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बचपन में जब तक स्वभाव में मासूमियत बची हुई थी, बापू कभी-कभार मेरे सपने में आया करते थे। जब भी वह सपने में आए, रोते ही मिले। बचपन में मेरे दिल में अंकित उनकी वही छवि आज भी बसी है, कि बापू दु:खी हैं, उनकी आत्मा कराह रही है। दसवीं के बोर्ड का इम्तहान देने के बाद छुट्टियों में पहली बार बापू की आत्म-कथा “सत्य के मेरे प्रयोग” पढ़ने का मौका मिला और कॉलेज के दिनों तक वह मेरी सबसे प्रिय किताबों में से एक रही। बापू के प्रिय लेखकों, रस्किन और टॉलस्टॉय की किताबें भी खोज-खोज कर पढ़ने की कोशिश की और जिस भगवदगीता को बापू अपनी माता कहा करते थे, वह मेरी जेब में ही हमेशा पड़ी रहती थी। यहां तक कि एक बार इम्तहान के दौरान जब मेरी जेब की तलाशी ली गई तो इनविजिलेटर महोदय उसमें गीता की प्रति देखकर अचंभित रह गए थे।

बाइस वर्ष की उम्र में आगे की पढ़ाई के लिए जब मेरा पहली बार राजधानी दिल्ली आना हुआ तो शायद यह गांधीवाद का ही असर रहा होगा कि विशुद्ध भारतीय वेशभूषा यानी धोती-कुर्ता में इस पश्चिमोन्मुख महानगरी में कदम रखते हुए मन में कोई संकोच नहीं था। रहने के लिए किराए पर जो पहला कमरा मिला, वहां से राजघाट आधे घंटे में पैदल पहुंचा जा सकता था। शुरुआती महीनों में मेरा कोई दोस्त भी नहीं बना था, तो प्राय: हर शाम अकेलेपन को बांटने के लिए मेरे कदम खुद-ब-खुद राजघाट की तरफ बढ़ आते थे। बापू की समाधि पर निरंतर जलती अग्निशिखा को देर तक निहारते रहना और उस शांत वातावरण में उनकी नीरव मौजूदगी को महसूस करना उन दिनों मेरी दिनचर्या में शामिल हो गया था। गांधीजी के जीवन के अवगाहन से ही मेरे भीतर यह अहसास भरा कि अवगुणों-अपूर्णताओं से युक्त मेरे जैसा साधारण इंसान भी बार-बार गलतियाँ दोहराने के बाद भी आत्म-सुधार के अपने संकल्प और अभ्यास के बल पर आखिरकार इंसानियत की ऊंचाइयों को हासिल कर सकता है।

बाद में, पत्रकारिता और जनांदोलनों में मेरी सक्रियता के दौरान कई गांधीवादी विद्वानों और कार्यकर्ताओं के साथ संपर्क हुआ और समय-समय पर संगोष्ठियों-साक्षात्कारों में गांधीवादी मूल्यों और सिद्धांतों के संबंध में उनके साथ संवाद करने के अवसर भी मिलते रहे। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास और आजादी की लड़ाई में भगत सिंह एवं नेताजी सुभाष जैसे क्रांतिकारियों की भूमिका के बारे में विशेष अध्ययन करने के बाद महात्मा गांधी के संबंध में मेरे विचारों में कुछ परिवर्तन जरूर हुआ और इस चिट्ठे पर मैंने यदा-कदा अपनी टिप्पणियों के माध्यम से उन्हें व्यक्त भी किया। दुर्भाग्य से मेरी ऐसी कुछ टिप्पणियों के बहाने चिट्ठा जगत में विवाद के कुछ अप्रिय प्रसंग भी छिड़े। लेकिन, मेरी जीवनचर्या और मेरी सोच पर बापू के जीवन और विचारों का असर अब भी मेरे अन्य प्रेरणास्रोतों की तुलना में कहीं अधिक है। लेकिन जीवन में अब आगे बढ़ने से पहले मैं अपने जीवन-संघर्ष की राह में गांधीवादी सिद्धांतों पर अमल की उपादेयता को एक बार फिर से कसौटी पर कसना चाहता हूँ।

