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जिंदगी की राह में मिले अच्छे-बुरे अनुभवों के खट्टे-मीठे रंगों के कोलाज हम सब के मन में बनते-मिटते रहते हैं, लेकिन जब हम किसी कहानी के पात्रों के प्रिज्म से होकर उन्हें देखते हैं तो उन कोलाजों में से उभरती कुछ नायाब शक्लें स्मृति-पटल पर टँग जाती हैं। अच्छी कहानियों को पढ़ते हुए जिंदगी के सुख-दु:ख और किरदारों की मासूमियत एवं समझदारी आपस में घुल-मिलकर एक अलग किस्म का रसायन बन जाते हैं, जिसकी तासीर मोहक होती है, और पाठक उसके सम्मोहन में बंधा-बंधा कहानी के अंत तक अटूट कौतूहल के साथ उतराता चला जाता है।

मेरे अभिन्न मित्र और सहकर्मी अनुज ने इधर पिछले तीन-चार वर्षों में कुछ बेहतरीन कहानियाँ लिख डाली हैं। उनकी प्राय: हर कहानी छपने के साथ ही जबरदस्त चर्चा के केन्द्र में रही। हिन्दी कहानियों के सुधी पाठकों और सुस्थापित लेखकों ने उनकी लगभग हर कहानी को हाथों-हाथ लिया। हिन्दी कहानियों के क्षितिज में उभरे इस नवोदित कहानीकार ने जाने-माने आलोचकों को भी अपनी मितव्ययी भाषा के जादू, अनुभव-संसार की विविधता, समकालीन यथार्थ की नब्ज पर अचूक पकड़ और कहानी कहने के अपने निराले तटस्थ अंदाज से समवेत सराहना करने के लिए आंदोलित कर दिया है।

भारतीय ज्ञानपीठ ने हाल ही में उनकी कहानियों के पहले संग्रह को प्रकाशित किया है। इस संग्रह का शीर्षक उनकी पहली कहानी “कैरियर, गर्लफ्रेंड और विद्रोह” को बनाया गया है। जेएनयू की पृष्ठभूमि पर लिखी इस बेहतरीन कहानी ने हालांकि अपने छपे जाने का लंबा इंतजार किया और इसी कारण अनुज के भीतर का कहानीकार किंचित देर से सामने आ सका। उर्वर संभावनाओं से भरे इस कहानीकार को पहली नजर में परखने का श्रेय रवीन्द्र कालिया को जाता है, जो वागर्थ के तत्कालीन संपादक थे और अब नया ज्ञानोदय के संपादक हैं। उन्होंने ही अनुज की ज्यादातर कहानियों को न सिर्फ प्रकाशित किया है, बल्कि अपनी चुटीली टिप्पणियों से उन्हें चर्चा में बनाए रखने में मदद की है।

“अनुज की कहानी की विशेषता यह है कि इसमें मुख्य पात्र की परिस्थिति और परिणति के प्रति न उपहास है, न उच्छवास, मात्र वृतान्त है। पाठक अपनी तरह से क्रियायित होने को स्वतंत्र है।….अनुज की यह तटस्थ शैली उन रचनाकारों से नितांत भिन्न है जो लेखक के साथ निर्देशक भी बन कर पाठक को शिक्षित करते चलते हैं।”

इस कहानी-संग्रह में उपर्युक्त पहली कहानी के अलावा खूँटा, अनवर भाई नहीं रहे, भाई जी, बनकटा  और कुंडली खास तौर पर चर्चित रहे हैं। इन कहानियों के अलावा माइक्रावेव टावर, हंसा रे, खड़ेसरी बाबा और काम्सोमोल कोटा भी पाठकों द्वारा खूब पसंद किए गए हैं। इनमें से खास तौर पर ‘खूँटा’ हिन्दी कहानी के इतिहास की श्रेष्ठतम कहानियों में शुमार करने लायक कही जा सकती है। इस कहानी में जिस तरह से ठेठ ग्रामीण परिवेश का और सोनपुर के पशु मेले का सजीव चित्रण हुआ है, वह प्रेमचंद के दो बैलों की कथा की याद दिलाता है।

