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चार बजट नोट कमाने के लिए और एक बजट वोट पाने के लिए। पांच साल की सत्ता के दौरान चार साल बाजार के साथ ताल में ताल मिलाने के बाद पांचवें साल वोटर की तरफ मुखातिब होना लोकतंत्र में सरकार की मजबूरी है। चुनाव में उतरकर जनता से समर्थन मांगने की यह मजबूरी यदि सरकार के सामने न हो तो देश को कंपनीराज में पूरी तरह तब्दील हो जाने में इतनी देर न लगे।

मगर बाजार और सरकार की जुगलबंदी चार वर्षों तक अपने बेसुरे राग से आम जनता के मिजाज को इतना परेशान कर चुकी होती है कि आख़िरी बजट के लुभावन आलाप के बाद भी उसके हाथ ताली बजाने के लिए खुल नहीं पाते। इस जुगलबंदी से बाजार में इतनी मंहगाई बढ़ चुकी होती है और सरकार में इतना भ्रष्टाचार बढ़ चुका होता है कि आखिरी बजट में जब मतदाताओं का ख्याल करते हुए हालात को थोड़ा संभालने की कवायद की जाती है तो जनता उससे राहत महसूस नहीं कर पाती। इसलिए पांच साल के बाद जब सरकार चुनाव में उतरती है तो जनता उसे नकारते हुए उसका चेहरा बदलकर अपनी नाराजगी जाहिर कर देती है।

हालांकि सरकार का चेहरा बदल देने के सिवाय जनता के वश में कुछ और होता नहीं। दरअसल वह सरकार का चेहरा भी नहीं बदल पाती। वह सिर्फ उसका मुखौटा बदल पाती है। सरकार को अंदर से बदलने की क्षमता तो बाजार के पास है । हमने देखा है कि पिछले दो दशकों में बाजार ने सरकार को कैसे अंदर से पूरी तरह बदल कर रख दिया है और अलग-अलग सरकारें किस तरह बाजार के हाथों की कठपुतली बनकर नाचती रही हैं।

बाजार और सरकार, दोनों के वजूद भले ही जनता के बल पर कायम हों, मगर बाजार के लिए जनता सिर्फ उपभोक्ता है, और सरकार के लिए वह सिर्फ मतदाता। बाजार को उससे मुनाफा चाहिए, सरकार को उससे सत्ता चाहिए। इसलिए दोनों मिलकर जनता को उल्लू बनाते हैं और अपना-अपना उल्लू सीधा करते हैं।

जनता को उस औजार की दरकार है जिससे वह बाजार और सरकार के बीच के अनैतिक गठजोड़ को तोड़ सके और उन्हें अपने हितों के अनुरूप काम करने के लिए बाध्य कर सके। वह औजार एक ही है – जनता के बीच सहज आपसी सहकार, जिसके बल पर वह चाहे तो सरकार और बाजार, दोनों को अपनी अंगुलियों पर नचा सकती है।

जनता को उस औजार की दरकार है जिससे वह बाजार और सरकार के बीच के अनैतिक गठजोड़ को तोड़ सके और उन्हें अपने हितों के अनुरूप काम करने के लिए बाध्य कर सके। वह औजार एक ही है- जनता के बीच सहज आपसी सहकार, जिसके बल पर वह सरकार और बाजार, दोनों को अपनी अंगुलियों पर नचा सकती है। यही वह ब्रह्मास्त्र है जिसके द्वारा वह अपनी खुशहाली, आजादी और शांति हासिल कर सकती है। बाजार और सरकार की संगठित ताकतों के अन्याय से मुकाबला करने के लिए उसे खुद को संगठित करना पड़ेगा।

