मेरे पिछले लेख पर संजय बेंगानीजी की संक्षिप्त टिप्पणी ने कई चिट्ठाकारों को क्षुब्ध किया। प्रियंकरजी ने प्रति-टिप्पणी करके संजयजी को हक़ीक़त बताने की कोशिश की। कुछ अन्य चिट्ठाकारों ने मुझे मेल करके और जीमेल गपशप पर बातचीत करते हुए संजयजी की सोच पर अपनी व्यथा जताई। मैं यहाँ प्रो. विष्णु प्रकाश श्रीवास्तव का एक लेख प्रस्तुत करने जा रहा हूँ, जो इस विषय की वास्तविकता को अत्यंत गहनता से स्पष्ट करता है। आशा है, इससे संजयजी एवं उनके जैसी सोच वाले अन्य व्यक्तियों की मानसिकता में कुछ परिवर्तन आने के आसार बनेंगे।
भारतीय बाजार में उतरने के बाद एक कोल्ड ड्रिंक कम्पनी की उच्च स्तरीय प्रबंध समिति ने अपने मूल मंत्र की घोषणा की–“हमारा सबसे बड़ा दुश्मन है, पानी”। बात सीधी थी–गर्म देश में राह चलने वाले को पानी न मिले तो झक मारकर आदमी प्यास बुझाने के लिए कुछ भी लेगा, किसी भी कीमत पर लेगा। रणनीति बनी, योजनाएँ बनाई गई कि सार्वजनिक स्थानों पर पानी कम से कम मिले। सार्वजनिक स्थानों–बस अड्डों, रेलवे स्टेशनों पर लगे नल सूखने लगे। जब गाड़ियों का समय होता तब विशेष रूप से नल बन्द रहने लगे। रेलों में, बसों में, विशेष रूप से नल बन्द रहने लगे। रेलों में, बसों में बोतलों की टनटनाहट और फेरीवालों की आवाज “कोल्ड ड्रिंक….कोल्ड ड्रिंक” तेज होती गई।
पेप्सी-कोक की प्रेत छाया के निशान देश के चप्पे-चप्पे पर छा गए। इन कंपनियों ने विज्ञापनबाजी, तरह तरह के इनामों तथा उत्सवों की स्पांसरशिप से नई संस्कृति को जन्म दिया, जिसमें पेप्सी-कोक निर्बाध मौज-मस्ती की जीवन शैली के प्रतीक बने। इस नए युग में पानी का ही नहीं, लस्सी, ठंडई, तरह तरह के शरबत और स्वास्थ्यवर्धक फलों के रस का स्थान मोटापा बढ़ाने वाले, दाँत और हड्डी गलाने वाले अल्कोहल युक्त पेप्सी और कोक ने ले लिया।फिर पानी की बदनामी होने लगी। जी हाँ, सार्वजनिक स्थानों पर उपलब्ध पानी की, नगर निगमों द्वारा वितरित पानी की, रेल प्रशासन द्वारा स्टेशनों पर उपलब्ध कराए गए पानी को गन्दा और पीने लायक न होने की बात फैलाई गई। रंगमंच पर पदार्पण हो रहा था पानी की बोतल का। जो कंपनियाँ कोल्ड ड्रिंक बेचने में सबसे मशहूर थीं–पानी बेचने की होड़ में लग गईं। पानी बेचने के लिए विज्ञापन में पानी की उपयोगिता बताने की जरूरत नहीं थी। बस इतनी जरूरत थी कि सरकारी पानी की शुद्धता पर संदेह का प्रचार-प्रसार किया जाए। जो लोग सामान्य से अलग, विशिष्ट दिखने की लालसा रखते हैं, स्टैण्डर्ड दिखाने के लिए मँहगे वस्त्राभूषण पहनते हैं, उन्हें पानी की बोतल थमा दी गई। उच्च-स्तरीय अधिकारियों की मीटिंग में मेज पर पानी की बोतलों की उपस्थिति आवश्यक बनाई गई। उच्च वर्ग में शादी आदि के आयोजन के अवसरों पर पानी बड़ी बोतलों में दिखने लगा। इन स्टैंडर्ड वाले लोगों में ज्यादातर लोग घरेलू जिन्दगी में सरकारी पानी ही पीते हैं, किन्तु अनजाने में जिस अंधेर नगरी की नींव पक्की हो रही है, उसमें –
कम्पनियों का है राज, विज्ञापन है ज्ञान।
