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व्यंग्य संवेदनशील एवं सत्यनिष्ठ मन द्वारा विसंगतियों पर की गई प्रतिक्रिया है– एक ऐसी प्रतिक्रिया जिसमें ऊपर से कटुता और हास्य की झलक मिलती है, पर उसके मूल में करुणा और मित्रता का भाव विद्यमान होता है। हरिशंकर परसाई जी ने अपने व्यंग्य लेखन के बारे में एक साक्षात्कार में कहा था:

यद्यपि मैं व्यंग्य विनोद लिखता हूँ, पर वास्तव में मैं बहुत दु:खी आदमी हूँ, दुःखी होकर लिखता हूँ। मैं इसलिए दुःखी हूँ कि देखो मेरे समाज का क्या हाल हो रहा है, ये सब दुःख मेरे भीतर हैं, करुणा मेरे भीतर है….। मैं बहुत संवेदनशील आदमी हूँ। इस कारण करुणा की अंतर्धारा मेरे व्यंग्य के भीतर रहती ही है। जैसे मैं विकट से विकट ट्रेजडी को व्यंग्य और विनोद के द्वारा उड़ा देता हूँ, उसी प्रकार करुणा के कारणों को भी मैं व्यंग्य की चोट से मारता हूँ या उन पर विनोद करता हूँ।

व्यंग्य असंतोष की वजह से पैदा होता है, परंतु यह संवेदनशील और करुण हृदय के असंतोष की प्रतिक्रिया के रूप में उपजता है। कबीर भी प्रचंड व्यंग्य करते हैं और सुनने वाले को तिलमिला कर रख देते हैं, पर महज किसी का मजाक उड़ाने या उपहास करने के लिए नहीं, बल्कि उसे सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देने के लिए। कबीर का व्यंग्य करुणा से उपजा है, अक्खड़ता तो सिर्फ उसकी ढाल है। वह चूँकि चेतना के धरातल पर जगे हुए थे और विसंगतियों एवं मूढ़ताओं को समझते थे और उसपर प्रहार करना जरूरी मानते थे, इसलिए व्यंग्य करते थे। वरना तो वह इतने दुःखी थे कि कहा करते थे –

सुखिया सब संसार है खावै औ सोवै।
दुखिया दास कबीर है जागै औ रौवे।।

व्यंग्य वही कर सकता है जो जगा हुआ है और अपने संस्कार एवं चरित्र से नैतिक है। हर कोई व्यंग्य नहीं कर सकता। व्यंग्य मजाक या उपहास नहीं होता, कटाक्ष भी नहीं होता और यह किसी का अहित चाहने की भावना से नहीं किया जाता। व्यंग्य में सुधार की दृष्टि अनिवार्य रूप से होनी चाहिए, यदि यह दृष्टि उसमें नहीं है तो वह कुछ और भले हो, परंतु व्यंग्य वह नहीं हो सकता। यदि मुक्तिबोध के शब्दों में कहें तो व्यंग्यकार की दृष्टि कुछ ऐसी होती है–

जैसी दुनिया है उससे बेहतर चाहिए, सारा कचरा साफ करने को मेहतर चाहिए।

Harishankar Parsaiपरसाई कहते थे, ‘व्यंग्य एक गंभीर चीज है, हँसने-हँसाने की चीज नहीं।’ व्यंग्य निष्पक्ष ईमानदारी के बिना पैदा नहीं हो सकता और यह ईमानदारी अपने युग के प्रति, जीवन-मूल्यों के प्रति होनी चाहिए। व्यंग्य पढ़कर, सुनकर हँसी आ जाना प्रासंगिक भर होता है, वह व्यंग्य का अभीष्ट नहीं होता। व्यंग्यकार का मानवीयता और मानव जीवन से गहरा सरोकार होना चाहिए, यदि यह सरोकार उसके पास नहीं है तो वह जो कुछ लिखेगा वह खुद फूहड़ हो जाएगा, हास्यास्पद हो जाएगा, उसकी धार खत्म हो जाएगी और यह सस्ती एवं टुच्ची चीज बन कर रह जाएगी। परसाई का व्यंग्य-लेखन उनकी रोजी-रोटी का माध्यम था, लेकिन सिर्फ इस वजह से उन्होंने अपने लेखन में कभी सस्तापन नहीं आने दिया। परसाई अपने ‘आत्म-कथ्य’ में स्पष्ट लिखते हैं–

