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आप सभी को बुद्ध पूर्णिमा के शुभ अवसर पर हार्दिक शुभकामनाएँ!

ओशोअमेरिकी सरकार की कैद के दौरान दिए गए धीमे जहर के घातक असर के कारण दिसम्बर, 1988 में ओशो कुछ सप्ताह तक गंभीर रूप से बीमार रहे और मरणासन्न हो चले थे। स्वस्थ होने पर उन्होंने बताया कि इस अवधि के दौरान कुछ समय तक वह गौतम बुद्ध की चेतना के वाहक बन गए थे। 26 दिसम्बर, 1988 को ओशो ने अपने प्रवचनों की श्रृंखला फिर से शुरू की और बताया कि उनके शरीर से जहर का असर अब पूरी तरह से चला गया है। समकालीन जापानी ज़ेन संन्यासिन के. इशिदा ने उनके मैत्रेय बुद्ध की चेतना के वाहक होने की पुष्टि की। उसके बाद ओशो ने भगवान रजनीश के नाम का त्याग करके ‘गौतम बुद्ध’ नाम धारण कर लिया। इस तरह उन्होंने अपने जीवनकाल में चार बार नए नाम धारण किए थे। ओशो उनके द्वारा धारण किया गया आखिरी नाम था। इस दुर्लभ परिघटना की कहानी, ओशो की जुबानी

यह ऐतिहासिक महत्व की अवधि रही।

सात सप्ताह तक मैं दिन-रात जहर से मुकाबला करने में जुटा रहा। एक रात तो मेरे चिकित्सक अमृतो को भी अंदेशा हो गया कि शायद मैं बच नहीं सकूँगा। वह मेरी नाड़ी और हृदय की गति को माप रहे थे। सात बार मेरे हृदय की गति क्षण भर को थम गई।

सातवीं बार जब मेरे हृदय की धड़कन थमी तो उसके वैज्ञानिक मन ने सोचा, “अब हम ऐसी जंग लड़ रहे हैं जो पहले ही हार चुके हैं।” लेकिन मैंने उससे कहा, “चिंतित मत हो। तुम्हारा कार्डियोग्राम गलत हो सकता है, वह महज एक यांत्रिक उपकरण है। मेरे साक्षीभाव पर भरोसा रखो। मेरे हृदय की धड़कनों की चिंता मत करो।”

सात सप्ताह तक संघर्ष करने के बाद जब मेरे शरीर का सारा दर्द चला गया तो अमृतो को विश्वास नहीं हुआ। यह एक चमत्कार की तरह ही घटित हो रहा था। सारा दर्द कहां गायब हो गया?

Lord Buddhaआखिरी रात, मध्य रात्रि में मैंने सुना कि कोई दरवाजा खटखटा रहा था। ऐसा विरले ही होता है, कोई मेरे दरवाजे को कभी नहीं खटखटाता। मैंने अपनी आँखें खोलीं। कमरे में बिल्कुल अंधेरा था, लेकिन मैंने अचानक देखा कि बंद दरवाजे से पवित्र प्रकाश का बना एक पुँज अंदर प्रवेश कर रहा था। एक क्षण के लिए वहाँ मौन छा गया, और मुझे एक आवाज सुनाई दी, “क्या मैं अंदर आ सकता हूं?” अतिथि इतना पवित्र, इतना सुगंधयुक्त था कि मैंने उन्हें अपने हृदय के मौन में प्रविष्ट होने दिया।

पवित्र प्रकाश का बना वह पुँज कोई और नहीं, स्वयं गौतम बुद्ध थे।

तुम अब भी मेरी आँखों में वह ज्योति देख सकते हो जिसे मैंने अपने भीतर आत्मसात किया है। एक ऐसी ज्योति जो पचीस शताब्दियों से धरती पर आश्रय की तलाश में भटक रही थी। मैं धन्य हो गया कि गौतम बुद्ध ने मेरे दरवाजे खटखटाए।

तुम मेरी आँखों में वह ज्योति, वह अग्नि देख सकते हो। तुम्हारा अस्तित्व भी उसी शीतल ज्योति से निर्मित है। तुम्हें इस अग्नि को धरती पर चारों तरफ ले जाना है, आँखों से आँखों तक, हृदय से हृदय तक, उस ज्योति को पहुँचाना है।

मैं यहाँ कोई नया धर्म बनाने नहीं आया हूँ। मेरा हर प्रयास सभी धर्मों को नष्ट कर देने की दिशा में है …..

