RSS Feed:
Posts
Comments

‘यूथ फॉर मेनटेनिंग अन-इक्वलिटी’ के उत्साही युवक आरक्षण-विरोध के प्रायोजित अभियान में सुप्रीम कोर्ट का जिस तरह से इस्तेमाल करना चाह रहे थे, वैसा तो हरगिज मुमकिन नहीं था। आरक्षण के मुद्दे पर फैसला करते समय सुप्रीम कोर्ट को न सिर्फ अपनी साख और मर्यादा का ख्याल रखना था, बल्कि लोकतंत्र के दूसरे संवैधानिक स्तंभों से सीधे टकराव को भी टालना था। मगर कोर्ट के इस फैसले में आरक्षण-विरोधियों को जंग जारी रखने के लिए कुछ ऐसे नुक्ते छोड़ दिए गए हैं जिनके आधार पर वे आगे की मोर्चेबंदी में जुट सकते हैं।

सरकार की नीयत में खोट

हालांकि आरक्षण की इस जंग में सरकार ने भी उस ईमानदार नीयत और नैतिक साहस का परिचय कभी नहीं दिया, जो प्रतिष्ठा और अवसर की समानता तथा सामाजिक न्याय के महान संवैधानिक आदर्श को साकार करने के लिए विधि-सम्मत प्रावधान करते समय उसे दिखानी चाहिए थी। वोटबैंक की अवसरवादी मानसिकता के कारण इस मसले पर सरकार और राजनीतिक दल प्रखर तेवर दिखा सकने की स्थिति में नहीं थे और इसलिए अदालत भी उनके इरादे पर शक करती रही।

नेपथ्य के असली खिलाड़ी

आरक्षण-विरोध के अभियान की असली कमान निजी क्षेत्र में शिक्षा की ऊँची दुकान चलाने वाले जिन देशी और विदेशी पूँजीपतियों के हाथ में थी, वे तो नेपथ्य में रहकर कठपुतलियाँ नचा रहे थे और अपने इरादे में वे शायद काफी हद तक कामयाब भी रहे हैं। आरक्षण नीति के कार्यान्वयन के तीसरे चरण में निजी क्षेत्र में आरक्षण की शुरुआत की आशंका से घबराए हुए ये लोग ही आरक्षण-विरोध के मुख्य प्रायोजक थे। परंतु कोर्ट में इस मुद्दे पर पार्टी बन सकने का अवसर उन्हें उपलब्ध नहीं था, क्योंकि सरकार ने निजी क्षेत्र में आरक्षण की दिशा में कोई वास्तविक कदम अभी तक उठाया ही नहीं है। मगर सीधे रूप से खुद पार्टी न होते हुए भी और विवाद में प्रत्यक्ष रूप से शामिल न रहते हुए भी वे कोर्ट के रुख को प्रच्छन्न रूप से अपने हितों के अनुकूल प्रभावित करने में सफल रहे।

मीडिया ने दिखाई नंगई

मगर इस पूरे खेल में सबसे अधिक नंगई मीडिया ने दिखाई। जैसे नाचते-नाचते किसी तवायफ का मेक-अप पसीने से उतर जाता है और अचानक वह बेहद बदसूरत नजर आने लगती है, आरक्षण के मुद्दे पर कवरेज करते और बहस चलाते पत्रकारों का हाल भी ठीक वैसा ही हुआ। उनकी कलई खुल गई और बची-खुची साख भी जाती रही। संविधान, संसद, सरकार और बहुमत के खिलाफ खुलकर खड़े होकर आरक्षण-विरोध का माउथपीस बनते समय यदि वे भारतीय समाज के ऐतिहासिक सत्य और पत्रकारिता के स्थापित मानदंडों का तनिक भी ख्याल रखते तो शायद उनमें थोड़ी शर्म बाकी रह जाती और वे अपने स्तर से इस हद तक नहीं गिरते।

