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आनंद कई दिनों से पूछना चाह रहे थे। बुद्ध के साथ वह निरंतर यात्रा पर थे और रात्रि विश्राम के समय उनके बगल में ही सोया करते थे। सुबह बुद्ध की आंखें खुलीं तो आनंद के मुख पर उत्सुकता और हैरानी के भाव देखकर मुस्करा उठे। आखिरकार आनंद ने पूछ ही लिया, “भगवन, मैं सोते समय रोज देखता हूं आपको। मेरी नींद रात में कई बार उचटती है और आप पर निगाह जाती है। मैं बार-बार करवटें बदलता रहता हूं। लेकिन आप जिस मुद्रा, जिस करवट में सोते हैं, उसी करवट, उसी मुद्रा में ही सुबह जगते हैं। बीच में एक बार भी आप की नींद नहीं उचटती, न ही आप कभी करवट बदलते हैं।” बुद्ध बोले, “मैं जब सोता हूं तो पूरी तरह सो जाता हूं। मेरे शरीर और किसी अंग को हिलने या करवट बदलने की अनुमति नहीं होती। मन नींद में पूरी तरह से शांत और शून्य रहता है।”

शरीर और मन नींद में भी, पूरी तरह से काबू में रहे, यही तो बुद्धत्व है। बुद्धत्व एक क्षण की अनुभूति नहीं है। यह हर क्षण का साक्षीभाव है। यह पूर्ण जागरण की अवस्था है। जो सोते समय पूरी तरह सो जाता हो, वही जागते समय पूरी तरह जगा रह सकता है। ऐसा ही व्यक्ति बुद्धत्व को उपलब्ध हो सकता है।

कुछ क्षणों के लिए तो बहुत-से लोग बुद्ध बन सकते हैं, लेकिन बुद्धत्व के स्थायी स्वभाव में प्रतिष्ठित हो पाना, स्थितप्रज्ञ बनना अत्यंत कठिन है। बड़े से बड़े सिद्ध- तपस्वी, ऋषि-मुनि, महात्मा-संत विचलित, क्रोधित, पतित और शापित होते देखे गए हैं। लेकिन सहजता, संतुलन और साक्षीभाव को सदैव कायम रख पाना केवल बुद्ध के लिए ही संभव है। यह रास्ता छुरे की धार पर चलने जितना कठिन है। यह निरंतर अभ्यास से ही सिद्ध होता है।

… क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति। (कठोपनिषद)

बुद्ध के लिए भी अपने बुद्धत्व भाव का तब तक अभ्यास करना जरूरी होता है जब तक कि वह स्थायी स्वभाव न बन जाए। ज्ञान प्राप्ति के बाद एक दिन गौतम बुद्ध किसी जिज्ञासु के प्रश्न का उत्तर दे रहे थे कि अचानक वह बोलते-बोलते रुक गए। एक मक्खी उड़ते हुए उनके चेहरे पर आई और बुद्ध का हाथ अकस्मात मक्खी को उड़ाने के लिए उठ गया। बुद्ध गंभीर हो गए। उस जिज्ञासु ने इस तरह अचानक गंभीर हो जाने का कारण पूछा तो बुद्ध बोले, “अभी मेरा अभ्यास पूरा नहीं हुआ है। मक्खी चेहरे पर आई और मेरा हाथ अनचाहे ही उसे उड़ाने के लिए उठ गया था। मैं अपने मन की प्रतिक्रिया और हाथ की हरकत के प्रति सजग नहीं रह पाया था।”

मेरे एक मित्र हैं। सरकारी अधिकारी हैं, लेकिन बीस साल सरकारी नौकरी करने के बाद भी आलस्य, कामचोरी और सुस्ती से बचे हुए हैं। न ही शरीर का वजन बढ़ा है, न मोटापा। रोजाना आठ-दस घंटे लगातार काम करते हैं। काम में इस तरह मगन होते हैं कि लंच करना भी अक्सर भूल जाते हैं। लेकिन शाम को जब कभी उनसे मिलता हूं तो हमेशा तरोताजा दिखाई देते हैं। थकान के कोई लक्षण उनके चेहरे पर कभी दिखाई नहीं देते। कभी उत्तेजित और क्रोधित होते नहीं देखा उन्हें। विपरीत परिस्थितियों में भी विचलित नहीं होते। चेहरे पर कभी तनाव नहीं, कोई शिकन नहीं। मुझे उनकी यह चिर ताजगी और तनावमुक्त दिनचर्या चकित करती रहती थी।