गांधीवाद के सरकारी प्रचार-प्रसार में जिस तरह का कमीनापन और मठाधीश गांधीवादियों के प्रवचनों में जिस तरह का सतहीपन झलकता रहा है, उसके कारण नई पीढ़ी को महात्मा गांधी से अरुचि होने लगी थी। लेकिन पिछले दिनों बालीवुड की एक फिल्म ‘गांधीगीरी’ को नई पीढ़ी के लिए फैशन की एक नई लहर के रूप में स्थापित करने में काफी हद तक सफल रही। नई पीढ़ी फिल्मों के माध्यम से बापू के विचारों के साथ कहीं अधिक शिद्दत से जुड़ रही है। शायद इसलिए कि फिल्मों ने कहीं अधिक यथार्थवादी एवं आलोचनात्मक ढंग से गांधी के व्यक्तित्व और विचार के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला है।

कई वजहों से इक्कीसवीं सदी में गांधी की फिर से जोरदार वापसी हो रही है। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा पहली बार गांधी जयंती को अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस के तौर पर मनाए जाने की घोषणा के बाद गांधीवाद पर विचार-विमर्श अब अचानक तेज होता दिख रहा है। गांधीवाद पर विचार-विमर्श की इस घनघोर लहर को देखकर मुझे चिंता होने लगी है। क्योंकि गांधी के विचार सहज बुद्धि और सहज विश्वास से ही समझ में आ सकते हैं। वह अमल करने, आत्मसात करने के लिए हैं, न कि विचार-विमर्श करने के लिए। उसे आचरण से ही समझा और समझाया जा सकता है, न कि बातें बनाकर और गांधी की बुतपरस्ती करके। जैसे योग निरंतर अभ्यास से ही सिद्ध होता है, जैसे परमात्मा की अनुभूति अपने भीतर ठहरे हुए मौन में ही हो सकती है, वैसे ही गांधीवाद को भी अपनी दिनचर्या में व्यावहारिक रूप से अपनाकर ही समझा जा सकता है। जो अमल करने के बजाय गांधीवाद की बातें करता रहता है, वह गांधी से बहुत-बहुत दूर है।

गांधीजी के लिए सत्य जीवन का साध्य था और अहिंसा उसका साधन। वह कहते थे कि “सत्य और अहिंसा के बीच चुनाव करना पड़े, तो मैं अहिंसा को छोड़कर सत्य रखने में आगा-पीछा नहीं करूंगा”। उन्होंने अपने जीवन-संघर्ष को भी सत्य के प्रयोगों की श्रृंखला के रूप में ही देखा। लेकिन गांधीवाद पर हो रहे समकालीन विमर्श में सत्याग्रह पर उतना बल नहीं दिया जा रहा, जितना कि शांति और अहिंसा पर दिया जाता है। खासकर, सत्ता द्वारा प्रायोजित गांधीवाद ऐसा ही है, जिसमें सत्य हाशिये पर है। सत्ता को हमेशा से ही सत्य से खतरा रहा है, शायद इसलिए वह गांधीवाद के सत्याग्रह वाले पहलू को जानबूझकर गौण करने की कोशिश करती है। यहां तक कि न्यायपालिका भी, जो सैद्धांतिक रूप से “सत्यमेव जयते” के शाश्वत मूल्य के आधार पर काम करती है, और व्यवहार में “समरथ को नहीं दोष गोसाईं” के अवसरवादी मूल्य को तरजीह देती है, अपने भीतर के भ्रष्टाचार को उजागर करने वाले सत्य के स्वरों को दबाने की चेष्टा करती दिखाई दे रही है और हड़ताल के रूप में सविनय अवज्ञा और शांतिपूर्ण असहयोग के गांधीवादी उपायों को वह असंवैधानिक करार दे रही है।

