यह देखकर अच्छा लग रहा है कि हिन्दी साहित्य के शोधछात्र भी अब शोध के
सिलसिले में इंटरनेट का रुख़ करने लगे हैं और गूगल सर्च एवं हिन्दी विकिपीडिया के लेखों में दिए गए संदर्भ लिंकों के माध्यम से हिन्दी चिट्ठों पर उपलब्ध सामग्रियों में से भी अपने उपयोग लायक सामग्री तलाश रहे हैं। इस तरह के शोध छात्रों का मेरे चिट्ठे पर भी समय-समय पर आकस्मिक आगमन होता रहता है और उनमें से कुछ छात्र यहां से कोई सामग्री लेते समय टिप्पणी करके इसकी सूचना देने के साथ-साथ धन्यवाद देना भी नहीं भूलते। हालांकि यह उम्मीद तो उनसे नहीं रखी जा सकती कि अपने शोधपत्र में भी वे इन चिट्ठों का संदर्भ देने की ईमानदारी बरतते होंगे, फिर भी अपने-आप में यही सुखद संतोष की बात है कि उन लेखों को लिखने के दौरान हुई मेहनत लंबे अरसे तक सुपात्रों के काम आती रहने वाली है।
जो तोड़ेंगे चिट्ठाकारी के संकीर्ण दायरे को
हालांकि चिट्ठाकारी की अपनी जो खास प्रकृति है वह ब्लॉग पर लिखी जाने वाली प्रविष्टियों में एक किस्म की व्यक्तिपरकता, अनौपचारिकता और तात्कालिकता को जरूरी बना देती है, इसलिए ज्यादातर चिट्ठाकार उसी अंदाज में रोजाना के नियमित पाठकों के लिए लिखने हेतु प्रेरित होते हैं और ब्लॉग एग्रीगेटर एवं फीड रीडर के माध्यम से अपने नियमित पाठकों तक पहुँचकर उनकी टिप्पणियों के बैरोमीटर से अपने लेखन की लोकप्रियता की पैमाइश करते हैं। लेकिन धीरे-धीरे हिन्दी में भी सर्च इंजन के माध्यम से कंटेंट तक पहुंचने वाले पाठकों की संख्या बढ़ रही है। ये पाठक कुछ अलग किस्म के हैं, जो चिट्ठाकारी से अपरिचित हैं, जो हिन्दी टाइप करना भी नहीं जानते, लेकिन वे किसी खास विषय पर प्रासंगिक और उपयोगी सामग्री की तलाश में भटकते हुए यहाँ आते हैं।
दरअसल वे ही सही मायने में असली पाठक हैं, क्योंकि उन्हें कुछ जानने की प्यास लगी है और वे उसकी तलाश में खुद चलकर आए हैं। वे आपको नहीं जानते, और न ही आप उनको जानते हैं। जब किसी वेबसाइट या ब्लॉग पर आकर उन्हें कोई ऐसी उपयोगी सामग्री मिलती है जो अन्यत्र उन्हें सुगमता से उपलब्ध नहीं हो पा रही थी, तो इससे हमारी वेबसाइट या ब्लॉग के अस्तित्व का प्रयोजन भी सार्थक होता है। वे जब हमारे लेखन पर कोई टिप्पणी करते हैं या आपके लेखन से उनको हुए लाभ के लिए आभार व्यक्त करते हैं तो वह पूरी तरह से उनकी अहैतुकी प्रतिक्रिया होती है। पहले से परिचित मित्रों या चिट्ठाकारों द्वारा आपस में एक-दूसरे का लिखा पढ़ने, उन पर चर्चा करने और टिप्पणी करने का मौजूदा संकीर्ण दायरा इसी तरह के पाठक तोड़ेंगे और चिट्ठाकारी को एक अलग तरह की सार्थकता प्रदान करेंगे।
विकिपीडिया में चिट्ठों का योगदान
जब हम इंटरनेट पर अन्य भाषाओं की तुलना में हिन्दी की समृद्धि के संदर्भ में सोचते हैं तो हमें यह अहसास होता है कि अलग-अलग विषयों पर हिन्दी में गुणवत्तापरक सामग्री का इंटरनेट पर उपलब्ध होना कितना जरूरी है। इस दृष्टि से हिन्दी विकिपीडिया की परियोजना से अधिकाधिक लोगों के स्वैच्छिक रूप से जुड़ने के संबंध में अक्सर चर्चा होती रही है। हमारे हिन्दी चिट्ठाकारों में से कुछेक साथी विकिपीडिया को समृद्ध करने की दिशा में सक्रिय योगदान कर भी रहे हैं। लेकिन जुलाई, 2003 में शुरु हुई हिन्दी विकिपीडिया में अब तक आधे-अधूरे केवल साढ़े पंद्रह हजार लेख ही संग्रहित हो पाए हैं। अंग्रेजी विकिपीडिया पर उपलब्ध 21.6 लाख लेखों की तुलना में हिन्दी विकिपीडिया कहीं नहीं ठहरता। यदि हम अपने चिट्ठों पर कभी-कभार अलग-अलग विषयों पर मौलिक एवं अनूदित सूचनात्मक, तथ्यात्मक और विश्लेषणात्मक लेखों को भी प्रकाशित किया करें तो उनके आधार पर विकिपीडिया जैसी परियोजना के माध्यम से इंटरनेट पर हिन्दी को समृद्ध करने में काफी योगदान हो सकेगा। पिछले दिनों अनुनाद जी से इस संबंध में बात हो रही थी, जो हिन्दी विकिपीडिया की समृद्धि में निरंतर लगे रहते हैं तो उनका यह अनुभव था कि हिन्दी चिट्ठों पर ऐसी सामग्री अत्यंत विरल ही प्रकाशित होती है जिनका संदर्भ लेकर विकिपीडिया के लेखों को समृद्ध किया जा सके।
