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इंटरनेट : मानवता का व्यक्त मानस पटल

इंटरनेट, समकालीन अग्रगामी मानवता का समष्टिगत, व्यक्त मानस पटल है। मानव अभिव्यक्ति का यह एक ऐसा विराट, अनंत और जीवंत सागर है जिसमें विचारों, भावनाओं और सूचनाओं की निरंतर चतुर्दिक तरंगें और लहरें उठती रहती हैं। प्रकृति ने मनुष्य को अभिव्यक्ति की जो बेचैनी और क्षमता नैसर्गिक रूप से प्रदान की थी, वह समकालीन लोकतांत्रिक चेतना के दौर में मौलिक मानवाधिकार के रूप में व्यापक स्वीकृति का संबल पाने और वेब तकनीक के जनसुलभ होने के बाद मानवता के इतिहास में पहली बार व्यापक और निर्बाध रूप से प्रस्फुटित हो रही है।

भाषाओं के महासागर

दुनिया भर में अलग-अलग भाषाओं के कारण अभिव्यक्ति के इस विराट संसार में शब्दों के कई महासागर, सागर, सरिता, सरोवर और अन्य छोटे-बड़े जलाशय हैं, जिनके बीच एक तरह का आभासी अलगाव भी दिखता है। लेकिन जिस प्रकार धरती पर मौजूद समस्त जलराशि के बीच एक प्राकृतिक अंतर्संबंध है, उसी प्रकार इंटरनेट पर अलग-अलग भाषाओं में मौजूद समस्त शब्दराशि के बीच भी एक तरह का कृत्रिम अंतर्संबंध है। “की-वर्ड” के रूप में कोई गोताखोर “सर्च इंजन” की टार्च लेकर इंटरनेट के अनंत सागर में ज्यों ही गोता लगाने उतरता है, उसे हजारों-लाखों अपनी तरह के शब्द क्षण भर में दिख जाते हैं और उन सबको जाल में समेटता हुआ वह किनारे पर लेकर आ जाता है।

ऑनलाइन भारत

इंटरनेट वर्ल्ड स्टैट्स के मुताबिक दुनिया की 660 करोड़ आबादी में से 126 करोड़ से अधिक लोग अब इंटरनेट का प्रयोग करने लगे हैं, जिनमें से केवल 3.6 फीसदी भारतीय हैं।

छ: करोड़ इंटरनेट प्रयोक्ताओं के साथ भारत अब दुनिया का पाँचवां सर्वाधिक ऑनलाइन आबादी वाला देश बन गया है। हमारे देश की केवल 5.3 फीसद आबादी अब तक इंटरनेट से जुड़ पायी है।

फिर भी, लगभग छ: करोड़ इंटरनेट प्रयोक्ताओं के साथ भारत अब दुनिया का पाँचवां सर्वाधिक ऑनलाइन आबादी वाला देश बन गया है। हमारे देश की केवल 5.3 फीसद आबादी अब तक इंटरनेट से जुड़ पायी है। दुनिया के लगभग 30 करोड़ ब्रॉडबैंड इंटरनेट धारकों में केवल 0.2 फीसद यानी 21 लाख भारतीयों के पास ही ब्रॉडबैंड कनेक्शन है।

ग्लोबल ब्लॉगिंग

दुनिया में इस समय 15 करोड़ से अधिक ब्लॉग होने का अनुमान है। टेक्नोरैटी इस समय दुनिया के 11.28 करोड़ ब्लॉगों की खोज-ख़बर रखता है। हर रोज औसतन 1,75,000 नए ब्लॉग बनते हैं। 16 लाख पोस्ट प्रति दिन, यानी प्रति सेकेंड 18 पोस्ट ब्लॉगों पर प्रकाशित होती है।

हिन्दी चिट्ठाकारी का हाल

ब्लॉगिंग के विश्व महासागर के एक लाखवें हिस्से में हिन्दी के ब्लॉगरों का दायरा सिमटा हुआ है। यहां तक कि इंटरनेट से जुड़े हिन्दी भाषियों का महज 0.1 फीसदी ही हिन्दी चिट्ठों का पाठक वर्ग है।