असल में, अहिंसा का सिद्धांत सत्ता के लिए हमेशा से विशेष सुविधाजनक रहा है। नागरिक अहिंसक हों तभी उसके द्वारा किया जाने वाला अन्याय और भ्रष्टाचार जारी रह सकता है। यह अनायास नहीं है कि संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा दो अक्तूबर को महात्मा गांधी की स्मृति में अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में मनाए जाने का निर्णय लिया गया है। संयुक्त राष्ट्र संघ पर अपना प्रभुत्व रखने वाली महाशक्तियों द्वारा विश्व भर में किया जाने वाला शोषण, अन्याय और भ्रष्टाचार तभी तक जारी रह सकता है जब तक उसका कोई प्रतिरोध न हो, या फिर वह अहिंसक प्रतिरोध हो। मजे की बात यह है कि सत्ता अक्सर ही सत्य की आवाज को दबाने के लिए हिंसा का सहारा लेती है और उस हिंसा को वह हमेशा ही वैध और नीतिपूर्ण ठहराने की कोशिश करती है। सत्ता दूसरों से तो अहिंसक बनने की अपेक्षा करती है, लेकिन खुद हर संभव मौके पर हिंसा करने से नहीं चूकती। दुनिया भर के राष्ट्रों में पुलिस, सेना और जेल कर्मियों के द्वारा नागरिकों की जो हत्याएं और उनके साथ जो मारपीट की जाती हैं, क्या उन्हें अहिंसा का पाठ सीखने-सीखाने की जरूरत नहीं है?

हिंसा और अपराध की मुख्य रूप से तीन ही वजहें हैं – एक तो है मानसिक प्रवृत्ति, दूसरा है अभाव और तीसरा है अन्याय। प्रेम और अहिंसा एक तरह का मनौवैज्ञानिक उपाय है जिससे हिंसक और आपराधिक प्रवृत्तियों पर कुछ हद तक काबू पाया जा सकता है। लेकिन इस उपाय को कभी अपराधियों को सुधारने के लिए व्यापक तौर पर आजमाया नहीं गया। दुनिया में नागरिकों द्वारा हिंसा और अपराध की ज्यादातर घटनाएँ मानसिक प्रवृत्तियों के कारण नहीं, बल्कि अभाव और अन्याय की प्रतिक्रिया में हो रही हैं। अहिंसा के द्वारा उनका समाधान कतई नहीं किया जा सकता है। इसका समाधान तो सत्याग्रह और सुनिश्चित न्याय से ही हो सकता है। लेकिन यह एक जटिल मुद्दा है। इसका एक पहलू तो यह है कि अहिंसक सत्याग्रह कोई कमजोर व्यक्ति नहीं कर सकता और अहिंसक सत्याग्रहियों को अक्सर कमजोर समझ लिया जाता है। कोई मार खाता रहे, सजा भुगतता रहे और सत्य को अंतिम सांस तक दोहराता रहे, इतनी सहनशीलता सबमें नहीं होती।

गांधी कहते हैं कि “यह याद रखना चाहिए कि सत्याग्रह अगर संसार की सबसे बड़ी ताकत है, तो इसके लिए मन में क्रोध और दुर्भाव रखे बगैर अधिक से अधिक कष्ट-सहन की क्षमता भी आवश्यक है”। लेकिन अहिंसक सत्याग्रह में सहनशीलता से भी अधिक जरूरी है इंतजार करने का धैर्य। अन्याय करने वाला जब तक सत्य के सामने पस्त न हो जाए, या जब तक उसका हृदय परिवर्तन न हो जाए या जब तक वह अपनी किन्हीं अन्य विवशताओं के कारण अपना रवैया बदलने के लिए बाध्य न हो जाए, तब तक अत्याचार को सहते हुए इंतजार करने का धैर्य रखना बहुत कठिन है। कष्ट सहन करने के मामले में आजादी के क्रांतिकारी दीवाने गांधी और उनके अहिंसक भक्तों से कई गुना आगे थे, लेकिन वे आजादी का इंतजार करने के लिए कतई तैयार नहीं थे। हिंसक सत्याग्रह भी उतना ही नैतिक और उदात्त होता है, जितना कि अहिंसक सत्याग्रह। लेकिन हिंसक सत्याग्रह में एक तरह की अधीरता होती है, उसमें अहिंसक सत्याग्रह की तरह अवसरवाद और समझौतापरस्ती की लोचनीयता नहीं होती।

