RSS Feed:
Posts
Comments

तेरी सूरत मिलती नहीं किसी सूरत से
हम जमाने में तेरी तस्वीर लिए फिरते हैं।

हर व्यक्ति के मन में ऐसी कोई-न-कोई तस्वीर जरूर होती है, जरूरी नहीं कि वह व्यक्ति कलाकार भी हो। यदि वह व्यक्ति कलाकार हो तो वह उसे शब्दों, रंगों या पत्थरों के माध्यम से मूर्त रूप प्रदान कर सकता है, और यदि वह कलाकार न भी हो, तब भी वह उसे अपनी कल्पना के रंगों-रेखाओं के माध्यम से बने अमूर्त रूप में अपनी मानस-मंजूषा में संजोये रख सकता है। लेकिन दोनों ही स्थितियों में उस तस्वीर का अस्तित्व जिस एक तत्व पर सबसे ज्यादा निर्भर करता है वह है कल्पना। तात्पर्य यह कि जीवन हो या कला, दोनों में कल्पना की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। हालांकि कला की सृष्टि में विशुद्ध कल्पना यथार्थ के मूल आधार का किस अनुपात में और किस कीमियागिरी के तहत सहयोग लेती है, यह अलग से चिंतन का एक महत्वपूर्ण विषय है।

कल्पना बिंबों की सृष्टि करती है, प्रतीकों का अन्वेषण करती है और अवधारणाओं का विकास करती है। ये बिंब, प्रतीक या अवधारणाएँ सामान्य प्रत्यक्ष जीवन में असंबद्ध, अप्रासंगिक एवं अर्थहीन उपादानों के रूप में होते हैं, पर कल्पना का संस्पर्श पाकर सुसंगत, संश्लिष्ट, अर्थव्यंजक और प्रासंगिक हो उठते हैं। इसीलिए Encyclopaedia of Philosophy में कल्पना को संवेदन द्वारा प्रत्यक्ष रूप से प्राप्त नहीं हो सकने वाले मानसिक बिंबों या अवधारणाओं की निर्मात्री-शक्ति के रूप में परिभाषित किया गया है।

Imagination is generally held to be the power of forming mental images or other concepts not directly derived from sensation.

लेकिन कल्पना की यह एक सामान्य परिभाषा है। असल में कल्पना का स्वरूप, कार्य और महत्व इससे बहुत अधिक व्यापक है। इस सृष्टि का प्रयोजन क्या है, इसका नियंता कौन है, वह कैसा है – ये कुछ ऐसे बुनियादी सवाल हैं, जिनके जवाब तलाशने की कोशिश में दर्शन और अध्यात्म की अवधारणाओं का विकास हुआ है। पर इन समस्त सवालों और उनके तमाम जवाबों के मूल में जो अदृश्य प्रेरणा काम करती है, वह भी कल्पना ही है। कांट ने Critique of Judgement में कहा है -

प्रकृति के बारे में यह चिंतन कि इसका भी कोई-न-कोई प्रयोजन है, एक कल्पनात्मक उपक्रम है, हालांकि इस प्रक्रिया में कोई वास्तविक बिंब बनता नहीं दिखाई नहीं देता।