मैं अपनी कैफियत दूँ तो यह हँसना और हँसाना, विनोद करना अच्छी बातें होते हुए भी मैंने केवल मनोरंजन के लिए नहीं लिखा।“

व्यंग्य वह औजार है जो जीवन के झाड़-झंखार को काट फेंकता है। ऐसी परंपरा जो जीवनी शक्ति देने के बजाय जीवन को बीमार बना देती है, समाज की वह विसंगति, अन्याय, अनाचार, मिथ्याचार, पाखंड, दोमुँहापन और दंभ, जो घातक है, अशिव है, इन सब पर व्यंग्य की चोट पड़ती है। परंतु यह चोट सात्विक होती है और ऐसी सात्विकता मानवीय करुणा और सरोकार से ही उपज सकती है।

व्यंग्य खरी-खरी बातों को सहज रूप से कह देने का अनोखा अंदाज है। विसंगतियों पर चोट, सात्विक चोट तो कई और तरीकों से भी की जा सकती है, किन्तु जरूरी नहीं कि वह व्यंग्य ही हो। मुक्तिबोध भी उन्हीं चीजों पर प्रहार करते थे जिस पर परसाई करते थे, बहुधा उनके रचना-संसार के चित्र और बिम्ब भी मिलते-जुलते होते थे, परंतु मुक्तिबोध जो लिखते थे वह कविता होती थी और परसाई जो लिखते थे वह व्यंग्य हो जाता था। डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी ने ‘देश के इस दौर में’ में मुक्तिबोध और परसाई के रचना-संसारों की बिंब-चित्र विधान की एकरूपता और संयुक्तता के कई स्थलों का पर्यवेक्षण भी किया है।

सतर्क विवेक व्यंग्य रचना के लिए अनिवार्य है। इस सतर्कता और विवेक के अभाव में छद्म पकड़ में आ ही नहीं सकता, फिर उसपर प्रहार कैसे होगा! ‘वो जरा वाइफ है न’ में परसाई की सतर्कता देखिए, वह छद्म को कैसे तुरंत पकड़ते हैं। एक सज्जन की बीबी बैठ रही है इम्तहान में, परसाई से पूछने आए हैं कबीरदास के पदों का अर्थ। परसाई तुरंत छद्म पकड़ लेते हैं और उस पर चोट करने के लिए धीरे से कहते हैं, ‘इसमें विद्यापति भी तो है’– बस छद्म प्रकट हो जाता है, वह नंगा होकर सामने आ जाता है। यह तो है परसाई की सतर्कता, पर उसके बाद जो वह अपने मन में दोहराते हैं, कहते नहीं है उसे, पाठक के लिए जिस बात को समझने के लिए छोड़ देते हैं, उसको देखिए–

‘‘तू क्या कबीर को भला आदमी समझता है? अरे, कबीर अगर ढंग से कोई समझ ले तो विद्यापति से ज्यादा खतरनाक हो सकता है। ’मन फूला फूला फिरै जग से कैसा नाता रे’–अगर ठीक से पत्नी समझ ले तो तेरी गृहस्थी ही टूट जाए।“

व्यंग्यकार का सतर्क विवेक छद्मों को पकड़ लेता है, स्वांगों को उघाड़ देता है। परंतु जरूरी नहीं कि छद्म और स्वांग की नंगई उघाड़ने के लिए व्यंग्यकार प्रकट रूप से सतर्कता बरतता दिखे भी। बालमुकुंद गुप्त भंग की तरंग में होने का नाटक करते हुए मदहोश भंगेड़ी की भूमिका में आकर विसंगतियों और छद्मों की बखिया उधेड़ते थे।

