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अव्यक्त ब्रह्म

  • प्रत्येक जीव अव्यक्त ब्रह्म है।
  • बाह्य एवं अंत:प्रकृति को वशीभूत करके अपने इस ब्रह्मभाव को व्यक्त करना ही जीवन का चरम लक्ष्य है।
  • कर्म, उपासना, मन:संयम अथवा ज्ञान- इनमें से एक, एक से अधिक या सभी उपायों का सहारा लेकर अपने ब्रह्मभाव को व्यक्त करो और मुक्त हो जाओ।
  • बस, यही धर्म का सर्वस्व है। मत, अनुष्ठान पद्धति, शास्त्र, मन्दिर अथवा अन्य बाह्य क्रिया-कलाप तो उसके गौण ब्यौरे मात्र हैं। 

– स्वामी विवेकानन्द

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One Response to “अव्यक्त ब्रह्म”

  1. on 31 Jul 2006 at 3:52 pm Arbindo

    Jai ho Vivekanand II

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