सत्ताधारी वर्ग की हमेशा से यह रणनीति रही है कि वह अपना सार्वजनिक मुखौटा उदार और भलमनसाहत का बनाए रखने का प्रयास करता है, जबकि उसके असली इरादे शोषणमूलक और वर्चस्ववादी होते हैं। भूमंडलीकरण का एक सिद्धांत यह है कि जैसे-जैसे इसकी रफ्तार तेज होगी और आय के नए स्रोतों का सृजन होगा तो धीरे-धीरे ‘आय का रिसाव’ सामाजिक व्यवस्था के निचले वर्गों तक भी होगा। इस तरह कुछ देर से ही सही, भूमंडलीकरण का फायदा गरीबों को भी होगा। दरअसल, बगैर समाज के निचले वर्गों के बहुसंख्यक लोगों के हितों को अपनी सैद्धांतिक परिधि में समाहित किए कोई भी विचारधारा सत्ता की नीति बन ही नहीं सकती। इसलिए सत्ता हमेशा सबको साथ में लेकर चलने और सबके हित में काम करने की बात करती है। भूमंडलीकरण के पैरोकार अगर गरीबी दूर करने या ‘भूमंडलीकरण के मानवीय चेहरे’ की बात करते हैं तो ऐसा वे अपनी उसी रणनीति के अनुरूप ही करते हैं। हालाँकि उन्हें भी यह स्वीकार करना पड़ रहा है कि भूमंडलीकरण के कारण अमीरों और गरीबों के बीच की खाई बढ़ रही है, जिसे पाटने के लिए ‘सुरक्षा छतरी’ बनाने जैसे कुछ विशेष प्रयास करने की जरूरत है। लेकिन इसे उनकी बौद्धिक ईमानदारी का सूचक या आत्मग्लानि का प्रतिफलन मान लेना हद दर्जे की मासूमियत ही होगी, क्योंकि यह वास्तव में शोषणमूलक पूँजीवाद के नकारात्मक प्रभावों को कल्याणकारी राजनीति के छद्म आवरण की ओट देने की पुरानी कुटिल साजिश है, जिसे उन्हें लोकतांत्रिक राजनीतिक परिवेश के दबाव के कारण मजबूरी में अपनाना पड़ता है।
लेकिन चिंता की मुख्य बात यह है कि पूँजीवादी सत्ता के इन साजिशों को समझ सकने और उनकी स्वतंत्र एवं मुखर आलोचना के द्वारा प्रतिरोध कर सकने की संभावनाएँ लगातार क्षीण होती जा रही हैं। सोवियत संघ के पतन और चीन की समाजवादी व्यवस्था के बाजारवादी अनुकूलता में ढल जाने के बाद अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में पूँजीवाद की राह के रोड़े समाप्त हो गए। तीसरी दुनिया के सामने कोई और विकल्प ही नहीं रहा। भारतीय राजनीतिक पटल में दिखायी दे रही विकल्पहीनता का मौजूदा दौर भी इसी की उपज है। सत्ता की राजनीति का अब यह स्थापित दर्शन बन गया है कि आम जनता के हितों के मुद्दे चुनाव में उठाकर सत्ता हासिल करो और सत्ता में आते ही वे सारे कृत्य करो जो आम जनता के हितों के खिलाफ हो, लेकिन यह सावधानी जरूर बरतो कि बीच-बीच में आम जनता और गरीबी की बातें भी करते रहो, यानी आत्मालोचन का भ्रम भी फैलाए रखो।
सत्ता पक्ष का नया पैंतरा यह है कि वह विपक्ष की भूमिका में सेंध मारकर उसकी आवाज चुरा लेता है। ऐसा इसलिए संभव हो पाता है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच विचारधारा और नीतियों के मामले में कोई स्पष्ट अंतर नहीं रह गया है। विपक्ष के पास न तो कोई ठोस विकल्प बचा है और न ही जनता के हित में संघर्ष करने की उनमें प्रतिबद्धतापूर्ण ईमानदारी बची है। वे विपक्ष में रहते हुए जिस बात का विरोध करते हैं, सत्ता में आते ही बेशर्म होकर उसी के प्रवक्ता बन जाते हैं।