व्यंग्यकार अपने भीतर से ठोस और निश्चिंत हो तभी व्यंग्य कर सकता है। जिसको अपनी चारित्रिक सुगठता और दृष्टिगत तर्कसंगतता का पक्का यकीन नहीं हो वह व्यंग्य कर ही नहीं सकता। वह अपने प्रति निश्चिन्त होता है कि जिस विद्रूपता को अपने व्यंग्य वाणों से वह मर्माहत करने जा रहा है वह उसके अपने अंदर नहीं है। अपनी चेतना के प्रति असुरक्षा का भाव जहाँ है वहाँ व्यंग्य करने का सात्विक, नैतिक साहस पैदा हो ही नहीं सकता। कबीर को अपनी भक्ति और राम की कृपा पर अमोघ विश्वास था, इसलिए वह अपने को सुरक्षित समझते थे और जमाने भर की विद्रूपताओं और विमूढ़ताओं पर तीखा व्यंग्य-प्रहार करने में समर्थ थे। परसाई को यह आत्मविश्वास और आत्मसुरक्षा मानव-मूल्यों के प्रति गहरी प्रतिबद्धता, शोषितों-पीड़ितों के प्रति पक्षधरता, मार्क्सवाद की सूक्ष्म समझ और तर्कशील इतिहास-बोध से मिला है।

व्यंग्य सीधी चीज नहीं है, वह टेढ़ी चीज है। स्वयं ‘व्यंग्य’ शब्द में भी यह टेढ़ापन परिलक्षित हो जाता है। व्यंग्य सीधे-सीधे नहीं किया जाता, उसके लिए कोई न कोई आड़ चाहिए, कोई बहाना चाहिए। परसाई के व्यंग्य-संसार में भी यह आड़ है। परसाई ‘मैं’ का मुखौटा ओढ़ लेते हैं, बालमुकुंद गुप्त भंगेड़ी की भूमिका की आड़ लेते हैं। परसाई अपने व्यंग्य निबंधों में जिन स्थलों पर वाकई व्यंग्य कर रहे होते हैं, वहाँ ‘मैं’ का मुखौटा लगाकर बोलते हैं और अपने मन में बोलते हैं, वह बात कथानक-प्रसंग में उपस्थित सामने के व्यक्ति से नहीं कहते।

व्यंग्य लेखन में कल्पनाशीलता का सहारा ज्यादा दूर तक नहीं लिया जा सकता। व्यंग्य विकट यथार्थ के अनुभव से ही पैदा हो सकता है, यदि उसमें कल्पनाशीलता घुसेड़कर जबरदस्ती व्यंग्य पैदा करने की कोशिश की गई तो वह रचना खुद ही हास्यास्पद हो जाएगी, उसमें धार तो कभी आ ही नहीं सकती। परसाई का व्यंग्य लगभग पूरा का पूरा खुद के अनुभव पर आधारित है और इसीलिए उसमें वह मारक धार आ पाई है। इस अर्थ में व्यंग्य साहित्य की अन्य सभी विधाओं से विशिष्ट है। कविता कल्पना के आधार पर, विशुद्ध कल्पना के आधार पर लिखी जा सकती है, उपन्यास भी लिखा जा सकता है, कहानी भी, लेकिन व्यंग्य पैदा करने के लिए ठोस अनुभव चाहिए। उसके बिना काम नहीं चल सकता।