दूध, कोक, पानी सबै, बिकै एक ही दाम।।
इस बात को साफ तौर पर समझ लेना चाहिए कि इस बोतलबन्द पानी के पीछे भारत की पेयजल की समस्या को हल करने की कोई मंशा नहीं है। इससे पानी को शुद्ध करके पीने का सामाजिक वातावरण बना हो, ऐसा भी नहीं है। उल्टे सार्वजनिक पानी की व्यवस्था में शुद्धता लाने के प्रयासों को घूस और कमीशन देकर रुकवाया जाता है, जिससे सार्वजनिक पानी की शुद्धता पर संदेह बढ़े और बोतल का पानी अधिक बिके।
एक बार आजादी बचाओ आन्दोलन की ओर से नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर गर्मियों के दिनों में यात्रियों को पानी पिलाने के काम में हिस्सा लेने का सुअवसर मिला और इसी बहाने रेल प्रशासन द्वारा यात्रियों के लिए पानी के इंतजाम को भी समझने का अवसर मिला। रेलवे के कई वरिष्ठ अधिकारियों से इस कार्य में सहयोग भी मिला और रेलवे के फिटर-प्लम्बर आदि कर्मचारियों ने तो पानी पिलाने के इस पुण्य कार्य में आगे बढ़कर हाथ बँटाया। यहाँ तक कि बहुत सारे स्कूली बच्चों ने भी उत्साह से इस अभियान में भाग लिया। कार्य के दौरान पता चला कि प्लेटफॉर्म नंबर एक को छोड़कर सारा पानी रेल प्रशासन द्वारा मंडावली के निकट स्थित रैनी बेल्स से लाया जा रहा है। जबकि प्लेटफॉर्म नंबर एक का पानी दिल्ली जल बोर्ड द्वारा दिया जाता है, जिसकी शुद्धता की नियमित जाँच कराई जाती है। इस अभियान के कारण बोतलबंद पानी और कोल्ड ड्रिंक बनाने वाली कंपनियों के इशारे पर उस वर्ष नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर पानी के नल बन्द नहीं कराए जा सके।
गाँधीजी ने एक बार ही पानी पीकर कुल्हड़ को तोड़ देने को मनुष्य के श्रम का अपमान बताया था। सन्त तिरुवल्लुवर ने साड़ी को नष्ट करके, पैसा देकर उसकी भरपाई करने वाले की मूर्खता की कथा सुनाई थी। पानी पीकर बोतल तोड़ते हुए जब लोगों को देखता हूँ तो लगता है कि गाँधी-तिरुवल्लुवर की गर्दन मरोड़ी जा रही है। एक लीटर पानी पीकर तीन रुपये की प्लास्टिक की बोतल तोड़ना यूज एंड थ्रो संस्कृति में ढालने का बेजोड़ उदाहरण है। रेलवे लाइन पर सभी जगह टूटी हुई प्लास्टिक की बोतलों की सजावट देखी जा सकती है। फटेहाल बच्चे इन बोतलों को उठाकर बेचने न ले जाते तो सुप्रीम कोर्ट को इस अम्बार की सफाई करने का आदेश रेलवे प्रशासन को देने के लिए मजबूर होना पड़ता। वैसे, वैष्णो देवी की यात्रा के रास्ते में टूटी प्लास्टिक की बोतलों का भक्तों द्वारा चढ़ाया जा रहा अम्बार यदि ऐसे ही बढ़ता रहा तो कुछ वर्षों बाद वैष्णो देवी यात्रा को भी बन्द करना पड़ेगा, जैसा कि फूलों की घाटी को बंद करना पडा था। ग्रीन पीस नामक संस्था की ओर से प्रकाशित एक पत्र “पेप्सी पल्युट्स द प्लैनेट” में बीसियों पोतों में भरकर अमेरिका की सड़कों का प्लास्टिक का कूड़ा भारत लाने का समाचार और तमिलनाडु में उससे बने पहाड़ों का चित्र देखने को मिला था। क्या हम उसी इंपोर्टेड प्लास्टिक से बनी बोतलों से पानी पीकर धन्य तो नहीं हो रहे?
