यह साबित करने के लिए अलग से दलील, तथ्य और प्रमाण पेश करने की जरूरत नहीं रह गई है कि केन्द्र की राजनीति में कांग्रेस और भाजपा एक-दूसरे के अस्तित्व को बनाए रखने में सबसे बड़े मददगार बनते जा रहे हैं। यदि इन दोनों पार्टियों का वश चले तो वे तमाम अन्य दलों को राजनीति के मैदान से खदेड़कर “इस बार मैं, अगली बार तू” वाला खेल दशकों तक जारी रखना चाहेंगे, जैसा कि अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में चलता रहा है। लेकिन क्षेत्रीय एवं छोटी-छोटी पार्टियों के साथ गठबंधन करके सत्ता में आने की मजबूरी के चलते उनकी राजनीति की दुकानें काफी अरसे से निर्बाध ढंग से नहीं चल पा रही हैं। अक्सर इन दोनों पार्टियों के शीर्ष नेताओं के बयानों में इस बात की कसक और छटपटाहट छलक जाती है। पिछले वर्षों में कई बार यह दिखा कि सत्ता में रहते हुए जब कभी इन दोनों पार्टियों में से किसी को दूसरे की कमजोर नब्ज पकड़ में आई तो वे सुनियोजित रणनीति के तहत एक-दूसरे को बख्श देते रहे हैं और अंदर ही अंदर दूसरी पार्टी की मदद करते रहे हैं।
यूँ तो सत्ताधारी और विपक्षी पार्टियों के बीच स्वस्थ और रचनात्मक सहयोग का होना लोकतंत्र की मजबूती और देश के विकास के लिहाज से बहुत अच्छी बात है, लेकिन कांग्रेस और भाजपा के बीच अंदर ही अंदर जिस तरह के दोस्ताने की खिचड़ी पक रही है, वह असल में नैतिकता की दृष्टि से नापाक और आम देशवासियों के दूरगामी हितों के ख्याल से खतरनाक है। यह बात अब छिपी नहीं रह गई है कि ये दोनों पार्टियाँ दरअसल नवसाम्राज्यवादी पूँजीवादी ताकतों के साथ मिलकर उनके लिए एजेंट की भूमिका में ही अपना सुरक्षित भविष्य देख रही हैं। ये पार्टियाँ अपने पूँजीवादी आकाओं के निर्देश पर देश की अस्सी फीसदी आम जनता को लूटने और बीस फीसदी समृद्धिशील जनता को खुश करने वाली नीतियों पर चलना चाहती हैं। ऐसा करते हुए लोकतंत्र के जरिए सत्ता का खेल खेलते हुए पारी-पारी से सत्ता सुख हासिल करते रहने में उन्हें कोई परेशानी नहीं है। उनकी नीयत और तौर-तरीकों को देखकर गुलामी के दिनों में अंग्रेजपरस्त भारतीय जमींदारों और देशी रियासतों के राजे-महाराजाओं के कारनामे याद आने लगे हैं।
इसी बात को भाँपते हुए राजनीति के धुरंधर एक अरसे से किसी ऐसे तीसरे मोर्चे के मजबूत विकल्प का ताना-बाना बुनने की कवायद शुरू किए जाने की जरूरत शिद्दत से महसूस करते रहे हैं जो कांग्रेस और भाजपा, दोनों पार्टियों से समान दूरी बनाए रखते हुए सैद्धांतिक धरातल पर जनहित के अनुकूल नीतियों को अपनाए और व्यावहारिक धरातल पर बहुमत का समर्थन हासिल कर सकने की काबिलियत रखे।
राजकिशोर जी ने केन्द्र की राजनीति में तीसरे मोर्चे की संभावना की पड़ताल करते हुए सितम्बर, 2007 के अपने लेख तीसरा मोर्चा उर्फ़… में कहा था :