एक बार वह शाम को मेरे घर पधारे। हमारी बातचीत लंबी चली और मैंने उन्हें रात को रुक जाने का अनुरोध किया। भोजन के बाद लगभग साढ़े दस बजे उनका बिस्तर लगा दिया। वह लेट गए और मुझे बत्ती बुझा देने के लिए कहा। एक-दो मिनट भी नहीं गुजरे होंगे कि मुझे ध्यान आया कि कहीं उन्हें रात को मच्छरों से परेशानी न हो, इसलिए ऑल आउट का प्लग लगाने के लिए कमरे में गया। तब तक वह गहरी नींद के आगोश में जा चुके थे। सुबह मेरे जगने से पहले ही वह फ्रेश हो चुके थे। मैंने पूछा, “रात को मच्छरों ने परेशान तो नहीं किया?” वह बोले, “पता ही नहीं चला। गाढ़ी नींद आई, हमेशा की तरह।”

किसी नई जगह, किसी नए बिस्तर पर इतनी सहजता से तुरंत नींद आ जाना और रात भर गाढ़ी नींद में सोना सामान्य नहीं है। हममें से अधिकतर को सोने से पहले अक्सर कुछ देर पढ़ने या कुछ इसी तरह का कोई उपक्रम करना पड़ता है, अपने घर के बिस्तर पर भी। यदि सबेरे की फ्लाइट पकड़नी हो तो रात भर मुश्किल से नींद आ पाती है। हम शायद ही कभी पूरी तरह सोते हैं, इसीलिए शायद ही कभी पूरी तरह से जगे होते हैं।

क्या आपने कभी गौर किया है कि कंप्यूटर पर टाइप करते वक्त आपको गलतियां सुधारने के लिए कितनी बार बैकस्पेस दबाने की जरूरत पड़ती है? कोई पत्र लिखते समय आपको ड्राफ्ट में कितनी बार बदलाव करने पड़ते हैं? सड़क पर कार ड्राइव करते वक्त आप कितनी बार छोटी-बड़ी दुर्घटना या टक्कर के शिकार हुए हैं? क्या आपने कभी सोचा है कि जब कभी आपसे कोई छोटी-सी भी चूक होती है तो इसका मतलब है कि उस वक्त आप पूरी तरह से जगे हुए नहीं थे। हम इन चूकों को इंसान होने की फितरत मान लेते हैं और जिंदगी भर उन्हीं चूकों को दोहराते रहते हैं। लेकिन कभी होश में नहीं आते और अपनी चेतना को अधिक जागृत बनाने की तरफ ध्यान नहीं देते। हमारा मन और हमारे शरीर के अंग पूरी तरह से हमारे नियंत्रण में नहीं होते। आप कभी खुद को या अपने आसपास के किसी व्यक्ति को काम करते वक्त या बातचीत करते वक्त गौर से देखिए, उसके हाथ या पैर की चेष्टाओं को देखिए। हमें पता नहीं होता कि हम बिना मतलब, अनचाहे ही अपने पैर हिला रहे हैं या हथेलियों को रगड़ रहे हैं। पुण्य प्रसून वाजपेयी को एंकरिंग देखता हूं तो वह इतनी बार अपनी हथेलियों को रगड़कर गर्मी पैदा करते दिखाई देते हैं मानो वह कड़ी ठंड में आग तापने का उपक्रम कर रहे हों। यह सब वह अनजाने ही करते हैं, एक आदत-सी बन गई है। हमारे लिए बहुत से शब्द तकियाकलाम बन जाते हैं, जिन्हें वक्त-बेवक्त हम अनजाने दोहराते रहते हैं।

यह सब बताता है कि हम सहज नहीं हैं, हम संतुलित नहीं हैं और हमारी चेतना पूरी तरह से जगी नहीं है। हमारे भीतर का तनाव, हमारी बेचैनी, हमारी लापरवाही इसलिए है कि हम सोते वक्त गहरी, गाढ़ी नींद नहीं लेते। नींद ही वह उपाय है जो हमारी चेतना को जागरण के उच्च शिखर पर ले जाता है। नींद जितनी गहरी होगी, जागरण का स्तर उतना ही ऊंचा होगा। जिस रात आपको गहरी नींद आती है, सुबह आप खुद को उतना ही तरोताजा और ऊर्जावान महसूस करते हैं।

प्रतिभा और कौशल के किसी भी क्षेत्र में जब भी आप किसी को उत्कृष्ट स्तर का प्रदर्शन करते देखते हैं तो इसका मतलब है कि उसकी एकाग्रता और सजगता का स्तर बेहतर है। ऐसा उन्हीं व्यक्तियों में होता है जिन्हें अच्छी नींद आती है। क्रिकेट में हमारे कई दिग्गज खिलाड़ी भी बीच-बीच में खराब फॉर्म के दौर से गुजरते हैं। उस दौरान उनकी एकाग्रता और सजगता कम हो जाती है और वे अपनी लय खो देते हैं और अच्छा परफॉर्म नहीं कर पाते। इसका सबसे बड़ा कारण यही है कि उस अवधि में किसी कारण से वे गहरी नींद नहीं ले रहे होते हैं।