“अरे, सारा पानी तो भाई पिए जा रहे हैं,…मेरे लिए कितना कम छोड़ा?” चीखते, शिकायत करते, लड़ते भाई-बहन देखे जा सकते हैं। खरीदी हुई बोतल की संस्कृति में साथी मुसाफिर या बच्चे को पानी के लिए पूछने की गुंजाइश कहाँ? घर में खरीदकर पानी पीने वाले नौकरों और सामान्य अतिथियों के लिए सरकारी पानी ही प्रयोग करते हैं। खरीदे हुए पानी को नौकर-चाकरों से बचाकर रखने की रणनीति अपनाई जाती है। यह उस देश का नजारा है, जहाँ पानी पिलाना, कुआँ, तालाब खुदवाना पुण्य कार्य समझा जाता था। यह धारणा फैलाई जा रही है कि शुद्ध पानी वह पिए जिसकी जेब में उसका दाम चुकाने की क्षमता हो। पहले सार्वजनिक शिक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा के साथ भी यही किया गया। फलस्वरूप, अमीरों के स्कूल अलग और गरीबों के अलग, अमीरों के अस्पताल अलग और गरीबों के अस्पताल अलग हो गए। अब बँटवारा हो रहा है, अमीर का पानी और गरीब का पानी। सार्वजनिक शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का बेड़ा गर्क कर दिया गया। पानी की उपलब्धता और शुद्धता के सामूहिक दायित्व से जो समाज हाथ खींच रहा है, वह यह जान ले कि पानी के धंधे से बढ़कर भ्रष्टाचार और कहीं नहीं है।
जिसकी जेब में दाम हो वह पानी पिए–इस दर्शन के पीछे विश्व बैंक की प्रस्तावित जल योजना है। पानी के निजीकरण से 40 करोड़ डॉलर के बाजार पर गिद्धों की निगाह है। भारतीय जीवन दर्शन पानी जैसी जीवन की अनिवार्य वस्तु को समाज की साझा संपत्ति मानता आया है, न कि निजी मुनाफे की वस्तु। पानी की बिक्री तथा नगर में पानी व्यवस्था के प्रबंध के बहाने बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ पानी जैसी अनिवार्य और दुर्लभ वस्तु पर अपना कब्जा जमा रही हैं। पानी की मिल्कियत को लेकर देश-देश में झगड़े शुरु हो गए हैं। कनाडा की प्रांतीय सरकार ने जन आक्रोश के दबाव में ब्रिटिश कोलम्बिया से पानी का निर्यात रोक दिया तो निर्यात करने वाली अमेरिका की सन बेल्ट वाटर कारपोरेशन ने कनाडा सरकार पर हर्जाने का मुकदमा ठोंक दिया। बोलिविया में पानी के बढ़ते दाम के खिलाफ जनता ने रास्ते जाम कर दिए। विशाल जनांदोलन के बाद उन्हें बैक्टेल कंपनी से मुक्ति मिल सकी। दक्षिण अफ्रीका में जल प्रबंधन तथा जल निकास सेवाओं को फ्रांसीसी कंपनी को दिए जाने के विरुद्ध संघर्ष जारी है। भारत में भी कई शहरों की जलापूर्ति व्यवस्था पर विदेशी कंपनियों ने कब्जा जमाना शुरू कर दिया है।
(प्रो. श्रीवास्तव दिल्ली विश्वविद्यालय में गणित के विभागाध्यक्ष रह चुके हैं और आजादी बचाओ आंदोलन के दिल्ली संयोजक हैं।)
(साभार: नई आजादी उदघोष, अक्तूबर, 2001)
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मैँ इस विषय पर अपना मत एक पोस्ट के रुप मे लिख रहा हुं.
मैं भी बहुत दिनो से ‘आजादी बचाओ आन्दोलन’ का साहित्य पढ़ता रहा हूं और उनकी गतिविधियों को देखता रहा हूं। मुझे उनका चिन्तन बहुत गहन मालूम पडता है।
विज्ञापन और प्रोपेगैन्डा बड़े-बड़े लोगों को चकित भ्रमित कर देते हैं। विज्ञापन में वो दम है कि आपसे पैसा देकर जहर खरीदकर पीने की प्रबल उत्कण्ठा जागृत कर सकता है।
लेखक के विचारों से मैं अपने को सहमत पाता हूं।
जानकारी से परिपूर्ण लेख प्रस्तुत करने के लिए धन्यवाद। लेखक ने बहुत बारीकी से भारत के वर्तमान का वर्णन किया है।
आपकी और इस लेख के लेखक की बात से मैं भी पूर्ण रूप से सहमत हूँ परन्त शायद संजय भाई अपनी बात सही तरीके से नहीं कह पाये आपके लेख पर, देखते हैं वे क्या कहना चाहते है|
उत्कृष्ट लेख। वैसे पानी की समस्या पर बैक्टेल का नाम सुनकर रोंगटे खड़े कर देने वाली बोलिविया की सच्चाई याद आ गई। यह निंरतर के एक पुराने अँक मे विस्तार से निकली है। निंरतर की साईट डाऊन है, उपलब्ध होने पर अवश्य पढ़ें।
मैं यह नहीं समझ पा रहा हूँ की पेप्सी का विरोध करने से क्या सबको पानी मिल जाएगा या फिर पाँच सितारा स्कुलो को रोक कर सबको शिक्षा मिलना तय हो जाएगा?