“भाजपा कांग्रेस से नहीं डरती। कांग्रेस को हरा कर ही वह सत्ता में आई थी और जिन राज्यों में आई है, इसी रहगुजर से आई है। वह दरअसल तीसरा मोर्चा से डरती है, क्योंकि इस कीटाणु का सच्चा एंटीबॉयटिक वही है। लेकिन वामपंथी पता नहीं किस चीज का इंतजार कर रहे हैं। लंबा इंतजार उन्हें इस लायक नहीं छोड़ेगा कि वे तीसरा मोर्चा का नेतृत्व कर सकें, जैसा कि सिंगूर और नंदीग्राम के कठोर अनुभव बताते हैं।”
यूँ तो समाजवादी पार्टी और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता पिछले दो वर्ष से जब-तब तीसरे मोर्चे के गठन की सुगबुगाहट दिखा रहे थे। लेकिन पिछले वर्ष राष्ट्रपति चुनाव के मद्देनज़र जब समाजवादी पार्टी, तेलगू देशम पार्टी, अन्नाद्रमुक, इंडियन नेशनल लोकदल, असम गण परिषद जैसी आठ क्षेत्रीय पार्टियों ने मिलकर यूनाइटेड नेशनल प्रोग्रेसिव एलायंस (यूनपीए) नाम से एक तरह के तीसरे मोर्चे का गठन करने की कोशिश की तो मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने उस वक्त उसे खास तवज्जो नहीं दी। लेकिन अमेरिका के साथ परमाणु संधि के मसले पर यूएनपीए का समर्थन हासिल करने के मकसद से माकपा उसके करीब आई और अब वह तीसरे मोर्चे के गठन को लेकर काफी गंभीर है।
भाजपा की घबराहट
तीसरा मोर्चा अभी गर्भ में है और इसमें शक नहीं कि आगामी लोकसभा चुनाव की घोषणा से पहले वह जन्म ले चुका होगा। लेकिन भाजपा अभी से उसके डर से जिस तरह से आतंकित दिख रही है, वह वाकई हैरतअंगेज है। तीसरे मोर्चे को लेकर माकपा एवं अन्य दूसरी पार्टियों की गंभीरता सामने आते ही भाजपा ने जिस तरह की पिनपिनाहट भरी प्रतिक्रिया व्यक्त की है, उससे उसकी बौखलाहट का साफ पता चलता है। हालाँकि आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर उसे तीसरे मोर्चे से अभी इस तरह घबराने की जरूरत नहीं है, क्योंकि जन्म के बाद अपने राजनीतिक बचपन को पारकर जवानी की दहलीज पर कदम रखने में तीसरे मोर्चे को कुछेक साल तो लग ही जाएंगे। भाजपा को अभी तो अगले आम चुनाव में कांग्रेस और यू.पी.ए. को परास्त करने में अपनी ऊर्जा लगानी चाहिए। बहरहाल, तीसरे मोर्चे के जन्म के संबंध में भाजपा के प्रवक्ता ने जो कुछ कहा है, उस पर गौर फरमाना एक बार जरूरी है :
“भारतीय राजनीति अब द्विध्रुवीय हो गई है और भाजपा तथा कांग्रेस भारतीय राजनीति के दो ध्रुव हैं। तीसरे मोर्चे के गठन की बात करना भारतीय जनमत को तोड़ने मरोड़ने की कोशिश है। … तथाकथित तीसरे मोर्चे का शोशा कुछ और नहीं बल्कि भाजपा के उत्थान में बाधा डालने तथा उसे सत्ता में आने से रोकने का प्रयास है।… तीसरे मोर्चे के निर्माण की बात करना माकपा की धृष्टता और उसके अतिनिम्न स्तरीय अहंकार को दर्शाता है।”
यदि तीसरे मोर्चे को सही मायने में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी का मजबूत विकल्प बनकर उभरना है और दोनों को एक साथ जोरदार टक्कर दे सकने की कुव्वत पैदा करनी है तो उसमें वामपंथी पार्टियों के साथ-साथ बहुजन समाज पार्टी को भी अनिवार्य रूप से शामिल होना पड़ेगा। बसपा का भी मालूम है कि कांग्रेस और भाजपा उसके सच्चे हमराही कभी नहीं बन सकते और केन्द्र की सत्ता में काबिज होने का उसका अवसरवादी एजेंडा उनके साथ दोस्ती करके पूरा नहीं होगा, इसलिए देर-सबेर वह भी तीसरे मोर्चे के करीब आएगी। भले ही उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी से उसकी कट्टर दुश्मनी जारी रहे, पर केन्द्र की राजनीति में वह उसी तीसरे मोर्चे का एक ताकतवर घटक बनकर रहना चाहेगी, जिसमें समाजवादी पार्टी भी शामिल होगी।