कल्पना की जरूरत सबको होती है, चाहे वह सामान्य व्यक्ति हो या कलाकार। शायद इसीलिए प्रकृति ने कल्पना-शक्ति, कम या अधिक, प्रत्येक व्यक्ति को प्रदान की है। परंतु सामान्य व्यक्ति अपने सामान्य प्रयोजनों के लिए कल्पना के जिस स्तर का प्रयोग करता है, कलाकार उससे भिन्न स्तर की कल्पना का उपयोग करता है। सैमुअल टेलर कॉलरिज ने इन दो स्तरों की कल्पना को क्रमश: प्राथमिक कल्पना (primary imagination) और उत्तरजात कल्पना (secondary imagination) की संज्ञा दी है। कोई आम व्यक्ति जिस शक्ति की सहायता से सहज रूप से बाह्य जगत के समस्त प्रपंच का निश्चयात्मक बोध प्राप्त करता है, वह प्राथमिक कल्पना है। यदि यह शक्ति न हो तो हम जीवन में देखे, सुने और अनुभव किए जाने वाले विभिन्न रूप, रस, गंध, आकार-प्रकार आदि की वस्तुओं का वास्तविक स्वरूप ही नहीं पहचान पाएंगे। कांट ने इसे चेतना की वह प्रच्छन्न परंतु अपरिहार्य क्रियाशक्ति बताया है, जिसके बिना हम किसी भी प्रकार के ज्ञान से वंचित रह जाते, लेकिन जिसके बारे में हम कदाचित ही सचेत रहते हैं।

Imagination … is the blind but indispensable function of the soul, without which we should have no knowledge, whatsoever, but of which we are scarcely ever conscious.

कल्पना इंद्रियों द्वारा प्राप्त किए गए असंबद्ध, अपूर्ण और विश्रृंखल सूचनाओं को सुसंबद्ध और संपूर्ण बना देती है। जैसे किसी घनाकार ठोस वस्तु की एक बार में तीन से ज्यादा सतहें नहीं देखी जा सकतीं, लेकिन उसे देखकर हम सहज रूप से जान जाते हैं कि उसकी छ: सतहें हैं, क्योंकि कल्पना अपूर्ण दृश्य-सूचनाओं को अपनी ओर से पूरा कर देती है। परंतु कलाकार इस प्राथमिक कल्पना के माध्यम से प्राप्त समस्त संवेदनों का सचेत रूप से सर्जनात्मक उपयोग करता है और एक समग्र एवं संश्लिष्ट प्रभाव वाली नवीन कलाकृति के रूप में उनको ढाल देता है। कलाकार के मानस में सक्रिय इसी उत्तरजात शक्ति को सर्जनात्मक कल्पना कहते हैं।

यदि कल्पना की सर्जनशीलता पर व्यापक रूप से गौर किया जाए तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह शक्ति केवल कलाकारों में ही नहीं पाई जाती वरन् ऐसे सामान्य व्यक्ति में भी पाई जाती है, जो कि कला का सहृदय भावक हो सकता है। किसी कलाकृति की रचना में ही नहीं, बल्कि उसका आनंद उठाने की प्रक्रिया में भी कल्पना की सर्जनात्मक शक्ति की भूमिका होती है। किसी कविता को पढ़ते हुए पाठक अपने मानस में कवि द्वारा संकेतित बिंबों-प्रतीकों के आधार पर मूल दृश्य और भाव तक पहुंचने की कोशिश के क्रम में एक पुनर्सृष्टि करता है और यह प्रक्रिया सर्जनात्मक कल्पना की सहायता से ही संभव हो पाती है। सार्त्र ने इसी अर्थ में कहा है कि पढ़ना एक तरह से निर्देशित सृजन है। इतना ही नहीं, उनके अनुसार तो पढ़ना आत्मनियंत्रित स्वप्न की तरह है

दूसरे शब्दों में, काव्य या किसी कलाकृति में अर्थ और भाव-विस्तार की क्षमता तथा उस क्षमता की अज्ञात संभावनाओं का बोध जिस शक्ति के कारण संभव होता है, वह कल्पना ही है। इसी से जुड़ी एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी काव्य या नाटक का देश, काल और परिस्थिति की सीमाओं को पारकर पाठक या प्रेक्षक के साथ साधारणीकरण हो जाना भी कल्पना की विलक्षण शक्ति के कारण ही संभव हो पाता है। पुराने हिन्दी फिल्मों में प्रेमी युगलों के मिलन के दृश्यों में प्रयोग किए गए बिंबों और प्रतीकों से दर्शकों को जो रसानुभूति प्राप्त होती है, उसमें भी उनकी सर्जनात्मक कल्पना की शक्ति ही कार्यशील रहती है।