मैं तुम्हारे भीतर इतनी आग भर देना चाहता हूँ कि उसमें तुम्हारा अहंकार भस्म हो जाए और साथ ही तुम्हारी दासता भी और वह तुम्हें मुक्त कर दे, तुमको स्वयं प्रकाशमान बना दे। तुम्हारी वही आँखें इस संसार की आशा हैं।

इन कुछ दिन-रातों में मेरा शरीर पवित्रीकरण की प्रक्रिया से गुजरा है। राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन और उसके अधिकारियों ने जो जहर मुझे दिलवाया था…..दुनिया भर के विष-विज्ञान के विशेषज्ञों ने कहा कि सभी प्रकार के विषों में यह एक ऐसा विष है जिसका किसी भी जाँच से पता नहीं चल सकता। और अमेरिका में सी.आई.ए. इसी जहर का प्रयोग करता है (अपने सबसे खतरनाक कैदियों के लिए), क्योंकि इसके बारे में पता लगाने का कोई उपाय नहीं है। और यदि आपको पता नहीं लगता तो आप प्रतिविष (एंटीडॉट्स) का प्रयोग भी नहीं कर सकते। मौत लगभग निश्चित ही थी।

इन लंबे दिन-रातों में मैं इस जहर की चुनौती का सामना करता रहा, केवल साक्षीभाव से। इस जहर के असर से हड्डियों के प्रत्येक जोड़ पर निरंतर पीड़ा हो रही थी, लेकिन एक चमत्कार हुआ। धीरे-धीरे सभी जोड़ों से दर्द गायब हो गया। आखिर में दोनों बाँहों में दर्द बचा रह गया था। आज वहां से भी दर्द दूर हो गया है।

मुझे महसूस हो रहा है कि यद्यपि मैं यहाँ शारीरिक रूप से उपस्थित नहीं था, तुमलोगों ने मुझे यहाँ की हवा में महसूस किया होगा। तुमने मुझे पहले से अधिक करीब से महसूस किया होगा। और तुम्हारे गीतों में भी मैं उपस्थित था। स्मरण करो कि तुम्हारे ध्यान में मैं उससे कहीं अधिक शामिल था जितना शारीरिक उपस्थिति के द्वारा हो पाना मेरे लिए संभव है।

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19 Responses to “जब बुद्ध ढाई हजार साल बाद फिर लौटे”

  1. on 02 May 2007 at 9:45 am PRAMENDRA PRATAP SINGH

    आप सभी को भी बुद्ध पूर्णिमा की हार्दिक शुभ कामनाऐं।

  2. on 02 May 2007 at 10:49 am Pratik Pandey

    बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर अच्छी प्रस्तुती है। इस व्याख्यान का वीडियो इंटरनेट पर भी मौजूद है जिसे मैंने काफ़ी पहले देखा था।

  3. on 02 May 2007 at 10:50 am मैथिली

    ओशो ने मुझे एक ऐसे समय में मानसिक संबल दिया था जब मेरे लिये जीवन के सारे रास्ते बंद हो चुके थे.
    इस लेख के लिये धन्यवाद

  4. on 02 May 2007 at 10:51 am Pratik Pandey

    इससे पहले थियोसॉफ़ी वाले भी जे कृष्णमूर्ति के बारे में ऐसा दावा कर चुके हैं, जिसे बाद में ख़ुद जे कृष्णमूर्ति ने ही सिरे से ख़ारिज कर दिया था।

  5. on 02 May 2007 at 11:08 am सृजन शिल्पी

    @ प्रतीक जी,

    थियोसॉफ़ी वालों के दावे और जे. कृष्णमूर्ति द्वारा उस दावे को ख़ारिज किए जाने के मामले में कुछ हद तक सच्चाई भी है। थियोसॉफ़िकल सोसायटी की स्थापना का एक प्रमुख मक़सद गौतम बुद्ध की चेतना के अवतरण के लिए अनुकूल और समर्थ वाहक की तलाश करना रहा था। उन्होंने जे. कृष्णमूर्ति को इसके लिए माता के गर्भ में आने के समय से ही हर तरह से तैयार करने का प्रयास किया, लेकिन जब बुद्ध की चेतना प्रवेश के लिए सम्मुख आई तो कृष्णमूर्ति ने उन्हें अपने भीतर प्रवेश की अनुमति देने से इनकार कर दिया। क्योंकि तब तक जे. कृष्णमूर्ति स्वयं ही इतने समर्थ हो चुके थे कि उन्हें किसी अन्य चेतना का वाहक बनने की जरूरत नहीं महसूस हुई। इस इनकार के बाद थियोसॉफिकल सोसायटी की दशकों की मेहनत पर पानी फिर गया और वह अपने मक़सद में विफल रहा।