मैंने इस चिट्ठे पर कबीर, नागार्जुन, शमशेर बहादुर सिंह, निर्मल वर्मा, हरिशंकर परसाई, आदि रचनाकारों पर केन्द्रित कुछ आलोचनात्मक लेखों के अलावा समय-समय पर सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विषयों पर भी शोधपूर्ण लेखन करने का प्रयास किया है। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की रहस्यमय गुमशुदगी के संबंध में शोधपरक लेख-श्रृंखला भी उसी प्रयास का एक अंग थी। इस तरह का लेखन आगे भी जारी रखने का प्रयास रहेगा।
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अनुनाद का सही कहना है कि हिन्दी चिट्ठों पर ऐसी सामग्री अत्यंत विरल ही प्रकाशित होती है जिनका संदर्भ लेकर विकिपीडिया के लेखों को समृद्ध किया जा सके।
कभी-कभी मुझे लगता है कि अगर हम पहले का लिखा साहित्य या बाहरी तथ्यों को ही ब्लॉग पर प्रकाशित करने लगें तो क्या यह यांत्रिक नहीं हो जाएगा? खैर हिंदी विकिपीडिया को सशक्त बनाने की ज़रूरत है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता।
बहुत ही उत्साह बढ़ाने वाली सूचना आपने दी है कि हिंदी साहित्य के शोध छात्र भी अब शोध के सिलसिले में इंटरनेट का रुख करने लगे हैं। वैसे हिंदी में bhomiyo.com बड़ा शानदार सर्च इंजन है। हिंदी में लिखी सारी सामग्री उसकी जद में है, यहां तक कि सारे ब्लॉग भी।
सही कहा.
चिट्ठो पर लिखा हमारे बाद भी मौजुद रहेगा.
बहुत ही अच्छी और उत्साह बढ़ाने वाली खबर दी आपने!!
अभी घरेलू हिंसा पर कुछ बोलने के लिए इंटरनेट पर हिन्दी में ढूंढने पर कोई 15 काम के लिंक मिले, 3 पूरी तरह से विषयानुरूप और सामग्री से भरपूर थे, जिनमें दो चिट्ठे थे!
हिन्दी अब जमने लगी है, और चिट्ठाकारी के बल पर यकीनन बहुत सी स्तरीय सामग्री भी एकत्रित होने लगेगी.
@अनिल जी,
पहले के लिखे साहित्य या बाहरी तथ्यों को ब्लॉग पर प्रकाशित किए जाने के परिप्रेक्ष्य में मैंने बात रखी भी नहीं है।
मेरा आशय केवल इस बात पर बल देने का है कि हम चिट्ठाकारों को कभी-कभार ऐसे विषयों पर भी तथ्यपरक और विश्लेषणपरक लेखन करने का प्रयास करना चाहिए जिनकी प्रासंगिकता और उपादेयता लंबे अरसे तक बनी रहने वाली हो। चूंकि इंटरनेट पर मौजूद सामग्री लंबे अरसे तक अस्तित्व में बनी रहेगी और सर्च इंजन के जरिए आने वाले पाठक पोस्ट लिखे जाने के महीनों, वर्षों बाद अपने काम की सामग्री की तलाश में आते हैं।
हालांकि ब्लॉग का अपना एक मिजाज है और चिट्ठाकार उसी मिजाज के अनुरूप अपनी लेखन शैली अपनाते हैं। विकिपीडिया को ध्यान में रखकर यदि वे लेखन करेंगे तो उसकी सारी खासियत चली जाएगी, जिसके कारण ब्लॉगिंग की पहचान है। फिर भी, चिट्ठों पर लिखी जाने वाली सामग्री में यदि ऐसे तत्व भी पर्याप्त मात्रा में रहें जिनसे विकिपीडिया के लेखों को तैयार किए जाते समय उपयोगी संदर्भ मिलता रहे तो यह खुद चिट्ठों के लिए भी फायदेमंद होगा। अंग्रेजी विकिपीडिया के लेखों में अंग्रेजी चिट्ठों से लिए गए संदर्भ बहुतायत में दिखते हैं।
यह मैने भी पाया है – फ़ीड एग्रेगेटर के साथ साथ सर्च इन्जन से ब्लॉग पर यातायात बढ़ा है।
हिन्दी सर्च इंजन की तलाश http://www.hindi.co.nr पर भी पूरी हो सकती है.. साथ ही इस वेबसाइट पर हिन्दी के कई औजार हैं. आजमाइए http://www.hindi.co.nr
मुझे इंग्लिश समझ में आती नही और हिन्दी में कहीं मैटर मिलते नहीं थे अचानक आपका ब्लॉग खुल गया दो या तीन लेख पढने पर ऐसा लगा जैसे ” वह मिल गया मुझको जिसकी तलाश थी ” यही नही आपके माध्यम से अन्य विद्वानों को भी में पढ़ प्जरह हूँ में आपको किन शव्दों में धन्यवाद दूँ समझ में नही आरहा है मुझ जैसे कई लोंगों को लाभ पहुचाने वाले आप को बहुत बहुत वधाई
निस्संदेह हिंदी का भविष्य उज्ज्वल है।
good