मेरे लिए न तो सत्य साध्य है और न ही अहिंसा। ये दोनों गांधीवादी मूल्य मेरे लिए साधन मात्र हैं। मेरे जीवन का साध्य है न्याय। न्याय से मेरा तात्पर्य है, समानता — आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक समानता। कम से कम उतनी समानता तो मुझे हर हाल में चाहिए, हर कीमत पर चाहिए, जिसे भारतीय संविधान मुझे एक नागरिक की हैसियत से प्रदान करने का संकल्प करता है, और वह है प्रतिष्ठा और अवसर की समानता। न्याय पाने के बुनियादी साधन के रूप में सत्य के प्रति मेरी निष्ठा और आग्रह में कमी नहीं है। लेकिन मेरे स्वभाव में सत्य के प्रति जितना आग्रह है, अहिंसा का भाव उस हद तक नहीं है। मैं उतना सहनशील नहीं हूं, जितना कि गांधीवाद के मुताबिक मुझे होना चाहिए। क्रोध और प्रतिकार के अंश मेरे स्वभाव में हैं। यदि कदाचित कभी वैसी नौबत आई तो शायद आत्म-रक्षा में अन्याय का प्रतिकार करने के लिए मैं हथियार भी उठा लेने में संकोच न करूं, जो कि क़ानूनन भी गुनाह नहीं है। लेकिन निजी और सार्वजनिक जीवन में न्याय पाने के अपने जीवन-संघर्ष में एक पत्रकार-लेखक के तौर पर मेरे लिए अहिंसा और हिंसा को बरतने का एकमात्र माध्यम भी सत्य ही है। मैं अपने शब्दों में ही हिंसक या अहिंसक हो सकता हूँ। क्योंकि शब्द ही मेरे हथियार हैं, शब्द ही मेरे ढाल हैं। न्याय के लिए जो एक तरह की अधीरता और बेचैनी मेरे भीतर है वह मेरे शब्दों को कभी-कभी हिंसक, अविनयपूर्ण और उद्दंड बना देती है। शब्दों में ठकुरसुहाती मुझे कभी रास नहीं आती।

गांधीजी पर मेरे कुछ अन्य लेख :

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6 Responses to “गांधी की डगर और मैं”

  1. on 02 Oct 2007 at 10:09 pm अनूप शुक्ल

    पूरा लेख पढ़ा। बहुत अच्छा लगा। गांधी जी के बहाने अपने बारे में तमाम बातें बताईं यह भी अच्छा लगा। बधाई इस लेख के लिये।

  2. on 02 Oct 2007 at 10:55 pm अनिल रघुराज

    एक सच्चे और न्यायप्रिय भारतीय की मानसिकता का परिचय दिया है आपने। अगर गांधी को स्वीकार करना है तो आपकी तरह ही करना चाहिए। आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक समानता हासिल करने के लिए सारी विचारधाराएं साधन मात्र हैं। फिर भी मेरा मानना है कि ऐतिहासिक संदर्भों में गांधी का पुनर्मूल्यांकन किया जाना चाहिए। उनकी अगुआई में चले आंदोलन में क्या खामियां थी जिनसे आज की राजनीति और शासनतंत्र विकसित हुआ है? प्रक्षेपास्त्र के छोड़ने में अंश के हजारवें हिस्से की गड़बड़ी भी उसे निशाने से कोसों दूर पहुंचा देती है।

  3. on 03 Oct 2007 at 5:41 am समीर लाल

    एक बार पढ़ना शुरु किया तो बहता ही चला गया. बहुत खूबसूरती के साथ आपने अपने बारे में और गाँधीवाद पर अपनी सोच को शब्दबद्ध किया है. कम ही पढ़ने में आता है ऐसा प्रवाहित कर देने वाला आलेख. बहुत आभार यह सारी बातें हमारे साथ बांटने के लिये.

    आगे भी आपको पढ़ने का इन्तजार रहेगा जबकि आजकल आप कम ही लिख रहे हैं. :)

  4. on 03 Oct 2007 at 6:54 am Gyan Pandey

    सत्य/न्याय (सत्य अन्यायी नहीं हो सकता) शायद मूल है. अहिंसा/हिंसा उसके बाद की चीजें हैं.
    आपने बहुत अच्छा लिखा.

  5. on 06 Oct 2007 at 10:02 am masijeevi

    हिंसक सत्याग्रह भी उतना ही नैतिक और उदात्त होता है, जितना कि अहिंसक सत्याग्रह। लेकिन हिंसक सत्याग्रह में एक तरह की अधीरता होती है, उसमें अहिंसक सत्याग्रह की तरह अवसरवाद और समझौतापरस्ती की लोचनीयता नहीं होती।

    अच्‍छा विश्‍लेषण

  6. on 06 Oct 2007 at 12:42 pm kakesh

    आज दुबारा इसे पढ़ा.सामयिक लेख और अच्छा विश्लेषण. लिखते रहें आजकल कम लिख रहे हैं दिख भी नहीं रहे.

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