The Mystery of Sleep by Leahcim

नींद रहस्य का द्वार है, यह चेतना को एक अनजाने लोक में ले जाता है। गहरी नींद से आप जब जगते हैं तो आपको कुछ भी पता नहीं चलता कि आप कहां से लौटे हैं। बस एक परोक्ष अनुभूति आपके साथ लौटती है जो आपको मौन, शून्य और शांति का अहसास कराती है। ध्यान भी आपको उसी रहस्य के लोक में ले जाता है, जहां नींद ले जाती है। लेकिन नींद से लौटने पर उस लोक की कोई स्मृति हमारी चेतना के साथ नहीं लौटती और उसकी अनुभूति धीरे-धीरे धूमिल हो जाती है। लेकिन ध्यान में हमारा साक्षीभाव कायम रहता है और उस लोक की स्मृति हमारे साथ लौटती है। ध्यान जब समाधि की अवस्था तक पहुंच जाता है तो उस लोक की स्मृति हमारी स्थायी अनुभूति बन जाती है। जो बुद्ध होते हैं वे इस स्मृति को निरंतर बनाए रखते हैं।

जिन्हें अच्छी नींद आती है, वे अत्यंत सहजता से ध्यान भी कर सकते हैं। ध्यान की प्रक्रिया भी वही है जो नींद की है। लेकिन नींद में चेतना का साक्षीभाव कायम नहीं रहता, जबकि ध्यान में यह साक्षीभाव निरंतर कायम रहता है। चेष्टा करने से नींद नहीं आती, उसी तरह चेष्टा करके ध्यान में उतर पाना भी संभव नहीं। दरअसल जब सारी चेष्टाएँ बंद हो जाती हैं तभी नींद आती है, तभी हम ध्यान में उतर पाते हैं। आधे घंटे का गहरा ध्यान भी हमें कई घंटों की नींद जितनी ताजगी और ऊर्जा से भर देता है। हमारे महाकाव्यों में कहा गया है कि लक्ष्मण, हनुमान और अर्जुन जैसे वीरों ने नींद पर विजय पा ली थी। थकान मिटाने और नई ऊर्जा हासिल करने के लिए वे नींद के बजाय ध्यान का सहारा लेते थे।

कहते हैं कि अच्छी नींद नसीबवालों को ही आती है। आप चाहे जितनी विद्या, संपत्ति या सत्ता के स्वामी हों, नींद आपकी मर्जी से आने वाली चीज नहीं है। आप बढ़िया से बढ़िया, आरामदेह बिस्तर जुटा सकते हों, लेकिन नींद की गारंटी हासिल नहीं कर सकते। नींद के लिए हमें केवल अपने मन और शरीर की सारी चेष्टाओं को शांत करना होता है और उसे मौन, शून्य एवं शांति के अवस्था में ले जाना होता है।

क्या आपको अच्छी नींद आती है या आप भी नींद संबंधी समस्याओं से परेशान हैं? नींद लाने के लिए आप क्या उपाय करते हैं?

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12 Responses to “नींद और जागरण”

  1. on 18 Sep 2007 at 5:20 pm sajeevsarathie

    सृजन शिल्पी जी आपने बहुत अच्छे विषय पर चर्चा की है। नींद मुझे तो इतनी गहरी आती है कि सुबह तक रात के सपने भी याद नहीं रहते। नींद में भी जागृत अवस्था को कैसे पाया जाए इस पर मेरे शोध अभी जारी हैं।

  2. on 18 Sep 2007 at 5:39 pm राजीव

    सृजन जी, बहुत विचारपूर्ण लेख है। अब बुद्ध का स्तर तो पाना तो सामान्य व्यक्ति के लिये लिये लगभग असंभव ही है
    । सामान्य व्यक्ति के लिये आपने जो दृष्टांत प्रस्तुत किया है वह तो ठीक है और अभ्यास से संभव भी। नींद के बारे में लगभग सभी मनोवैज्ञानिक, चिकित्सक, दार्शनिकों और योगियों की भी यही धारणा होती हो, कदाचित्।

    आधे घंटे का गहरा ध्यान भी हमें कई घंटों की नींद जितनी ताजगी और ऊर्जा से भर देता है। ध्यान के लिये तो नहीँ कह सकता, पर हाँ 2 घंटे की अति-शांत निद्रा के बाद तो चैतन्यता का अनुभव किया है।

  3. on 18 Sep 2007 at 8:00 pm divyabh

    काफी दिनों बाद दर्शन में अध्यात्म को पीरो कर पढ़ना अच्छा लग रहा है…
    जीवन प्रयास ही है और यही सामान्य जन विद्वत जन बन जाते है… बुद्धत्व भी एक प्रयास ही था जहाँ एक शून्यता थी…।