आपस में संगठित होने की बजाय जनता अभी तक प्रशासनिक और न्याय व्यवस्था पर भरोसा करती रही है कि वे संविधान के अनुरूप कार्य करते हुए जनता के हितों की रक्षा करेंगे। मगर अब उसे प्रशासन और न्याय तंत्र के तेजी से बदल रहे चरित्र को अच्छी तरह से समझ लेना होगा जो अब भ्रष्टाचार में आकंठ डूब चुकी है और केवल सरकार और बाजार के मोहरे की तरह काम कर रही है। वे अब जनता के हितों की रक्षा करने के लिए आगे नहीं आएंगे।
इसके अलावा, जनता को अपने बीच मौजूद ऐसे तत्वों की पहचान भी करनी होगी जो दरअसल बाजार और सरकार के दलाल या एजेंट के रूप में काम करते हैं। ये एजेंट तरह-तरह की भूमिका में हो सकते हैं। वे पत्रकार, कलाकार, बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता या धर्म प्रचारक का भी नकाब ओढ़े हो सकते हैं। ये जनता के ध्यान को इधर-उधर की व्यर्थ सतही बातों, फिजूल की बहस और मनबहलाव में उलझाए रखते हैं और उनके हित के असली मुद्दों से भटकाए रखते हैं।

जनता अपने बीच छिपे इन दलालों को पहचानकर उनसे पीछा छुड़ा ले और आपसी सहकार से जीना, रहना और लड़ना शुरू कर दे तो वह दिन दूर नहीं जब बाजार और सरकार, दोनों उसके हाथों की कठपुतली होंगे। जनता के बीच हर स्तर पर, हर मंच पर आपसी सहकार अधिक से अधिक बढ़ना चाहिए। संगठित जनता ही बाजार और सरकार को अपनी शर्तों पर झुका सकती है और अपने हितों के लिए काम करने के लिए बाध्य कर सकती है।

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7 Responses to “बाजार-सरकार बनाम जन-सहकार”

  1. on 02 Mar 2008 at 10:01 am Dr. Chandra Kumar Jain

    beshak…BIN SAHKAAR NAHEEN UDHAAR.
    JAN-EIKYA MEIN BADEE TAQAT HAI.
    BADE DINON SE AAPKA INTZAAR THA.
    DHANYAVAD..

  2. on 02 Mar 2008 at 10:07 am अनिल रघुराज

    “बाजार के लिए जनता सिर्फ उपभोक्ता है, और सरकार के लिए वह सिर्फ मतदाता। बाजार को उससे मुनाफा चाहिए, सरकार को उससे सत्ता चाहिए।” लेकिन बाज़ार और सरकार दोनों ही अपरिहार्य हैं। ऐसे में जनता का सहकार ही कोई राह निकाल सकता है। एकदम सच कहा है आपने।

  3. on 02 Mar 2008 at 3:53 pm visfot

    आप वर्डप्रेस और अपने डोमेन पर आ गये. बहुत अच्छा लगा.

  4. on 02 Mar 2008 at 4:20 pm Jagdish Bhatia

    बाजर और सरकार के इस खेल के प्रति नागरिकों को जागरूक किया जाना बहुत ही जरूरी है।

    अफसोस यह है कि बाजार अपनी चकांचौंध से और सरकार लोन माफी जैसे झुनझुनों से जनता को मूर्ख बनाते हैं।

  5. on 07 Mar 2008 at 11:06 am Srijan Shilpi

    @ विस्फोट,

    अपना डोमेन और वर्डप्रेस तो कई वर्ष पुरानी बात है। लगता है आपकी निगाह अब जाकर गई है। :)

  6. on 10 Mar 2008 at 10:07 pm अनूप शुक्ल

    बाजार पर अच्छा लिखा है। सुन्दर!

  7. on 03 Apr 2008 at 6:05 pm BrijmohanShrivastava

    मुआफी चाहते हुए निवेदन है की आप अध्यात्म योग दर्शन के बाद कर्म योग में गीता के कर्म योग का पालन कर रहे हैं =क्या यह सम्ब्हब है की जनता सहकार से जीना रहना लड़ना सीख कर और उस सीखे पर अमल करके सरकार और बाज़ार को नचा सके /आप तो सम्भिधान और कानून के विशेष ज्ञाता है दर्शन और अध्यात्म का गहन अध्ययन किए हुए है मानव प्रकृति और प्रब्रती से परिचित है फिर क्या आपका ये लेख काल्पनिक नहीं है किस युग में ये हो पाया है और आगामी कितनी सदियों तक ये संभावना है की जनता[ जो की उपभोक्ता है सरकार की भी और बाज़ार की भी ]सरकार और बाज़ार को नचा पायेगी और ख़ुद नाचना भूल जायेगी

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