यह टिप्पणी संजय बेंगाणी ने की थी. यह बात उनकी सोच और समझ के अनुसार उन्होंने लिखी. वे सही हो सकते हैं और गलत भी. लेकिन उनकी टिप्पणी से तमाम चिट्ठाकार अप्रसन्न हुये यह बात कुछ समझ में नहीं आयी. प्रियंकरजी ने लिखा है और उसके बात किसी ने कुछ नहीं लिखा तो फिर “संजयजी की सोच पर अपनी व्यथा जताई। वे संजयजी को नाराज नहीं करना चाहते, इसलिए खुलकर प्रतिक्रिया जाहिर करने से बचते रहे।लिखने का कोई मतलब नहीं बनता. संजय बेंगाणी की सोच-समझ से हमें सहमति-असहमति हो सकती है लेकिन उनकी एक बात का मैं कायल हूं कि वे जैसा सोचते हैं, समझते हैं वैसा कहने में हिचकते नहीं. उनकी पोस्ट का इंतजार है मुझे.
[...] पानी में कितना पानी यह सृजन-शिल्पी की प्रविष्टी के पहले पेरेग्राफ के लिए लिखा गया है. इससे पहले मैंने उन्हे टिप्पणी में यह लिखा था की पाँच सितारा स्कूल क्यों नही खोले जाने चाहिए. तथा कोला का विरोध करने से कैसे आम आदमी को पानी उपलब्ध हो जाएगा. यहाँ यह भी बता देना चाहता हूँ की हो सकता है कोला कम्पनियों का विरोध करने वाले कभी सोफ्ट ड्रींक पीते हो, मैं सोफ्ट ड्रींक न पीता हूँ न पीलाता हूँ. [...]
[...] पहले यह पढ़ लिजीये यह यहाँ लिखा गया है. वे संजयजी को नाराज नहीं करना चाहते, इसलिए खुलकर प्रतिक्रिया जाहिर करने से बचते रहे। [...]
बढ़िया लेख है जो हमें कुछ सोचने पर मजबूर करता है । इस बात में दो मत नहीं हो सकता कि शुद्ध पेय जल की उपलब्धता और सब के लिये प्राथमिक शिक्षा सरकार की अनिवार्य जिम्मेवारी है और वो इससे दूर नहीं हठ सकती ।
इस लेख का एक-एक शब्द सच्चा है…..इसे हम तक पहुँचाने के लिये ह्रदय से धन्यवाद !!
रीतेश गुप्ता
[...] बात तो उनकी तर्कसंगत है, परन्तु यहाँ ज़रा तर्क को हम साईड में लगा देते हैं, उससे हर किसी का पाला नहीं पड़ता। तो हम आगे बढ़ते हैं। सृजनशिल्पी जी ने एक अन्य पोस्ट इस विषय पर लिखी जिसमें उन्होंने दो बातें बताई। [...]