भारत में आज कोई भी विपक्षी राजनीतिक दल यह विकल्प प्रस्तुत करने को तैयार नहीं है कि यदि वे सत्ता में आ जाएंगे तो गरीबों, छोटे किसानों, असंगठित मजदूरों और देशी लघु एवं कुटीर उद्योगों के हित में विश्व व्यापार संगठन से बाहर निकलना पसंद करेंगे और भूमंडलीकरण का रास्ता छोड़ देंगे। क्योंकि भूमंडलीकरण के अनिवार्य खतरों से अवगत होने के बावजूद उनकी मजबूरी यह है कि उनके पास ऐसा कोई ठोस विकल्प है ही नहीं कि भूमंडलीकरण का रास्ता छोड़ने के बाद वे किधर जाएंगे। ऐसे में उन्हें सत्ता प्राप्ति के लिए मक्कारी वाला रास्ता अपनाना पड़ता है। वे गरीब किसान, मजदूर आदि की बातें करके सत्ता हासिल करते हैं और सत्ता हासिल होते ही ठीक उसके विपरीत काम करने लगते हैं। क्योंकि सत्ता हासिल होने के बाद गरीब आम जनता के हित में काम करना उनके लिए फायदे का धंधा नहीं रह जाता है। चूँकि राजनेताओं का सत्ता-प्राप्ति का अभियान मूल रूप से पैसा बनाने के लिए होता है और पैसा उन्हें पूँजीपतियों को पहुँचाए गए लाभ के प्रतिशत के रूप में प्राप्त होता है और पूँजीपतियों को लाभ आम जनता के शोषण से होता है, इसलिए आम जनता के प्रति शोषणमूलक नीति अपनाना राजनेताओं की नियति बन जाती है। लेकिन सबसे त्रासदीपूर्ण विकल्पहीनता तो खुद आम जनता की है। वह राजनेताओं के इस दोहरे चरित्र को भली-भाँति जानते-समझते हुए भी कोई निरापद विकल्प चुनने की स्थिति में नहीं है। दरअसल, भूमंडलीकरण के नियंताओं को सबसे जबरदस्त कामयाबी इसी में मिली है। उन्होंने प्रतिरोध के सभी संभावित स्वरों को स्खलित करके बिखेर दिया है। इसलिए आम आदमी के हित में कोई साझी जोरदार आवाज उठने का कोई संयोग ही नहीं बन पा रहा और प्रतिरोध के सन्नाटे में उन्हें अपनी इस मक्कारी को वह उदार छवि पहनाने का अवसर मिल जाता है कि गरीब आदमी के लिए भी सबसे अधिक चिंतित वे ही हैं। ऐसे में जबकि भूमंडलीकरण के मोहपाश में आबद्ध सत्ता पक्ष विपक्ष की भूमिका में सेंध लगाकर उसकी आवाज को चुरा लेने के कुटिल षड्यंत्र में जुटा है, सवाल उठता है कि उसके षड्यंत्र का पर्दाफाश कैसे किया जाए और कैसे उसके खिलाफ एक मजबूत प्रतिरोध खड़ा किया जाए? इसके लिए सबसे पहले भूमंडलीकरण के शिकार लोगों को संगठित होकर अपना एक ठोस वैकल्पिक आधार तैयार करने की जरूरत है। हमें अपने राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य, परिस्थिति और प्रयोजन को ध्यान में रखकर विकास का अपना एक मॉडल विकसित करना पड़ेगा। इस समय सत्ता द्वारा समाज के ऊपर के जिन तीन प्रतिशत कुलीन वर्ग के हितों और आकांक्षाओं के दबाव में राष्ट्रीय नीतियाँ तैयार की जा रही हैं, उसके सारे सपने अंतर्राष्ट्रीय कुलीन बिरादरी का अंग बन जाने के हैं। उन्हें सबकुछ ‘ग्लोबल’ स्तर का चाहिए। वे स्वदेशी संसाधनों को दरकिनार करके विदेशी संसाधन उधार लेकर विकास का अपना महल खड़ा करने की कोशिश में जुटे हुए हैं। भूमंडलीकरण का सारा खेल इसी वर्ग के लिए हो रहा है। सरकार उसी वर्ग के हितों के लिए अपनी आर्थिक नीतियाँ तैयार कर रही है। बजट उन्हीं की सुविधाओं को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं।हमें इसको चुनौती देनी पड़ेगी। हमें बताना होगा कि हमें विदेशी संसाधन उधार लेने की जरूरत नहीं है और अगर विदेशी संसाधन हमें चाहिए भी तो अपनी शर्तों पर चाहिए, अपनी जरूरतों के हिसाब से चाहिए। हमें यह बताना होगा कि हम अपने संसाधनों के बल पर अपना विकास कर सकते हैं, हमें यह दिखाना होगा कि विकास और प्रगति का हमारा अपना भारतीय मॉडल है। हमें मँहगी विदेशी कारें नहीं, बल्कि सक्षम सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था