दुनिया में तीसरी सर्वाधिक बोली और समझी जाने वाली भाषा होने के बावजूद इंटरनेट पर सबसे लोकप्रिय दस भाषाओं में हिन्दी का दूर-दूर तक कोई स्थान नहीं है। संसार भर में हिन्दी भाषा समझने वालों की संख्या 50 करोड़ से भी अधिक है और 30 करोड़ से अधिक लोग हिन्दी पढ़ना-लिखना जानते हैं। लेकिन उनमें से केवल 50 लाख लोग ही इंटरनेट से जुड़ पाए हैं, जिनमें से केवल दस फीसदी यानी लगभग पाँच लाख लोग ब्रॉडबैंड कनेक्शन से जुड़े हुए हैं। ब्लॉगिंग के बारे में पिछले पाँच वर्षों की तमाम चर्चा, हलचल और सक्रियता तथा पर्याप्त तकनीकी सुगमता के बावजूद अब तक हिन्दी में महज पंद्रह सौ ब्लॉगर सामने आ सके हैं। हालाँकि हिन्दी के ऑनलाइन पाठकों की कुल संख्या पच्चीस लाख तक होने का अनुमान किया जाता है, लेकिन हिन्दी चिट्ठों के पाठकों की कुल संख्या बमुश्किल पाँच हजार होगी। ब्लॉगिंग के विश्व महासागर के एक लाखवें हिस्से में हिन्दी के ब्लॉगरों का दायरा सिमटा हुआ है। यहां तक कि इंटरनेट से जुड़े हिन्दी भाषियों का महज 0.1 फीसदी ही हिन्दी चिट्ठों का पाठक वर्ग है।

क्यों है यह हाल

  • हिन्दी चिट्ठाकारी के बारे में इंटरनेट से जुड़े ज्यादातर हिन्दी भाषी व्यक्तियों को जानकारी नहीं है।
  • ऑनलाइन पाठकों को हिन्दी चिट्ठों की तरफ आकर्षित करने के लिए जनसंचार माध्यमों का प्रभावी उपयोग नहीं हो पाया है।
  • हिन्दी चिट्ठों पर लिखे जा रहे विषयों में विविधता, उत्कृष्टता और पठनीयता के विकास की बहुत जरूरत है, जिसके अभाव में बड़ी संख्या में ऑनलाइन पाठक वर्ग चिट्ठों की तरफ आकर्षित नहीं हो पा रहे हैं। स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, आय संवर्धन, क़ानून, तकनीक, पर्यावरण, नारी मन, साहित्य, खेल, फिल्म, कला, चित्रकारी और फोटोग्राफी, संगीत, फिल्म, कृषि, स्वरोजगार के उद्यम, राजनीति, अर्थनीति, मीडिया विश्लेषण, समाज, संस्कृति, योग, अध्यात्म, दर्शन, ज्योतिष जैसे तमाम विषयों पर विशेषज्ञों और पाठकों के बीच घनिष्ठ संवाद पर आधारित चिट्ठे सामने आने चाहिए।
  • हिन्दी यूनिकोड फोण्ट और कंप्यूटर पर हिन्दी टंकण के सरल औजारों की जानकारी लोगों के पास नहीं है।
  • चिट्ठाकारी में लगने वाले समय, श्रम और व्यय के एवज में कोई कमाई नहीं होने के कारण बहुत-से प्रतिभावान साथी चिट्ठाकारी में सक्रिय दिलचस्पी बनाए नहीं रख पाते। स्वांत:सुखाय प्रवृत्ति से अच्छा लिख सकने की क्षमता वाले कई चिट्ठाकार भी टिप्पणियों के रूप में पाठकों की जीवंत प्रतिक्रिया अपेक्षा के अनुरूप नहीं मिल पाने के कारण धीरे-धीरे ढीले पड़ जाते हैं।