अनवर भाई नहीं रहे‘ सरकारी दफ्तर के माहौल और वहां के कर्मचारियों की मानसिकता और उनके बीच चलने वाली राजनीति को उजागर करने वाली कहानी है, जो कहानीकार के खुद के यथार्थ अनुभवों पर आधारित है। ‘माइक्रोवेव टावर‘ सांप्रदायिकता की पृष्ठभूमि पर है, जबकि ‘हंसा रे‘ शहरी जनजीवन में मध्य वर्ग की तस्वीर उकेरने वाली कहानी है, ‘खड़ेसरी बाबा‘ आजकल के साधुओं के ठगी के कारोबार पर है, ‘बनकटा‘ में बेटियों के पिता की मानसिक त्रासदी का चित्रण हुआ है, ‘काम्सोमोल कोटा‘ कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर एक कामरेड के क्षोभ की कथा है।

ममता कालिया के शब्दों में, “अनुज की कहानी की विशेषता यह है कि इसमें मुख्य पात्र की परिस्थिति और परिणति के प्रति न उपहास है, न उच्छवास, मात्र वृतान्त है। पाठक अपनी तरह से क्रियायित होने को स्वतंत्र है।….अनुज की यह तटस्थ शैली उन रचनाकारों से नितांत भिन्न है जो लेखक के साथ निर्देशक भी बन कर पाठक को शिक्षित करते चलते हैं।”

लेखक – अनुज
प्रकाशक – भारतीय ज्ञानपीठ, 18, इंस्टीट्यूशनल एरिया, नई दिल्ली-3
पृष्ठ – 120
मूल्य – 120 रुपये

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9 Responses to “कैरियर, गर्लफ्रेंड और विद्रोह”

  1. on 07 Jun 2009 at 1:37 pm अनूप शुक्ल

    अनुज को बधाई। शुक्रिया भी कि इसी बहाने सृजनशिल्पी ने फ़िर से लिखना शुरू किया।

  2. on 07 Jun 2009 at 6:25 pm Maithily

    समीक्षा बहुत अच्छी है, कोशिश करते हैं कि कल इस किताब को ले पायें
    “कैरियर, गर्लफ्रेंड और विद्रोह” तो पहले अनुज जी के ब्लाग में पढ़ चुके हैं, बहुत अच्छी लगी थी
    आपकी कमी बहुत महसूस की थी, अब आगे इसे महसूस मत कराईयेगा

  3. on 07 Jun 2009 at 6:30 pm amit

    अनुज जी को बधाई। समीक्षा के बहाने ही सही, आपने पुनः लिखना आरंभ किया इसके लिए आपको साधुवाद। रोज़ नहीं तो सप्ताह में एकाध बार ही सही लेखन को जारी रखें, पुनः ब्लॉगावकाश पर न चले जाईयेगा! :)

  4. on 19 Jun 2009 at 10:42 pm A. N. Nanda

    बेहतरीन समीक्षा पाने वाले लेखक और उनकी कृति दोनों को बधाई । समीक्षाकार की समीक्षा लेखक को अनुप्राणित करेगा यह मैं आशा रखता हूँ ।

  5. on 22 Jun 2009 at 12:01 am anuj

    Hi friends
    I am very much thankful not only to Srijanshilpi but entire friends who have read or willing to read my short stories book – Career,Girlfriend aur Vidroh and commented/presented their views on this blog.I always need your support and love. Thanks.
    anuj

  6. on 22 Jun 2009 at 12:33 am anuj

    प्रिय मित्रों
    अनूप जी, मैथिली जी, अमित जी और नंदा साहेब – मैं सचमुच आपका आभारी हूँ कि आप सब ने मेरी पुस्तक के प्रति अपना प्यार जताया. मैं सृजनशिल्पी जो मेरे अच्छे दोस्त हैं, के प्रति भी बहुत आभारी हूँ जिन्होंने मुझे बताये बगैर ही इतनी मेहनत और बौद्धिक समझ के साथ इतनी अच्छी समीक्षा की. यह उनका बड़प्पन ही है. उन्होंने इस समीक्षा की सूचना मुझे बहुत बाद में दी. आज उनके कारण ही मैं आप सब की टिप्पणियां पढ़ पा रहा हूँ. आप सब को मैं फिर से धन्यवाद देते हुए यह आशा व्यक्त करता हूँ कि पुस्तक पढ़कर भी आप सब इसी तरह अपने विचारों से मुझे अवगत कराएँगे और मेरा मार्गदर्शन भी करेंगे. धन्यवाद.
    आपका ही
    अनुज

  7. on 31 Oct 2009 at 2:50 pm anamika

    Hi,

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  8. on 12 Nov 2009 at 2:12 pm murar kandari

    acha pariyas ha aaj ka samaj ka ley khas kar aaj ka youa peede ka leey……

  9. on 17 Feb 2010 at 12:30 pm Kaviraaj

    बहुत अच्छा । सुदर प्रयास है। जारी रखिये ।

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