RSS Feed:
Posts
Comments

जड़ प्रकृति के पिंडों के बीच जिस प्रकार आकर्षण और प्रतिकर्षण के दो बल सर्वदा एक साथ क्रियाशील रहते हैं जिनके कारण उनके बीच एक संतुलन बना रहता है, ठीक वैसे ही आकर्षण और प्रतिकर्षण के दो बल चेतन प्रकृति के जीवों के बीच भी सदा क्रियाशील रहते हैं जो सृष्टि चक्र में संतुलन बनाए रखते हैं। यहाँ हम समस्त जीवों के बजाय यदि केवल मानव समाज के संदर्भ में ही इस सिद्धांत की चर्चा करें, तो इस गुत्थी को बेहतर समझ सकेंगे। और जब इस गुत्थी को समझ लेंगे तो समकालीन समस्याओं के व्यावहारिक हल तलाशना भी सुगम होगा।

मानव चेतना भी आकर्षण और प्रतिकर्षण के इन दो बलों के परस्पर द्वन्द्व से संचालित होती है। आकर्षण का जो बल दो मनुष्यों की चेतना को आपस में जोड़ता है उसे “धर्म” कहते हैं, और प्रतिकर्षण का जो बल दो मनुष्यों की चेतना को एक-दूसरे से दूर करता है, उसे “अधर्म” यानी आधुनिक अर्थों में “राजनीति” कहते हैं।

मानव चेतना भी आकर्षण और प्रतिकर्षण के इन दो बलों के परस्पर द्वन्द्व से संचालित होती है। आकर्षण का जो बल दो मनुष्यों की चेतना को आपस में जोड़ता है उसे “धर्म” कहते हैं, और प्रतिकर्षण का जो बल दो मनुष्यों की चेतना को एक-दूसरे से दूर करता है, उसे “अधर्म” यानी आधुनिक अर्थों में “राजनीति” कहते हैं। धर्म की बुनियाद है प्रेम, लगाव, समानता। इसके विपरीत अधर्म यानी राजनीति की बुनियाद है, टकराव, अलगाव, भिन्नता। जो प्रेरक भाव हमें एकत्व की ओर ले जाता है, एक-दूसरे से जुड़ने के लिए उत्साहित करता है, वही धर्म है। और, जो भाव हमारे भीतर अपनी विशिष्टता की अलग पहचान का आग्रह भरता है, अपने को दूसरे से बेहतर, महत्तर जताने, एक-दूसरे से आजाद करने के लिए सचेष्ट करता है, वही राजनीति है। यदि आप “धर्म”, “अधर्म” और “राजनीति” शब्दों के पारंपरिक अर्थों के बजाय उन्हें सर्वथा नवीन संदर्भ में ग्रहण कर सकें तो इसे बेहतर समझ सकेंगे।

सामाजिक गतिकी में संतुलन के लिए धर्म और राजनीति, दोनों का एक साथ सम्यक अनुपात में सक्रिय होना अपरिहार्य है। डॉ. राममनोहर लोहिया इसे दूसरे तरीके से कहते थे, “राजनीति अल्पकालीन धर्म है और धर्म दीर्घकालीन राजनीति”। समाज केवल धर्म के सहारे या केवल राजनीति के जरिए नहीं चल सकता। दोनों के बीच अनुपात का संतुलन आवश्यक है। जब कभी यह संतुलन गड़बड़ाता है तो समाज भयंकर समस्याओं से परेशान हो जाता है और उस संतुलन को फिर से कायम करने के लिए किसी शक्तिसंपन्न चेतना को सामाजिक द्वंद्व में हस्तक्षेप करने के लिए सक्रिय होना पड़ता है। इसी बात को गीता में श्रीकृष्ण की सर्वाधिक चर्चित अभिव्यक्ति, “यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥” में भी उदघाटित किया गया है।

जिस व्यक्ति के प्रति हम जुड़ाव, लगाव महसूस करते हैं उनसे एक रिश्ता बना लेते हैं या जिनके साथ हमारा एक रिश्ता होता है, उनके प्रति हम जुड़ाव, लगाव महसूस करने लगते हैं। इस रिश्ते को शिद्दत के साथ निभाने, इस लगाव को परवान तक चढ़ाने को ही धर्म कहते हैं। लेकिन रिश्तों के बीच, आपसी लगाव के संबंधों के बीच ही एक ऐसा कारक भी सक्रिय रहता है जो उनमें दरार डालने का, अलगाव पैदा करने का, दूरी बढ़ाने का काम करता है, जिसे राजनीति कहते हैं। यदि यह राजनीति न हो तो समाज में व्यक्तिगत स्वतंत्रता का लोप हो जाएगा और सामाजिक जीवन की गतिशीलता नष्ट हो जाएगी। हर परिवार में, हर देश में टकराव की परिस्थितियां पैदा होती रहती हैं और वे अलग-अलग भागों में विभक्त होते रहते हैं। लेकिन उनके बीच आपसी जुड़ाव के तंतु भी समानांतर रूप से सक्रिय रहते हैं। मानव समाज के अस्तित्व का विकास-क्रम तभी तक स्थायी रह सकता है जब तक मनुष्यों के बीच आपसी लगाव और अलगाव को प्रेरित करने वाले भाव संतुलित अनुपात में रहें।