व्यंग्य का दायरा अत्यंत व्यापक है और यह इसलिए है कि व्यंग्य का आलंब जो विद्रूपता और विसंगति है, उसका दायरा भी काफी विस्तृत है। परसाई, जिन्हें विश्वनाथ त्रिपाठी ने ‘वर्तमानता के रचनाकार’ कहा है, अपनी वर्तमानता के दायरे में भी राम, कृष्ण और दूसरे मिथकीय चरित्रों एवं मिथकों को पकड़ लाते हैं और विद्रूपताओं की धुनाई शुरू कर देते हैं। ‘वे मिथकों को, पौराणिक पात्रों को वर्तमान जटिलताओं, समस्याओं से भिड़ा देते हैं। मिथक अपने आप चकनाचूर हो जाते हैं।’ विश्वनाथ त्रिपाठी परसाई द्वारा आयोजित इस भिड़ंत को इतिहास, धर्म या संस्कृति की मानवीय धारा की अवज्ञा नहीं मानते, बल्कि इसे इतिहास, धर्म, संस्कृति की मानवीय धारा को अवरुद्ध करने वाले तत्वों को हटाना कहते हैं। व्यंग्यकार की अपनी नैतिक चेतना इतनी ठोस और प्रखर होनी चाहिए कि वह स्थापित मिथकों और मान्यताओं की विद्रूपता और अवैज्ञानिकता को सहज ही तोड़ सकने में सक्षम हो।

व्यंग्य लेखन के लिए युगचेतना और युगबोध का स्पष्ट बोध जरूरी है। कबीर को अपने समय की युगचेतना और युगसत्य का बोध था और उसी के अनुरूप वह व्यंग्य करते थे। भारतेन्दु को भी अपने युगसत्य की समझ थी। यही समझ हरिशंकर परसाई में भी कूट-कूट कर भरी हुई थी। युगचेतना और युगसत्य जब इतिहास से टकराते हैं तो उसके अवांछनीय और अवरोधक तत्वों को तोड़ डालते हैं। इस युगबोध से ही व्यंग्यकार को अपनी रचनात्मक जिम्मेदारी का अहसास होता है। परसाई के रचना-संसार को ‘स्वातंत्र्योत्तर भारत की सच्चाइयों का प्रामाणिक दस्तावेज’ जो कहा जाता है, वह परसाई के इसी युगबोध के कारण है। यह युगबोध प्रेमचन्द की भी विशिष्टता थी। बीसवीं शताब्दी के जिन दो हिन्दी साहित्यकारों को उनके जीवन्त और सक्रिय युगबोध के आधार पर सबसे बड़ा व्यंग्यकार माना जाता है, वे हैं–प्रेमचन्द और हरिशंकर परसाई। प्रेमचन्द स्वतंत्रता पूर्व के युगबोध के सबसे सशक्त साहित्यिक प्रतिनिधि हैं तो हरिशंकर परसाई स्वतंत्रता-पश्चात के युगबोध के।

मनुष्य कैसा हो, उसका चिंतन, कर्म और जीवन कैसा हो, इसकी स्पष्ट रूपाकृति मन में यदि हो तभी व्यंग्यकार अपने उद्देश्य में सफल हो सकता है। जीवन और जगत का सौंदर्य बोध व्यंग्यकार में होना जरूरी है। यह सौंदर्य बोध न हो, सुष्मिता की पहचान न हो तो वह विकृतियों को, अनगढ़ता को, विद्रूपताओं को पकड़ ही नहीं सकता। लेकिन सौंदर्य बोध भर काफी नहीं है, सर्वसुन्दर मनुष्य और संपूर्ण स्वस्थ समाज गढ़ने का स्वप्न और प्रतिबद्धता भी व्यंग्यकार में होना आवश्यक है। परसाई के संपूर्ण व्यंग्य संसार में यह स्वप्न और प्रतिबद्धता प्रच्छन्न रूप से सर्वत्र प्रवाहित दिखाई देती है। उनको यह स्वप्न और प्रतिबद्धता मार्क्सवाद की सूक्ष्म समझ यानी सौंदर्य और मानवीय भावों से युक्त मार्क्सवाद की समझ, कोरे द्वंद्वात्मक भौतिकवाद और छद्म क्रांतिकारिता वाला मार्क्सवाद नहीं। नन्दकिशोर नवल कहते हैं–