आदमी जैसा सोचता है, वैसा ही बन जाता है। अपने बारे में और दूसरों के संबंध में कोई व्यक्ति जिस तरह से सोचता है, उसकी मानसिकता भी उसी प्रकार बन जाती है। यह सोचना भी एक तरह से कल्पना ही है। जाहिर है कि किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व और चरित्र के निर्माण में कल्पना की केन्द्रीय भूमिका होती है। योग में तो कल्पना की इस अद्भुत शक्ति के सहारे व्यक्तित्व के संपूर्ण रूपांतरण तक की बात भी कही गई है। यह शक्ति एकाग्रता और समर्पण के बल पर तदाकार होने की सीमा तक घनीभूत की जा सकती है। प्रेम के दारुण क्षणों में कृष्ण के राधा के रूप में और राधा के कृष्ण के रूप में परिवर्तित हो जाने की प्रसिद्ध मिथकीय एवं काव्यात्मक परिघटना को कल्पना की इस यौगिक शक्ति का प्रमाण कहा जा सकता है। सूरदास ने अपने काव्य में जिस तरह से दोनों तरफ से जलती संठी (पटसन के सूखे डंठल) के बीच में फँसे कीट के बिंब के माध्यम से इस दारुण स्थिति को जीवंत किया है, वह काव्यात्मक कल्पना की अद्भुत सर्जनात्मक शक्ति का अपूर्व उदाहरण है।

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के उपन्यासों में तो इस यौगिक शक्ति को केन्द्रीय महत्व देकर उसे अध्यात्म की चरम साधना के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। वाणभट्ट की आत्मकथा में धूम्रेश्वरी की दशभुजा पाषाण मूर्ति के साधक के संपूर्ण उत्सर्ग के प्रभाव से महामाया रानी के रूप में परिवर्तित हो जाने का प्रसंग हो या अनामदास का पोथा में जटिल मुनि के पद्मासनबद्ध सावित्री की दिव्य मूर्ति के रूप में परिणत हो जाने का प्रसंग हो, वह कल्पना की इसी यौगिक संभावना की ओर संकेत करते हैं कि मनुष्य अपने श्रद्धेय के साथ एकमेक हो सकता है। खैर, यह तो योग और परम संभावना की बात हुई। सामान्य व्यावहारिक जीवन में भी कल्पना अपनी सकारात्मक या नकारात्मक दिशाओं में तदनुकूल परिणाम सामने लाती है। कहते हैं कि नज़र बदलने से नज़ारे बदल जाते हैं और किश्ती के रुख़ पटलने से किनारे बदल जाते हैं। इसलिए बेहतर मनुष्य और बेहतर समाज के निर्माण के लिए भी श्रेष्ठ कल्पना का विशेष महत्व है। वह हमारी दृष्टि को अधिक संवेदनशील, समानुभूतिपूर्ण और उदात्त बनाती है।

(अगले अंकों में जारी….)

 आगे पढ़िए »

10 Responses to “कला, कलाकार और कल्पना”

  1. on 07 Jul 2007 at 5:47 am अनामदास

    देर आए, दुरुस्त आए. सुंदर.

  2. on 07 Jul 2007 at 8:06 am सुनीता (शानू)

    बिल्कुल सही लिखा है. हर इन्सान कल्पना करता है, कोई कम कोई ज्यादा…यदि कल्पना शक्ति खत्म हो जायेगी तो इन्सान कुछ नहीं कर पायेगा…

  3. on 07 Jul 2007 at 2:55 pm Sanjeet Tripathi

    जबरजस्त!!

  4. on 07 Jul 2007 at 5:57 pm अनुनाद

    दिमाग के तार झनझना गये। कल्पनालोक भी अनन्त है.. यह लेख भी समझने के लिये कल्पना की भारी मात्रा जरूरी है।

    (काहे इतना दिन बाद लिख रहे हैं, भाई जी?)