    चिट्ठाकारी में लगने वाले समय, श्रम और व्यय के एवज में कोई कमाई नहीं होने के कारण बहुत-से प्रतिभावान साथी चिट्ठाकारी में सक्रिय दिलचस्पी बनाए नहीं रख पाते। स्वांत:सुखाय प्रवृत्ति से अच्छा लिख सकने की क्षमता वाले कई चिट्ठाकार भी टिप्पणियों के रूप में पाठकों की जीवंत प्रतिक्रिया अपेक्षा के अनुरूप नहीं मिल पाने के कारण धीरे-धीरे ढीले पड़ जाते हैं।

  • शिक्षित हिन्दी भाषियों के बहुत बड़े वर्ग की पहुँच से कंप्यूटर और इंटरनेट अब भी दूर हैं।

वर्ष 2008 के लिए अनुमान

  • हिन्दी चिट्ठों की संख्या में दस गुनी तक बढ़ोतरी। चिट्ठाकारों की कुल संख्या 20 हजार से अधिक।
  • हिन्दी चिट्ठों के पाठक वर्ग में कम से कम बीस गुनी बढ़ोतरी। हिन्दी चिट्ठों के कुल पाठक पचास हजार से एक लाख के बीच।

व्यक्तिगत लक्ष्य और कार्ययोजना

  • पिछले दो वर्ष से मेरा हर हफ्ते एक की औसत से पोस्ट लिखने का क्रम रहा था। जनवरी, 2006 से अब तक पिछले दो वर्ष के कुल 104 सप्ताह में मेरी पोस्टों की कुल संख्या भी इतनी ही रही है। लेकिन इस वर्ष अपनी सक्रियता बढ़ानी है और वर्ष भर में कम से कम तीन सौ पोस्ट लिखने का विचार है।
  • पिछले वर्ष में मेरे पसंदीदा हिन्दी चिट्ठों की संख्या 100 तक पहुँची, जिन पर आने वाली प्राय: हर पोस्ट पढ़ने का प्रयास किया। इस वर्ष तीन सौ से अधिक नए उत्कृष्ट चिट्ठों का चयन करने और उनको नियमित रूप से पढ़ते रहने का इरादा है।
  • हिन्दी चिट्ठों पर हो रहे विपुल और विविध लेखन में निहित उत्कृष्ट सृजनशीलता और अभिव्यक्ति की सामर्थ्य को उभारकर व्यापक मंच पर ले जाने के लिए एक सहकारी प्रयास शुरू करने की योजना लंबे अरसे से लंबित थी। अब इसके लिए एक नया समूह ब्लॉग चिट्ठाकारी नाम से फिलहाल शुरू कर रहा हूँ। यह हिन्दी के ऑनलाइन पाठकों के लिए हिन्दी चिट्ठा जगत के निराले और रंग-बिरंगे संसार में झाँकने का एक झरोखा होगा। यह हिन्दी जानने वाले ऑनलाइन व्यक्तियों को हिन्दी चिट्ठों की तरफ आकर्षित करने के लिए तमाम जरूरी उपाय करने का प्रयास करेगा।

सभी हिन्दी चिट्ठाकारों से विनम्र निवेदन है कि वे इस समूह ब्लॉग की योजना में सहभागी बनें।

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9 Responses to “कितने पानी में है हिन्दी चिट्ठाकारी”

  1. on 06 Jan 2008 at 5:04 pm अनिल रघुराज

    सृजन जी, बहुत ही सराहनीय प्रयास है। मैं पूरी तरह इस प्रयास में सहभागिता के लिए तैयार हूं। वैसे, सचमुच अफसोसजनक हकीकत है कि तीस करोड़ के भारतीय मध्यवर्ग के बावजूद हमारी राष्ट्रीय भाषा हिंदी की यह दुर्दशा है। यहां तो हिंदी ब्लॉगों को पढ़नेवालों की संख्या कम से कम (30 करोड़ की 10 फीसदी) तीन करोड़ तो होनी ही चाहिए थी।

  2. on 06 Jan 2008 at 5:30 pm Anunad Singh

    आपका विश्लेषण तर्कपूर्ण है; विशेष रूप से हिन्दी चिट्ठाकारिता के अभी भी गति न पकड़ पाने के लिये गिनाये गये कारण काफी सटीक हैं।

    एक नया चर्चा-समूह आरम्भ करने पर बधाई!