‘परसाई के व्यंग्यात्मक लेखन की यह बहुत बड़ी विशेषता है कि वे वार के लिए वार नहीं करते, बल्कि गलत चीज को तोड़कर उसे नये ढंग से बनाने के लिए उस पर वार करते हैं। व्यंग्य लेखक का दृष्टिकोण हमेशा आलोचनात्मक होता है, पर उसकी सफलता इस बात में है कि वह रचनात्मक भी हो।’

इस बात पर बड़ा विवाद रहा है कि व्यंग्य को साहित्य की अलग से कोई विधा माना जाए या नहीं। परसाईजी की अपनी दृष्टि इस मामले में यह है कि

‘‘व्यंग्य का निश्चित कोई ’स्ट्रक्चर’ नहीं है। वह निबंध, कहानी, नाटक आदि सभी विधाओं में लिखा जाता है। व्यंग्य इस कारण एक ‘स्पिरिट’ है। व्यंग्य लेखक को यह शिकायत नहीं होनी चाहिए कि विश्वविद्यालय व्यंग्य को विधा क्यों नहीं मानते। उन्हें संतोष करना चाहिए कि व्यंग्य का दायरा इतना विस्तृत है कि वह सब विधाओं को ओढ़ लेता है।“

परसाईजी की दृष्टि इस बारे में बिल्कुल साफ है कि व्यंग्य अपने आप में अलग से कोई विधा नहीं है, बल्कि वह खुद साहित्य की सारी विधाओं का मुखौटे के रूप में इस्तेमाल कर सकता है, उनमें ‘स्पिरिट’ के रूप में विद्यमान रहकर। दरअसल यह विवाद उठा इस वजह से कि आज के दौर में अखबारी व्यंग्य स्तंभों के लिए व्यंग्य लेखन को ही व्यंग्य का मानक रूप मान लेने की गलतफहमी पैदा हो गई है। यह बात सही है कि आज का अधिकांश व्यंग्य-लेखन अख़बार के कॉलम के लिए ही व्यंग्य लेखन है, यहाँ तक कि परसाईजी का भी अधिकतर लेखन ऐसा ही था। इसी अर्थ में इसे गद्य की एक अलग विधा माना जाने लगा है। परंतु यह जरूरी नहीं कि व्यंग्य लेखन अखबारी कॉलम के निबंधात्मक रूप में ही हो, वह कविता, कहानी या उपन्यास के रूप में भी हो सकता है। व्यंग्य को निबंध और अखबारी कॉलम के दायरे में समेट देना उसकी व्यापकता और शक्ति को कम करना है।

कई विद्वान प्राचीन संस्कृत नाटकों में मौजूद प्रहसन-प्रसंगों और अंग्रेजी साहित्य के satire से व्यंग्य की संगति बिठाने की कोशिश करते हैं। वस्तुत: व्यंग्याभास वाले तत्व संसार के प्रत्येक साहित्य में मिलते हैं, कोई भी साहित्य व्यंग्य के बिना पूर्ण नहीं बन सकता, परंतु व्यंग्य वस्तुत: होता है लोक में, ‘धन्य और धिक्कार की शक्तियों’ के रूप में। व्यंग्यकार जब व्यंग्य लिखता है तो लोक की इसी शक्ति का उपयोग करता है।

व्यंग्य की भाषा कैसी होनी चाहिए, यह बहुत ही महत्वपूर्ण सवाल है। व्यंग्यकार की सफलता काफी हद तक उसकी भाषा की सहजता और जीवंतता पर निर्भर करती है। व्यंग्य की भाषा का आदर्श रूप देखना हो तो परसाईजी द्वारा आखिरी दौर में लिखे गए निबंधों को देखना चाहिए। कहीं भी बनावटी भाषा नहीं दिखाई देती। व्यंग्य में जो बिंब होते हैं, जो रूपक और चित्र-विधान लिए जाते हैं, वे बिल्कुल आम जनजीवन से लिए हुए होने चाहिए। कबीर की भाषा ऐसी ही थी और परसाई की भाषा भी इसी कमाल का साक्षात कराती है। भाषा का तेवर वही हो जो लोक में प्रचलित है, कहीं भी प्रकट रूप से अपनी साहित्यिक भाषा ज्ञान के प्रदर्शन का भाव न हो तो उस भाषा में इतना दम और इतनी धार आ जाती है कि वह सीधे पाठकों के मर्म को भेदकर उसे मर्माहत और बैचैन कर देती है। परसाईजी की भाषा का एक नमूना यहाँ भी देखें:

“सिर्फ यह नहीं है कि ईसा अपना सलीब खुद ढो रहा है या सूली पर टंगा है। ईसा को अपने पाँवों पर अपने हाथों से कील ठोंकने को मजबूर किया जा रहा है और वह कह रहा है–पिता, इन्हें हरगिज माफ मत करना, क्योंकि ये साले जानते हैं, ये क्या कर रहे हैं।“ (न्याय का दरवाजा)

यह आम जनजीवन में बोली जाने वाली भाषा है, लगता है जैसे मेरी-आपकी बातचीत का कोई टुकड़ा उठा लिया गया है। भाषा सहज और परिचित, परंतु बात बिल्कुल नई और अनोखी–यही तो चमत्कार है परसाई की भाषा का। कुछ समीक्षकों ने इसे ‘अखबारी भाषा’ कहकर इसका महत्व कम समझने की भूल की है, उन्हें परसाई की भाषा का असाहित्यिक कहने से पहले अपने-आप से सवाल करना चाहिए कि बीसवीं शताब्दी में हिन्दी साहित्य में प्रेमचन्द के बाद किसकी रचनाओं को सर्वाधिक लोगों ने पढ़ा और आनन्द उठाया है, तो उनको जबाव खुद ब खुद मिल जाएगा। प्रेमचन्द और परसाई की भाषा लोकसंवाद की भाषा है और इस भाषा में जो शक्ति और जीवंतता इतनी प्रचुर मात्रा में आ पाई है, वह इस निरंतर संवादधर्मिता के कारण ही संभव हो पाई है। जो सहज और सरल भाषा में, संवाद की भाषा में नहीं लिख सकता, वह कभी सफल व्यंग्यकार नहीं हो सकता।

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13 Responses to “व्यंग्य के प्रतिमान और परसाई”

  1. on 28 Oct 2006 at 4:56 am Prabhakar Pandey

    व्यंग्य शैली को परिभाषित करते हुए उसके लक्षणों पर प्रकाश डालता हुआ और रोचकता से परिपूर्ण एक ज्ञानवर्धक लेख ।

    धन्यवाद ।

  2. on 28 Oct 2006 at 6:58 am समीर लाल

    बीसवीं शताब्दी के जिन दो हिन्दी साहित्यकारों को उनके जीवन्त और सक्रिय युगबोध के आधार पर सबसे बड़ा व्यंग्यकार माना जाता है, वे हैं–प्रेमचन्द और हरिशंकर परसाई। प्रेमचन्द स्वतंत्रता पूर्व के युगबोध के सबसे सशक्त साहित्यिक प्रतिनिधि हैं तो हरिशंकर परसाई स्वतंत्रता-पश्चात के युगबोध के।

    भई, सृजन शिल्पी जी, आपने तो जग लूट लिया, क्या बेहतरीन प्रस्तुति है. हम तो फिदा हो गये.वाकई…

    बहुत बहुत बधाई…आगे भी जारी रखें.