नेतृत्व की पेचीदगी
तीसरे मोर्चे के लिए सबसे मुश्किल गुत्थी उसमें किसी सर्वमान्य नेतृत्व की तलाश से जुड़ी है। बहुत मुश्किल होगा इस मोर्चे में शामिल हर घटक राजनीतिक दल के लिए कि वह अपनी स्वतंत्र पहचान और अपने नेता की महत्वाकांक्षा को परे रखते हुए किसी ऐसे नेता को स्वीकार कर ले, जिसकी छवि और क्षमता सर्वमान्य हो, असंदिग्ध हो। जिस दिन उसे कोई ऐसा सर्वमान्य नेतृत्व मिल जाएगा, तीसरा मोर्चा अपनी राजनीतिक जवानी की दहलीज पर कदम रख चुका होगा और फिर उसकी राह रोक सकने की जुर्रत कांग्रेस और भाजपा में नहीं हो सकेगी।
मोर्चे का थिंक टैंक
यह मानने में कोई हिचक नहीं कि सत्ता हथियाने का अवसरवाद ही तीसरे मोर्चे के गठन का मुख्य उत्प्रेरक अब भी है। कोई पावन सैद्धांतिक निष्ठा, विचारधारात्मक प्रतिबद्धता, जनहित और राष्ट्रहित की उदात्त प्रेरणा इसके पीछे नहीं है। लेकिन कालचक्र घूमते-घूमते अब उस दौर में पहुँच चुका है, जब इस तीसरे मोर्चे को भारत की राजनीति में एक निमित्त बनकर महापरिवर्तन के वाहक का दायित्व पूरा करना है। तीसरे मोर्चे को वह धुरी बननी है जिसके सहारे महाकाल अपनी अभूतपूर्व विराट योजनाओं को अंजाम दे सके। यदि तीसरा मोर्चा अपनी इस चुनौतीपूर्ण भूमिका को स्वीकार करता है तो उसे राजनीति, अर्थव्यवस्था, अंतर्राष्ट्रीय संबंध, विज्ञान और टेक्नोलॉजी तथा सामरिक नीति के विशेषज्ञों का एक स्वतंत्र थिंक टैंक बनाकर मुद्दे, कार्यक्रम और नीतियों से जुड़े मसलों को तय करने और उन्हें कारगर रूप से पेश करने का दायित्व सौंप देना चाहिए।
भविष्य के समर्थ नेता
हमारे देश में सरोकार, समझ और संभावना से भरपूर कई ऐसे संगठन और राजनीतिक व्यक्तित्व गढ़े जाने की प्रक्रिया में हैं जो निकट भविष्य में तीसरे मोर्चे का नेतृत्व संभाल सकते हैं। आज भले ही वे नेपथ्य में छिपे दिखाई देते हों, लेकिन आने वाले समय में जब कालचक्र की मथनी घूमेगी तो मौजूदा दौर के ज्यादातर धुरंधर और दबंग राजनेता उड़कर हाशिये पर जा फिकेंगे और तब इन होनहार राजनेताओं को राजनीति की मुख्यधारा में जगह बनाने का मौका मिलेगा। लोक सत्ता पार्टी के डॉ. जयप्रकाश नारायण, एकता परिषद के पी.वी. राजगोपाल, इंडियन जस्टिस पार्टी के उदित राज, नेशनल एलायंस ऑफ पीपुल्स मूवमेंट की मेधा पाटेकर, आदि के अलावा स्वामी अग्निवेश, राजकिशोर, वेद प्रताप वैदिक, आदि जैसे कई प्रबुद्ध, प्रतिबद्ध एवं प्रखर व्यक्ति आने वाले दौर में स्वस्थ और बेहतर राजनीति का माहौल तैयार करने में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए आगे आ सकते हैं।
राजनीति के संबंध में पिछले कुछ लेख :
- कब तक चलेगा गठबंधन की राजनीति का दौर?