यहाँ अमरीका में भी यही हाल है भैया। बोतल बन्द पानी का अरबों डॉलर का व्यवसाय है, और अधिक बढ़ता जा रहा है। सभी लोगों के दिमाग में यह भ्रम होता है कि नल का पानी शुद्ध नहीं है। निजी कम्पनीयां बच्चों-परिवार के स्वस्थ्य के नाम पर ऐसा भ्रम फ़ैलाती हैं कि जज़्बात में बहकर कोइ नल का पानी ना पीये।
भई हम तो भारत में नल का पानी पीकर इतनी बड़े हुए हैं। इतना ज़रूर है कि यहाँ के नल का पानी काफ़ी रासायनिक शुद्धि के बाद ही घर तक पहुँचाया जाता है इसीलिये नल का ही पीती हैं।
[...] “हैलो सरकिट,” “अरे मुन्नाभाई कैसे हो, अब तो तुम्हे बहुत टाईम हो गया चिट्ठा गिरी करते। क्या समाचार हैं चिट्ठा जगत के? ” “अरे कुछ मत पूछ सरकिट, इदर पानी और कोक को लेकर लफड़ा हो गया।” “अरे क्या मुन्ना भाई ! पानी और कोक? अरे दारू पीने का और मस्त रहने का। क्या?” “चुप्प ! दारू का नाम नहीं लेने का ! ये जगदीश भाटिया का ब्लाग है, अभी आ गया तो भोत पिटायी करेगा तेरी। वो तो क्या हुआ कि संजय भाई की एक टिप्पणी से अपने नीरज भाई की भावना को चोट लग गई।” “भाई ये भावना कहां रहती है? ” “अरे रास्कल ! भावना बोले तो विचार ! फीलिंग ! नीरज भाई बोला कि गरीब के वास्ते साफ पानी, एजुकेशन और मेडिकल सर्विस के लिये सरकार को ज्यादा बजट देना चहिये।” “तो भाई इसके लिये सरकार के पास और पैसा किदर से आयेंगा?” “जब टाटा, बिड़ला और अंबानी और इनके जैसी हजारों कम्पनियां ज्यादा मुनाफा कमा कर ज्यादा टेक्स देंगी।” “वो कैसे होगा भाई? ” “जब अधिक से अधिक लोग कोक पेप्सी पीयेंगे, रिलाईंस के मोबाईल खरीदेंगे। नये नये मॉल और एसईज़ेड बनेंगे। पता है सरकिट, इस बार मैं लाईब्रेरी में चाईना की इकोनॉमी स्टडी कर रहा था। वहां का एक एसईजेड ही इतना एक्सपोर्ट कर देता है जितना अक्खा इंडिया भी नहीं करता। और वहां खाली पड़ी बंजर जमीनों पर नये नये कई एसईजेड बन गये हैं जिनके आसपास कई नये शहर बस गये हैं और यह सब हुआ सिर्फ पिछले सात आठ सालों में। उनके एक बैंक की टर्नओवर हमारी अक्खी कंट्री की बैंकिंग ईंडस्ट्री से पांच गुना ज्यादी है। अपनी सरकार को भी कुछ ऐसाइच करना चाहिये। इससे सबको साफ पानी मिल जायेंगा भाई?” “यह तो मुझे पता नहीं मगर इतना जानता हूं कि सरकार अकेली किस किस को नौकरी देगी और किस किस की गरीबी दूर करेगी? रिलायंस के रिटेल आउटलेटस अगर लोगों को नौकरी देते हैं तो क्यों न खुलें?” “पर भाई हमारा कोई अपना सामाजिक इकोनॉमिक मॉडल भी तो होगा जो चाईना से अलग हो?” “हां, हमारा है समाजवादी पूंजीवाद और उनका है पूंजीवादी समाजवाद !” “है ! ! ! ! ! ! ! ! ! ! ! ! ! ! इसमें क्या फर्क है भाई?” “पता नहीं सरकिट !” [...]
[...] [सुपरिचित कथाकार अखिलेश का नाम हिंदी कथा पाठकों के लिये जाना-पहचाना नाम है। उनकी कहानी चिट्ठी में देश के तमाम पढ़े-लिखे युवा अपने को या अपने परिवेश को किसी न किसी न रूप में मौजूद पाते हैं। अखिलेश का एक आत्मक्थ्य नुमा लेख मेरे पसंदीदा लेखों में हैं। प्रख्यात साहित्यिक कथापत्रिका, ‘कथादेश’, के फरवरी २००० के अंक में प्रकाशित यह लेख पत्रिका के नियमित स्तम्भ ‘मैं और मेरा समय’में छ्पा था। इस स्तम्भ के अंतर्गत प्रसिद्ध लेखकों के अपने समय के बारे में अनुभव व विचार प्रस्तुत किये जाते हैं। हिंदी ब्लाग जगत में जब सृजन शिल्पी के एक लेख पर संजय बेंगाणी पर की टिप्पणी पर लेख उस पर अमित का लेख और फिर नीरज दीवान का बड़ी मेहनत से लिखा विचारोत्तेजक लेख प्रकाशित हुआ तो मुझे एक बार फिर यह लेख बहुत याद आया। इसलिये मैं अखिलेशजी के इस लेख को यहां प्रस्तुत कर रहा हूं। आशा है कि लेख अपनी पर्याप्त लंबाई के बावजूद आपको पढ़ने और सोचने के लिये मजबूर करेगा] अखिलेश [...]