    यहाँ तक कि ओशो भी बुद्ध की चेतना को अधिक समय तक धारण नहीं कर सके। 30 दिसम्बर, 1988 को ओशो ने बताया कि गौतम बुद्ध की चेतना 20वीं शताब्दी की परिस्थितियों के साथ समायोजन नहीं कर पाई और उनके अस्तित्व में से निकलकर वापस लौट चुकी है। उसके बाद उन्होंने ज़ोरबा दि बुद्धा नाम धारण कर लिया।

    मैं अगली पोस्ट में ओशो के साथ घटी इस पूरी परिघटना को हिन्दी में अनूदित करके पेश करने का प्रयास करता हूँ। यदि आप उक्त व्याख्यान की वीडियो फुटेज का लिंक उपलब्ध करा सकें तो उसे मैं यहाँ लगा देता हूँ।

  6. on 02 May 2007 at 11:41 am काकेश

    ओशो का दर्शन एक अलग तरह का दर्शन है जिसे हर कोई नहीं समझ सकता . हम भी कभी ओशो पर पागल हुए थे. भाग कर पूना तो नहीं गये पर खोज लेते थे एक कोना …एक किताब के साथ. ओशो के बारे में मिथ्या धारणाऎं अभी भी प्रचलित हैं .ओशो को बिना पढ़े नहीं समझा जा सकता . दुर्भाग्य यह है कि गलत धारणाऎं फैलाने वाले वो लोग होते हैं जिन्होने ओशो को कभी नहीं पढ़ा.

    इतने अच्छे लेख के लिये साधुवाद . अगले लेख की प्रतीक्षा है.

  7. आपको भी बुद्ध पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ!
    आज के दिन ओशो को याद करा के तो आपने एक सुखद ऐहसास दिला दिया .ओशो की अवधारणा को गले उतारना हर किसी के बूते मे नही है. धर्म को लेकर उनके तीखे तेवर कितने यथार्थ पर दिखते हैं , इसका अन्दाजा तो उनके कई प्रवचनों से आसानी से लगाया जा सकता है.हां , बुद्द को वह सहज मे ही अपने पास पाते हैं , इसमे भी कोई अतिशोयक्ति नही है.जब वह कहते हैं-

    मैं यहाँ कोई नया धर्म बनाने नहीं आया हूँ। मेरा हर प्रयास सभी धर्मों को नष्ट कर देने की दिशा में है …..

    तभी यह आभास होता है कि वह धर्म नही बल्कि धार्मिकता सिखा रहे हैं.धार्मिकता – एक बहती सरिता, सतत अपना मार्ग बदलती हुयी लेकिन अंतत: सागर तक पहुंचती हुयी .
    धर्म को लेकर ओशो कहते हैं :

    एक चट्टान अति प्राचीन हो सकती है, कहीं अधिक अनुभवी भी, लेकिन चट्टान -२ है और मृत है. यह मौसम के साथ बदलती नही , यह अस्तित्व के साथ चलती नही, यह बस पडी रहती है.क्या तुमने किसी चट्टान को नृत्य करते, गीत गाते देखा है? …..आज दुनिया मे कोई तीन सौ धर्म हैं, वे सब मृत चट्टानें हैं, वे बहते नहीं, वे बदलते नहीं, वे समय के साथ चलते नहीं. और कोई भी चीज जो मृत है तुम्हें मदद नहीं पहुंचा सकती.

  8. on 02 May 2007 at 3:11 pm अनुनाद

    आपको और सभी चिट्ठाकार बन्धुओं को बुद्ध पूर्णिमा की हर्दिक शुभकामनायें!

  9. on 02 May 2007 at 4:35 pm श्रीश शर्मा

    बुद्ध पूर्णिमा की शुभकामनाएं!