  3. हमे भी अपने साथ समझिये। 1500 ब्लागर भी यदि नियमित हो जाये तो बेडा पार हो जाये।

  4. on 06 Jan 2008 at 7:01 pm Gyan Pandey

    सदा की तरह अच्छा लेख। और आप विश्वास करते हैं कि पठनीयता/विविधता/उत्कृष्टता की कमी है!

  5. on 06 Jan 2008 at 7:46 pm Sanjeeva Tiwari

    सार्थक चिंतन, हम सभी को इस संबंध में विचार करना चाहिए, यह हम सब के लिए प्रेरणापद है ।

    संजीव

    डोंगरगढ की मॉं बगलामुखी-बमलेश्‍वरी

  6. on 06 Jan 2008 at 8:47 pm Sanjeet Tripathi

    प्रभावी लिखा आपने!!
    एक सार्थक प्रयास के लिए सिर्फ़ शुभकामनाएं लिखने से काम पूरा नही होगा बल्कि हम सबको ही इसमें ज़िम्मेदारी निभानी होगी!!

  7. on 07 Jan 2008 at 4:12 pm sanjay bengani

    सही सटिक विश्लेषण.

  8. on 07 Jan 2008 at 6:00 pm डा० अमर कुमार

    सरजी,
    हमको भी शामिल किया जाय, नाम तो बहुत सुना था सृजन शिल्पी !
    आज दर्शन सार्थक हुआ । कहावत ही उलट गयी, झूठ बोलें कि सच ?
    लोग अपने को स्वयं ही या एक चौगड्डे के जरिये विभूषित करवाते देखे
    जा रहे हैं । सो हम भी भटक गये कि होंगे कोई, यहाँ तो ठेलमठेल
    सृजन की भरमार है तो यदि कोई शिल्पी भी है तो की फ़र्क पैंदा है ?

    हा तात, मेरा तो बहुमूल्य इंटरनेट टाईम बेकार गया अब तक !
    अपने सार्थक एवं सोद्देश्य सोच में हमको भी साझी मानें ।
    और कोई हुकुम ? अपने व्यवसायिक प्रतिबद्धता के चलते नियमित न रह पाऊँ, यह दीगर बात है !

  9. on 27 Feb 2008 at 1:23 pm Dr. Chandra Kumar Jain

    SHILP BHEE UTTAM, SRIJAN TO BOL HEE RAHA HAI.AGRAGAMEE MANAVTA KA SAMASHTIGAT,VYAKTA MANAS PATAL…KITNEE SARGARBHIT PARIBHASHA DEE HAI AAPNE INTERNET KEE.CHITT DEKAR CHITTHA LIKHNA AUR BAHUAAYAMEE VISHAYON MEIN SE SAHEE CHUNAV KARNA,SACHMUCH BADI BAAT HAI.MERA BLOG BHII NET PAR UPLABDHA HAI.HINDI SEVA SVAYAM SAUBHAGYA KEE BAAT HAI.NET KEE DUNIYA SE DER SE HEE SAHEE,LEKIN JAB SE JUDA HUN USKA MUREED HO GAYA HUN. AAPKE VICHARON SE POORA ITTIFAQ RAKHTA HUN.300 POST LIKHNE KEE AAPKEE MANSHA AUR SAMOOHIK-SAJHA BLOGGERS MANCH KA IDEA BHEE ABHINANDNEEYA HAI. MUJHE SAHYATRY MANEN.NAI GENERATION KO HINDEE KE VAIBHAV KE NIKAT LANE KA BEHAD PRABHAVSHALEE MADHYAM BAN SAKTA HAI YAH LEKHAN.LEKIN ABHIVYAKTI KEE SVATANTRATA,SVACHHAND HOKAR APNA PATH AUR PATHEY NA BHOOLE TO KOII BAAT BANE.AAP JAISE SHILPEE IS UMMEED KO SAMASHTIGAT BANA SAKTE HAIN,YAQEEN HAI MUJHE…MEREE SHUBHBHAVNAIN SVIKAR KEEJIYE.

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