यह महज संयोग से कुछ अधिक लगता है। इस चिट्ठे पर तीसरे मोर्चे से संबंधित पिछले लेख में कांग्रेस और भाजपा के बीच पनप रहे नापाक किस्म के दोस्ताने को खास तौर पर रेखांकित किया गया था। और, कांग्रेस का मीडिया प्रकोष्ठ इस तरह के दोस्ताने के सार्वजनिक होने के घातक असर को प्रभावशून्य करने के अभियान में फौरन मुस्तैदी से जुट गया। कल हर अख़बार की सुर्खियों में राहुल गाँधी अचानक यह असहज स्पष्टीकरण देते नज़र आए कि कांग्रेस और भाजपा एक-दूसरे के प्रबल राजनीतिक विरोधी हैं और दोनों के बीच बुनियादी मतभेद हैं।
यह सफाई जिस संदर्भ में दी गई, उसका मूल प्रसंग तो पुराना पड़ चुका था और उसमें ऐसी कोई खास बात थी भी नहीं कि इतने दिनों बाद उस मामूली प्रसंग को लेकर इतना बड़ा मीडिया कैम्पेन चलाया जाए। हुआ यों था कि पिछले गुजरात चुनाव प्रचार के दौरान दो माह पहले एक बार दिल्ली हवाई अड्डे पर अपने-अपने विमानों का इंतजार करते समय आडवाणी जी और राहुल गाँधी के बीच संयोग से मुलाकात हो गई थी। वैसे, संसद सत्रों के दौरान दोनों के बीच इस तरह का आकस्मिक आमना-सामना तो रोज ही होता है। परंतु, हवाई अड्डे के वीआईपी लाउंज में आडवाणी जी को सामने देख राहुल गाँधी शिष्टाचारवश अभिवादन करने जा पहुँचे थे। आडवाणी जी ने मौका देखकर कांग्रेस पार्टी के युवराज राहुल को यह समझाने की कोशिश की थी कि हम एक-दूसरे के राजनीतिक विरोधी हैं, शत्रु नहीं और हमें आपस में इसी तरह से व्यवहार करना चाहिए। आडवाणी जी को लगा होगा कि राहुल को यह बात खास तौर पर समझाने की जरूरत है। सोनिया जी और कांग्रेस के पुराने दिग्गज तो इसे बखूबी समझते ही हैं। पता नहीं क्यों, उस शिष्टाचार मुलाकात में हुई इस निजी बातचीत की ख़बरें भाजपा की ओर से मीडिया में प्रचारित भी कर दी गई।
कांग्रेस को उस समय तो नहीं, पर अब उस बात के बहाने भाजपा के साथ बढ़ रही उसकी अंदरुनी साँठ-गाँठ के सार्वजनिक हो जाने के घातक राजनीतिक असर का अहसास हो रहा है। कांग्रेस पार्टी के मीडिया विभाग के प्रमुख वीरप्पा मोइली ने पत्रकारों के लिए लंच पार्टी का आयोजन किया और उसी के दौरान कांग्रेस महासचिव राहुल गाँधी ने कांग्रेस बीट कवर करने वाले अपने खास-खास पत्रकारों के माध्यम से आडवाणीजी के साथ हुई उस मुलाकात के सार्वजनिक होने के प्रतिकूल निहितार्थ और जनता के बीच गए विपरीत संदेश के असर को कम करने की कोशिश की और उस बातचीत को सार्वजनिक करने के लिए आडवाणी पर निशाना साधते हुए कहा कि ‘मेरी यह आदत नहीं है कि मैं निजी बातचीत को मीडिया के सामने जाहिर करूं।’ बेमौके के इस मीडिया कैम्पेन का कोई और खास मक़सद नहीं था। लंच पार्टी के दौरान पत्रकारों के साथ राहुल की केवल अनौपचारिक बातें ही हुईं। पर प्राय: हर अख़बार की सुर्खियों ने राहुल गाँधी के मीडिया अभियान का सबूत चीख-चीख कर दिया।
आगे पढ़िए »
दोनों की दोस्ती में प्रतिद्वंदिता भी है, प्रभु वर्गों का सच्चा और वफादार बने रहने की।
इसमें क्या गलत है की कॉंग्रेस और भाजपा दुश्मन नहीं प्रतिस्पर्धि मात्र है, यही होना चाहिए. फिर वामपंथियों और क्षेत्रियदलो के ब्लैकमेलिंग से बचने के लिए हाथ मिलाना भी बुरा नहीं.
बाकि जो आपने कहा सही ही है
राजनीति में न दुश्मनी स्थायी है न दोस्ती। अत: “कांग्रेस और भाजपा के बीच पनप रहे नापाक किस्म के दोस्ताने” को उसी स्पिरिट में लिया जाये।
दिक्कत ये है कि दोनों पार्टियों को एक-दूसरे से स्वतंत्र आधार नहीं मिल रहा। इंदिरा और राजीव के जमाने में कांग्रेस ने जब हिंदूवादी बनने की कोशिश की तो बीजेपी में जान आ गई। और बीजेपी जब गांधीवादी और उदार बनने की कोशिश करती है तो कांग्रेस को बढ़त मिल जाती है। सच यही है कि कांग्रेस और बीजेपी कतई mutually disjoint नहीं हैं। दोनों में जबरदस्त overlapping है। फिर एक बार तो आडवाणी ने सीआईआई के सम्मेलन में कहा था कि पार्टी की नीति भले ही अलग हो, लेकिन सरकार में आने पर नीतियों की निरतंरता को जारी रखना ज़रूरी होता है। उन्होंने इस संदर्भ में विदेश मंत्री के रूप में अटल की पहली पाकिस्तान यात्रा का उल्लेख भी किया था। सत्ता की पार्टियां हैं तो आपसी बांट-बखरा ही चलेगा। दुश्मनी का रिश्ता तो हो ही नहीं सकता।