शख्सियत की कुछ अच्छाईयों को देखें -और उन अच्छाईयों से कुछ सीखें? अपने को दार्शनिक साबित करने का इससे आसान तरीका नहीं हो सकता कि किसी बडी हस्ती के बारे में किसी बहाने कुछ बुरा कह दो -और अगर आप राष्ट्रपिता जैसी हस्ती चुनते हैं तो आपको खबरों में आने में एक पल भी नहीं लगेगा। रामदेव जी योग को बढावा दे कर बहुत सुन्दर कार्य कर रहे हैं -लोकप्रियता उन्हें पहले से ही बहुत हांसिल है -उन्हें इस तरह की ऊल-जुलूल बातें शोभा नहीं देती। योगी निंदा नहीं करता और ना ही किसी बहस में पडता है ना ही किसी बहस को जन्म देता है।
खैर भई, हम्-जैसे पढे-लिखे लोग मीडिया द्वारा उडाई ऐसी बातों पर बहस करने से ज्यादा कर भी क्या सकते हैं. ना कोइ ये जानना चाहता है कि स्वामी रामदेव जी ने क्या और क्यों कहा | हर एक-दो महीने बाद किसी ना किसी बात पर गांधी जी के बारे में सबके पास कुछ ना कुछ होता है, वो भी नकारात्मक| क्या गांधी जी किसी सकारात्मक बात पर कार्य और फिर बहस सम्भव है?
[...] बहरहाल, बाबा की बात तो बाबा जाने हमारे चिट्ठाजगत में भी बाबा रामदेव के बतान के बहाने काफ़ी कुछ लिखत-पढ़त हुयी। पहले शिल्पीजी ने लेख लिखा-गाँधी की महानता पर उठते प्रश्न। जनवरी में गांधी पर पुनर्विचार करने वाले शिल्पीजी ने साल खतम होते-होते नवंबर में उनकी महानता पर सवाल उठा दिये। लगे हाथ सागर चंद नाहर ने बाबा रामदेव की पीठ ठोंक दी कि वाह स्वामी रामदेव क्या बहादुरी की बात कही है। [...]
[...] पहली बात तो यह कि मैंने यह लेख गांधीजी के बारे में अपनी सोच बताने के लिये लिखा था। बाबा रामदेव के बयान का उल्लेख करती सृजन शिल्पीजी पोस्ट का पहला पैराग्राफ और सागर भाई के बाबा रामदेव को शाबासी देने के संदर्भ से अधिक मैंने इन पोस्टों के संबंध में कुछ नहीं लिखा। न ही मैंने बाबा रामदेव या ऒशो के बयान पढ़े थे जिनके लिंक सृजन शिल्पी की पोस्ट में थे। मेरे जो भी विचार थे वे बाबा रामदेव के बयान को लेकर थे। सृजन शिल्पी जी और सागर भाई की प्रतिक्रियायें पढ़ने के बाद मैंने सारे लेख, लिंक देखे और अब अपनी बात रखना चाहता हूं। [...]
[...] मुझे नहीं मालूम कि अनूप जी ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का कितना और किस दृष्टि से अध्ययन किया है। जहाँ तक मेरी बात है, मैंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास और उसमें विशेषकर गाँधी, नेहरू, सुभाष और भगत सिंह की भूमिका का अध्ययन करने के लिए काफी समय लगाया है। इस विषय से संबंधित दर्जनों पुस्तकों और सैकड़ों दस्तावेजों के विशद अध्ययन के दौरान जो बातें मेरे सामने अधिक से अधिक स्पष्ट होती गई हैं, उनके आधार पर प्रसंगवश कुछ बातों का जिक्र मैंने कर दिया था। मेरा उक्त दृष्टिकोण मेरे स्वतंत्र अध्ययन पर आधारित है और ज्यों-ज्यों इस विषय पर मेरा अध्ययन बढ़ता गया है, मेरी धारणा प्रबल होती गई है। [...]
[...] गांधी की महानता पर उठते प्रश्न [...]