चाहिए। हमें पेप्सी और कोकाकोला नहीं, बल्कि स्वच्छ पेयजल चाहिए। हमें पाँच सितारा निजी स्कूल और अस्पताल नहीं, बल्कि सबके लिए बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएँ चाहिए। विदेशी सहयोग की हमें उच्च प्रौद्योगिकी और अनुसंधान जैसे चुनिंदा क्षेत्रों में ही जरूरत है। विदेशी पूँजी भी हमारे लिए आकस्मिक रूप से ही जरूरी हो सकती है। लेकिन इस तरह का ठोस वैकल्पिक आधार प्रस्तुत करने के लिए पहले हमें वैचारिक गुलामी और पराभिमुखता से निजात पानी होगी। इस समय केवल हमारे राजनेता ही नहीं, बल्कि हमारे अधिकांश बौद्धिक जन भी मानसिक दिवालिएपन के शिकार दिखाई देते हैं। उन्हें मौलिक रूप से कुछ सूझता ही नहीं। वे पश्चिमी विचारधारा, सिद्धांत और मॉडल का अंधानुकरण करने में लगे हैं। इस स्थिति से अधिक घातक हमारे लिए कुछ और नहीं हो सकता। इतना ही नहीं, वे अपने अहंकार और स्वार्थ के संकीर्ण दायरों में सिमटे अपनी-अपनी डफली, अपना-अपना राग अलापने में लगे हुए हैं। हमारे सामने जो आसन्न चुनौती है वह सामूहिक है और उससे संगठित होकर लड़ने की जरूरत है। भूमंडलीकरण के पीछे की शक्तियाँ अत्यंत ताकतवर हैं और उनको जोरदार टक्कर देने के लिए बहुत बड़े संगठित अभियान की जरूरत है। लेकिन यहाँ तो लोग अपना निजी व्यक्तित्व चमकाने में लगे हुए हैं।
भूमंडलीकरण के खिलाफ एक संगठित, सशक्त और निर्णायक आंदोलन शुरू हो पाने में अभी लम्बा वक्त लगेगा। जब जनता भूमंडलीकरण के अभिशापों को और अधिक झेलने से इनकार कर देगी और उसके खिलाफ सामूहिक विद्रोह के लिए स्वत:स्फूर्त ढंग से आंदोलित हो जाएगी, तभी उस सामूहिक संकट के भाव को भाँपकर उसके दबाव में हमारे बौद्धिक जन भी नए सिरे से सोचने के लिए विवश होंगे। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि तब तक हमें हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहना चाहिए। हमें इस वक्त अपने-अपने कार्यक्षेत्रों में संघर्ष करते हुए अपने-आपको समकालीन व्यापक संदर्भों से जुड़ने का निरंतर प्रयास करना चाहिए और अपने राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य के अनुरूप विकास और प्रगति का वैकल्पिक ठोस आधार तैयार करने के लिए साझे प्रयास का माहौल विकसित करना चाहिए।
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काफी सही विश्लेषण है आपका। सर्वप्रथम आवश्यकता है, अपने ऊपर विश्वास की। चीन और जापान जिसके अच्छे उदाहरण हैं। Globalization is a necessary evil. इससे भागा नहीं जा सकता. किंतु घरेलू मोर्चे पर भी हमें मेहनत करनी होगी। कृषि और छोटे उद्योगों को आगे बढ़ाना ही पड़ेगा यदि हम आत्मनिर्भर समाज चाहते हैं तो।
सुंदरता से किया गया विश्लेषण बहुत प्रभावी है, बधाई. अभी बहुतेरे प्रयासों की आवश्यकता है.
मैं यह नहीं समझ पा रहा हूँ की पेप्सी का विरोध करने से क्या सबको पानी मिल जाएगा या फिर पाँच सितारा स्कुलो को रोक कर सबको शिक्षा मिलना तय हो जाएगा?
संजय ,
पेप्सी का आसान किंतु नुकसानदेह विकल्प जब नहीं होगा तो (पानी तो जब मिलेगा तब मिलेगा और कोक-पेप्सी में भी पानी तो भारत का ही है,अब अमेरिका से तो पानी के टैंकर आने से रहे) आप लस्सी की तरफ़ उन्मुख होंगे और तब आप खस,केवड़ा और गुलाब के शरबत के बारे में भी सोचेंगे जो अब कहीं दिखाई नहीं देते या दिखाई देते भी हैं तो बहुत ढूंढने पर.