  5. on 08 Jul 2007 at 1:28 pm Manish

    बहुत अच्छा विषय चुना है आपने। काफी मेहनत भी की है। बस मेरी एक सलाह है कि ये विषय थोड़ा जटिल है इसलिए उसे समझाने के लिए आप जितनी सरल भाषा का प्रयोग करेंगे, पाठकों के लिए वो उतना ही ग्राह्य होगा।

  6. 1. ओह! आई थॉट यू हैड गॉन इन हाइबरनेशन! :)
    2. हर सृजन दो स्तरों पर होता है, पहले कल्पना में, फिर मूर्त.
    3. कल्पना सदा कॉंशस स्तर पर होती है, अथवा उसमें अज्ञात/जन्मांतर का भी अंश होता है, पता नहीं! शायद होता है.

  7. कला, कलाकार और कल्पना…बडा ही सकरात्मक लेख है सृजनशिल्पी जी..सारी बाते इन्ही पंक्तियो से ही समझ आ जाती है..

    ““कल्पना की जरूरत सबको होती है, चाहे वह सामान्य व्यक्ति हो या कलाकार। शायद इसीलिए प्रकृति ने कल्पना-शक्ति, कम या अधिक, प्रत्येक व्यक्ति को प्रदान की है। परंतु सामान्य व्यक्ति अपने सामान्य प्रयोजनों के लिए कल्पना के जिस स्तर का प्रयोग करता है, कलाकार उससे भिन्न स्तर की कल्पना का उपयोग करता है।“

    यहाँ भी देखेँ…
    “लियनार्दो की मोनालिसा भी ऐसे ही रची गई होगी…क्या थी, एक जीती जागती हमारी ही जैसी आँख नाक पैर वाली आम इंसान ही…तो हम क्युँ न् देख सके उसकी खूबसूरती को.. लियनार्दो ने ही क्यो देखा…उसी ने हमे उसकी खनकती/ मुस्कुराती हँसी दिखाई…उसकी मुस्कुराहट् का राज, उसकी आंखो की गहराई…और वह तमाम अनदेखे पहलू भी दिखाये थे…मोनालिसा कोई भी हो सकती है… अभी भी यहाँ हो सकती है…फर्क यही है कि हम उसे देख नही पा रहे… बरसो पहले ही दिखी थी लियनार्दो को… हमे फिर से दिख सकेगी..यदि हम यथार्थ के साथ अपनी कल्पनाओ के रंग भर देंगे.”
    http://vijendrasvij.blogspot.com/2007/07/blog-post_09.html

  8. on 27 Aug 2008 at 12:50 am Rajeev Ranjan

    likha manonuku hai, study bhi hai, sabse behtrin isme continuti aur flow hai, jo bhasha aur silap ki drishti se bejod kahi jaygi.

  9. on 27 Aug 2008 at 12:51 am Rajeev Ranjan

    badiyan

  10. on 10 Feb 2009 at 1:24 pm Hariom Kuthwaria

    कला के बारे में मैने एक कविता लिखी है कृप्या करके थोडी नजर जरुर डालिएगाl

    कला एक ऐहसास हैं
    अंधेरे मे भी राह दिखा देती हैं
    भटके हुए राही को मंजिल से मिला देती हैं

    इक सम्मान हैं
    पत्थर को भी भगवान् बना देती हैं

    इक ख्वाईश हैं
    सपनो का संसार सजा देती हैं
    रोते हुए इंसान को भी पल में हंसा देती हैं

    इक इबादत हैं
    उस मालिक से मिला देती हैं
    दुनिया की भीड़ में कुछ खास बना देती

    इक दर्पण हैं
    मन की असलियत दिखा देती है
    अच्छे-बुरे की पहचान करा देती है

    कला एक प्यास है
    जो बुझाने पर और भी बढ जाती है

    (कृति) हरिओम कुठवारिया

Trackback URI | Comments RSS

Leave a Reply