  3. on 28 Oct 2006 at 10:10 am ratna

    हाल में ही परसाईं और प्रेमचन्द को फिर से पढ़ना शुरू किया है। आपके लेख ने बहुत से पहलूयों पर प्रकाश डाल हमारे पाठन को और आनन्दमयी बना दिया।

  4. on 28 Oct 2006 at 10:39 am Giriraj Joshi

    पिछले रविवार मैने यहाँ सारी “बुक स्टालें” छान मारी मगर “परसाईजी” की एक भी किताब नहीं मिली। :(

    यह भी पिछड़ेपन पर एक अच्छा व्यंग्य दिखा, इससे ज्यादा अब अपने शहर के बारे में क्या कहूँ।

    सृजन शिल्पी जी आपकी इस पोस्ट के सामने मेरा पूरा शहर ही शुन्य दिखाई पड़ता है, अगली कड़ी का इंतजार रहेगा।

  5. on 28 Oct 2006 at 5:12 pm SHUAIB

    इस लेख के लिए आपका बहुत शुक्रिया, मेरे लिए ये सब नई बातें हैं।

  6. on 28 Oct 2006 at 11:45 pm Reetesh gupta

    बहुत ज्ञानवर्धक एवं रूचिकर लेख है …..

    धन्यवाद एवं बधाई !!!

  7. on 29 Oct 2006 at 12:17 am भुवनेश शर्मा

    परसाईजी के लेखन पर बहुत ही अच्छा विश्लेषण है।
    परसाईजी मेरे प्रिय लिखक हैं। आपके लेख से उनके बारे में और अधिक जानने का अवसर मिला।

  8. on 30 Oct 2006 at 9:38 am प्रत्यक्षा

    बहुत बढिया प्रस्तुति

  9. on 31 Oct 2006 at 11:54 pm नीरज दीवान

    परसाई जी के लेखन के उद्धरण पिछले दिनों पढ़ने मिले थे. देखिए व्यंग्य के माध्यम से कितना गहरा आघात करते हैं हमारी दुनिया पर. आज भी प्रासंगिक बन पड़े हैं-
    *अमरीकी शासक हमले को सभ्यता का प्रसार कहते हैं.बम बरसते हैं तो मरने वाले सोचते है,सभ्यता बरस रही है.
    *अर्थशास्त्र जब धर्मशास्त्र के ऊपर चढ बैठता है तब गोरक्षा आन्दोलन के नेता जूतों की दुकान खोल लेते हैं.

    वाह सृजनशिल्पी जी, क्या खूब लिखा है…‘धन्य और धिक्कार की शक्तियों’ के रूप में. गहरा निचोड़ है व्यंग्य विधा का. इस तरह का विवेचन आपकी लेखनी की विशेषता है. यह आलेख पढ़कर परसाई जी एक रचना और पढ़ी जाएगी आज रात… जल्द ही आप कोई बेहतरीन व्यंग्य पन्ने पर संकलित करें ताक़ी अपन भी पढ़ लें.

  10. on 08 Nov 2006 at 1:06 pm सृजन शिल्पी

    धन्यवाद, आप सभी के सराहनापूर्ण शब्दों के लिए।

  11. on 05 Jan 2007 at 3:53 pm पंकज बेंगाणी

    बहुत अच्छा और विचारोत्तेजक लिखा है। परसाइजी ने बहुत सही कहा है। व्यंग्य लिखना सचमुच में बडी विधा है, इसे हर कोई नही लिख सकता।

    आपने मुझे इस लेख को पढने के लिए कहा.. इसके पीछे कोई वजह तो है ही। :)

    मैं समझता हुँ.. मुझे नही पता कि मैं व्यंग्य करता या नही.. मै जो लिख रहा हुँ दिल से लिख रहा हुँ… अब वो चाहे जो है!

    :)

  12. on 10 Jul 2007 at 5:22 pm vikas awasthi

    hello ,

    you r a great persoan

  13. on 26 Mar 2008 at 8:24 pm Brijmohanshrivastava

    मैंने हरिशंकर जी को भी पढ़ा है शराद्जोशी जी को भी और श्रीलाल जी को भी निसंदेह परसाई जी के व्यंग बेहतर है फिर भी जो पैनापन शरादजी में है जो चुटिलापन श्रीलालजी में है वह कम ही देखने को मिलता है हरी शंकर जी के लेखों में हास्य की पुट ज्यादा है कुछ लेख तो मंटो टाइप के है

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