[...] [सुपरिचित कथाकार अखिलेश का नाम हिंदी कथा पाठकों के लिये जाना-पहचाना नाम है। उनकी कहानी चिट्ठी में देश के तमाम पढ़े-लिखे युवा अपने को या अपने परिवेश को किसी न किसी न रूप में मौजूद पाते हैं। अखिलेश का एक आत्मक्थ्य नुमा लेख मेरे पसंदीदा लेखों में हैं। प्रख्यात साहित्यिक कथापत्रिका, ‘कथादेश’, के फरवरी २००० के अंक में प्रकाशित यह लेख पत्रिका के नियमित स्तम्भ ‘मैं और मेरा समय’में छ्पा था। इस स्तम्भ के अंतर्गत प्रसिद्ध लेखकों के अपने समय के बारे में अनुभव व विचार प्रस्तुत किये जाते हैं। हिंदी ब्लाग जगत में जब सृजन शिल्पी के एक लेख पर संजय बेंगाणी पर की टिप्पणी , उस पर अमित का लेख और फिर नीरज दीवान का बड़ी मेहनत से लिखा विचारोत्तेजक लेख प्रकाशित हुआ तो मुझे एक बार फिर यह लेख बहुत याद आया। इसलिये मैं अखिलेशजी के इस लेख को यहां प्रस्तुत कर रहा हूं। आशा है कि लेख अपनी पर्याप्त लंबाई के बावजूद आपको पढ़ने और सोचने के लिये मजबूर करेगा। ] [...]
[...] [सुपरिचित कथाकार अखिलेश का नाम हिंदी कथा पाठकों के लिये जाना-पहचाना नाम है। उनकी कहानी चिट्ठी में देश के तमाम पढ़े-लिखे युवा अपने को या अपने परिवेश को किसी न किसी न रूप में मौजूद पाते हैं। अखिलेश का एक आत्मक्थ्य नुमा लेख मेरे पसंदीदा लेखों में हैं। प्रख्यात साहित्यिक कथापत्रिका, ‘कथादेश’, के फरवरी २००० के अंक में प्रकाशित यह लेख पत्रिका के नियमित स्तम्भ ‘मैं और मेरा समय’में छ्पा था। इस स्तम्भ के अंतर्गत प्रसिद्ध लेखकों के अपने समय के बारे में अनुभव व विचार प्रस्तुत किये जाते हैं। हिंदी ब्लाग जगत में जब सृजन शिल्पी के एक लेख पर संजय बेंगाणी पर की टिप्पणी , उस पर अमित का लेख और फिर नीरज दीवान का बड़ी मेहनत से लिखा विचारोत्तेजक लेख प्रकाशित हुआ तो मुझे एक बार फिर यह लेख बहुत याद आया। इसलिये मैं अखिलेशजी के इस लेख को यहां प्रस्तुत कर रहा हूं। आशा है कि लेख अपनी पर्याप्त लंबाई के बावजूद आपको पढ़ने और सोचने के लिये मजबूर करेगा। ] अखिलेश [...]
[...] [सुपरिचित कथाकार अखिलेश का नाम हिंदी कथा पाठकों के लिये जाना-पहचाना नाम है। उनकी कहानी चिट्ठी में देश के तमाम पढ़े-लिखे युवा अपने को या अपने परिवेश को किसी न किसी न रूप में मौजूद पाते हैं। अखिलेश का एक आत्मक्थ्य नुमा लेख मेरे पसंदीदा लेखों में हैं। प्रख्यात साहित्यिक कथापत्रिका, ‘कथादेश’, के फरवरी २००० के अंक में प्रकाशित यह लेख पत्रिका के नियमित स्तम्भ मैं और मेरा समय में छ्पा था। इस स्तम्भ के अंतर्गत प्रसिद्ध लेखकों के अपने समय के बारे में अनुभव व विचार प्रस्तुत किये जाते हैं। हिंदी ब्लाग जगत में जब सृजन शिल्पी के एक लेख पर संजय बेंगाणी पर की टिप्पणी , उस पर अमित का लेख और फिर नीरज दीवान का बड़ी मेहनत से लिखा विचारोत्तेजक लेख प्रकाशित हुआ तो मुझे एक बार फिर यह लेख बहुत याद आया। इसलिये मैं अखिलेशजी के इस लेख को यहां प्रस्तुत कर रहा हूं। आशा है कि लेख अपनी पर्याप्त लंबाई के बावजूद आपको पढ़ने और सोचने के लिये मजबूर करेगा। ] [...]