गाँधी जी के समय में समस्याएं दूसरी थीं आज दूसरी है उल तरीके से हल सम्ब्हब नहीं है ‘ ओशो तो सबकी आलोचना करते थे किंतु उनपर कई मामलों में सहमत होने को मजबूर होना पढता है ओशो द्वारा गांधीजी पर जो भी लिखा गया है उन पर भी विचार किया जाबे तो कभी कभी यह मानना पड़ता है की न तो बाबा राम्देओ ग़लत है न रजनीश ग़लत थे आगे फिर अपने अपने विचार है मुंडे मुंडे मतिर भिन्न तुंडे तुंडे सरस्वती
महात्मा गांधी और बाबा रामदेव की तुलना करना भी एक महानता ही माना जायेगा,आज की पीढी को यह भी पता नही है,कि अन्ग्रेजी शासन क्या होता था,मै खुद इस बात का गवाह हूँ,कि अन्ग्रेजों के अत्याचार के कारण मेरे पिताजी मुझे दसों दिन जंगलों में रखते थे,और शीत गर्मी और बरसात का दुख जितना झेलना होता था,वह झेला करते थे,उन्नीस सौ छियालीस की गर्मियों की बात है,मेरे गांव की नहर की पटरी पर एक अन्ग्रेजों के ठहरने की कोठी बनी थी,अन्ग्रेज सैनिक जब निकलते थे,तो चारो तरफ़ हल्ला मचता था,”भागो फ़िरंगी”,और जो जहां पर जैसा होता था भाग लेता था,रोटी अगर चूल्हे के अन्दर होती थी तो वहीं रह जाती थी,आफ़त कमजोर और अबलाऒं की आती थी,कोई गांव की लडकी अगर किसी फ़िरंगी की नजर में चढ जाती थी,तो उसे अन्ग्रेजों के हाथों मरने के अलावा,परिवार में आते ही मार दिया जाता था,क्योंकि उसके उदर में कितने ही फ़िरंगियों का वीर्य भरा होता था,आज जैसे लोग अगर होते तो शायद गुलामी काट रहे होते,आज अपने ही लोग फ़िरंगियों की भाषा को पढ कर अपने ही देश में अबलाओं की कोख में अपना वीर्य भरने के लिये घूमते रहते है,नौकरी के बहाने घर पर रखते है,और फ़िर रोटी देने के नाम पर और अपनी ऊंची पहुँच रखने के कारण जिन्दगी को फ़िरंगियों से अधिक बरबाद करते है,इस लिये गांधी और रामदेव की तुलना करना बेकार है,उसे सीखो जो भूल कर आये हो,उसे याद करो जो तुम्हारे हमारे पुरखों ने झेला है,वे दिन याद करो जब तुम्हारे हमारे पूर्वज किसी प्रकार से हिन्दुत्व और मुसलमानी संस्कृति को बचा कर रख पाये थे,उन दिनो को याद करो जब जाते जाते हम दो भाइयों के अन्दर घरेलू कूटनीति को फ़ैलाकर लाखों परिवारों को उजाड दिया था,और वही कूटनीति का सहारा लेकर हम आपस में दूर और दूर होते जा रहे है,एक विशेष पार्टी एक तरफ़ अन्दरूनी कूटनीति आज भी फ़ैला रही है,और दूसरी बाहर से रहकर अपना नाम चमकाने के चक्कर में कूटनीति का सहारा ले रही है,एक पार्टी हिन्दू को भी आपस में बांटने के लिये राजनीतिक माहौल पैदा कर रही है,और हरिजन और नीच बताकर सवर्णों का भेद पैदा कर रही है,जनता को अब भी मानस बना लेना चाहिये कि हमने बहुत ही जिल्लत झेली है,लाखों कुर्बानिया दी है,हजारों सुहागिनो का सुहाग दाव पर लगा दिया था,हम भी यतीम थे,लेकिन एक दिन के लिये जेल जाकर स्वतंत्रता-संग्रामी होने की वाह वाही नही लूटी,किसी कारण से थाने में नाम आगया तो अपने को आगे कर नही चले,फ़िर कह रहा हूँ कि मत भूलो,हमारी संस्कृति बहुत मूल्यवान है.