उल्टी बही बयार

यदि सत्ताधारी राजनीतिक दल और उनके नेता वाकई सामाजिक न्याय के प्रति समर्पित होते तो पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की शुरुआत करने में चार दशकों की देर नहीं हुई होती। चार दशकों के विलंब के बाद अगस्त, 1990 में जब पिछड़ों के लिए आरक्षण की नीति लागू की गई तब भी उसे पूरी तरह से अपनाने की बजाय किस्तों में अपनाया गया। यदि इसे तब भी पूरी तरह अपना लिया गया होता तो वह राजनीतिक दलों के लिए वोटबैंक का दीर्घकालिक अवसरवादी हथियार नहीं बन पाता और आरक्षण का मकसद भी काफी हद तक साकार हो जाता।

अगर किस्तों में ही आरक्षण लागू करने की स्थिति थी, तो पहले शिक्षा में आरक्षण लागू किया जाना चाहिए था और बाद में रोजगार में आरक्षण लागू किया जाता। लेकिन आरक्षण को एक साथ सरकारी और निजी, दोनों क्षेत्रों में लागू किया जाना जरूरी था, ताकि आरक्षण का मूल मकसद पूरी तरह से हासिल हो पाता, वैसी परिस्थिति शीघ्र हासिल हो पाती, जब आरक्षण की जरूरत न रह जाए।

आरक्षण की समीक्षा और क्रीमीलेयर की छँटाई

सुप्रीम कोर्ट के फैसले में समय-समय पर आरक्षण की समीक्षा किए जाने और क्रीमीलेयर को आरक्षण नहीं दिए जाने की जो बात कही गई, वह सर्वथा उचित और स्वागतयोग्य है। दरअसल, आरक्षण का प्रावधान जिस उद्देश्य के लिए लागू किया गया है, वह किस हद तक और किस गति से पूरा हो रहा है, यह देखा जाना बहुत जरूरी है। लेकिन पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण का विरोध करने वाले तत्व एक रणनीति के तहत दलितों और आदिवासियों के लिए आरक्षण को निर्बाध रूप से जारी रखने के पक्षधर बन गए हैं। इसलिए हमारे यहां आरक्षण की नीति के दोहरे मानदंड प्रचलित हैं।

अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए न सिर्फ पदोन्नति में भी आरक्षण पिछले पचास वर्ष से लागू है, बल्कि उनके लिए क्रीमीलेयर का सिद्धांत भी लागू नहीं होता। जबकि होना यह चाहिए कि आरक्षण का लाभ जिसे भी मिले, उसकी एक निश्चित अंतराल पर समीक्षा हो, जिसमें ऐसे परिवारों की पहचान की जाए, जो आरक्षण का लाभ उठाने के बाद क्रीमीलेयर में आ चुके हैं और जिन्हें अब आगे आरक्षण के लाभ की जरूरत नहीं है।

लेकिन जो छात्र आरक्षण का लाभ लिए बगैर योग्यता सूची में सामान्य श्रेणी के छात्रों की कतार में सफलता हासिल करते हैं, उनको अपने कैरियर के दौरान पदोन्नति के कम-से-कम एक अवसर पर आरक्षण का लाभ दिया जाना चाहिए या फिर उनकी संतान को क्रीमीलेयर के अंतर्गत शामिल नहीं माना जाना चाहिए और उसे आरक्षण का लाभ ले सकने का विकल्प मिलना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बिन्दु यह है कि उच्च शिक्षा में आरक्षण लागू करते समय क्रीमीलेयर की परिभाषा के अंतर्गत परिवार की शैक्षणिक पृष्ठभूमि का विशेष रूप से ध्यान रखा जाना चाहिए, क्योंकि पिछड़े वर्गों के कई परिवार भले ही आर्थिक दृष्टि से संपन्न माने जाते हों, पर शैक्षणिक-सांस्कृतिक दृष्टि से वे अत्यंत बदहाल होते हैं।

इसके अलावा, क्रीमीलेयर की परिभाषा के आर्थिक आधार को भी अधिक यथार्थवादी बनाए जाने की जरूरत है। मुद्रास्फीति की मौजूदा दर को देखते हुए पांच लाख रुपये से अधिक वार्षिक आय वाले परिवारों, सांसदों, विधायकों, मंत्रियों, संवैधानिक पदों पर आसीन अन्य व्यक्तियों और ग्रुप ‘ए’ श्रेणी में सीधी भर्ती वाले राजपत्रित अधिकारियों की संतानों को छोड़कर पिछड़े वर्ग के अन्य सभी समुदायों को आरक्षण का लाभ लेने का अवसर दिया जाना चाहिए।