  4. on 18 Sep 2007 at 8:10 pm अनिल रघुराज

    सृजन जी, बस यही कह सकता हूं कि बहुत गहराई है आपके चिंतन और लेखन में। अंदर और बाहर की दुनिया को साधना सचमुच तलवार की धार पर चलने जैसा है। मैंने पहली बार आपको इतने ध्यान से पढ़ा है। प्रवाह कभी थमा नहीं…एक सांस में आखिर तक पढ़ गया।

  5. on 18 Sep 2007 at 8:40 pm Pratik Pandey

    वाह! बढ़िया लेख है। ऐसा लगा मानो साक्षात ओशो आपके माध्यम से बोल रहे हों।

  6. on 18 Sep 2007 at 9:00 pm सागर चन्द नाहर

    सृजनजी
    इस लेख को पढ़ने के बाद महसूस होता है कि अभी मैं भी जागा हुआ नहीं हूँ। कई बार दुकान बंद करने के बाद घर जाते-जाते आधे रास्ते से वापस आता हूँ कि मैने सही ताला लगाया है कि नहीं, ब्लॉग पढ़ते समय अन्जाने में अंगुलियाँ चटकाते रहता हूँ।
    इस लेख को पढ़ने के बाद आप से इस लेख की अगली कड़ी की उम्मीद है जिसमें आप सही ढंग से जागृत रहने की विधि बतायेंगे।
    बहुत दिनों के बाद अच्छा चिठ्ठा पढ़ने को मिला।
    धन्यवाद!

  7. उत्तरोत्तर मैंने पाया है कि ऊर्जा क्षरण के अध्याय जीवन में कम होते गये हैं. पर बुद्ध की छाया भी बनना तो हजारों मील दूर है. केवल यही आसरा है कि यह करने को आगे भी जन्म मिलेंगे! :)

  8. on 19 Sep 2007 at 1:19 am अनामदास

    वाकई बहुत सुंदर लिखा है, जिस सहजता सरलता की बात आप कर रहे हैं वह इस लेख में भी है. बहुत पसंद आया, बात बहुत सादा लेकिन जटिल, बहुत आसान लेकिन बहुत मुश्किल है. यह बिल्कुल सही है कि नींद और चेतना का एकदम सीधा और आनुपातिक रिश्ता है.

  9. on 19 Sep 2007 at 4:01 pm प्रियंकर

    बुद्ध की भांति प्रकृतिस्थ,समाधिस्थ और स्थितिप्रज्ञ होना तो हमारे जैसे साधारण लोगों के लिये बहुत मुश्किल,बल्कि असम्भव काम है .

    कुल मिलाकर काम भी ८-१० घंटे करते हैं,कभी-कभी लंच भी भूल जाते हैं और वजन भी पिछले १५-२० साल में कमोबेश स्थिर ही रहा है,पर बहुत शांत और निर्विकार नहीं रह पाता और शाम को थकान भी महसूस होने लगती है . अच्छी बात यही है कि रात को बिस्तर पर गिरते ही नींद जबर्दस्त आती है और घोड़े बेचकर सोता हूं . सो बचा हुआ हूं .

    काश! जीवन में वैसी सहजता, संतुलन और साक्षीभाव आ सके .

    सहज शैली में लिखी इस गहन-सघन पोस्ट के लिए आपकी जितनी तारीफ़ करूं कम है .

  10. on 27 Sep 2007 at 12:17 pm अफ़लातून

    पहुँचे हुए हैं , मित्र सृजन शिल्पी । धन्यवाद ।

  11. on 01 Oct 2007 at 10:06 pm नीरज दीवान

    दिनचर्या की महत्वपूर्ण क्रिया पर अत्यंत सहज शैली में लिखा है. बधाई.
    नींद में चेतना का साक्षीभाव कायम नहीं रहता, जबकि ध्यान में यह साक्षीभाव निरंतर कायम रहता है। चेष्टा करने से नींद नहीं आती, उसी तरह चेष्टा करके ध्यान में उतर पाना भी संभव नहीं। दरअसल जब सारी चेष्टाएँ बंद हो जाती हैं तभी नींद आती है, तभी हम ध्यान में उतर पाते हैं।
    सही है. प्रेरणास्पद आलेख.
    जीवन छोटी-छोटी सी चीज़ों से बनता है. नींद सहज स्वरूप में छोटी लगती हो किंतु इसका व्यक्तित्व पर गहरा असर होता है.

  12. on 18 Oct 2007 at 8:39 pm LM

    The great Marathi poet philosopher of 14th century, Jyaneshwar has explained the word Hiranyagarbh as the Sushupti awastha and indicated it is the link between Ihlok and Paralok (beyond death)

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