सभी सिर्फ बाते ही करते है. गांधी जी स्वयं अपने अहिंसा रूपी खुंटे से बन्ध गये थे. जैसे भीष्म पितामह बन्धे थे. सिर्फ अहिंसा से ही समस्याऐं हल नहीं होती है. देश की स्वतन्त्रता तो बहुत बड़ी समस्या थी. मेरा यह मानना है कि चुकिं गांधी जी को जनता के सामने जनप्रिय बनना आ गया था. साथ ही एक बडी पार्टी से जुडे थे. अत जनप्रिय बनना तो स्वाभविक है. साथ अहिंसा रूपी नये विचार को (लीक से हटकर) को सार्वजनिक तौर पर उठाने वाले उस समय अकेले ही व्यक्ति थे. इसलिऐ भी उनको काफी प्रसिद्धि मिली. लेकिन देश की स्वतन्त्रता में अहिंसा ही प्रमुख नहीं थी.
साथ अंग्रेजों जो काफी धूर्त, चालाक, मक्कार थे. उन्होने भी काफी जाल बिछाया इनको जनप्रिय बनाने में. ताकि अहिंसा की आड्र में उनकी गलतियां माफ होती रहे. आशीष जी ने 10 करोड़ का आंकडा कहां से लिया है? यदि यह मान भी ले कि इतने लोगो ने गांधी जी को अपना आदर्श माना तो आज तक अपना देश अंहिसा वादी हो जाना चाहिऐ था. जहां कोई खून खराबा, लड़ाई झगड़ा न हो, हर बात अंहिसक तरीके से मनायी जायें. किन्तु हमारे देश के चुने हुये प्रतिनिधि ही आपस में टांग खिचाई में समय जाया करते है. जनता में जातिवाद बढ़ाने हेतु आरक्षण आदि करवाते है. कभी धर्म के नाम तो कभी जाति के नाम, तो कभी जगह के नाम लड्राते है असली मुद्रदे की बात तो कोई नहीं कहता है? कि पर्यावरण इतना दूषित क्यों हो रहा है? क्यों हमारी भूमि बंजर हो रही है? क्यों किसान गरीब से गरीब हो जा रहा है? क्यों नेता, आई.ए.एस. या अन्य उच्च अधिकारी गण लोग एसी कारों में ही सफर करते है? शहरी करण क्यों बढता जा रहा है? गांवों में इतनी असुविधाएं क्यों है? नैतिक पतन उच्च अमीर लोगों में ज्यादा क्यों है? क्यों अमीर लोग अपराध करके छूट जाते है? क्यों एक कम्पनी मालिक करोड़ों रूपयों से खेलता है? क्यों पहले की तरह व्यक्ति एक दूसरे का भला नहीं करते है? यह प्रव़ति शहरों में ज्यादा है.
इसलिए गांधी जी या रामदेव जी चर्चा से पहले यह देखना चाहिऐ कि हम क्या कर सकते है और क्या नहीं कर सकते है तथा देश, समाज या किसी व्यक्ति के लिये कितना भला किया है?
जहां तक मेरा मानना है कि गांधी जी की अहिंसा से मेरा भला तो अब तक नहीं हुआ है (जीव हिंसा के अर्थ में नहीं) दुष्ट व्यक्ति को अहिंसा समझ में नहीं आती है? उसे तो दण्ड ही समझा सकता है.
और रामदेव जी के प्राणायाम व योग (चुकिं योग व प्राणायाम वेदकाल से चला आ रहा है लेकिन लोकप्रिय रामदेव जी ने किया इसलिए) मुझे काफी लाभ हुआ है. जिसको यह बात नहीं समझ में आती हो वह स्वयं आधा घण्टा प्राणायाम करके देख लेवें. और ज्यादा जानना हो तो रामदेव जी के शिविर में श्री राजीव जी दीक्षित के विचार सुने. काफी बातें समझ में आ जाएगी. धन्यवाद
nature cant make twice every person or living beling is unique in the world , so dont make compare who is the great , all r the great , but the main thing what u learn from them , in my point of view mainly(also many other r) three ways to know truth , one is dissolve your self in nature means yog(by bhakri ,samrpan etc , ram ,krishna , shiv), second is madhya marg like mediatation , pranayam ( osho,buddha ,patjali etc) and third is viyog ( mahavir ) ( u r not body) so i think gandhiji mostly follow the mahavir(ahinsha) so comment between the wayers is common so all r the great i like really all.i like my mother and u like your mother its basic thing in common so all like his own thinking how ever all great person impact on simploe men so the common men quarreal due to his own thinking , time doing and time finished , so just enjoy by peace