- समय की डायरी में दर्ज हैं तटस्थों के अपराध
- लोकतंत्र नहीं है अभी भारत में
- मायावती की जीत के निहितार्थ और भावी राजनीति

काश, तीसरा मोर्चा कोई सार्थक विकल्प दे पाता। अतीत इस बारे में कतई आश्वस्तिकारी नहीं है। हां, डॉ. जयप्रकाश नारायण, पीवी राजगोपाल, उदित राज, मेधा पाटेकर और बीएसपी मिलकर कुछ कर सकें तो शायद ज्यादा विश्वसनीय विकल्प नज़र आ सकता है। वैसे, राजनीति बहुत जटिल है और इसके बारे में मुझे ज्यादा आता नहीं है।
तीसरा विकल्प!! पिछले अनुभव क्या कहते है. सत्ता के लालच में जो क्षेत्रिय दल दोनो बड़े दलो के साथ आ जुटते है वे ही सत्ता के लिए आपस में मिलते है. उनसे कोई उम्मीद नहीं, समय बर्बाद होता है, ऐसे विकल्पो के चलते.
@ अनिल जी, संजय जी,
अतीत में कोई ऐसा तीसरा मोर्चा कभी नहीं बना जो कांग्रेस और भाजपा दोनों से अलग, दोनों से दूरी बनाकर गठित हुई हो। इसलिए पिछले अनुभवों के आलोक में इसे देखना ठीक नहीं होगा। तीसरे मोर्चे के प्रयोग के पिछले अनुभवों में या तो भाजपा ने या फिर कांग्रेस ने मुख्य रूप से सहयोग किया था, तीसरे मोर्चे का अपना कोई ठोस और दूरगामी आधार नहीं था। इसलिए जिनके सहयोग-समर्थन के बल पर वे मोर्चे बने थे, उनके हटते ही वे मोर्चे बिखर कर रह गए।
अब जो पहल हो रही है, वह इस मायने में पिछले अनुभवों से अलग है कि इसमें कांग्रेस और भाजपा, दोनों से एक समान दूरी बनाकर चलना जरूरी समझा जा रहा है।
मुझे तो भारतीय जनता कांग्रेस का इन्तजार है जी। ये थर्ड फ्रण्ट या वाम फ्रण्ट फर्जी लोग हैं। अकाउण्टेबिलिटी तो भाजपा/कान्ग्रेस की भी कम है; पर बाकी तो सौ फीसदी मैनीप्युलेटर हैं।
तीसरा मोर्चा तो आएगा। मगर चुनाव के पहले जनता के वास्तविक संघर्षों के मैदान से।
@ ज्ञान जी,
हा हा हा …… मुझे तो लगता है कि आपका इंतजार भी पूरा हो जाएगा, क्योंकि जिस तरह के तीसरे मोर्चे की रूपरेखा बन रही है, उससे मुकाबले के लिए कांग्रेस और भाजपा को आने वाले दौर में खुलकर एकसाथ आना पड़ेगा। दोनों पार्टियों के चरित्र, चाल और नीयत में वैसे भी कोई खास फर्क नहीं रह गया है।
@ दिनेश जी,
आपकी बात से सहमत हूँ। मेरा नजरिया भी यही है कि शुरुआती चरण में न सही, पर बाद के चरण में जनांदोलनों से निकले लोग ही तीसरे मोर्चे का नेतृत्व करेंगे।
मुझे तो भारतीय जनता कांग्रेस का इन्तजार है जी। i like this litte for third fornt