आरक्षण से संबंधित मेरे पिछले लेख

 आगे पढ़िए »

12 Responses to “आरक्षण: जंग अभी जारी है…”

  1. on 11 Apr 2008 at 10:33 pm अनूप शुक्ल

    मेरी तो समझ में अभी पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जाति-जनजाति को मिलाकर क्रीमीलेयर की अगली पीढ़ी को आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिये। क्रीमीलेयर का आर्थिक निर्धारण करने के बारे में मैं नहीं कह सकता लेकिन जो वर्ग अभी क्रीमी लेयर में शामिल हैं ग्रुप ‘अ’ के अधिकारी आदि, उनके बच्चों को इसका लाभ नहीं मिलना चाहिये।

  2. on 12 Apr 2008 at 6:02 am Gyan Dutt Pandey

    सुप्रीम कोर्ट का फैसला तो सही लगता है।

  3. on 12 Apr 2008 at 7:04 am हर्षवर्धन

    एकदम जंग अभी जारी है। आपने सभी पक्षों पर काफी कुछ ठीक-सा लिखा है। लेकिन, ये तो तय करना ही होगा आरक्षण कब तक।

  4. on 12 Apr 2008 at 10:02 am अफ़लातून

    क्या अनारक्षित वर्ग में क्रीमी लेयर नहीं है ?
    अत्यन्त उचित समीक्षा प्रस्तुत की है , शुक्रिया ।

  5. on 12 Apr 2008 at 1:07 pm akhilesh sharma

    aapki baat main dam hai. lekin har tasvir ke kai pehlu hote hain. isi baare main maine bhi ek lekh apne blog per likha hai. nazar daliye.
    http://merikahi.blogspot.com

  6. on 14 Apr 2008 at 4:51 pm Pravin K. Prabhat

    क्या करारा तमाचा मारा है सर….पर साथ ही साथ मीडिया पर जो तमाचा जड़ा है, वह सोने पे सुहागे वाली बात की है ……लगे रहिये सर …….

  7. on 14 Apr 2008 at 5:40 pm Brij mohan Shrivastava

    क्रीमी लेयर की परिभाषा अत्यन्त युक्ति संगत एवं समयानुकूल है। वैसे पाँच लाख सालाना आय वालों को वंचित किया गया तो कम लोग लाभान्वित होंगे क्योंकि प्राइवेट सेक्टर जिस प्रकार से तनख्वाह बांटते हैं, कुछ अवधि के पश्चात यह राशि भी परिवार के गुजारे लायक ही होगी। 

  8. on 16 Apr 2008 at 3:35 pm Dr. Chandra Kumar Jain

    लंबी प्रतीक्षा के बाद आपको पढ़ना
    बड़ा सुखद प्रतीत हो रहा है.
    आरक्षण पर आपका लेखन तो
    अधिकारिक और मार्गदर्शक है.
    आभार.

  9. on 15 May 2008 at 7:20 am Roshini

    Nice Post !
    Use a Hindi social bookmarking widget like PrachaarThis to let your users easily bookmark their favourite blog posts on Indian bookmarking services.

  10. on 06 Feb 2009 at 3:22 pm Krishnarao Mudaliar

    please inform me how to get a software and how to down it on my computer Translate in other languages in hindi and other languages
    Krishnarao Mudaliar

  11. on 06 Feb 2009 at 3:24 pm Krishnarao Mudaliar

    please inform me how to get a software and how to download it on my computer
    Translate in other languages in hindi and other languages
    Krishnarao Mudaliar

  12. on 19 Jul 2010 at 7:47 pm rajesh

    सवर्ण समाज में ही कुछ विभिसन जैसे गद्दार हैं जिनके कंधे पर सवार होकर सवर्णों का ही बुरा किया जा रहा है अब भारतीय प्रजा शक्ति पार्टी आरक्षण विरोधी मुहीम चला रही है आप भी इस मुहीम म सामिल होकर अपना फ़र्ज़ अदा करें

Trackback URI | Comments RSS

Leave a Reply