बचपन में गर्मी के दिनों में घरों और शादी-बारातों-समारोहों में अमूमन मिलने वाली ठंडाई अब कहां है ? इन सब प्रश्नों पर जब सोचेंगे तब आपको कोक-पेप्सी के दुष्प्रभाव का सही अंदाज़ा हो पाएगा . रही बात पांच सितारा स्कूलों की तो इनके बिना भी सबको शिक्षा मिलेगी और एक जैसी मिलेगी. तब राजा और प्रजा बनाने वाले दो तरह के अलग-अलग स्कूल भी नहीं होंगे . देश और समाज के बारे में बात करते समय थोड़ा संवेदनशील होना होगा . अन्यथा हम बहुराष्ट्रीय कंपनियों को ही फायदा पहुंचाएंगे .
[...] यहाँ इस मुद्दे की शुरुआत हुई सृजनशिल्पी जी के लेख “सत्ता की साजिश और भूमंडलीकरण” से जिस पर संजय भाई की टिप्पणी से तथाकथित हलचल हुई, कुछ लोगों के पंख हिले। ज़्यादा कुछ नहीं संजय भाई ने बस इतना ही कहा था: मैं यह नहीं समझ पा रहा हूँ की पेप्सी का विरोध करने से क्या सबको पानी मिल जाएगा या फिर पाँच सितारा स्कुलो को रोक कर सबको शिक्षा मिलना तय हो जाएगा? [...]
[...] इन दिनों भूमंडलीकरण पर बहस छिड़ी है. बहस की शुरूआत सृजनशिल्पी जी ने की जिसमें असहमति के स्वर छेड़ते हुए संजय जी ने टीप क्या मारी कुछ लोग नाराज़ हो गए. आप पूछेंगे कि सिपाही को कैसे पता चला? हुआ ये कि नारद ने जब बताया कि सृजनशिल्पी का नया लेख छपा है तो अपन उनके डेरे पर भागे और लेख पढ़ते-पढ़ते आखरी में संजय जी की टिप्पणी पढ़ी. अपना माथा ठनका कि ये क्या कहा संजय भैया ने? सृजन जी के लेख के अंतिम सिरे पर कुछ समाधान की बातें थी. उनका कहना था - [...]
[...] [सुपरिचित कथाकार अखिलेश का नाम हिंदी कथा पाठकों के लिये जाना-पहचाना नाम है। उनकी कहानी चिट्ठी में देश के तमाम पढ़े-लिखे युवा अपने को या अपने परिवेश को किसी न किसी न रूप में मौजूद पाते हैं। अखिलेश का एक आत्मक्थ्य नुमा लेख मेरे पसंदीदा लेखों में हैं। प्रख्यात साहित्यिक कथापत्रिका, ‘कथादेश’, के फरवरी २००० के अंक में प्रकाशित यह लेख पत्रिका के नियमित स्तम्भ ‘मैं और मेरा समय’में छ्पा था। इस स्तम्भ के अंतर्गत प्रसिद्ध लेखकों के अपने समय के बारे में अनुभव व विचार प्रस्तुत किये जाते हैं। हिंदी ब्लाग जगत में जब सृजन शिल्पी के एक लेख पर संजय बेंगाणी पर की टिप्पणी पर लेख उस पर अमित का लेख और फिर नीरज दीवान का बड़ी मेहनत से लिखा विचारोत्तेजक लेख प्रकाशित हुआ तो मुझे एक बार फिर यह लेख बहुत याद आया। इसलिये मैं अखिलेशजी के इस लेख को यहां प्रस्तुत कर रहा हूं। आशा है कि लेख अपनी पर्याप्त लंबाई के बावजूद आपको पढ़ने और सोचने के लिये मजबूर करेगा] अखिलेश [...]
maine srijanshilpi ji ka lekh padha yah ek bahut hi pyara bahas ka mudda hain, per eske virodh mein sanjay ji ka tippani bahut hi bekar hain ki kya kok aur pepsi ko band kar dene se sabko pani mil jayegi. hum logon ko yah to sochana hi hoga ji humare yahan ke aam adami ki buniyadi jaruraton ke liye bhi socha jana chahiye aur jab tak yah soch nahin paida hoga tabtak humlog apane parivesh main badlao nahhin la payenge aur hum logon ka bhala nahin ho payega.
[...] सत्ता की साजिश और भूमंडलीकरण [...]