समकालीन दौर में मानव समाज जिन परिस्थितियों से गुजर रहा है, उसके कारण धर्म और राजनीति के बीच का आनुपातिक संतुलन बिगड़ गया है। राजनीति प्रबल हो रही है और धर्म शिथिल हो रहा है। मनुष्यों के बीच आपसी अलगाव, टकराव बढ़ रहा है और लगाव, अपनत्व कम हो रहा है। राजनीतिबाज यानी “दुष्कृत” लोग जनमानस में जुड़ाव, लगाव के सहज भाव को क्षोभित करके उनके बीच टकराव, अलगाव पैदा करने की चेष्टा में लगे हैं।

यह सब इस समय पूरी दुनिया में, हर देश में, हर जाति में, हर वर्ग में चल रहा है। अपने देश में हम इन दिनों राज -बाल ठाकरे को मराठी-बिहारी की राजनीति करके आपसी सदभाव बिगाड़ने की कुचेष्टा करते देख ही रहे हैं। यहां तक कि हिन्दी चिट्ठा जगत में भी ऐसे अवि… – मसि… टाइप राजनीतिबाज सक्रिय हैं जो “साधुवाद के दौर के अंत” के उदघोष के साथ चिट्ठाकारों के बीच आपसी टकराव को हवा देने में जोर-शोर से जुटे हुए हैं। यह सही है कि यदि वे न होते तो चिट्ठाकारी में जो गतिशील विकास देखने को मिल रहा है वह उस रूप में उभर कर सामने नहीं पाता। परंतु क्या आपको नहीं लगता कि साधुवादियों और टकराववादियों के बीच संतुलन अब इस कदर बिगड़ने लगा है कि इसमें किसी समर्थ हस्तक्षेप की जरूरत है?

 आगे पढ़िए »

8 Responses to “धर्म, राजनीति और हम”

  1. आप ने राजनीति और धर्म को बदले हुए मायनों में समझने का आग्रह कर के सब गड़ बड़ कर दिया है। अब इन शब्दों के पुराने अर्थों के लिए नए शब्द कहाँ से लायें?
    आप की विवेचना प्रणाली अनायास ही भौतिकवादी हो गयी है। यह इस बात का प्रमाण है कि वस्तुतः भौतिकवाद ही सही दर्शन है अर्थात् विचार वस्तु से उत्पन्न होता है, विचार से वस्तु नहीं। आप के आलेख में यही हो रहा है, अनजाने में ही सही।

  2. आप का मेल क्या है? कभी चैट करने को जी चाहता है।

  3. on 07 Mar 2008 at 11:03 am Srijan Shilpi

    @ दिनेशराय जी,

    आपको जीमेल चैट पर अनुरोध भेज दिया है। जब कभी मुझे ऑनलाइन देखें, चैट के लिए संदेश भेज सकते हैं।

    आपकी पहले वाली टिप्पणी का उत्तर देने के लिए एक नई पोस्ट लिखने की जरूरत है। शीघ्र लिखने का प्रयास करता हूं।

  4. on 07 Mar 2008 at 4:06 pm अनिल रघुराज

    “जो प्रेरक भाव हमें एकत्व की ओर ले जाता है, एक-दूसरे से जुड़ने के लिए उत्साहित करता है, वही धर्म है। और, जो भाव हमारे भीतर अपनी विशिष्टता की अलग पहचान का आग्रह भरता है, अपने को दूसरे से बेहतर, महत्तर जताने, एक-दूसरे से आजाद करने के लिए सचेष्ट करता है, वही राजनीति है।”
    धर्म और राजनीति से लेकर रिश्तों व टकराव के एकदम नए अर्थ ने सोचने का नया आधार दिया है। फिलहाल समझने की कोशिश कर रहा हूं।

  5. on 08 Mar 2008 at 1:08 pm अजित वडनेरकर

    “राजनीति अल्पकालीन धर्म है और धर्म दीर्घकालीन राजनीति”
    लोहिया जी की इस उक्ति का बहुत दिनों बाद स्मरण कराने के लिए आभार। दिनेशराय जी की टिप्पणी के संदर्भ में आपके लेख को दोबारा पढ़ना पड़ा। अब आपके नए लेख की प्रतीक्षा है।

  6. on 09 Mar 2008 at 1:55 pm Dr. Chandra Kumar Jain

    SHILPI JI,
    KUCH DHARMA KI RAJNEETI AUR RAJNEETI KE DHARMA PAR BHI LIKHIYE NA…
    AAPKE GYAN AUR CHINTA KO AALOKIT KARTA SABDLOK, SOCHANE-SAMAJHNE KE LIYE NAYE SETU BANA RAHA HAI.
    AABHAR…
    NAYE AALEKH KA INTJAAR RAHEGA.

  7. on 10 Mar 2008 at 10:06 pm अनूप शुक्ल

    “राजनीति अल्पकालीन धर्म है और धर्म दीर्घकालीन राजनीति” सही कहे थे लोहियाजी।
    अविनाश,मसिजीवी जैसे अपने काम में मेहनत से लगे बाकुंरे भी आवश्यक हैं। दिल लगा रहता है।

  8. on 26 Mar 2008 at 8:55 pm Brij mohan shrivastava

    समर्थ हस्तक्षेप करेगा कौन ?  इतिहास गवाह है, कलम ने क्रांति की है। आप जैसे समर्थ लेखक हस्तक्षेप का बीड़ा उठा लें तो क्या संभव नहीं है। जो सिर से लेकर पांव तक खुद्दार नहीं है, हाथों में कलम लेने का हक़दार नहीं है। आप जैसे लेखकों की समाज को, देश को ज़रूरत है।

Trackback URI | Comments RSS

Leave a Reply