    आज तो नई बात पता चली, मैं समझता था कि ओशो हर प्रकार के आडंबर के विरोधी थे, लेकिन यहाँ मालूम हुआ कि एक समय उन्हें भी इस तरह के दावे (सत्य/असत्य वे ही जानें) करने पड़े।

    ओशो भक्तों मुझे क्षमा करना आप लोग, जहाँ तक मैं समझता हूँ ओशो ने कहा कि इंसान को किसी भी बात पर अंधविश्वास न करके खुद परखना चाहिए, लेकिन आज ओशो के अनुयायी भी खुद उसके प्रति वैसे ही कट्टर हैं जैसे कि अन्य धर्मों के लोग।

  10. on 02 May 2007 at 5:56 pm नीरज दीवान

    अहा.. लंबे समय बाद ओशो के बारे में पढ़ा. बुद्ध पूर्णिमा पर बधाई.
    @श्रीश…. सही बात है भैये. अब ओशो के नाम पर भी दुकाने खुल चुकी है. बाबा पीछे रह जाते हैं चेले चांदी काटते हैं.

  11. on 07 May 2007 at 12:24 pm अफ़लातून

    कृष्णमूर्ति फाउन्डेशन के एक विद्यालय में पढा और हमारे स्कूल छोड़ने के बहुत बाद उनकी मृत्यु हुई । वह परिसर सारनाथ की तरह वरुणा के तट पर है। कुछ शिक्षक यह बताते थे कि उस परिसर में किसी पेड़ के नीचे बैठ कृष्णमूर्ति ने कभी कहा था, ‘This is where Lord used to sit.’ लेकिन यह सब चलाया नहीं जा सकता था क्योंकि Gurudom को खारिज करने वाले दर्शन के साथ यह नहीं टिकता ।

  12. काफी बढ़िया लगा ओशो के बारे में पढ़कर।

  13. on 13 Jul 2007 at 6:12 pm हरिमोहन सिंह

    भाई लोगो
    माफी मॉंगते हुये पूछना चाहता हूँ कि ओशो की क्‍या बात है कौन है ये क्‍या करते है

  14. on 27 Nov 2007 at 8:54 pm KP Pandey

    i support with mr. shrish sharma “ओशो भक्तों मुझे क्षमा करना आप लोग, जहाँ तक मैं समझता हूँ ओशो ने कहा कि इंसान को किसी भी बात पर अंधविश्वास न करके खुद परखना चाहिए, लेकिन आज ओशो के अनुयायी भी खुद उसके प्रति वैसे ही कट्टर हैं जैसे कि अन्य धर्मों के लोग।

  15. on 19 Dec 2007 at 5:44 pm arun kumar Gautam

    One thing of Osho I impress lot. when he said that he anylysis the all religion/sact of the world but he got the Dhammpad of Budhha. He annouce the world it is my ultimate path i.e.Buddha path

    Jai Bheem
    Arun Kumar Gautam

  16. on 17 Jan 2008 at 11:49 am Shiva

    this is quite possible as we Know the Buddha soul is still waiting for suitable mediums. Jiddu experiment has failed but Osho had mentioned in the book “in search of miraclous part 2″ that still people are working so that Buddha soul gets a suitable medium.

    love
    Shiva

  17. on 21 Jun 2009 at 9:02 pm Raushan Kumar

    yak bar Gautam budh ke pas unka shisya yak katora lekar ata hai. Aur kahta hai Tathagat yah katora chamtkari hai. Yak jadugar ne apne jadu se katora ko bina hath lagaye aasman me ghumaya hai. Gautam Budh ne us katora ko pair se kuchalte huye kahte hai. “Chamtkaro ko aapni dharmnistha ka aadhar mat banao”. Ausho ji aap samjh gaye honge ki is updesh ka arth kaya hai. aapne jis chamtkar ko aane se joda hai wah kalpnik hai. Jhutha hai. Mithya hai. Kyonki Gautam budh kah chuke hai”Chamtkaro ko aapni dharmnistha ka aadhar mat banao”. Mai aap ke sath hui is ghatna ko False, Jhutha, Kalpanik mantu hui. http://www.raushankumar265.blogspot.com ya raushankumar@gmail.com pe sampark kare. Mai aapke vicharo ko padha hui. aur prabhavit hu.

  18. on 02 Mar 2010 at 2:10 pm ajay

    I really astonish , how one man can be a intellectual and to say bodhi.
    I want to read osho work and pravachn in hindi.
    If any have the material please send the message where I could able to free download.
    thanking you

  19. on 23 Apr 2010 at 6:56 am चिन्तन

    @ अजय जी ,
    http://www.oshoba.org/downloads/hindi-audio-discourses से आप ओशो के प्रवचनों को डाउनलोड कर के सुन सकते हैं ।

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